Wednesday, March 23, 2011

तो शे‘रबाजी में गीदड़ ही दिखा लोकतंत्र!

तेईस मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया। भगत सिंह को फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। पर उनके इंकलाब का खौफ अंग्रेजों पर इतना था। एक दिन पहले ही चुपके से फांसी पर चढ़ा दिए। अंग्रेजों को आभास हो गया था, गर तय समय पर फांसी हुई। तो लोगों की भीड़ अंग्रेजी हुकूमत के लिए खतरा बन जाएगी। बुधवार को अपनी संसद ने 80वें शहादत दिवस पर भगत, राजगुरु, सुखदेव को श्रद्धांजलि दी। पीठासीन अधिकारियों ने शहीदों से प्रेरणा लेने की नसीहत दी। पर आजकल स्वाधीनता सेनानी सिर्फ जयंती और पुण्य तिथि के दिन ही याद किए जाते। प्रेरणा तो लोग अब राडियाओं, राजाओं, कलमाडिय़ों से लेते। हर कोई जल्द से जल्द टाटा, बिड़ला, अंबानी बनने का ख्वाब देखता। संसद ने बुधवार को शहीद त्रिमूर्ति का स्मरण किया। तो भूल गए, भगत सिंह ने फांसी से पहले क्या कहा था। उन ने कहा था- ‘अंग्रेजों के बाद जो हम पर राज करेंगे। वह भी देश को लूटेंगे। सो मैं फिर पैदा होऊंगा।’ सचमुच युवा अवस्था में ही भगत सिंह ने देश की बुढ़ाती व्यवस्था का चेहरा भांप लिया था। आज व्यवस्था में करीब-करीब हर कोई तभी तक ईमानदार, जब तक बेईमानी का मौका नहीं मिलता। पर अफसोस, कोई अपने घर में भगत सिंह नहीं चाहता। सो अपनी व्यवस्था महज ड्रामा बनकर रह गई। जब चाहे जो अपनी ढपली बजा जाता। अब बुधवार को वोट के बदले नोट कांड पर अपने प्रकांड नेताओं ने खूब भाषणबाजी की। पर कोई निचोड़ नहीं निकला, अलबत्ता मनमोहन ने अपनी बात दोहरा दी- निचुड़े हुए नींबू को और मत निचोड़ो। देश में बहुतेरे मुद्दे, जिनकी चिंता करने की जरूरत। विपक्ष पश्चिम एशिया के देशों में चल रहे संघर्ष पर चर्चा करे, न कि विकीलिक्स के खुलासे पर। यानी विकीलिक्स की पुष्टि को पीएम ने फिर धता बता दिया। बहस के बीच में संसदीय कार्यमंत्री पी.के. बंसल ने तो विकीलिक्स को साइबर आतंकवाद से जोड़ दिया। राज्यसभा में होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने वोट के बदले नोट कांड के वक्त हुए स्टिंग ऑपरेशन की जांच पर विशेष जोर दिया। चिदंबरम बोले- स्टिंग ऑपरेशन की योजना एक राजनीतिक दल (बीजेपी) ने बनाई थी। जो अपने सांसदों के लिए खरीददार की तलाश में था, ताकि स्टिंग को अंजाम दिया जा सके। यानी अब भी वोट के बदले नोट कांड से परदा उठाने की कोई बात नहीं। अलबत्ता पीएम हों या चिदंबरम, पूरे प्रकरण को ही गलत बता रहे। पर सवाल- जब लेफ्ट ने समर्थन खींच लिया था। तब 22 जुलाई के विश्वास मत से पहले 14 जुलाई को ही सीपीआई के महासचिव ए.बी. वर्धन ने खुलासा किया- मनमोहन एक-एक सांसद को खरीदने में जुटे। सांसद घोड़े बन चुके। मंडी में एक-एक घोड़े की कीमत 25-25 करोड़ रुपए लग रही। सचमुच एक-एक वोट की जुगाड़ में मनमोहन सरकार जुटी हुई थी। जेल में बंद सांसदों की तो जुलाई 2008 में समझो मौज आ गई। अब भले मनमोहन-चिदंबरम जुलाई 2008 के विश्वास मत को बहुमत बताएं। पर सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। मनमोहन सरकार के ही मंत्री रामविलास पासवान ने 18 जुलाई 2008 को कहा था- 272 का जादुई आंकड़ा दोनों में से किसी के पास नहीं, यही ईमानदारी की बात। अब कोई पूछे- फिर विश्वास मत में बहुमत का आंकड़ा कैसे जुटा? जिन विपक्षी सांसदों ने पलटूराम की उपाधि धारण की, क्या यों ही? गुरुदास दासगुप्त ने तो साफ कहा- संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना, जब विश्वास मत के दौरान विपक्ष के कई सांसद गैर-हाजिर रहे। शरद यादव ने भी कहा- अखबार ने क्या लिखा, उस पर नहीं जाऊंगा। पर जिस तरह से 19 सांसदों ने पाला बदला था, मैंने अपनी आंखों से देखा। मेरी पार्टी के भी दो सांसद थे। जिनमें एक धन के लालच में, तो दूसरा टिकट के लालच में पलटी मार गया। सो बहुमत के लिए नोट का खेल हुआ, इसे कोई दिल से इनकार नहीं कर सकता। सो बहस के दौरान सुषमा स्वराज ने मनमोहन पर खूब तीर चलाए। बोलीं- पीएम अपनी भलमनसाहत का सहारा लेकर दूसरों पर ठीकरा फोड़ते हैं। देश में महंगाई, तो शरद पवार, कॉमनवेल्थ घोटाला, तो कलमाड़ी, टू-जी घोटाला, तो राजा जिम्मेदार। और जहां कुछ नहीं पता, वहां गठबंधन की मजबूरी। सो अब पीएम के बहानों से जनता तंग आ चुकी। अब लोग पूछ रहे- पीएम पद पर बने रहने की क्या मजबूरी है? सुषमा ने शायराना अंदाज में पीएम के जमीर को ललकारा। बोलीं- न इधर-उधर की तू बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा? हमें रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। पर पीएम ने बुधवार को भी नया पेंतरा ढूंढ लिया। विपक्ष ने संसदीय जांच रपट के आधार पर झूठा बताया, तो पीएम ने बुधवार को इसका ठीकरा पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के सिर फोड़ दिया। बोले- जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद 16 दिसंबर 2008 को सदन में सोमनाथ ने जो बात कही, मैंने वही कहा। पर पीएम ने चतुराई दिखाई। सुषमा ने पीएम पर तीर चलाए थे। तो पीएम ने सीधे आडवाणी की दुखती रग पर हाथ रख दिया। बोले- आडवाणी को विश्वास था कि पीएम बनना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। सो उन ने मुझे इस बात के लिए कभी माफ नहीं किया कि मैं पीएम हूं। आखिर में सुषमा की शायरी पर पीएम ने भी शे‘र मारा- माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो देख। पर शे‘र-ओ-शायरी के बीच समूची बहस का निचोड़ क्या निकला। मुद्दे वहीं रह गए। यानी शे‘रबाजी में लोकतंत्र को गीदड़ बना दिया।
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23/03/2011

