Wednesday, January 5, 2011

‘महंगाई टैक्स’ से लुटी प्रजा, ‘राजाओं’ का हुआ ‘विकास’!

इधर भ्रष्टाचार का घड़ा बोफोर्स से ओवर-फ्लो हुआ। उधर स्पेक्ट्रम घोटाले ने करुणानिधि के घर में कोहराम मचा दिया। करुणा के बड़े बेटे एम.के. अझागिरी ने बुधवार को केबिनेट मंत्री समेत पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। ए. राजा और कनीमोझी को डीएमके से बर्खास्त करने की मांग की। साथ ही शर्त रख दी, विधानसभा चुनाव में सीएम के लिए किसी का नाम प्रोजैक्ट न हो। और स्टालिन या उनमें से जिसका पलड़ा चुनाव बाद भारी हो, वही सीएम बने। यों फिलहाल अझागिरी ने इस्तीफा अपने पिता करुणा को भेजा। सो समकालीन भारत के शाहजहां अब संकट में फंस गए। राजा तो रिश्तेदारी से बाहर, पर कनीमोझी तो उनकी तीसरी बीवी रजाथी से पैदा सांसद बेटी। करुणा सीएम के तौर पर स्टालिन को प्रोजैक्ट करना चाह रहे। पर बड़ा भाई अझागिरी दावा छोडऩे को राजी नहीं। सो तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके के पारिवारिक फिल्म का क्लाइमैक्स क्या होगा, यह तो वक्त बताएगा। पर फिलहाल भ्रष्टाचारियों के वक्त सही नहीं चल रहे। ना-नुकर करते आखिरकार बुधवार को सुरेश कलमाड़ी को सीबीआई दफ्तर पहुंचना ही पड़ा। कॉमनवेल्थ घोटाले में घंटों कड़ी पूछताछ हुई। पर सीबीआई ने सजा दिलाने के लिए कड़ी से कड़ी जोड़ी या बचाने के लिए, यह तो भविष्य के गर्भ में। कलमाड़ी-राजा के बाद अब बोफोर्स ने कांग्रेस को मुश्किल में डाल रखा। सो बीजेपी ने भी बुधवार को कोर ग्रुप की मीटिंग कर हमले की धार और तेज करने की रणनीति बनाई। यानी भ्रष्टाचारियों का भले कुछ न बिगड़े। पर भ्रष्टाचार को मुद्दा बना वोटों का हिसाब-किताब हो रहा। सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, अब तो गणतंत्र दिवस से बीस दिन पहले तिरंगे पर तकरार शुरू हो गई। बीजेपी की यूथ विंग के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर कोलकाता से श्रीनगर तक की एकता यात्रा पर निकले हुए। पर युवा नेतृत्व की आड़ में बीजेपी के घाघों ने रणनीति बनाई। सो मकसद समझना कोई बड़ी बात नहीं। श्रीनगर में तिरंगा फहराने को लेकर हमेशा विवाद रहा। अलगाववादी ताकतें 26 जनवरी और 15 अगस्त के दिन हमेशा पाकिस्तानी झंडा लहराती दिखतीं। सो बीजेपी ने तिरंगे की आड़ में भावनात्मक लहर पैदा करने का मंसूबा बनाया। रही-सही कसर बुधवार को खुद जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने पूरी कर दी। उमर ने ऐसा बयान दिया, ‘वैद्या फरमाए वही, जो रोगी चाहे’ वाली कहावत चरितार्थ कर दी। तिरंगे पर तकरार बीजेपी को भी राजनीतिक लिहाज से शूट करती। घाटी के हालात के लिहाज से उमर को भी मुफीद। सो बीजेपी ने उमर के बयान पर फौरन खम ठोका। सीधे अरुण जेतली मैदान में कूदे। कहा- तिरंगा फहराने के लिए किसी की इजाजत की जरूरत नहीं। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। पर उमर ने कहा- अब घाटी में हालात बिगड़े, तो बीजेपी जिम्मेदार होगी। अब गुरुवार को तेलंगाना पर सर्वदलीय मीटिंग में भी कांग्रेस का तेल निकलना तय। बीजेपी-टीआरएस पहले ही मीटिंग के बॉयकाट का एलान कर चुकीं। अब आप खुद ही देखिए, राजनीति का यह कैसा स्तर? आखिर अपने नेता देश को कहां ले जाना चाहते? आखिर किसी भी एक मुद्दे पर कभी राजनीतिक एका क्यों नहीं दिखता? हर मुद्दे में वोट बैंक की राजनीति क्यों घुस जाती? सचमुच नजीर पेश करने वाले नेता राजनीति के बियाबां में कहीं खो चुके। अब नेताओं में सिर्फ एक ही बात का एका दिखता। वह है- जनता की गाढ़ी कमाई को लूट-खसोट कर पांच साल में ही अपनी संपदा पचास गुना बढ़ा लेना। ऐसे मामलों में कोई भी राजनीतिक दल अछूता नहीं। क्या आज कोई भी ऐसा दल है- जिसकी चाल टेढ़ी न हो, चरित्र में दाग न हो, चेहरा कुरूप न हो? कोई एक बार नेतागिरी में घुसा, खुदा न खास्ते एमपी-एमएलए-पार्षद बन गया। तो शायद दिल-ओ-दिमाग में यह नारा घर कर जाता- कर लो दुनिया मुट्ठी में। सो राजनीति से लोगों का भरोसा उठ रहा। आखिर जनता का भरोसा क्यों न उठे? महंगाई छह साल से आम आदमी को मुंह चिढ़ा रही। पर मनमोहन हों या सोनिया, सिर्फ जुबानी भरोसा दिला रहे। अब बुधवार को होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने महंगाई को एक टैक्स बता दिया। बोले- महंगाई से बड़ा कोई टैक्स नहीं। अगर आपकी आमदनी काफी अधिक है, तो उसे महंगाई खा जाती है। उन ने पहली बार कबूला- हमें पक्का विश्वास नहीं है कि खाने-पीने की चीजों की कीमत नियंत्रित करने के लिए हमारे पास सभी तरह के उपाय हैं। अब बोफोर्स पर इनकम टेक्स ट्रिब्यूनल के ताजा फैसले के बाद यह प्रणव मुखर्जी पर हमला या कुछ और। पर सवाल, जब चिदंबरम खुद वित्त मंत्री थे, तब सोचने की शक्ति कहां थी? अब जो भी हो, चिदंबरम के बयान से साफ हो गया। मनमोहन सरकार की विकास दर आम आदमी की छाती पर मूंग दलकर बढ़ी। आम आदमी तो कंगाल ही रह गया। राजाओं-कलमाडिय़ों ने विकास का भरपूर फायदा उठाया। सचमुच विकास दर का ही नमूना, जब मनमोहन वित्तमंत्री थे, तो लाख रुपए में सांसद बिक जाते थे। जब पीएम बने, तो कीमत 25 करोड़ पहुंच गई। अब तो मनमोहन का दावा फिर फेल होता दिख रहा। महंगाई फिर कहर बरपा रही। मनमोहन ने कांग्रेस अधिवेशन में मार्च तक महंगाई दर साढ़े पांच फीसदी लाने का भरोसा दिया था। पर जिस तरह कीमतें बढ़ रहीं, आम आदमी का राम ही राखा। पेट्रोल में तो पहले ही आग लग चुकी। बस महीने-दो महीने का इंतजार करिए। डीजल और रसोई गैस में भी ‘मनमोहिनी विस्फोट’ होंगे।
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05/01/2011

