Tuesday, November 23, 2010

तो ‘जेपीसी’ का मतलब, जनता ही पहचाने चोर

न येदुरप्पा गए, न जेपीसी बनी और न संसद में शांति हुई। पीएम से मुलाकात के बाद प्रणव दा ने विपक्ष को बता दिया, जेपीसी नहीं बनाएंगे। सो नौवें दिन भी संसद नहीं चली। अब कब तक संसद ऐसे ही ठप होने को बैठती रहेगी, यह सत्तापक्ष और विपक्ष को भी मालूम नहीं। भ्रष्टाचार के भंवर में जैसी कांग्रेस, वैसी बीजेपी भी उलझी हुई। सो गैर कांग्रेस, गैर बीजेपी दलों के नेता जमकर चुटकियां ले रहे। इतिहास का जिक्र कर फरमा रहे- जेपीसी बनने से पहले बोफोर्स पर 45 दिन, हर्षद मेहता घोटाले पर 17 दिन और यूटीआई घोटाले पर 14 दिन संसद ठप रही थी। सो स्पेक्ट्रम मामले में अभी तो सिर्फ नौ दिन ही हुए। यानी इतिहास गवाह, ऐसे मामलों में सरकार को घुटने टेकने ही पड़े। पर अबके हमाम में बीजेपी-कांग्रेस एक साथ नंगी खड़ीं। अगर जेपीसी बनी और येदुरप्पा ने इस्तीफा नहीं दिया, तो भी संसद में गतिरोध बना रहेगा। यानी नैतिकता की सौदेबाजी में संसद सिसक रही। बीजेपी को जैसे ही सरकार ने जेपीसी न बनाने का इशारा किया। येदुरप्पा के इस्तीफे का मामला टाल दिया। बड़े जतन के बाद अरुण जेतली, वेंकैया ने येदुरप्पा को पार्टी का आदेश मानने के लिए राजी किया। पर मंगलवार तडक़े बीजेपी को असली नैतिकता का अहसास हुआ। बीजेपी के सूरमाओं की दलील, जब स्पेक्ट्रम मामले में जेपीसी नहीं बन रही। दो हफ्ते के हंगामे के बावजूद पीएम के कान पर जूं नहीं रेंग रही। तो बेमतलब येदुरप्पा का इस्तीफा लेकर कर्नाटक में चल रही अपनी सरकार को खतरे में क्यों डाले। येदुरप्पा ने बगावती तेवर दिखा ऐसे ही आलाकमान के माथे पर पसीने ला दिए। येदुरप्पा के समर्थन में नरेंद्र मोदी भी उतर आए। सो बीजेपी ने भविष्य के चक्कर में वर्तमान की परवाह नहीं की। कर्नाटक में अगले महीने ही पंचायत चुनाव होने। और तो और, येदुरप्पा का लिंगायत समाज पर ऐसा प्रभाव। अगर बीजेपी सख्ती से हटाने का फैसला करे, तो कर्नाटक में बीजेपी का बंटाधार तय। मंगलवार को पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग में कई येदुरप्पाई सांसदों ने आडवाणी के सामने येदुरप्पा को न हटाने की मांग की। यानी कुल मिलाकर येदुरप्पा की ताकत और जेपीसी पर केंद्र के रवैये को देख बीजेपी ने फिलहाल येदुरप्पा को अभयदान दे दिया। पर कर्नाटक बीजेपी में इतनी कलह, यह शांति अधिक लंबी नहीं। अब कर्नाटक से बेफिक्र आडवाणी ने सांसदों को इशारा कर दिया। सरकार पहली बार इस कदर घिरी, सो जेपीसी की मांग नहीं छोडऩी। पर कांग्रेस भी कम नहीं। भ्रष्टाचार पर भले जूते और प्याज वाली कहावत चरितार्थ। फिर भी जेपीसी को राजी नहीं। कांग्रेस को डर, अगर जेपीसी ने पीएम को तलब कर