Tuesday, March 22, 2011

पक्ष-विपक्ष की ‘प्रतिष्ठा’ में पिस रहा आम आदमी

विकीलिक्स के बवाल से कांग्रेस-बीजेपी दोनों कटघरे में। उधर वोट के बदले नोट कांड पर पीएम की सफाई को जूलियन असांज ने भी नकार दिया। अपने केबल को सबूतों के आधार पर पुख्ता बताया। तो इधर विपक्ष ने मंगलवार को भी सरकार की नाक में दम कर दिया। राज्यसभा तो दोनों पक्षों की जिद के आगे निढाल हो गई। पर लोकसभा की कार्यवाही रेंग-रेंग कर चली। वह भी तब, जब सरकार की जिद को देख विपक्ष ने सदन से वाकआउट कर दिया। सो बिना विपक्ष ही वित्त विधेयक पर चर्चा शुरू हो गई। विपक्ष ने भी एलान कर दिया- जब तक पीएम के बयान पर अल्पकालिक चर्चा नहीं होती, सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज बोलीं- हमने वाकआउट कर अपना विरोध दर्ज करा दिया। पर मंगलवार को पक्ष-विपक्ष के बीच की नोंकझोंक किसी बचकानेपन से कम नहीं। रार सिर्फ इस बात को लेकर ठनी, पहले पीएम के बयान पर अल्पकालिक बहस हो या वित्त विधेयक पर चर्चा। विपक्ष की अपनी दलील, तो सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण वित्त विधेयक। सो प्रणव मुखर्जी ने सदन की बैठक से पहले ही सुषमा स्वराज को फोन किया। पर सुषमा नहीं मानीं। फिर सदन में प्रणव-सुषमा के बीच दलीलों का दौर चला। आखिर सदन की कार्यवाही रोकनी पड़ी। फिर सुषमा ने प्रणव दा को फोन घुमाया। फार्मूला सुझाया- अगर लोकसभा में वित्त विधेयक, तो राज्यसभा में पीएम के बयान पर बहस होने दें। ताकि विपक्ष को सरकार पर एतबार हो जाए। विपक्ष को आशंका, पहले वित्त विधेयक पारित हो गया, तो सरकार पीएम के बयान पर बहस को राजी नहीं होगी। अब अगर विपक्ष की आशंका को सच भी मान लें, तो सवाल- हंगामे का क्या मतलब? मंगलवार को वित्त विधेयक पर चर्चा शुरू हो गई। विकीलिक्स के खुलासे पर बहस इसके बाद ही होगी। यानी संसद में पक्ष-विपक्ष की लड़ाई अब सिर्फ प्रतिष्ठा से जुडक़र रह गई। हर मुद्दे पर दोनों के बीच प्रतिष्ठा आड़े आ जाती। पर बात विकीलिक्स की। तो मुश्किल में बीजेपी। एटमी डील पर बीजेपी के दोहरेपन का खुलासा हुआ। तो अब विकीलिक्स ने गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को लेकर अमेरिका के दोहरेपन को जगजाहिर कर दिया। जब यूपीए की ताजा-ताजा सरकार बनी थी। अपने नटवर सिंह टीम मनमोहन के विदेश मंत्री हुआ करते थे। तब प्रवासी गुजरातियों के कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी को बतौर चीफ गेस्ट जाना था। पर अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को न तो कूटनीतिक वीजा दिया, ना ही निजी। गुजरात दंगे की छाप को अमेरिका ने वीजा न देने का आधार बनाया। तब कांग्रेस दो घंटे तक ऊहापोह में रही। संसद का सत्र चल रहा था। पर सरकार सोच नहीं पा रही थी, मोदी का बचाव करे या अमेरिका का विरोध। सरकार की ऊहापोह ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया। तब जाकर होश में लौटी मनमोहन सरकार ने अमेरिका के सामने विरोध जताया। क्योंकि सवाल नरेंद्र मोदी का नहीं, भारत के एक प्रांत के निर्वाचित सीएम के अपमान से जुड़ा था। पर अपनी राजनीति की यही विडंबना, हर मामले में वोट बैंक जुड़ जाता। अब जिस अमेरिका ने मोदी को वीजा नहीं दिया था। वही अमेरिका कितना डरा-डरा सा था, इसका खुलासा विकीलिक्स के जरिए हो गया। बाकायदा अमेरिका ने मोदी की जासूसी कराई। मोदी के ताकतवर होने का अहसास हुआ। सो दूतावास के जरिए संबंध सुधारने की कोशिशें होने लगीं। यानी आज लीबिया पर हमला हो या अमेरिका के अन्य कथित मानवीय कदम, सब महज दिखावा। सही मायने में अमेरिका किसी का सगा नहीं हो सकता। सो मंगलवार को मोदी ने अमेरिका पर पलटवार किया। विकीलिक्स की रपट को प्रामाणिक बताया। अब चाहे जो भी हो, मोदी का कद एक बार फिर बीजेपी के अन्य नेताओं से ऊपर हो गया। पर बीजेपी की मुश्किल- विकीलिक्स की एक रपट को सही माने, तो दूसरी को झुठलाए कैसे? सो एटमी डील पर बीजेपी के डबल स्टैंडर्ड की भी पुष्टि मानकर चलिए। वैसे बीजेपी की अंदरूनी खींचतान अभी भी कम नहीं। संसद के दोनों सदनों के नेताओं में सरकार को घेरने की होड़ मची रहती। पर आजकल सुषमा स्वराज को सत्तापक्ष से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा। जब भी कुछ बोलने को खड़ी होतीं, बिना मुंह खोले की कांग्रेसी प्वाइंट ऑफ आर्डर उठा देते। हंगामा शुरू हो जाता। सो पिछले हफ्ते और अब मंगलवार को भी सुषमा के लिए आडवाणी को बैटिंग करनी पड़ी। बोले- जब भी नेता विपक्ष खड़ी होती हैं, ट्रेजरी बैंच से रोकने की कोशिश की जाती है। सरकार यह भूल रही, विपक्ष के नेता को बोलने से रोकने का खामियाजा समूचे शीत सत्र के ठप होने के तौर पर भुगत चुकी। अब आडवाणी की इस दलील का मतलब आप खुद निकालें। पर लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ विरोध करना ही नहीं। विपक्ष हर मुद्दे पर सदन को बंधक नहीं बना सकता। अब विपक्ष की वित्त विधेयक से गैरहाजिरी को क्या कहेंगे आप? प्रणव दा ने एयर कंडीशंड अस्पताल में इलाज से सर्विस टेक्स वापस ले राहत तो दी। पर लीबिया संकट के मद्देनजर महंगाई रूपी आफत के बादल मंडरा दिए। जल्द पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे का इशारा कर दिया। पर लीबिया के खिलाफ हो रहे अमेरिकी हमले की निंदा का प्रस्ताव लाने को राजी नहीं। सो कुल मिलाकर पक्ष-विपक्ष की प्रतिष्ठा की लड़ाई में पिस रहा बेचारा आम आदमी।
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22/03/2011