Tuesday, January 4, 2011

भ्रष्टाचारियों से घिरे पीएम, सोनिया पर तना ‘बोफोर्स’

अब विजयी मुद्रा में दिग्विजय इतरा रहे। सो मंगलवार को सिर्फ विपक्ष नहीं, अपने सहयोगियों पर भी निशाना साधा। हेमंत करकरे पर दिए अपने बयान को पुष्ट करने के लिए दिग्विजय ने आखिर बीएसएनएल से रिकार्ड निकलवा ही लिया। फिर खम ठोककर मैदान में कूदे। तो कॉल डिटेल की प्रति बंटवाईं। जिसमें दिग्विजय के मोबाइल से महाराष्ट्र एटीएस के दफ्तर के नंबर पर फोन किए जाने का रिकार्ड। यानी मुंबई हमले के दिन पांच बजकर 44 मिनट पर दिग्विजय के मोबाइल से हेमंत करकरे के दफ्तर में फोन हुआ। सो तेवर दिखा दिग्विजय बोले- मुझे झूठा, देशद्रोही कहने वाले मेरी निष्ठा और ईमानदारी पर सवाल उठाने वाले अब तो मुझसे माफी मांगो। अगर माफी नहीं मांग सकते, तो कम से कम खेद जता दो। पर सबूत के बाद भी कांग्रेस दिग्विजय के साथ नहीं खड़ी। तो भला देश कैसे भरोसा करे। कांग्रेस ने तो इसे दिग्गी का निजी मसला बता दिया। पर दिग्विजय ने बाकायदा महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल को चिट्ठी लिख माफी मांगने को कहा। पाटिल ने विधानसभा में दिग्विजय को झूठा बताया था। करकरे-दिग्विजय की बातचीत के किसी रिकार्ड से इनकार किया था। अब आर.आर. पाटिल क्या सफाई देंगे, यह बाद की बात। पर सवाल वही, दिग्विजय के सबूत को कैसे सच मान लें? जिस नंबर पर बात हुई, वह एटीएस दफ्तर का जनरल नंबर। खुद दिग्विजय की मानें, तो वह कभी करकरे से मिले नहीं। ना दिग्विजय देश के गृहमंत्री, ना पुलिस के आफीसर। तो सवाल, करकरे ने अपनी पीड़ा पत्नी को न बता दिग्विजय को ही क्यों बताई? हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने तो मंगलवार को भी दोहराया- जब मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकी हमले की जांच में पकड़े जा रहे थे। तब भी करकरे को धमकी मिलती थी। सो मालेगांव की जांच में हिंदू कट्टरपंथियों से धमकी कोई हैरानी की बात नहीं थी। पुलिस वालों की जिंदगी में यह साधारण सी बात। पर दिग्विजय की मानें, तो करकरे बेहद व्यथित थे। धमकियों से परेशान थे। पर सवाल हुआ- क्या दिग्विजय ने यह सूचना देश के गृहमंत्री को दी? आखिर दिग्विजय से ही करकरे ने ऐसा कहा। तो कोई झक मारने के लिए नहीं कहा होगा। अगर मध्य प्रदेश की पैदाइश होने के नाते करकरे-दिग्विजय करीब आए। तो दिग्विजय ने उनकी मदद क्यों नहीं की? अगर इन पहलुओं को छोड़ भी दें। तो सवाल- इस बात का सबूत नहीं कि दिग्विजय ने करकरे से ही बात की। अगर की भी, तो क्या वही बात हुई। जो दिग्विजय कह रहे। जब से दिग्विजय ने यह खुलासा किया, तबसे खुद कई रंग बदल चुके। पहले हेमंत करकरे की ओर से फोन आने की बात कही थी। पर बवाल मचा, तो अगले दिन ही अपनी ओर से फोन करने का दावा किया। अब कह रहे- पहले एटीएस के दफ्तर के नंबर से मिस्ड कॉल आई, फिर उन ने पलटकर फोन किया। सवाल और भी, कुछ दिन पहले ही दिग्विजय ने कहा था- मैंने बीएसएनएल से रिकार्ड मांगा है। पर भोपाल बीएसएनएल ने यह कहते हुए मना कर दिया कि एक साल से अधिक का रिकार्ड नहीं रखते। पर अब कोई पूछे- उसी भोपाल बीएसएनएल ने रिकार्ड कैसे मुहैया करा दिया। अब चाहे जो भी हो, पर दिग्विजय कांग्रेसी एजंडे को बखूबी अंजाम दे रहे। जैसे पाकिस्तान अपने ही कथित इस्लामिक आतंकवाद का शिकार, दिग्विजय भारत को कथित हिंदू आतंकवाद का शिकार साबित करने में जुटे हुए दिख रहे। मंगलवार को पाकिस्तान के पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को इंदिरा गांधी की तर्ज पर ही उनके कमांडो ने मार डाला। सो बीजेपी ने तो दिग्विजय पर फौरन पलटवार किया। बोली- ऐसे बयानों से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई कमजोर हो रही। पर अपने नेताओं को इससे क्या फर्क पड़ता। आतंकवाद हो या भ्रष्टाचार जैसी बीमारी, सबको वोट बैंक की आलमारी में सहेज लेते। सो आतंकी जेल में बैठ आराम की रोटी तोड़ते। तो भ्रष्टाचार सत्ता में बैठ खुद को कुबेर समझते। अब भ्रष्टाचार के ताजा किस्सों को छोड़ दें। तो बोफोर्स ने कलई खोल दी। कैसे एक आरोपी को बचाने के लिए समूचा सिस्टम खड़ा था, यह इनकम टेक्स ट्रिब्यूनल और सीबीआई की अलग-अलग दलीलों से साफ हो गया। ट्रिब्यूनल में बोफोर्स दलाली की बात साबित हो गई। पर सीबीआई को आका का हुक्म नहीं मिला। सो मंगलवार को तीस हजारी कोर्ट में क्वात्रोची को क्लीन चिट दिलवाने की ही दलील देती रही। पर जज ने पूछ लिया- ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद कानून मंत्री के बयान के बारे में सीबीआई का क्या रुख है? पर सीबीआई के वकील ने दो-टूक कह दिया- क्वात्रोची से मामला वापस लेने की अर्जी सभी पहलुओं को गहराई से विचार करने के बाद दी गई थी। पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया। अलबत्ता सुनवाई की अगली तारीख छह जनवरी मुकर्रर कर दी। उसी दिन तेलंगाना पर श्रीकृष्ण कमेटी की रिपोर्ट भी सार्वजनिक होनी। पर बात बोफोर्स की, तो मंगलवार को बीजेपी हो या बाकी विपक्ष। भ्रष्टाचार के मुद्दे की चपेट में दस जनपथ को भी घसीट लिया। टू-जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ और आदर्श पर हुई मनमोहन की किरकिरी। जेपीसी-पीएसी के झमेले में मनमोहन उलझ चुके। विपक्ष भ्रष्टाचार के घेरे में पीएम को ले चुका। अब ट्रिब्यूनल के फैसले से सीधे सोनिया गांधी पर ‘बोफोर्स’ तान दी। रविशंकर प्रसाद बोले- गांधी परिवार से करीबी रिश्ते की वजह से कांग्रेस और उसकी समर्थित सरकारों ने क्वात्रोची को बचाने का ही प्रयास किया। क्वात्रोची बचाओ मुहिम में एक बेहद शक्तिशाली छुपा हुआ हाथ काम कर रहा।
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04/01/2011