लिया, तब क्या होगा। सचमुच कांग्रेस ईमानदार होती, तो जेपीसी से न डरती। वैसे भी इतना बड़ा घोटाला कोई राजा अकेले नहीं कर सकता। राजा की हालत तो वैसी ही, जैसी झारखंड के पूर्व सीएम मधु कोड़ा की। खाया-पीया चार आना, गिलास तोड़ा बारह आना। कांग्रेस के एक वरिष्ठतम नामी-गिरामी नेता तो येदुरप्पा की कुर्सी न जाने से बेहद खफा दिखे। बोले- एक फ्लैट की वजह से हमारे सीएम की कुर्सी ले ली। और बीजेपी अपना सीएम नहीं हटा रही। अगर यही फार्मूला चला, तो हमारी तो पूरी केबिनेट ही खाली हो जाएगी। यानी भ्रष्टाचार के इस खेल में सब हिस्सेदार, यह मजाक में ही सही, पर कांग्रेसी नेता भी कबूल रहे। फिर भी शर्म है कि आती नहीं। सीवीसी के तौर पर थॉमस की नियुक्ति न्यायिक सवालों के घेरे में आई। तो कांग्रेस नेताओं से सुप्रीम कोर्ट जैसा ही सवाल हुआ। आखिर आरोपी को ही सीवीसी क्यों बनाया? तो कांग्रेस नेता की हद देखिए। बोले- अगर किसी डाक्टर को डायबिटीज हो जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह दूसरे डायबिटिक मरीज का इलाज नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर जब कांग्रेस नेता ऐसे मजाक बनाएं। तो फिर नैतिकता की उम्मीद करना मूर्खता ही। पर कुल मिलाकर कांग्रेस ने मन बना लिया, जेपीसी नहीं मानेंगे। सुप्रीम कोर्ट में भी पीएमओ के हलफनामे पर सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई। बुधवार को कोई उम्मीद। पर कोर्ट की जिस टिप्पणी को लेकर पीएम सवालों के घेरे में आए। उस बैंच ने मीडिया को खरी-खोटी सुना दी। बैंच के मुताबिक उन ने पीएम का नाम नहीं लिया। पर मीडिया ने गलत ढंग से पेश कर इसे राजनीतिक रंग दे दिया। मंगलवार को कोर्ट में अटार्नी जनरल और याचिकाकर्ता सुब्रह्मण्यम स्वामी के बीच दलीलों का दौर चला। तो अटार्नी जनरल ने साफ कर दिया, मुकदमा दायर करने के लिए मंजूरी की जरूरत ही नहीं थी। पर स्वामी ने दलील दी, मुकदमा दायर करने के बाद मंजूरी की बात आती। सो उन ने पहले ही यह मांग कर दी। अब कांग्रेस जेपीसी न मानने के पीछे संवैधानिक वजह गिना रही। ताकि लोगों में यह संदेश न जाए कि भ्रष्टाचार की जांच से कांग्रेस भाग रही। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने दलील दी, संवैधानिक परंपरा के मुताबिक सीएजी रपट की जांच पीएसी ही करती। यानी जेपीसी और येदुरप्पा के चक्कर में संसद का तो राम ही राखा। वैसे भी बुधवार को सबकी नजर बिहार पर होगी। सो जेपीसी का गठन होगा या नहीं, यह तो बाद की बात। पर सत्तापक्ष और विपक्ष के इस नैतिक खेल में अब जनता ही जेपीसी। संसद चलाने को भले दोनों के बीच कोई सौदेबाजी हो जाए। पर असली जेपीसी तो तब होगी, जब जनता पहचानेगी चोर।
----------
23/11/2010