Monday, March 21, 2011

कहीं राजनीति, तो कहीं तेल का खेल

तो होली पर बीजेपी का मुंह काला हो गया। विकीलिक्स ने एटमी डील पर विपक्ष के दोहरेपन का खुलासा क्या किया, होली के दिन बीजेपी रंग भी पहचान नहीं पाई। एटमी डील पर बीजेपी ने विरोध का ऐसा झंडा उठाया, मनमोहन सरकार खतरे में पड़ गई थी। लेफ्ट ने समर्थन खींच लिया था। पर अब खुलासा हुआ- बीजेपी के दांत खाने के और, दिखाने के और थे। बीजेपी ने एटमी डील का न सिर्फ विरोध किया था, अलबत्ता आडवाणी ने सत्ता में आने पर रिव्यू का भी एलान कर दिया था। पर विकीलिक्स के जरिए बात खुली- बीजेपी नेताओं ने अमेरिका को पहले ही बता दिया था। दिखावे पर न जाओ, अपनी अक्ल लगाओ। यानी डील का विरोध करना राजनीतिक चाल। पर बीजेपी डील के खिलाफ नहीं। और तो और, बीजेपी के नेता शेषाद्रि चारी ने तो अमेरिकी अधिकारी राबर्ट ब्लैक को यहां तक कह दिया था- हमारी विदेश नीति के प्रस्ताव पर ध्यान न दो। खुलासे के मुताबिक खुद आडवाणी ने भी अमेरिका को भरोसा दिलवाया था- बीजेपी सत्ता में आएगी, तो डील रिव्यू नहीं कराएगी। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। बीजेपी के लिए विकीलिक्स ऐसी फांस बनी, जो न उगली जाए, न निगली जाए। जिस विकीलिक्स को आधार बना मनमोहन को मजबूर किया, अब खुद क्या कहेगी बीजेपी? यों सत्ता में बीजेपी हो या कांग्रेस, अमेरिका के आगे दुम हिलाती रहीं। सो जब डील पर बीजेपी के भीतर चिक-चिक हो रही थी, तभी साफ हो गया था। बीजेपी सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रही। सो अब वोट के बदले नोट कांड के पूर्व की परिस्थितियां देखें, तो कहीं न कहीं बीजेपी भी जिम्मेदार। बीजेपी डील की पैरोकार थी। अगर दिखावे का विरोध न करती। तो न नौ मन तेल होता, न राधा नाचती। शायद न सरकार संकट में आती, न बहुमत का भोंडा प्रदर्शन होता। पर कहते हैं ना- राजनीति, प्यार और जंग में सबकुछ जायज। अब बीजेपी की राजनीति की तो पोल खुल गई। सो बात कांग्रेस और तृणमूल के बीच ‘प्यार’ भरे रिश्ते की। कांग्रेस ने बंगाल में तमिलनाडु दोहराने की कोशिश की। पर आखिर में बिलबिलाती नजर आई। यों कांग्रेस के लिए सुखद संदेश यही रहा- न तमिलनाडु में गठबंधन टूटा, न बंगाल में दरका। पर तमिलनाडु में कांग्रेस ने करुणा को करुण कर दिया। तो बंगाल में ममता की ‘ममता’ पर ही निर्भर रहना पड़ा। तमिलनाडु में कांग्रेस ने अपनी मांग 48 से बढ़ाते-बढ़ाते 63 सीट तक कर दीं। ना-नुकर करते-करते करुणानिधि को भी मानना पड़ा। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच की आंच में डीएमके को झुलसा कांग्रेस ने मंशा पूरी की। पर बंगाल में ममता के राजनीतिक पेच ने कांग्रेस को पंक्चर कर दिया। कांग्रेस ने ममता से पहले 98 सीट मांगी। तो ममता ने 45 से गिनती शुरू की। फिर कांग्रेस 75 पर आई, तो ममता भी 50 पर आईं। फिर 60 और आखिर में 64 की लकीर खींच ममता ने बिना कांग्रेस की बाट जोहे अपने 228 उम्मीदवारों का एलान कर दिया। कांग्रेस के लिए 64 और दो सीट एसयूसीआई के लिए छोड़ दीं। सो कांग्रेस के लिए अब काटो तो खून नहीं। कांग्रेस की प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो गई। सो कई राउंड की बातचीत के बाद ममता महज कांग्रेसी चेहरे से धूल झाडऩे को तैयार हुईं। आखिर में एक और सीट थमा कांग्रेस को हैसियत बता दी। पर गठबंधन बच गया, तो बंगाल कांग्रेस के प्रभारी शकील अहमद बोले- यह न आत्म समर्पण, न समझौता, यह गठबंधन है। पर जो भी हो, गठबंधन के खेल में कांग्रेस का तेल निकल गया। सो अब बात असली तेल की, जिसकी खातिर अमेरिका ने मित्र देशों के साथ मिल लीबिया पर हमला बोल दिया। लीबिया में तानाशाह कर्नल गद्दाफी के खिलाफ जन आंदोलन छिड़ा हुआ। दोतरफा संघर्ष चल रहा। सो अब दुनिया के कथित दादागण अपनी दादागिरी पर उतर आए। गद्दाफी के ठिकानों समेत कई जगहों पर हवाई हमले शुरू हो गए। पर सवाल- दुनिया के दादाओं को यह लाइसेंस किसने दिया? इराक में रासायनिक हथियार के नाम पर हमला बोला। इराक को नेस्तनाबूद कर दिया। पर रासायनिक हथियार का रा भी नहीं मिला। अब इराक के तेल के कुएं से अमेरिका और मित्र देशों की कंपनियां मालामाल हो रहीं। अगर सचमुच अमेरिका एंड कंपनी लोकतंत्र की पैरोकार, तो क्या हवाई हमले के सिवा कोई और विकल्प नहीं? हवाई हमले में शिकार हो रहे निर्दोष नागरिकों की जिम्मेदारी कौन लेगा? अपने भारत और पड़ोसी चीन ने हमले पर खेद जताया। हिंसा छोडऩे की अपील की। पर सिर्फ घरेलू राजनीति में ही दिखावा नहीं। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी दिखावे हो रहे। भारत कभी ईरान का पैरोकार रहा। अमेरिका ने घुडक़ी दी, तो विरोध किया। अब तो अमेरिका के हर कदम में भारत साथ दे रहा। पर मौका देख कभी परदे के पीछे, तो कभी सामने आ जाता। सो बात अमेरिका और सहयोगी देशों की, तो आप इतिहास पलट कर देख लो। कभी इन देशों के इरादे नेक नहीं रहे। लीबिया पर हमला भी लोकतंत्र लाना नहीं, अलबत्ता तेल के कुएं पर कब्जा जमाना।
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21/03/2011