Monday, January 3, 2011

बोफोर्स पर सीबीआई का साथ, ट्रिब्यूनल का तमाचा

 बीते साल के साये ने नए साल को भी दबोच लिया। नए साल के चौथे दिन ही सूर्य ग्रहण। अब यह ग्रहण किसके लिए शुभ या अशुभ, यह तो कोई ज्योतिषी ही बताएगा। पर अपना देश तो अरसे से राजनीतिक ग्रहण का शिकार। जनता लुटती जा रही, नेताओं के घर भरते जा रहे। तभी तो भ्रष्टाचार सुरसा की तरह मुंह फैला चुका। सो 2010 के आखिर में भ्रष्टाचार का जो हवन शुरू हुआ, थम नहीं रहा। अब ग्रहण से पहले भ्रष्टाचार के हवन में बोफोर्स का भी घी टपक गया। बोफोर्स मामले में इनकम टेक्स ट्रिब्यूनल ने क्वात्रोची और बिन चड्ढा को रिश्वत दिए जाने का दावा किया। ट्रिब्यूनल ने माना- बोफोर्स सौदे के लिए क्वात्रोची और चड्ढा को दलाली दी गई। ट्रिब्यूनल ने बाकायदा भुगतान की प्रक्रिया का भी ब्यौरा दिया। अब इतना बड़ा खुलासा हो, तो विरोध की आग धधकनी तय थी। सो बीजेपी के अरुण जेतली ने हमेशा की तरह बोफोर्स पर कमान संभाली। बोले- सरकारी नीति का उल्लंघन कर बोफोर्स सौदे में दलाली दी गई। सच्चाई दब नहीं सकती, सो ट्रिब्यूनल के फैसले से सच सामने आ गया। पर उन ने नया राग छेड़ा- सीबीआई की ईमानदारी पर भरोसा नहीं। सो अब बोफोर्स दलाली की जांच एसआईटी से हो। पर राजनीति की असली जंग मंगलवार को दिखेगी। बोफोर्स की जांच कर रही सीबीआई पिछले साल ही क्वात्रोची के खिलाफ मुकदमे की फाइल बंद करने की अर्जी डाल चुकी। जिस पर दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट मंगलवार को अपना फैसला सुनाएगी। सीबीआई ने अर्जी में कहा था- क्वात्रोची के खिलाफ कोई सबूत नहीं। सो केस को आगे बढ़ाने का कोई मतलब नहीं। पर अब इस नए खुलासे के बाद सीबीआई क्या कहेगी? आखिर सीबीआई को क्या हो गया? कभी सिख विरोधी दंगे के आरोपी जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दिला रही। तो सीबीआई कभी तेरह साल की मासूम बच्ची आरुषि का हत्यारा नहीं ढूंढ पा रही। राजनीतिक आकाओं के इशारे पर कभी ये फाइल बंद, कभी वो फाइल बंद, यही सीबीआई का ढर्रा बन गया। अगर सीबीआई के पास क्वात्रोची के खिलाफ कोई सबूत नहीं। तो आईटी ट्रिब्यूनल ने कैसे इतना बड़ा खुलासा किया? अब कांग्रेस को सांप सूंघना लाजिमी। सो ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद अभिषेक मनु सिंघवी बोले- पढ़ेंगे, सोचेंगे, फिर बोलेंगे। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने तो सफाई देने के बजाए विपक्ष के नेता अरुण जेतली पर ही निशाना साध दिया। बोले- जेतली ने खुद कानून मंत्री रहते क्या कर लिया? इसे कहते हैं- नाच ना जाने, आंगन टेढ़ा। एनडीए काल में क्या हुआ, यह 29 अप्रैल 2009 को कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की टिप्पणी से स्पष्ट। जब सीबीआई ने क्वात्रोची पर मेहरबानी दिखाते हुए रेड कार्नर नोटिस वापस लेना तय किया था। तब सिंघवी ने कहा था- बोफोर्स मामले में सिर्फ अदालती कार्रवाई पर 200 करोड़ खर्च हो चुके। जिनमें 150 करोड़ तो सिर्फ एनडीए राज में खर्च हुए। फिर भी हाथ कुछ नहीं लगा। सो क्वात्रोची के खिलाफ रैड कॉर्नर नोटिस के अब कोई मायने नहीं थे। पर सिंघवी को अपना यह बयान याद होगा या नहीं, यह तो वही जानें। पर सवाल वही, आखिर ट्रिब्यूनल को सबूत कैसे मिल गए? अब भले कांग्रेस सीबीआई के बेजा इस्तेमाल से इनकार करे। पर बोफोर्स दस्तावेज देश में लाने वाले सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर जोगिंदर सिंह की एक टिप्पणी भी बताते जाएं। उन ने कहा था- सीबीआई स्वतंत्र एजेंसी नहीं है। हो सकता है, आप इससे सहमत नहीं हों। पर क्वात्रोची को 73.2 लाख डालर मिले थे। वह दस्तावेज स्विटजरलैंड के अधिकारियों ने खुद मुझे दिए थे। अब जोगिंदर सिंह की बात छोड़ भी दें। तो बोफोर्स घोटाले का समूचा घटनाक्रम अपनी कहानी खुद बयां कर रहा। तेईस साल हो चुके, पर न दलाली की रकम वापस लौटी, न दलाल क्वात्रोची हत्थे चढ़ा। अलबत्ता 64 करोड़ की दलाली की जांच में अब तक 300 करोड़ खर्च हो चुके। अब अगर पुराने मामले छोड़ दें, तो यूपीए के वक्त हुए खेल को ही देखो। फरवरी 2007 में अर्जेंटीना में क्वात्रोची गिरफ्तार हुआ। सीबीआई के पास आठ फरवरी को खबर आ चुकी थी। पर खुलासा 23 फरवरी को हुआ। जब तक अपने सीबीआई वाले पहुंचते, छब्बीस फरवरी को क्वात्रोची जमानत पर छूट चुका था। अपनी सुप्रीम कोर्ट ने क्वात्रोची के लंदन खाते से पैसा न निकले, यह सुनिश्चित करने की हिदायत सरकार को दी। पर आदेश से पहले ही लीगल ओपीनियन की आड़ में एडीशनल सोलीसीटर जनरल बी. दत्ता लंदन जाकर खाते खुलवा चुके थे। क्वात्रोची अपनी दलाली की रकम निकाल चुका था। फिर 2008 में लीगल ओपीनियन के जरिए क्वात्रोची से रेड कार्नर नोटिस हटाने की बात हुई। तो अप्रैल 2009 में वह भी हट गया। अब कोई पूछे, सीबीआई क्वात्रोची के खिलाफ जांच कर रही थी या बचाने की कोशिश? सो 29 अप्रैल 2009 को यहीं पर एक सवाल उठाया था- क्वात्रोची को क्लीन चिट के बाद क्या मानहानि भी देगी सरकार? सीबीआई और कांग्रेस की रहनुमाई वाली सरकार को शायद ऐसा करने में भी गुरेज न होता, गर देश में लोकतंत्र न होता। सो सोमवार को ट्रिब्यूनल ने तमाचा मारा। अब मंगलवार को आंशिक सूर्य ग्रहण का कांग्रेस पर कितना असर पड़ा, यह कोर्ट के फैसले से ही मालूम पड़ेगा।
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03/01/2011