Monday, November 22, 2010

अब बने जेपीसी और जाएं येदुरप्पा, तो ही संसद में शांति

कहते हैं आदतें बदली जा सकतीं, पर लत नहीं छूट सकती। शायद कांग्रेस को जूते और प्याज खाने की लत पड़ चुकी। सो न सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां असर कर रहीं, न नैतिकता झकझोर पा रही। अभी टू-जी स्पेक्ट्रम का पेच सुलझा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी पी.जे. थॉमस की नियुक्ति पर सवाल उठा दिए। मनमोहन सरकार ने विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आपत्ति को ताक पर रखकर थॉमस के लिए वीटो लगा दिया। तब कांग्रेस ने बीजेपी को खूब खरी-खोटी सुनाई थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने हू-ब-हू वही कहा, जो विपक्ष की नेता ने कहा था। थॉमस के खिलाफ पॉम आयल घोटाले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी। पर तब होम मिनिस्टर चिदंबरम ने भी थॉमस को क्लीन चिट दी थी। अब चीफ जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा की रहनुमाई वाली बैंच ने सीधा पूछ लिया- एक अभियुक्त सतर्कता आयुक्त कैसे हो सकता? बैंच ने माना, आपराधिक मुकदमा झेल रहा व्यक्ति अगर सीवीसी होगा, तो हर कदम पर सवाल उठेंगे। जब वह खुद आपराधिक मामले में अभियुक्त होगा, तो दूसरे की फाइल कैसे बढ़ाएगा? कोर्ट ने केंद्र सरकार को याद दिलाया, सीबीआई भी सीवीसी को रिपोर्ट करती। पर अटार्नी जनरल ने अपने आका की बेशर्मी भरी भाषा का इस्तेमाल किया। दलील दी, अगर नियुक्ति के मूल मानदंड के मुताबिक सवाल उठने लगे। तो संवैधानिक पद पर किसी की भी नियुक्ति नहीं हो पाएगी। क्योंकि किसी की भी नियुक्ति को चुनौती दी जा सकती है। यों अटार्नी जनरल तो महज सरकारी मुलाजिम। पर कांग्रेस ने टू-जी की तर्ज पर सीवीसी के मामले में भी कह दिया- शर्मिंदगी जैसी कोई बात नहीं। यों कांग्रेस की दलील भी सही। जब शर्म को कोई स्पेक्ट्रम बनाकर बेच खाए, तो शर्मिंदगी कैसी। गवर्नरों का मामला हो या मुख्य चुनाव आयुक्त का। कांग्रेस ने कभी लोक-लाज की परवाह नहीं की। विपक्ष ने एड़ी-चोटी एक कर ली। पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का क्या बिगड़ा? बूटा सिंह, सिब्ते रजी, एससी जमीर जैसे जेहादी गवर्नरों ने कैसी संवैधानिक निष्ठा दिखाई, किसी से छुपी नहीं। पर सवाल कांग्रेस से, क्या संवैधानिक पदों पर बूटाओं, चावलाओं से दूर नजर क्यों नहीं दौड़ा पाती? ताकि विपक्ष की हर धार भोंथरी हो सके। याद करिए, वाजपेयी राज में हुए राष्ट्रपति चुनाव का वक्त। कैसे वाजपेयी ने गुजरात दंगों की स्याह हटाने के लिए राष्ट्रपति पद पर एपीजे अब्दुल कलाम का नाम प्रस्तावित किया। कैसे कलाम के नाम पर ऐतिहासिक राजनीतिक एकता बन गई। पर कांग्रेस कभी बूटाओं, चावलाओं से ऊपर नहीं उठती। लोकतंत्र की मर्यादा की फिक्र होती। तो इमरजेंसी के बाद बने शाह कमीशन ने चावला का जो इतिहास लिखा। उसके बाद किसी राजनीतिक दल से ऐसी जिद की उम्मीद नहीं। पर कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी की सिफारिश के बावजूद चावला को बरकरार रखा। कांग्रेस की ऐसी राजनीतिक धौंस की कहानी अनेक। पर पाप का घड़ा कभी न कभी तो फूटता ही है। सो स्पेक्ट्रम, आदर्श, कॉमनवेल्थ और अब सीवीसी का मामला। कांग्रेस पर एक साथ लाठियां बरस रहीं। सो बेचारी कांग्रेस किस-किस का जवाब दे। संसद की कार्यवाही तो तीसरे हफ्ते भी लकवाग्रस्त। पर भ्रष्टाचार के भूचाल को थामने के लिए कांग्रेस जेपीसी तक को राजी नहीं। जब कांग्रेस खुद को ईमानदार मान रही। तो कोई और जांच हो या जेपीसी, परहेज क्यों? पर सोमवार को भी संसद के गतिरोध पर कोई फैसला नहीं हो सका। अलबत्ता पिछले मंगलवार और अब सोमवार को हुई सर्वदलीय मीटिंग के बीच कांग्रेस बुरी तरह घिर गई। सोमवार को विपक्ष के साथ-साथ लेफ्ट और सरकार की सहयोगी तृणमूल ने भी जेपीसी की मांग कर दी। पर प्रणव दा ने पीएसी के साथ बहुउद्देश्यीय जांच एजेंसी का प्रस्ताव रखा। सो नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। सुषमा स्वराज ने रिलायंस से जुड़ी नीरा राडिया के टेप को आधार बनाकर दो-टूक कह दिया- अब जेपीसी के बिना कुछ भी संभव नहीं। उन ने कहा- ताजा खुलासे से अब ऐसा लग रहा, लोकतंत्र के चारों स्तंभ लडख़ड़ा गए। मीडिया और कारॅपोरेट जगत की सांठगांठ से मंत्री बनाने और विभाग देने की बात का खुलासा हो रहा। यानी अब सरकार का जेपीसी से बचकर भागना मुमकिन नहीं। पर चेहरा बचाने को अब बीजेपी से गुहार लगा रही। बीजेपी ने कर्नाटक के सीएम येदुरप्पा को विदा करने का मन बना लिया। पर येदुरप्पा की बगावत से परेशान। फिर भी बीजेपी नेताओं को उम्मीद, मान-मनोव्वल कर येदुरप्पा को हटाएंगे। ताकि संसद में बीजेपी निशाने पर न आ जाए। सरकार ने जेपीसी का इशारा विपक्ष को कर दिया। पर येदुरप्पा की वजह से मुश्किलें होंगी। सो माना जा रहा, मंगलवार को पहले बीजेपी की ओर से येदुरप्पा के इस्तीफे का एलान होगा। फिर सरकार जेपीसी को हरी झंडी दिखाएगी। सो कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन ने सोमवार को साफ कहा- हमारी नजर कर्नाटक पर। यानी मंगलवार को संसद का गतिरोध टूटने और सब कुछ मंगलमय होने की उम्मीद। सरकार के पास अब कोई विकल्प भी नहीं। मंगलवार को ही पीएम के हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई। सो कोर्ट का रुख सत्र का भविष्य तय करेगा। फिलहाल सोमवार को पीएम मनमोहन और सीएम येदुरप्पा पुट्टापार्थी जाकर सत्य साईंबाबा का आशीर्वाद ले आए। मनमोहन के इस्तीफे की तो कोई बात नहीं। येदुरप्पा मुद्दे पर बीजेपी में राजस्थान दोहरा रहा।
----------
22/11/2010