 

Friday, March 18, 2011

नैतिकता का दहन, संसद में हुड़दंग

मराठी में एक कहावत है- गुड़घ्याला बाशिंग बांधले। यानी कुर्सी की खातिर कोई इतना अधीर, सिर का सेहरा घुटने पर बांध ले। जब मनमोहन सरकार की पहली पारी पर एटमी संकट छाया। तो अमेरिका की खातिर राजनीति के तरकश से सारे तीर निकाले गए। एटमी डील खतरे में थी। सो अमेरिका की निगाहें वाया दूतावास मनमोहन सरकार पर ही गड़ी थीं। येन-केन-प्रकारेण मनमोहन ने कुर्सी तो बचा ली। पर सेहरा सिर से ऐसा सरका, संभाले नहीं संभल रहा। सत्ता के नशे में विपक्ष को अनदेखा किया। विपक्ष भी सरकार को दिखाने के बजाए आपस में ही एक-दूसरे को देखने लगा। सो कांग्रेस पर तबसे ही जो नशा चढ़ा, उतरने का नाम नहीं। अब 22 जुलाई 2008 का विश्वास मत लोकतंत्र के साथ विश्वासघात साबित हो रहा। तो कांग्रेस ने नैतिकता को जेब में रख ताल ठोक दी। विकीलिक्स के खुलासे ने अमेरिकी प्रेम और खरीद-फरोख्त की पुष्टि की। तो अब कांग्रेसी दलील देखिए- विपक्ष ने 2009 के चुनाव में भी ऐसे आरोप लगाए। पर जनता ने खारिज कर दिया। संसद के दोनों सदनों में दूसरे दिन भी यही मुद्दा उछला। पर पीएम मनमोहन ने पहले इंडिया टुडे कान्क्लेव में सफाई दी। फिर दोपहर बाद संसद में। पर दोनों सफाई के बीच ‘हाथ’ ने अपना कमाल दिखा दिया। इंडिया टुडे कान्क्लेव में मनमोहन बोले- सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई, इसकी कोई जानकारी नहीं। और ना ही मैंने किसी को अधिकृत किया। पर जब कुछ घंटों बाद संसद में बयान पढ़ा, तो भाषा और तेवर भी बदल गए। उन ने न सिर्फ विपक्ष को आईना दिखाया, अलबत्ता बेहिचक कह दिया- यूपीए सरकार और कांग्रेस के किसी भी सदस्य ने विश्वास मत जीतने के लिए कोई गैर-कानूनी तरीका अख्तियार नहीं किया। चलो मान लिया, पर सवाल 25 करोड़ का- विश्वास मत के दिन 19 सांसदों ने क्रास वोटिंग क्यों की? अपनी पार्टी के पलटूराम क्यों बने? नेताओं से नि:स्वार्थ काम करने की उम्मीद तो कतई नहीं की जा सकती। अठन्नी-चवन्नी में बिकने वाले सांसद मुफ्त में मनमोहन सरकार तो नहीं बचाएंगे। अब जरा पीएम की सफाई का मतलब भी देख लो। इंडिया टुडे कान्क्लेव में पीएम ने किसी को अधिकृत न करने वाली दलील दी। तो सवाल- क्या ऐसे काम के लिए पीएम अपने लैटर हैड पर किसी को अधिकृत करेंगे? पीएम ने संसद में सफाई दी, तो कांग्रेस और सरकार की ओर से ऐसे गैर-कानूनी काम को नकारा। पर पीएम ने यह नहीं कहा- विश्वास मत के लिए सांसदों की कोई खरीद-फरोख्त नहीं हुई। सो नोट के बदले वोट कांड का भूत तीन साल बाद आया या तीस साल बाद आए, कांग्रेस कभी कबूल नहीं करेगी। सो पीएम के बयान पर लोकसभा में सुषमा स्वराज ने स्पष्टीकरण की अनुमति मांगी। तो स्पीकर ने ठुकरा दिया। पर राज्यसभा में सभापति हामिद अंसारी ने सचमुच इतिहास बना