Friday, December 31, 2010

साल 2010: कांग्रेस खुद ही मुद्दा बन गई

इंतजार की घड़ी खत्म.. साल 2011 का आगाज हो गया। सो नए साल की ढेर सारी शुभकामनाएं। पर 2010 का बीतना सिर्फ साल नहीं, अलबत्ता 21वीं सदी का पहला दशक बीत गया। सो भले बीजेपी ने 2010 को घोटालों का वर्ष करार दिया। पर सही मायने में सिर्फ बीता साल नहीं, पूरा दशक देश की परिपक्वता के लिए याद किया जाएगा। चुनावी नतीजों को छोड़ दें, तो जनता ने अमिट छाप तब छोड़ी। जब अयोध्या जैसे विवादास्पद मुद्दे पर आए फैसले के बाद भी जनता ने संयम का परिचय दिया। वोट के सौदागर मुंह ताकते रह गए। सो परिपक्वता और संयम के इस दशक के लिए देश की जनता को अपना सलाम। पर आज लेखा-जोखा इस बात का भी, सत्ता में बैठी कांग्रेस ने जनता जनार्दन को क्या दिया। साल 2009 के आखिर में तेलंगाना की फांस लेकर कांग्रेस ने 2010 में प्रवेश किया। अब 2011 में भी वही फांस। पर बीते साल में तेलंगाना के साथ जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस के सिर दर्द बने। आतंकवाद पर पी. चिदंबरम ने राहत की सांस ली। तो यह कहकर चौंका दिया- पुणे की जर्मन बेकरी को छोड़, मुंबई के बाद कोई बड़ा हमला नहीं हुआ। सो 90 फीसदी भगवान को, दस फीसदी सुरक्षा बलों को क्रेडिट। पर इसी साल वाराणसी घाट विस्फोट ने अपने सुरक्षा तंत्र की कलई फिर खोल दी। सिर्फ चिदंबरम के ही बोल नहीं, दिग्विजय, राहुल और मणिशंकर अय्यर ने अपने बोलों से खूब सुर्खियां बटोरी। दिग्गी राजा ने संघ पर हमले की सुपारी ले ली। तो राहुल ने संघ को सिमी के बराबर बता दिया। पर विकीलिक्स के खुलासे ने राहुल को सफाई देने के लिए मजबूर कर दिया। तो मणिशंकर के बयान ने कॉमनवेल्थ घोटाले की परतें उधेड़ दीं। जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला, अरुंधती राय के बोल ने कांग्रेस की बोलती बंद कराई। घाटी साढ़े तीन महीने तक अलगाववाद की आग में झुलसी। छह अप्रैल को दंतेवाड़ा के नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत ने भूचाल मचाया। पर कांग्रेस वोट बैंक में जुटी रही। चिदंबरम के ऑपरेशन ग्रीन हंट पर दिग्विजय ने सार्वजनिक तौर से सवाल उठाया। तो सोनिया ने भी सहमति जता दी। सो कांग्रेस नक्सलवाद पर कनफ्यूज रही। बटला हाउस एनकाउंटर पर भी यही हाल। दिग्विजय सिंह आतंकी के घर आजमगढ़ पहुंच गए। कभी मोहन चंद्र शर्मा, तो कभी हेमंत करकरे की शहादत पर सवाल उठाए। फिर भी बिहार चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक लुभाने के सारे दांव फेल हो गए। कांग्रेस बिहार में नौ से चार सीट पर सिमट गई। यूपीए की दूसरी पारी राहुल फार्मूले से बढ़ी। पर राहुल की टीम के युवा मंत्री रोते-धोते ही नजर आए। राज्य मंत्रियों की व्यथा-दुर्दशा ऐसी कि पीएम को मीटिंग लेनी पड़ी। पर न राज्य मंत्रियों की हालत सुधरी, न आम आदमी की। महंगाई ने आम आदमी की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। पहली बार बजट में पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ। विपक्ष की ओर से पहली बार कटौती प्रस्ताव आया। पर खजाना मैनेज करने के बजाए सरकार ने पलटूराम दलों के मुखिया माया-मुलायम-लालू को मैनेज किया। सोनिया-मनमोहन के भरोसे के बावजूद महंगाई नहीं थमी। अब साल जाते-जाते भी प्याज और दूध की कीमतों में उछाल ने जनता को पस्त किया। सही मायने में जब-जब कांग्रेस और सरकार ने महंगाई रोकने का भरोसा दिलाया, महंगाई बढ़ती गई। अब भले महंगाई दर कम हो जाए, पर महंगाई कम नहीं होगी। महंगाई पर सरकार का आलम तो यह, सुबह कीमत घटाने की बात करती। तो शाम को बढ़ाने पर चर्चा। बीते साल सरकार ने पेट्रोल कीमतों को नियंत्रण मुक्त कर लूट की खुली छूट दे दी। सो महंगाई की आग में पेट्रोल अपना काम बखूबी कर रहा। अब नए साल में भी डीजल-रसोई गैस के दाम बढऩे तय, बस सिर्फ तारीख का इंतजार। सो जैसे महंगाई ने कांग्रेस का हाथ छोड़ अपना मुकाम बनाया, भ्रष्टाचार ने इतिहास रच दिया। स्पेक्ट्रम, आदर्श, कॉमनवेल्थ तो नजीर बन गए। कॉमनवेल्थ की तैयारियों पर ऐसी फजीहत, खुद पीएम को कमान संभालनी पड़ी। भ्रष्टाचार पर महाराष्ट्र में सीएम अशोक चव्हाण की छुट्टी हुई। तो मनमोहन केबिनेट से घोटालों के सरताज ए. राजा नप गए। देश के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला हुआ। पर कांग्रेस ने विपक्ष की जेपीसी की मांग नहीं मानी। संसद का शीतकालीन सत्र काला इतिहास रच गया। पर अभी भी रार ठनी हुई। कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर होने के बजाए विपक्ष पर हमला शुरू कर दिया। कांग्रेस अधिवेशन में देश के मुद्दों से अधिक वोट बैंक पर फोकस किया। यों बीते साल कांग्रेस ने सकारात्मक इतिहास भी रचा। इसी साल राइट टू एजूकेशन एक्ट लागू हुआ। राहुल गांधी ने ठाकरे बंधुओं की चुनौती को मुंहतोड़ जवाब दे, मुंबई की यात्रा की। महिला आरक्षण बिल राज्यसभा से पारित करा इतिहास बनाया। सोनिया चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। तो जनार्दन द्विवेदी ने चालीस बार बनाने का खम ठोका। परिवारवाद की चापलूसी की पराकाष्ठा तो कांग्रेस की परंपरा बन गई। सचमुच बीते साल में महंगाई हो या भ्रष्टाचार, कश्मीर हो या कूटनीति, आतंकवाद हो या नक्सलवाद, अयोध्या फैसला हो या बिहार की हार, आईपीएल की गुगली में थरूर का जाना, भ्रष्टाचार की गंगा में राजा का बहना, आदर्श बनाने में चव्हाण की छुट्टी। कुल मिलाकर 2010 में कांग्रेस के लिए यही अहम मुद्दे बने रहे। सो कांग्रेस सचमुच में जनता के मुद्दों पर मंथन करने के बजाए बीते साल खुद एक मुद्दा बनकर रह गई। अब यही सवाल उठ रहे, कांग्रेस राज में ही महंगाई-भ्रष्टाचार चरम पर क्यों पहुंचते।
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31/12/2010