Saturday, November 20, 2010

तो पीएम कागज से, राजा खजाने से खेलते रहे!

'चुप-चुप खड़े हो, जरूर कोई बात है...।' घोटालों पर खामोशी को विपक्ष ने मौन स्वीकृति करार दिया। तो पहले सोनिया गांधी और अब खुद मनमोहन ने भी लंबी चुप्पी तोड़ दी। जब एटमी डील पर मनमोहन चौतरफा घिर गए थे। तो एचटी समिट में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने लाचारी भरी टिप्पणी की थी। तब दोनों ने एक सुर में कहा था, एक डील न होने से जिंदगी खत्म नहीं होती। पर जब मनमोहन ने डील को अपनी आन का मुद्दा बना लिया। तो लेफ्ट की समर्थन वापसी के बावजूद पूरा करके दम लिया। भले सरकार बचाने को सांसदों की जमकर खरीद-फरोख्त हुई। सत्ता की खातिर नैतिकता को ठेंगा दिखा दिया। लोकसभा में करोड़ों की गड्डियां लहराई गईं। तब मनमोहन ने सरकार बचाने की खातिर हुए इस भ्रष्टाचार पर आंखें मूंद लीं। अब भ्रष्टाचार के मौसम की चपेट में खुद पीएम आ गए। तो दो हफ्ते तक संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढऩे के बाद एचटी समिट में ही पीएम ने जुबान खोली। तो जैसी लाचारगी एटमी डील के वक्त मनमोहन के बयान में थी। अबके उससे कुछ अलग नहीं। भ्रष्टाचार के मुद्दे ने सरकार को इस कदर घेर लिया। अब बाहर निकलने का रास्ता नहीं दिख रहा। सो पीएम ने न सिर्फ विपक्ष से संसद चलने देने की अपील की। अलबत्ता घोटाले के दोषियों को न बख्शने का भरोसा भी दिलाया। पर संसद आखिर कैसे चलेगी, जब विपक्ष की जेपीसी की मांग को न नकारा, न स्वीकारा। बोले- संसद का सत्र चल रहा। सो जेपीसी पर यहां बोलना सही नहीं। अब आप खुद अंदाजा लगा लें, अगर सरकार बैकफुट पर न होती, तो किसी भी मंच से जेपीसी खारिज कर देते। प्रणव दा तो लगातार इस मांग को खारिज कर रहे। पर जैसे पीएम ने तेल और तेल की धार देखते हुए जेपीसी पर चतुराई भरा बयान दिया। प्रणव दा भी कुछ ऐसा ही करते। बाहर इनकार, पर उन ने अब तक विपक्ष को जेपीसी न मानने का औपचारिक जवाब नहीं दिया। यानी सरकार की हालत कितनी पतली, बतलाने की जरूरत नहीं। सो विपक्ष भी आक्रामक हो चुका। अब सीधे पीएम पर निशाना साधा। तो इशारों में ही पीएम के इस्तीफे की भी मांग कर दी। पर अपनों का कुकर्म बीजेपी को कर्म ही पूजा नजर आ रहा। कर्नाटक के सीएम येदुरप्पा का पाप जगजाहिर। फिर भी बीजेपी ने अभय दान दे दिया। शुक्रवार की आधी रात तक मीटिंग चली। पर बीजेपी के भ्रष्टाचार का पैमाना देखिए। दलील दी गई, जब केंद्र में सरकार न जेपीसी मान रही, न पीएम के इस्तीफे की हलचल। सो येदुरप्पा की बलि लेकर थोथी नैतिकता दिखाने का कोई मतलब नहीं। यानी नैतिकता की राजनीतिक परिभाषा यही, पहले तुम, फिर हम। येदुरप्पा ने तो बेंगलुरु पहुंच कर बेशर्मी भरा बयान भी दे दिया। बोले- आरोप लगने वाले कितने मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों ने अब तक इस्तीफा दिया। खुद को पाक-साफ बता इस्तीफे से इनकार किया। पर कोई पूछे, जब इतने पाक-साफ थे। तो जमीन लौटाई क्यों? पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी की आड़ में फिलहाल बीजेपी की तोप गोले दाग रही। सो अब सबकी निगाह मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर। सुप्रीम कोर्ट ने पीएम की चुप्पी पर सवाल उठाए थे। तो शनिवार को हलफनामा देकर पीएमओ ने सफाई दे दी। टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में पूरी क्रोनोलॉजी यानी तारीखवार ब्यौरा सौंप दिया। सुब्रहमण्यम स्वामी की सभी छह चिट्ठियों पर पीएमओ में हुए विचार और संबंधित विभाग को भेजने का हवाला दिया। यानी पीएमओ ने सरकारी प्रक्रिया के तहत अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह किया। अब कोर्ट पीएमओ के हलफनामे से संतुष्ट होगा या नहीं, यह मंगलवार को मालूम पड़ेगा। पर याचिका कर्ता स्वामी ने भी कबूला, पूरे मामले में पीएम गुनहगार नहीं। पर सवाल, देश का मुखिया सिर्फ कागजी कार्रवाई ही करता रहा? लूटने वाले अपनी जेब भरते रहे। पर पीएम ने सब कुछ जानकर भी अनजान होने का रुख क्यों अपनाया? हलफमाने का निचोड़ यही, पीएमओ कभी चुप नहीं रहा। अलबत्ता लेटरबाजी करता रहा। अब मनमोहन इम्तिहान की घड़ी बता रहे। पर इस चुनौती के लिए जिम्मेदार कौन?
----------
20/11/2010