दिया। राज्यसभा में मंत्री या पीएम के बयान पर स्पष्टीकरण मांगने की परंपरा। पर शुक्रवार को पीएम के बयान के बाद अंसारी ने अनुमति नहीं दी। तो विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। सो अंसारी ने चौंकाने वाली दलील दी। बोले- चूंकि पीएम ने स्वत: बयान नहीं दिया, अलबत्ता विपक्ष की मांग पर दिया। सो रूल 251 के तहत स्पष्टीकरण नहीं मांगा जा सकता। उन ने अपनी व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए 24 अप्रैल 1987 की एक रूलिंग भी परोस दी। यह रूलिंग किस मुद्दे पर आई थी, आप सुनते जाओ। बोफोर्स घोटाले पर तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने बयान दिया। विपक्ष ने स्पष्टीकरण मांगा, तो तत्कालीन  सभापति शंकरदयाल शर्मा ने यह कहते हुए स्पष्टीकरण की अनुमति नहीं दी कि अगले दिन इस मुद्दे पर विस्तृत बहस होनी है। सो विपक्ष ने दोनों सदनों में पीएम के बयान पर बहस का नोटिस थमा दिया। पर सीताराम येचुरी ने तो तभी चुटकी ली- 24 साल पीछे की रूलिंग लागू करने के बजाए पिछले हफ्ते अपनाई गई परंपरा का अनुसरण क्यों नहीं करते? पर सभापति नहीं माने। सरकार ने भी ठान ली थी, सो पवन बंसल बोले- विपक्ष की हर बात नहीं मानेंगे। यानी जो बात मुफीद, वही बात मानेगी सरकार। पर सवाल- जब मनमोहन को भरोसा, जुलाई 2008 में कुछ गलत नहीं किया। तो विपक्ष के सवालों का जवाब देने में संकोच कैसा? संसद में आकर बयान पढ़ दिया और चलते बने, यह कैसी परंपरा? अपनी संसद में यही देखने को मिलता। सभी दलों के सांसद बोलते, आखिर में मंत्री जवाब देता और कथा समाप्त हो जाती। मनमोहन ने भी शुक्रवार को वही किया। बोले- नोट के बदले वोट कांड में संसदीय जांच कमेटी को भी निष्कर्ष तक पहुंचने वाले सबूत नहीं मिले। विपक्ष भूल गया, चुनाव में जनता ने क्या जवाब दिया। जिस 14वीं लोकसभा में बीजेपी के 138 सांसद थे, 15वीं में घटकर 116 रह गए। लेफ्ट भी 59 से घटकर 24 पर अटक गया। सिर्फ कांग्रेस की सीटें 145 से बढक़र 206 हो गईं। अब इस दलील में सचमुच कोई तर्क या सिर्फ घमंड, आप ही तय करिए। अगर चुनाव जीतने से घूसखोरी, भ्रष्टाचार और अपराध को छूट मिलने लगे, तो फिर मनमोहन चुनाव सुधार की बात क्यों कर रहे? लालू, मुलायम, शिबू, माया, मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन, ए. राजा जैसे लोग भी चुनाव जीत चुके। मनमोहन फार्मूले के मुताबिक तो इन्हें भी मुकदमेबाजी से मुक्त कर देना चाहिए। क्या सत्ता में आने का मतलब, सरकार कुछ भी कर सकती? अब होली के इस मौके पर संसद में हुड़दंग तो जारी। पर होलिका दहन से ठीक पहले मनमोहन सरकार ने नैतिकता का दहन कर दिया।
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18/03/2011

Thursday, March 17, 2011

तो क्या ‘चौदहवीं के चांद’ पर लगा दाग नहीं धुलेगा?