Thursday, December 30, 2010

बीजेपी: 2010 में सुकून से शुरू, संघर्ष पर खत्म

 तो अब साल 2010 भी विदा होने जा रहा। समय तो सतत चलते रहने का नाम। सो साल 2011 के आगमन में महज कुछ घंटों का इंतजार। पर बीते साल का लेखा-जोखा भी जरूरी। सो आज बात बीजेपी के सफरनामे की। साल 2009 की चुनावी हार ने बीजेपी को ऐसा दर्द दिया, उबरने में काफी वक्त लग गया। अंदरूनी उठापटक इस कदर, पार्टी की मिट्टी पलीद होने लगी। तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कैंसर बता कीमोथेरेैपी की सलाह दी। फिर कहा था- राख से भी उठ खड़ी होगी बीजेपी। सो जब 2009 के आखिर में 19 दिसंबर को संघ ने बीजेपी का किला बचाने को नागपुर से नितिन गडकरी को भेजा। तो सचमुच बीजेपी के साल 2010 की शुरुआत सुकून भरी रही। पार्टी की कमान गडकरी ने, तो संसद की कमान दिल्ली में बैठे धुरंधर सुषमा-जेतली ने संभाली। सो फरवरी के इंदौर अधिवेशन में जब टेंट में नेता ठहराए गए। तो तालमेल से भरी बीजेपी नए जोश में दिखी। पर शुरुआत में बीजेपी का चेहरा बदला, तो साल का अंत होते-होते चाल और चरित्र ही बदल गया। गडकरी ने महानगरों की समस्या के लिए बाहरी लोगों को जिम्मेदार ठहराया। तो सबसे पहले एनडीए की सहयोगी जेडीयू ने पुतला फूंक गडकरी को सलामी दी। इंदौर मीटिंग के बाद गडकरी को अपनी नई टीम बनाने में मत्थापच्ची करनी पड़ी। गडकरी ने अध्यक्षी संभालते ही एलान किया था- काम को पुरस्कार, नकारों को नमस्कार। पर जब मार्च में टीम गडकरी का एलान हुआ। तो नाम बड़े, दर्शन छोटे की कहावत चरितार्थ हो गई। नाम वाले कुर्सी ले गए, काम वाले कमर पकड़ कर बैठ गए। सो सीपी ठाकुर, शत्रुघ्न सिन्हा, अमित ठाकर, शाहनवाज हुसैन, बीसी खंडूरी, प्रकाश जावडेकर  जैसे नेताओं ने मोर्चा खोल दिया। ठाकुर ने चेतावनी दी- इस टीम से गडकरी का दस फीसदी वोट बढ़ाने का सपना पूरा नहीं हो सकता। फिर 27 अप्रैल को महंगाई पर कटौती प्रस्ताव ने तो बीजेपी की ही पतंग काट डाली। झारखंड में शिबू सोरेन के साथ बनी बीजेपी की सरकार लडख़ड़ा गई। पर महीने भर झारखंड के झमेले में बीजेपी का चरित्र उजागर हो गया। कभी समर्थन वापसी, तो कभी सीएम पद का लालच। आखिर में बीजेपी ने झारखंड की सरकार गंवाई, जूते और प्याज भी खाए। पर एक बार अनैतिक काम कर चुकी बीजेपी ने दूसरी बार शर्म नहीं की। साल बीतने से पहले शिबू संग झारखंड में फिर सरकार बना ही ली। सो झारखंड बीजेपी के चाल, चरित्र की नजीर बना। तो कटौती प्रस्ताव की हार ने बीजेपी के चेहरे का रंग भी बता दिया। जब मई में चंडीगढ़ की रैली में गडकरी ने लालू-मुलायम को सोनिया का तलवा चाटने वाला कुत्ता कह दिया। बवाल मचा, तो माफी मांग ली। पर गडकरी के सिर्फ इसी बोल ने नहीं, उन ने दिग्विजय को औरंगजेब की औलाद, तो अफजल की फांसी में देरी के लिए कांग्रेस नेताओं का दामाद कह