Friday, November 19, 2010

तो दूसरी पारी में कांग्रेस बढ़ी, नैतिकता सिकुड़ी!

तो जेपीसी पर संसद का दंगल नहीं थमा। टू-जी ने सरकार का ऐसा वन-टू का फोर किया, पीएम की जुबां नहीं खुल रही। कांग्रेसी अब बेबाक कह रहे, सिर्फ कोर्ट में जवाब देंगे। सचमुच सुप्रीम कोर्ट ने दिन में तारे न दिखाए होते। तो विपक्ष के तेवर कांग्रेस कबका पस्त कर चुकी होती। पर कोर्ट का डंडा ऐसा चला, कांग्रेस की सांस उखड़ रही। तो विपक्ष को मानो संजीवनी मिल गई। सो विपक्ष ने खम ठोक दिया- जेपीसी नहीं, तो संसद की कार्यवाही भी नहीं। पर सत्तापक्ष से प्रणव मुखर्जी भी पीछे नहीं रहे। एलान कर दिया- जेपीसी मंजूर नहीं। विपक्ष पहले पीएसी की रपट का इंतजार करे। प्रणव दा ने विपक्ष से एक बार फिर संसद चलने देने की अपील की। सोमवार से पहले एक और कोशिश करेंगे। फिर भी बात न बनी, तो शीत सत्र को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने का विकल्प भी खुला। सो सरकार के साथ-साथ विपक्ष भी पसोपेश में, आखिर बाकी मुद्दों का क्या होगा। पर फिलहाल जैसी रार ठनी, गतिरोध खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे। भ्रष्टाचार की बयार ऐसी चल रही, कोई बच नहीं पा रहा। विपक्ष संसद में हावी, पर कर्नाटक में बीजेपी का कुकर्म परेशान कर रहा। यों शुक्रवार को सीएम येदुरप्पा के परिजनों ने सरकारी जमीन वापस लौटा दी। पर बीजेपी अभी भी कार्रवाई से बच रही। येदुरप्पा दिल्ली तलब किए गए। पर न्यायिक जांच की आड़ में कुर्सी बचाने की कोशिश हो रही। अब आप खुद ही देख लो। जमीन डिनोटीफाई कर अपनों को रेवड़ी बांटने के मामले की जांच का एलान हुआ। पर पिछले दस साल तक के मामले जांच के दायरे में होंगे। यानी सरकारी जमीन को कौडिय़ों के भाव लुटाने के मामले में बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस-जेडीएस भी शामिल। पर सवाल, क्या बीजेपी को नैतिकता नहीं दिख रही? यों शुक्रवार को एसएस आहलूवालिया ने एलान कर दिया- हमारा सीएम दोषी पाया गया, तो निकाल बाहर करेंगे। पर बीजेपी भूल रही, अशोक चव्हाण अभी दोषी पाए नहीं गए थे। नैतिकता तो सचमुच सिर्फ कहने की बात। सत्ता के लिए सब कुछ करेगा का फार्मूला ही सबके लिए। राजनीति में तो नैतिकता अब कहने भर की भी नहीं रही। सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए किसी को शिबू सोरेन से हाथ मिलाने में हिचक नहीं। तो कोई रेड्डी बंधुओं के नखरे सहने को तैयार। कभी राजीव हत्याकांड पर बने जैन कमीशन की रिपोर्ट में डीएमके पर उंगली उठी। तो कांग्रेस ने संयुक्त मोर्चा की सरकार गिराने में देर नहीं की। फिर डीएमके ने सत्ता के शिखर तक पहुंची बीजेपी का दामन थाम मलाई काटी। फिर 2004 में वही डीएमके कांग्रेस के साथ खड़ी हो गई। यूपीए-टू में मनमोहन और कांग्रेस थोड़ी मजबूत हुई। तो मनमोहन ने ए. राजा और टीआर बालू को मंत्रालय में न लेने का विचार रखा। पर मनमोहन की नहीं चली। मनमोहन तो सिर्फ कांग्रेस की ओर से पीएम पद पर मनोनीत व्यक्ति। असल में नेता तो सोनिया गांधी। सो सत्ता के लिए सोनिया गांधी ने तब जो समझौता किया, आज उसके काले छींटे मनमोहन पर पड़ रहे। सो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के कर्ताधर्ता ए. राजा के मामले में पीएम मनमोहन से बड़ी जवाबदेही सोनिया गांधी की। पर सरकार के मुखिया होने के नाते विपक्ष और न्यायपालिका की तोप मनमोहन की ओर घूमी हुई। सो सवालों के लपेटे में कांग्रेस का राज दरबार न आ जाए, इसलिए कांग्रेस का शीर्ष ब्रिगेड मनमोहन के बचाव में उतर आया। जनार्दन द्विवेदी ने तो पहले ही एलान कर दिया- पीएम के साथ थे, हैं और रहेंगे। अब शुक्रवार को राहुल गांधी ने भी बचाव किया। तो बोले- पीएम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में शर्म की कोई बात नहीं और ना ही पीएम के लिए कोई असहज स्थिति। अब अगर राहुल की बात छोड़ दें। तो राजनीति में शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं। अगर शर्म की बात होती, तो ए. राजा की जगह संचार मंत्रालय संभालने वाले कपिल सिब्बल यह नहीं कहते, दुनिया में हर जगह भ्रष्टाचार है। उन ने पीएमओ की कलई खोलने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी की हैसियत पर भी सवाल उठा दिए। पर सवाल, क्या किसी हैसियत वाले आदमी को ही पीएम से सवाल पूछने का हक? अब शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में पीएम के जवाब पर सबकी निगाह होगी। पर फर्क देखिए, शुक्रवार को जहां राहुल ने कोर्ट की टिप्पणी से शर्मिंदगी को अलग कर दिया। वहां मां सोनिया गांधी राजनेता कम, दार्शनिक अंदाज में प्रवचन देतीं दिखीं। इंदिरा गांधी की जयंती पर तीन मूर्ति भवन में समारोह हुआ। तो उन ने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब देखिए। आर्थिक तरक्की के बीच नैतिकता का पतन हुआ। लालच और भ्रष्टाचार बढ़ा और नैतिकता सिकुड़ी। देश में करोड़पति बढ़े, तो गरीबी भी बढ़ी। करोड़ों लोग दो जून की रोटी नहीं जुटा पा रहे। विकास ही सब कुछ नहीं। हम कैसा समाज चाहते हैं, यह सोचना होगा। आजादी के सिद्धांतों से खिलवाड़ हुआ। यानी कुल मिलाकर सोनिया ने तरक्की का सेहरा मनमोहन के सिर बांधने की कोशिश की। भ्रष्टाचार का सेहरा राजा के सिर। पर सवाल, पिछले छह-सात साल से कांग्रेस की ही सरकार। फिर गरीबी-अमीरी का फासला क्यों बढ़ा। नैतिकता के पतन पर नकेल क्यों नहीं कसी? देश में महंगाई हुई, तो विकास की चादर में ढक दिया। अब भ्रष्टाचार को भी विकास की चादर में ढांपने की कोशिश। तो ऐसे प्रवचन को अपना नमन।
----------
19/11/2010