भ्रष्टाचार का भूकंप अब मनमोहन सरकार की सुनामी बन गई। नित-नए झटकों से सरकार को दो-चार होना पड़ रहा। सीडब्ल्यूजी, टू-जी, आदर्श और थॉमस के बाद अब विकीलिक्स की फांस गले पड़ गई। अमेरिका से एटमी डील की खातिर मनमोहन ने सरकार दांव पर लगा दी थी। बाईस जुलाई 2008 को मनमोहन ने विश्वासमत जीता। पर लोकतंत्र का मंदिर दागदार हो गया। अब विकीलिक्स ने खुलासा किया, कैसे बहुमत के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई। कथित तौर पर कैप्टेन सतीश शर्मा का करीबी नचिकेता कपूर अमेरिकी दूतावास के अधिकारी से मिला था। नोटों से भरे बैग दिखा बतलाया था- सांसदों को खरीदने के लिए 50-60 करोड़ रुपए साथ लेकर चल रहे। यों नचिकेता और सतीश शर्मा का आरोपों से इनकार। पर सतीश शर्मा से जान-पहचान की बात नचिकेता ने कबूल की। विकीलिक्स के खुलासे में वोट के बदले निजी विमान भी रिश्वत में देने का ऑफर हुआ था। अजित सिंह की रालोद के सांसदों को खरीदने के लिए 40 करोड़ रुपए दिए गए। ये सारे खुलासे विकीलिक्स ने अमेरिकी दस्तावेज के आधार पर किए। सो गुरुवार को संसद में जमकर हंगामा हुआ। कांग्रेसियों को तो सांप सूंघ गया। एटमी डील पर मनमोहन की वैतरिणी पार लगाने वाले मुलायम भी विपक्ष के साथ सुर मिला जांच की मांग करने लगे। पर भ्रष्टाचार रूपी भूकंप के झटके खा रही सरकार के लिए यह खुलासा मारक साबित हो रहा। पहली बार समूचे विपक्ष ने सीधे मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांगा। आडवाणी-सुषमा समेत सभी विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने दो-टूक कहा- अब यूपीए सरकार को शासन में बने रहने का कोई हक नहीं। यों विपक्ष की मांग सौ फीसदी सही। पर विकीलिक्स का खुलासा कुछ नया नहीं। जब 22 जुलाई 2008 को मनमोहन ने अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव की तरह ही विश्वास मत का इतिहास रचा। तब बीजेपी ने क्या किया? भले सबूत न हों, पर इसमें कोई शक नहीं कि विश्वास मत के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई। सदस्यता और निष्ठा को दांव पर लगाकर 19 सांसदों ने यों ही पाला नहीं बदला होगा। क्रॉस वोटिंग करने वाले गैर कांग्रेसी दलों के सांसद 15वीं लोकसभा में कांग्रेसी टिकट पर चुनकर आए। भ्रष्टाचार पर कांग्रेस के डीएनए का एक और नमूना देखिए। सिर्फ वोट के बदले नोट कांड ही नहीं, सवाल के बदले घूस कांड में लोकसभा से बर्खास्त तबके बसपाई सांसद राजा रामपाल 15वीं लोकसभा में कांग्रेस के सांसद हैं। सो राजनीति बेहयाईपन की कोई सीमा रेखा नहीं। जिस चौदहवीं लोकसभा के विश्वासमत पर पंद्रहवीं लोकसभा में हंगामा बरपा। उस 14वीं लोकसभा में सबसे अधिक बीजेपी के सांसद भ्रष्ट थे। ऑपरेशन दुर्योधन, चक्रव्यूह, वोट