दिया। सिख विरोधी दंगे को गुजरात दंगे से जोड़ फिर सफाई दी। अयोध्या में मंदिर के बाजू में मस्जिद पर स्पष्टीकरण देना पड़ा था। पर बीजेपी की बड़ी फजीहत पटना कार्यकारिणी में हुई। जब नरेंद्र मोदी ने बिहार में हीरो बनने की कोशिश की। तो नीतिश कुमार ने खरी-खरी सुना भोज का न्योता वापस ले लिया। कोसी बाढ़ राहत में गुजरात से आए पांच करोड़ भी लौटा दिए। फिर कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार ने भ्रष्टाचार की वजह से तीन संकट झेले। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में कर्नाटक ने बीजेपी की धार भौंथरी कर दी। येदुरप्पा ने ऐसी धौंस दिखाई, आला नेतृत्व चाहकर भी हटाने की हिम्मत न कर सका। पर जून में जसवंत सिंह की वापसी पार्टी के लिए अच्छी पहल रही। फिर भी जसवंत की बर्खास्तगी के वक्त दी गई दलीलों का बीजेपी जवाब नहीं दे पाई। सो जसवंत की वापसी करा बीजेपी ने विचाराधारा का चोगा उतार फेंका। फिर राजस्थान से राम जेठमलानी को राज्यसभा भेज विचारधारा का क्रिया-कर्म कर डाला। यों साल 2010 में बतौर विपक्ष बीजेपी की भूमिका असरदार रही। संसद का कोई भी सत्र ऐसा नहीं बीता, जब सुषमा-जेतली की जुगलबंदी ने सरकार को कटघरे में खड़ा न किया हो। भले अनैतिक, पर इसी साल खोया झारखंड वापस लिया। अयोध्या जमीन विवाद पर एतिहासिक फैसला बीजेपी में नई ऊर्जा भर गया। बिहार की जीत बीजेपी के लिए बड़ी सौगात बनी। भले नीतिश लहर ने कमाल दिखाया। पर बीजेपी का स्ट्राइक रेट नीतिश से उम्दा रहा। फिर भी सौगात बीजेपी में शांति नहीं, संघर्ष लेकर आई। मोदी मैजिक पर सुषमा के बयान से बवाल मचा। सुषमा बनाम मोदी जंग सतह पर आ गई। सीबीआई दुरुपयोग और अमित शाह की गिरफ्तारी के मुद्दे पर संसद में चुप्पी ने दरार और बढ़ा दी। सुषमा और अरुण जेतली ने नई भूमिका में लॉबी बनानी शुरू की। तो वर्चस्व की लड़ाई साफ दिखने लगी। इसी साल बेटे के टिकट के लिए सीपी ठाकुर का प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीफा। यशवंत सिन्हा का पंजाब के प्रभारी से इस्तीफा। गडकरी के बेटे की शाही शादी में कुबेर के खजाने जैसा लुटाना। उस पर आडवाणी की नाराजगी। अब आखिर में साल जाते-जाते मुरली मनोहर जोशी का पीएसी के रूप में जोश। सो गुरुवार को बीजेपी ने मान-मनोव्वल कर जोशी से बयान जारी करवा दिया। पर जोशी के स्पष्टीकरण से बीजेपी के चाल, चरित्र, चेहरे का भी स्पष्टीकरण हो गया। खुद गडकरी ने एक इंटरव्यू में मान लिया- कर्नाटक में येदुरप्पा ने जो किया। वह भले अनैतिक, पर असंवैधानिक नहीं। अब आप साल भर में बीजेपी कहां से कहां पहुंची, खुद देख लो। साल 2010 की शुरुआत बीजेपी ने सुकून से की, पर फिर संघर्ष का दौर चल रहा। आने वाला साल भी उत्तराखंड में मुसीबत लेकर आ रहा।
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30/12/2010