Thursday, November 18, 2010

तो कांग्रेसी पाप का घड़ा कब तक ढोएंगे मिस्टर क्लीन?

देश से गांव, गांव से देश की यात्रा यों तो महज हफ्ते-दस दिन की रही। पर इस बीच देश में बहुत कुछ घट गया। अभी भी अपना गांव राजनीतिक कोलाहलों से अनजान त्योहारी मौसम में ही रमा हुआ। गांव में कार्तिक स्नान का दौर चल रहा। पर देश का मौसम स्कैम, स्कैंडल और करप्शन के रंग में ऐसा डूबा हुआ, मानो घोटालों की सेल लगी हो। हर कोई भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाता दिख रहा। क्या डीएम, क्या सीएम और क्या पीएम, कोई अछूता नहीं। ‘आदर्शवादी’ अशोक चव्हाण को कांग्रेस ने सचमुच का आदर्श बना दिया। जिस दिन बराक ओबामा ‘इंडिया’ को स्थायी सीट की झप्पी दे ‘भारत’ में अपना माल खपाने का जुगाड़ कर गए। उसी शाम अशोक का ताज छीन शोक मनाने के लिए छोड़ दिया। कांग्रेस ने नजीर पेश करने की कोशिश की। फौरन राहुल गांधी का बयान आ गया- अब साफ छवि का व्यक्ति ही सीएम होगा। सो एक चव्हाण चूके, तो इतिहास नहीं, वर्तमान के पृथ्वीराज चव्हाण को राज मिल गया। पर भ्रष्टाचार की अम्मा कांग्रेस कब तक खैर मनाती। महाराष्ट्र में आदर्श सोसायटी घोटाला और कॉमनवेल्थ घोटाले का शोर अभी थमा भी नहीं। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की परतें तेजी से उधड़ीं। तो सबसे पहले घोटालों के राजा केबिनेट मंत्री ए. राजा की छुट्टी हुई। बकरीद से पहले सुप्रीम कोर्ट ने पीएम पर ऐसी तल्ख टिप्पणी की। कांग्रेस हलाल हुई, पर उफ तक नहीं कर पाई। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में देश को पौने दो लाख करोड़ का चूना लगा। पर तमाम घटनाक्रम में पीएम की चुप्पी को लेकर कोर्ट ने सवाल उठाए। तो राजनीतिक भूचाल आ गया। सो बीजेपी ही नहीं, समूचे विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया। सभी घोटालों की जांच के लिए जेपीसी की मांग कर दी। पर कांग्रेस जेपीसी के लिए राजी नहीं। सो संसद के शीत सत्र को मानो (शीत) ठंड लग गई। लगातार छठे दिन भी संसद नहीं चली। गतिरोध खत्म करने की कोशिशें हो चुकीं। पर दोनों पक्षों ने रार ठान ली। सो गतिरोध जस का तस बरकरार। यों भले छठवें दिन भी संसद नहीं चली। पर हालात इतनी तेजी से बदले कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों के छक्के छूट रहे। नैतिकता और लोकतंत्र की दुहाई दे रही बीजेपी को अपनी करनी और कथनी परेशान कर रही। केंद्र में बीजेपी जेपीसी की मांग कर रही। तो कर्नाटक में बीजेपी की येदुरप्पा सरकार जमीन घोटाले में फंस गई। पहले तो येदुरप्पा ने दस्तावेज जारी कर सफाई दी। जमीन डिनोटीफाई करने का काम पहले के भी सीएम करते रहे। यानी उनने मान लिया, हमाम में सभी नंगे। फिर भी नितिन गडकरी ने येदुरप्पा को क्लीन चिट दे दी। पर नैतिकता के भूत ने बीजेपी की लंगोटी पकड़ ली। तो अब येदुरप्पा ने अपने परिजनों की ओर से कौडिय़ों के भाव खरीदी गई सरकारी जमीन लौटाने का एलान कर दिया। पर यही काम तो आदर्श घोटालेबाज अशोक चव्हाण ने भी किया था। तब बीजेपी क्यों नहीं मानी। यों कर्नाटक की सियासत में जितने भी ट्विस्ट आ रहे, सब बीजेपी की अंदरूनी खींचतान का ही नतीजा। पर बात दिल्ली के राजनीतिक धमाल की। सुप्रीम कोर्ट ने भले पीएमओ को नोटिस जारी नहीं किया। पर पीएम को जवाब दाखिल करने के लिए शनिवार तक का वक्त देना भी किसी नोटिस से कम नहीं। सो सरकार ही नहीं, समूची कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी। बात सिर्फ ए. राजा तक सीमित रहती, तो कांग्रेस मोर्चा संभाल लेती। पर मनमोहन की चुप्पी को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठा दिए। जो बात जनता के दिल में थी, कोर्ट ने जुबान से कह दी। सो मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं, अब न्यायिक हो गया। पीएमओ की ओर से शनिवार को हलफनामा दाखिल होगा। जिसमें टू-जी स्पेक्ट्रम के बारे में पूरा ब्यौरा होगा। ताकि पीएम की चुप्पी पर सवाल न उठे। पर स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट की टिप्पणी के बाद मनमोहन पर राजनीतिक हमले भी तेज हो चुके। आडवाणी ने पीएम से सफाई मांगी। तो गुरुवार को सीताराम येचुरी ने भी कहा- जब इस्तीफा देने वाला मंत्री कह रहा, सब कुछ पीएम की जानकारी में हुआ। तो पीएम को संसद में सफाई देनी होगी। अब मनमोहन की छवि दांव पर। मिस्टर क्लीन कहलाने वाले मनमोहन आखिर क्या करें। राजनीति में छवि बनाने से बड़ी चुनौती उसे बरकरार रखने की। वाजपेयी ने छह दशक में जो छवि बनाई। बतौर पीएम गुजरात दंगे ने एक कलंक लगा दिया। वाजपेयी तो तभी नरेंद्र मोदी को हटाना चाहते थे। पर पार्टी की वजह से चुप रहना पड़ गया। यही हाल मनमोहन का, जिन ने पहले टर्म में न सही, पर दूसरे टर्म में डीएमके कोटे से टीआर बालू और ए. राजा को केबिनेट में शामिल न करने का खम ठोक दिया था। पर पार्टी नेतृत्व की वजह से समझौता करना पड़ा। तो बालू न सही, राजा की ताजपोशी हो गई। अब राजनीतिक मजबूरी की वजह से सत्ता में कई लुटेरे हिस्सेदार हो गए। सो मनमोहन चुप रहे। अब पार्टी के पाप का ठीकरा मनमोहन की पगड़ी पर फूट रहा। पर इस छवि के साथ क्या मनमोहन पीएम रहना पसंद करेंगे? अगर रहेंगे, तो हंसी के पात्र ही बनेंगे। हो न हो, मनमोहन ने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी हो। पर कांग्रेस की मजबूरी, अभी राहुल कुर्सी के लिए पूरी तरह तैयार नहीं। गर मनमोहन हटे, तो फिर जबर्दस्त सफाई अभियान चलाना पड़ेगा। पर मनमोहन ने अंतरात्मा की मान कुर्सी छोड़ी, तो छवि सचमुच बनी रहेगी। पर फिलहाल अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव की तरह मनमोहन भी मौनी बाबा बने हुए।
---------
18/11/2010

Thursday, November 4, 2010

गरीबों को ‘दीया’ छीन कब तक जलेगा चिराग?