के बदले नोट तक बीजेपी के कुल सांसद धरे गए। यानी उस लोकसभा में बीजेपी के कुल 138 सांसद से गुणा-भाग करें, तो औसतन बीजेपी का हर नौवां सांसद भ्रष्ट था। सो वोट के बदले नोट कांड के बाद आडवाणी ने ठोक-बजाकर उम्मीदवार उतारने का एलान किया। बीजेपी ने अपनी चुनाव समिति की मीटिंग टाल नए मापदंड तय किए- अब जिताऊ से अधिक टिकाऊ को अहमियत देंगे। ताकि चुनकर आने के बाद सांसद बिकाऊ न बनें। सचमुच कोई मजबूत विपक्ष होता, तो सर्कस बन चुकी मनमोहन सरकार का तख्ता पलट चुका होता। पर लोकसभा चुनाव के वक्त बीजेपी अंदरूनी कलह की शिकार रही। अध्यक्ष और पोल मैनेजर खुलेआम लड़ते रहे। सो भ्रष्टाचार, आतंकवाद और महंगाई जैसे तमाम मुद्दों के बावजूद मनमोहन सरकार सत्ता में वापस लौटी। विपक्ष न तो विकल्प के तौर पर मैदान में खड़ा हो सका और ना ही मनमोहन सरकार को घेर सका। सो कांग्रेस न सिर्फ सत्ता में लौटी, अलबत्ता मजबूत होकर लौटी। पर विपक्ष की कमजोरी ने कांग्रेस की जीत में नशा घोल दिया। सो सत्ता के नशे में गलतियों का पहाड़ खड़ा हो गया। कांग्रेस को इल्म तब हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने हथौड़ा मारा। अब विकीलिक्स के ताजा खुलासे पर कांग्रेस और प्रणव दा की दलील देखिए। चूंकि यह मामला 14वीं लोकसभा का, सो 15वीं लोकसभा में डिस्कस नहीं हो सकता। मौजूदा सरकार सिर्फ 15वीं लोकसभा के लिए जिम्मेदार, 14वीं के लिए नहीं। प्रणव दा ने खुलासे की न पुष्टि की, न खंडन किया। पर इसके लिए भी दलील देखिए- दूतावास को राजनयिक संरक्षण हासिल, सो सरकार के लिए पुष्टि या खंडन करना संभव नहीं। पर विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने पलटवार किया। बोले- चूंकि यह अपराध भारत में हुआ, इसमें भारतीय शामिल थे। सो राजनयिक छूट का मुद्दा नहीं उठता। जेतली और प्रणव दा के बीच जमकर तकरार हुई। पर क्या 14वीं के चांद पर लगा यह दाग नहीं धुलेगा? भले अजित सिंह की पार्टी के सांसदों ने सरकार के खिलाफ वोट दिया हो। पर पैसे के लेन-देन से अभी इनकार नहीं। लोकसभा में 22 जुलाई 2008 को चार बजकर चार मिनट पर बीजेपी के तीन सांसद अशोक अर्गल, महावीर भगोरा और फग्गन सिंह कुलस्ते ने अमर सिंह एंड कंपनी की ओर से दिए गए एक करोड़ के नोटों की गड्डियां सदन में लहराईं। बाद में संसद की जांच कमेटी बनी, तो नोट लहराने वाले ही अपराधी हो गए। अमर सिंह को क्लीन चिट मिल गई। पर सवाल- पाला बदलने वाले सांसदों ने क्या नि:स्वार्थ वोट दिया? एटमी डील की खातिर मनमोहन ने साम, दाम, दंड, भेद सब लगा दिए। विश्वास मत से पहले ही गुरुदास दासगुप्त ने खुलासा किया था- 25 करोड़ में बिक रहे सांसद।
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17/03/2011