Wednesday, December 29, 2010

भविष्य की इमारत के लिए कांग्रेस ने की डेंट की पुताई

तो बाप बड़ा न भैया और न रुपैया। सबसे बड़ी वोट की नैया, जिसे पार लगाने को कांग्रेस ने संजय गांधी को श्मशान से लाकर मारने में भी हिचक नहीं दिखाई। वैसे भी वोट की खातिर गड़े मुर्दे उखाडऩा राजनीति की फितरत। सो इमरजेंसी की कालिमा का दंश झेल रही कांग्रेस ने अपनी 125वीं वर्षगांठ के समापन पर एक किताब जारी की। जिसका शीर्षक दिया- द कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन। यानी जस नाम, तस व्याख्या। कांग्रेस ने यह किताब इतिहास बतलाने को नहीं, इतिहास में लगे दाग धोने के लिए लिखी। सो कांग्रेस ने रणनीतिक तौर पर संजय गांधी को इमरजेंसी का खलनायक करार दे दिया। इमरजेंसी के सच को कांग्रेस ने पहली बार कबूला। पर मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू। वैसे भी नेहरू-गांधी खानदान पर कांग्रेस भला दाग कैसे देख सकती। संजय गांधी की बीवी मेनका और बेटा वरुण अब बीजेपी के कमल खिला रहे। सो स्वर्गीय संजय का बोझ भला स्वर्गीय राजीव का परिवार क्यों उठाता। कांग्रेस ने किताब में माना, इमरजेंसी के वक्त पीएम इंदिरा गांधी के हाथ असीमित ताकत आ गई थी। संजय गांधी तभी अहमियत वाले नेता बनकर उभरे। कांग्रेस ने इंदिरा के आपातकाल को शुरुआत में सराहनीय बताया। कांग्रेस की मानें, तो जनता के एक बड़े वर्ग ने इमरजेंसी का स्वागत किया था। पर संजय गांधी की ओर से जबरन नसबंदी और झुग्गी-झोंपड़ी हटाने के कार्यक्रम ने नाराजगी पैदा कर दी। यानी इमरजेंसी के सारे दाग कांग्रेस ने स्वर्गीय संजय गांधी को पार्सल कर दिए। किताब में जेपी के आंदोलन को संविधानेतर और अलोकतांत्रिक करार दिया। जेपी को ईमानदार और निस्वार्थी तो बताया। पर सिद्धांतों का ढीला व्यक्ति करार दिया। किताब में संजय गांधी के लिए जितनी कड़वाहट, उससे कई गुना अधिक मिठास सोनिया-राहुल के लिए। विधानसभा चुनाव में बेहतर काम के लिए राहुल की पीठ ठोकी गई। राहुल-सोनिया की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से। किताब में कहा गया- जैसे महात्मा गांधी ने सत्ता का त्याग किया, वैसे ही सोनिया-राहुल ने सत्ता का त्याग कर मिसाल पेश की। यानी कांग्रेस ने सच का सामना तो किया, पर अपनी सहूलियत के मुताबिक। जो मुद्दे कांग्रेस को जड़ से हिला देते, उनको किताब में सिर्फ छुआ गया। पर जो मुद्दे सीधे वोट बैंक से जुड़े, कांग्रेस ने रिश्तों की बलि चढ़ाकर मैसेज दे दिया। अयोध्या फैसले, गुजरात दंगे के कई मामलों में मोदी को क्लीन चिट, बिहार चुनाव में पटखनी के बाद से कांग्रेस ने मुस्लिम वोट को वापस लाने की मुहिम छेड़ रखी। गाहे-ब-गाहे दिग्विजय सिंह के बयान और बुराड़ी के अधिवेशन मंच से सोनिया की मौजूदगी में उनकी गर्जना सबूत दे चुके। पर यह भी एक एतिहासिक तथ्य, इमरजेंसी के समय जबरन नसबंदी का विरोध तो सबने किया। पर सबसे तीखा विरोध अल्पसंख्यक समुदाय में हुआ। सो कांग्रेस ने इमरजेंसी की बदनामी का ठीकरा संजय के सिर फोड़ दिया। कांग्रेस की कारीगरी देखिए, लिखा तो 125 साल का इतिहास। पर तुष्टिकरण का तडक़ा लगाके। कांग्रेस की दलील- संजय की वजह से बदनामी हुई। पर कोई पूछे, कांग्रेस को यह तथ्य ढूंढने में 35 साल क्यों लग गए? क्या राहुल गांधी की पारी का इंतजार हो रहा था? कांग्रेस की इस किताब का मकसद राहुल के रूप में एक नई कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाना। पर सिर्फ लिख देने से इतिहास नहीं बदलता, न लोगों के दिलों पर पड़ी छाप मिटती। अगर इमरजेंसी की कालिमा के लिए सिर्फ संजय जिम्मेदार। तो इंदिरा के पास असीमित शक्ति होने की दलील कैसे दे रही कांग्रेस? इमरजेंसी थोपते ही इंदिरा ने तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में कैसे ठूंसा। मीडिया, नौकरशाह, पुलिस और यहां तक कि न्यायपालिका का भी गला घोंटा गया। अगर कांग्रेस ने किताब में तथ्य लिखे। तो कांग्रेसी किताब से इतर यह भी तथ्य, बिना किसी आरोप के एक लाख लोग हिरासत में रखे गए। नौकरशाह आंख मूंदकर इंदिरा-संजय का आदेश मानने को मजबूर किए गए। यहां तक एलान कर दिया गया- विरोध करने वालों पर गोली चली, तो आश्रितों को बोलने का कोई हक नहीं। मानवाधिकार का गला घोंटने के लिए इंदिरा ने कोर्ट का भी मुंह बंद करने की कोशिश की। सो बुधवार को शरद यादव ने सही कहा- इमरजेंसी का ठीकरा किसी एक व्यक्ति पर नहीं थोपा जा सकता। खुद पीएम इंदिरा ने हर फैसला लिया। सचमुच इंदिरा का वरदहस्त न होता, तो संजय मनमानी नहीं कर सकते थे। जैसे सोनिया-राहुल के पास कोई सरकारी पद नहीं। तब संजय गांधी के पास भी नहीं था। इमरजेंसी के वक्त बाकायदा मीडिया और बालीवुड पर दबाव बनाया गया कि वह संजय को भावी पीएम पेश करे। यह खुलासा खुद फिल्म अभिनेता देवानंद अपनी किताब- रोमांसिंग विद लाइफ में कर चुके। मीडिया की हालत तो तब कैसी थी, यह आडवाणी की बतौर सूचना-प्रसारण मंत्री इमरजेंसी के बाद की गई टिप्पणी से देख लो। आडवाणी ने कहा- सरकार ने आपको झुकने के लिए कहा। पर आप तो रेंगने लगे। अब कांग्रेस का कबूलनामा कितना रंग लाएगा, यह बाद की बात। पर अतीत की नींव पर भविष्य का निर्माण करने के लिए कांग्रेस ने नींव पर पड़े डेंट की पुताई शुरू कर दी। ताकि भविष्य की इमारत साफ-सुथरी दिखे।
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29/12/2010