त्योहारी सीजन का यही अनोखापन, कब वक्त बीत जाता, पता भी नहीं चलता। अपने नेताओं के झूठे वादों की तरह नहीं, जिसके इंतजार में उम्र निकल जाती। पर वादा निभाने का दिन कभी नहीं आता। तभी तो गरीबी के अभिशाप को मिटाने की कभी ईमानदार कोशिश नहीं हुई। अगर गरीबी दूर हो गई, तो फिर राजनेताओं को तो वोट के लाले पड़ जाएंगे। सो गरीबी ऐसा पटाखा हो गई, जिसे चुनावों में हर नेता फोड़ जश्न मनाता। एक चुनाव में हाथ अगर गरीब के साथ होता, तो अगले चुनाव में नारा बदल आम आदमी के साथ हो जाता। कोई दल कभी हिंदुत्व का झंडा उठाता। तो अगले चुनाव में राष्ट्रवाद का नारा। यानी शब्दों की जुगाली तो कोई नेताओं से सीखे। सो आम आदमी कहो या गरीब, अब महंगाई पर सरकार से किसी करिश्मे की उम्मीद नहीं कर रहा। अलबत्ता महंगाई को आत्मसात कर त्योहार मना रहा। आखिर जनता निकम्मी सरकारों से उम्मीद भी क्या करे। जब चुनावी मौसम होता, तो तोहफों की बारिश कर देते। पर जैसे ही सत्ता मिल जाती, नशा सिर चढक़र बोलने लगता। वैसे भी अबके दिवाली के मौके पर मनमोहन सरकार को त्योहार से अधिक बराक ओबामा दौरे की फिक्र। सो सरकारी अमला त्योहारी छुट्टी के बावजूद दौरे की तैयारी में जुटा। बीजेपी ने ओबामा की संरक्षणवादी नीति पर विरोध दर्ज कराने का एलान कर दिया। तो विदेश सचिव निरुपमा राव ने भोपाल त्रासदी के गुनहगार वारेन एंडरसन को छोटा मुद्दा बता दिया। निरुपमा बोलीं, एंडरसन से भी बड़े मुद्दे हैं, जिन पर राष्ट्रपति ओबामा से बात होगी। अब इसे संवेदनाशून्य बयान न कहें, तो क्या कहें। जिस त्रासदी ने भोपाल के लोगों की कई पीढी तबाह कर दी। उसके मुख्य गुनहगार को भारत लाने की बात अपने विदेश मंत्रालय की नजर में ऐरा-गैरा मुद्दा। वैसे कांग्रेसी सरकार से उम्मीद भी क्या। जब भरी संसद में वारेन एंडरसन को भगाने के रिकार्ड नहीं होने का एलान कर दिया गया। तो अब क्या उम्मीद? पर पिछली दिवाली से इस दिवाली राजनीतिक उथल-पुथल इस बात का सबूत कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं होता। पिछले साल दिवाली के वक्त बीजेपी तमाम झंझावातों से गुजर रही थी। महंगाई, आर्थिक मंदी और आतंकवाद जैसे मुद्दों के बावजूद लोकसभा चुनाव की हार ने बीजेपी को इतना हिला दिया था कि नींव हिलने लगी थी। राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से वसुंधरा राजे के इस्तीफे को लेकर तबके अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने घोड़े खोल रखे थे। याद करिए, 17 अक्टूबर की दिवाली से ठीक पहले धनतेरस के दिन 15 अक्टूबर को पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग में कैसे लालकृष्ण आडवाणी ने वसुंधरा से इस्तीफा लेने का फैसला वापस लेने की अपील की। पर राजनाथ सिंह ने आडवाणी तक की अपील खारिज कर दी थी। बोर्ड की मीटिंग में तनाव इस कदर बढ गया कि चार घंटे तक मंथन चलता रहा। पर धनतेरस के दिन बीजेपी अब महिला नेत्रियों पर कोई अहम फैसले से परहेज करती। उमा भारती को 10 नवंबर 2004 को धनतेरस के दिन ही सस्पेंड किया था। यानी पिछली दिवाली बीजेपी अपना ही दिवाला निकालने में लगी थी। पर कैडर बेस पार्टी होने का यही फर्क होता। साल भर बाद ही दिवाली में बीजेपी में शांति का माहौल। बीजेपी नेताओं ने बड़े इत्मिनान के साथ दिवाली मनाई। पर पिछले साल सत्ता में वापसी के बाद दिवाली पर घी का दीया जलाने वाली कांग्रेस इस बार फटेहाल। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी तक आ चुकी। पर ए. राजा को संचार मंत्रालय से हटाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही कांग्रेस। कॉमनवेल्थ घोटाले और मुंबई आदर्श सोसायटी घोटाले के तो वाकई क्या कहने। भ्रष्टाचार के मुद्दे ने कांग्रेस को इस कदर घेर रखा कि अब कांग्रेस कुछ कहने के बजाए, दबी जुबान कहती फिर रही- भ्रष्टाचार को जिंदगी का हिस्सा हो चुका। अब दबी जुबान ही सही, कोई सत्ताधारी पार्टी ऐसी सोच रखती हो। तो आप उससे देश हित की क्या उम्मीद रखेंगे? पर वक्त का पहिया घूमने में देर नहीं लगती। तभी तो पिछली दिवाली बीजेपी टेंशन मेें थी। तो अबके कांग्रेस फटेहाल दिख रही। भ्रष्टाचार से धन तो जुटा लिए। आम आदमी का पैसा अपनी जेब में भर लिया। जनता गरीबी और महंगाई के बोझ तले दबी। पर कांग्रेस भ्रष्टाचार को पनाह देने में लगी हुई। अब सवाल, आम आदमी का ‘दीया’ छीन कांग्रेस कब तक अपना ‘चिराग’ जलाएगी? भ्रष्टाचार की हांडी तो एक-न-एक दिन फूटेगी ही। चारा घोटाले वाले लालू आज किस कदर पानी मांग रहे। बोफोर्स ने कैसे देश में तख्ता पलट कर दिया। यह किसी को भी नहीं भूलना चाहिए। पर राजनीति की बातें तो होती रहेंगी। फिलहाल दीपावली की आप सबको ढेर सारी शुभकामनाएं।
---------
04/11/2010

Wednesday, November 3, 2010

लुटे-पिटे ओबामा से भला कैसी उम्मीद?

तो धनतेरस भी बीत गया। बाजारों में खूब रौनक रही, लोगों ने दिल खोलकर खरीददारी की। भले भारत दो हिस्सों दिखता हो, जैसा खुद राहुल गांधी कह रहे। पर अपने भारत की यही बड़ी खासियत, त्योहार के रंग में लोग इस कदर रंग जाते। अमीरी-गरीबी का फर्क भले कुछ पल के लिए ही सही, पर मिट सा जाता। अपनी संस्कृति में यही अनोखापन, जो विविधता से भरे भारत को एक सूत्र में पिरोए रखता। पर देखिए, जहां त्योहार हमारी एकता का आदर्श बन जाता। वहां आदर्श के नाम पर नेता-नौकरशाह कितनी लूट मचाते। बुधवार को नौ सेना ने रक्षा मंत्रालय को अपनी अंतरिम रपट दी। तो साफ कर दिया, सोसायटी की जमीन पर सेना का हक। पर महाराष्ट्र सरकार भी अपना दावा जताती रही है। नौ सेना ने सोसायटी को एनओसी नहीं दी। सुरक्षा के लिहाज से मौजूदा इमारत को खतरा भी बताया। अब सवाल अपनी नौ सेना से भी। नेताओं-नौकरशाहों की नीयत तो हमेशा ही रेवडियों की खातिर लपलपाई रहती। पर नौ सेना के अहम ठिकानों के बिलकुल पास में 31 मंजिला इमारत खड़ी हो गई। तो नौ सेना को तब क्यों नहीं दिखा। इतनी बड़ी इमारत कोई रातों-रात तो खड़ी नहीं हो गई। सो सवाल, नौ सेना ने पहले ही इस इमारत का निर्माण रुकवाने को कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए? अपना इरादा नौ सेना की क्षमता पर संदेह का नहीं। पर सेना की रपट से ही यह सवाल निकल रहा। आखिर नौ सेना किस तरह से सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही थी, जो इतनी बड़ी इमारत बन गई और उसे पता भी नहीं चला? यानी इस आदर्श घोटाले में सबके सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे निकले। अगर सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत नहीं होती। तो इतनी बड़ी भ्रष्ट इमारत खड़ी नहीं हो पाती। सो आदर्श फ्लैट धारको में नेताओं-नौकरशाहों के साथ-साथ सेना के नामी-गिरामी हस्तियों की भी कलई खुल गई। अब तक खुद को पाक बताने वाले विलासराव देशमुख के भी चेहरे से नकाब उतर गया। जब कानूनी सीमा से बाहर जाकर आदर्श सोसायटी को फायदा दिलाया। सो आदर्श के चक्कर में फर्श घिस रही कांग्रेस। ऊपर से कॉमनवेल्थ करप्शन पर बीजेपी लगातार परतें उधेडऩे में जुटी। नितिन गडकरी ने केबिनेट के फैसलों के नोट जारी कर दिया। तो शाहनवाज हुसैन ने आरोप लगाया, घोटाले में कांग्रेस खुद चोर और चौकीदार बनी बैठी। सो कांग्रेस अबके भ्रष्टाचार के जाल में बुरी तरह फंस चुकी। मंगलवार के कांग्रेस अधिवेशन में भ्रष्टाचार पर चुप्पी मीडिया की सुर्खियां बनी। तो बुधवार को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी सफाई देने मैदान में आए। उनने मीडिया की समझ पर सवाल उठा अपनी समझनदानी बड़ी बता दी। बोले- आपलोग सोनिया गांधी के भाषण को सही ढंग से समझ नहीं पाए। उन्होंने वर्करों को बुनियादी मूल्य न भूलने और संयम-सादगी का मंत्र दिया था, जिसमें संदेश साफ निहित है। यानी कांग्रेस भ्रष्टाचार के सिवा बाकी सभी मुद्दो पर सीधा-सीधा बोलती है। अब इसे राजनीतिक बेशर्मी नहीं, तो और क्या कहेंगे? भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मुद्दा, पर कांग्रेस सीधा बोलने से बच रही। अब अगर मनीष तिवारी की दलील मान भी लें। तो क्या मंगलवार को सोनिया का भाषण दिग्वििजय सिंह को भी समझ नहीं आया। उन ने तो मंगलवार को ही कहा था, जरुरी नहीं हर मंच से भ्रष्टाचार की बात हो। सो कांग्रेस के वाकई क्या कहने। अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौरे के बाद फिर हंगामा बरपेगा। बीजेपी ने संसद में घेरने की पुख्ता रणनीति बना ली। पर उससे पहले बराक ओबामा के स्वागत की तैयारी में मनमोहन सरकार बिछ चुकी। दिवाली के मौके पर मुंबई छावनी में तब्दील हो गई। ओबामा के संग तीन हजार से अधिक लोग आ रहे। सो अमेरिका मुंबई विजिट पर रोजाना 900 करोड़ खर्च करेगा। अब आप ही सोचिए, ओबामा का सीधे भारत की आर्थिक नगरी मुंबई में आना। सारा फोकस मुंबई पर करना, क्या यों ही। सही मायने में भारत में दिवाली का जश्न, तो उधर अमेरिका में बराक ओबामा का दिवाला निकल गया। लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच जिस तरह अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति होने का गौरव हासिल किया। अब धराशायी मार्केट की तरह लोकप्रियता भी गिर गई। मध्यावधि चुनाव में ओबामा की पार्टी डेमोक्रेटिक का हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में बहुमत खत्म हो गया। अब रिपब्लिकन ने बहुमत हासिल कर लिया। सीनेट में भी रिपब्लिकन डेमोक्रेट के करीब आ गई। यानी 21 महीने में ही ओबामा लुट गए। यों व्यक्तिगत तौर पर लोग ओबामा को पसंद करते, पर उनकी नीतियां बेअसर साबित हुई। आर्थिक मंदी से उबरने में नाकाम ओबामा अब भारत दौरे से खुद उम्मीद लगाए बैठे। सो दौरे से पहले ही कह दिया, सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता, दोहरी टेक्नोलॉजी का मामला बेहद जटिल। पर एक पते की बात कह गए ओबामा। उनने पाक को मुंबई हमले के दोषियों पर जिम्मेदार कार्रवाई की नसीहत दी। तो लगे हाथ, रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत को अपनी टॉप पालिसी बताया। आखिर में कहा, दुनिया में बहुत नेताओं से मिला। पर उनमें मनमोहन सर्वाधिक अदभूत नेता। यानी कुल मिलाकर अमेरिका हमें जुबानी सराहना देगा, बदले में भारत के बाजार में अपना माल खपाने का बंदोबस्त कर जाएगा। वैसे भी लुटे-पिटे ओबामा से भारत भला उम्मीद भी क्या करे।
-----
03/11/2010