Tuesday, December 28, 2010

सर्दी में भी ‘जेठ’ की तपिश महसूस कर रही बीजेपी

 तो मौसम ने कांग्रेस का झंडा मुरझा दिया। मंगलवार को कांग्रेस ने 126वां स्थापना दिवस मनाया। तो मौसमी थपेड़ों के बीच 24 अकबर रोड पर कांग्रेसियों का जमावड़ा लगा। ठंड और बारिश के मिलेजुले कहर के बीच सोनिया गांधी ने झंडा फहराया। पर अबके मौसम की दोहरी मार से झंडे में पहले जैसी लहर नहीं दिखी। घोटालों की फेहरिश्त ने तो तोते उड़ा ही रखे। बाकी कोई भी ऐसा दिन नहीं, जब नए संकट पैदा न हो रहे। तेलंगाना की फांस गले पड़ चुकी। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन कांग्रेस सरकार के लिए नासूर बन चुका। पर मौसम की मार से सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बीजेपी भी हलकान। घोटालों पर कांग्रेस तो शान से कह चुकी- नो जेपीसी। पर भ्रष्टाचार को सरकार के खिलाफ निर्णायक जंग मुद्दा बना चुकी बीजेपी को अब अपनी परछाईं ही सता रही। मुरली मनोहर जोशी के जोश ने बीजेपी के होश फाख्ता कर दिए। सो मंगलवार को विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने ट्विट किया। बोलीं- पीएम की पेशकश निरर्थक। जब पीएसी को मंत्री को बुलाने का अधिकार नहीं। तो पीएम की बात दूर। पीएसी का काम सिर्फ अकाउंट देखना। घोटाले की जवाबदेही और निष्कर्ष तक सिर्फ जेपीसी ही पहुंच सकती। यानी जोशी की दलील को सुषमा ने खारिज किया। सिर्फ सुषमा नहीं, बीजेपी के कई धुरंधर जोशी के जोश से परेशान। सो अंदरखाने जोशी की सक्रियता पर फिर सवाल उठ रहे। पर कांग्रेस अब भी जोशी की मुरीद। सो शकील अहमद बोले- जोशी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे। अगर बीजेपी का आपस में मतभेद, तो वह जोशी को पीएसी से वापस ले ले। या सुषमा स्वराज खुद इस्तीफा दे दें। अब बीजेपी नेताओं में छिड़े कोल्ड वॉर का कांग्रेस खूब लुत्फ उठा रही। जोशी के साथ हमदर्दी पर खुद कांग्रेस नेता ही चुटकी ले रहे। कोई सोमनाथ चटर्जी से तुलना कर रहा। तो कोई आडवाणी से बदला बता रहा। यों आडवाणी से बदले की बात गले उतरने वाली नहीं। पर सोमनाथ से तुलना सटीक बैठ रही। जब मनमोहन की पहली पारी में एटमी डील ने यूपीए-लेफ्ट का तलाक करवा दिया। तो सोमनाथ चटर्जी ने अपनी पार्टी सीपीएम के कहने पर भी स्पीकर की कुर्सी नहीं छोड़ी। उन ने भी संवैधानिक जिम्मेदारी की दुहाई दी। तब कांग्रेस ने सोमनाथ पर भी वैसा ही भरोसा जताया, जैसा अब जोशी पर जता रही। सो आखिर में सीपीएम ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से बर्खास्त कर दिया। सोमनाथ ने पार्टी लाइन से हट पद की खातिर इतिहास रच दिया। अब वही काम मुरली मनोहर जोशी कर रहे। जोशी संसद की पीएसी के मुखिया के नाते संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे। पर बीजेपी उनकी तेजी से मुश्किल में फंसी हुई। जैसे सोमनाथ दादा को यूपीए से लेफ्ट की समर्थन वापसी का फैसला रास नहीं आया था। वैसे ही जोशी को विपक्ष की जेपीसी की मांग रास नहीं आ रही। सो वह पीएसी को ही बेहतर बता रहे। अब सुषमा की यह बात सोलह आने सही- पीएम को बुलाना तो दूर, पीएसी मंत्री को भी नहीं बुला सकती। पर जोशी तो पहले ही कह चुके- यहां पीएम को समन करने जैसी बात ही नहीं। अलबत्ता खुद पीएम ने पेशकश की। तो इस बारे में पीएसी समय आने पर फैसला कर सकती। सो इन हालात में बीजेपी लेफ्ट बनेगी या जोशी सोमनाथ, यह वक्त ही बतलाएगा। पर फिलहाल सिर्फ जोशी ही नहीं, जेठमलानी के बोल भी बीजेपी की पोल खोल रहे। रायपुर की जिला अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता डाक्टर विनायक सेन को देशद्रोही बता उम्र कैद की सजा सुना दी। सेन लंबे समय से आदिवासी इलाकों में निस्वार्थ काम करते रहे। पर राज्य सरकार की आंखों में चढ़ गए। सो नक्सली सांठगांठ का आरोप लगा। पर अदालती फैसले ने देश नहीं, दुनिया में भूचाल ला दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल से लेकर दुनिया के नामचीन बुद्धिजीवियों ने फैसले पर सवाल उठाए। पर नक्सलवाद के खिलाफ बंदूक से लडऩे की पक्षधर रही बीजेपी ने फैसले को जायज ठहराया। वैसे भी छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार। कांग्रेस ने तो न्यायिक प्रक्रिया का हवाला देकर बीच का रास्ता अख्तियार कर लिया। पर सुषमा ने ट्विट कर सेन के खिलाफ फैसले को तर्कसंगत बताने की कोशिश की। अब बीजेपी की मजबूरी हो या नीति, पर जेठमलानी ने सारी कसर पूरी कर दी। उन ने सेन को उम्र कैद की सजा को वाहियात फैसला करार दिया। ऊपरी अदालत में पैरवी करने का एलान भी। जेठमलानी बोले- सेन के खिलाफ मुकदमे में कोई दम नहीं। सेन की पैरवी करना मेरे लिए सम्मान की बात होगी। पर बीजेपी के सम्मान का क्या होगा? सो बीजेपी ने एक बार फिर जेठमलानी की राय को निजी बताया। राजीव प्रताप रूड़ी बोले- जेठमलानी वकील हैं, किसी का भी मुकदमा लड़ सकते हैं। बीजेपी ने कुछ नहीं कहा। यानी जेठमलानी के आगे बीजेपी फिर नतमस्तक। जबसे बीजेपी की टिकट पर राजस्थान से राज्यसभा सांसद बने। तबसे यह तीसरा मौका, जब बीजेपी को चौराहे पर ले आए। जब बीजेपी ने भारत-पाक विदेश मंत्री स्तर वार्ता के बाद राज्यसभा में एस.एम. कृष्णा को घेरा। तो जेठमलानी ने वेंकैया-जावडेकर की दलील को धता बता कृष्णा की चुप्पी को शिष्टाचार का तकाजा बताया था। बीजेपी ने कश्मीर के वार्ताकार दिलीप पडगांवकर पर उंगली उठाई। तो जेठमलानी ने इसे बचकानी और अशिष्ट हरकत करार दिया। सचमुच जेठमलानी कोई बीजेपी की नीति से प्रभावित होकर नहीं आए। अलबत्ता राज्यसभा की मेंबरी तो गुजरात की फीस समझिए। कुल मिलाकर सर्दी के मौसम में जोशी और जेठमलानी बीजेपी को गर्मी का अहसास दिला रहे।
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28/12/2010