Wednesday, March 16, 2011

बेभाव की पड़ती, तो बिलबिला उठते नेता

कुर्सी छिन गई, पर थॉमस की ठसक नहीं जा रही। अब थॉमस ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गैरकानूनी बताया। बाकायदा अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति रैफरेंस की सलाह दी। थॉमस की दलील- संविधान की व्याख्या करने वाले मुद्दे पर फैसले के लिए पांच जजों की बैंच का होना जरूरी। पर सीवीसी मसले में तीन जजों की बैंच ने फैसला दिया। सो यह फैसला निष्प्रभावी माना जाए। पर थॉमस ऐसी दलील तीन जजों की बैंच के सामने भी दे चुके। फिर भी रार ठाने बैठे हुए। शायद उन ने भी अब ठान लिया- बदनाम हो ही गए, तो अब शर्म का परदा क्यों। सो पूरी ताकत लगा सुप्रीम कोर्ट को ही गलत ठहराने की मुहिम में जुट गए। अपनी व्यवस्था को चलाने वाले नेताओं-नौकरशाहों का अब यही शगल बन गया। सो जब कोई मामला खुद के खिलाफ आ जाता, तो नाक-भौं सिकोडऩे लगते। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस या फिर लेफ्ट और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां। मन की हो, तो वाह, नहीं तो आह। तभी तो दिल्ली के लोकायुक्त ने सीएम शीला के करीबी मंत्री राजकुमार चौहान को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी। चौहान ने एक व्यापारी को टेक्स से बचाने के लिए वैट कमिश्नर को धमकाया था। सो लोकायुक्त ने जांच में आरोप को सच पाया। चौहान अपनी सफाई में मजबूत दलील नहीं पेश कर पाए। पर सिफारिश को पखवाड़ा भर होने वाला। फिर भी शीला दीक्षित ने राजकुमार चौहान का राज नहीं छीना। अब बुधवार को दिल का गुबार जुबां पर आ ही गया। मैडम शीला फरमा रहीं- लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा होनी चाहिए। पर कांग्रेस और शीला को यह भी बताना चाहिए- जब कर्नाटक में बीजेपी के मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त ने टिप्पणी की, तो मोर्चा क्यों खोला। येदुरप्पा ने तो आरोपी मंत्री को हटाने में कोई देर नहीं की। पर दिल्ली की कांग्रेसी सीएम शीला को दर्द क्यों हो रहा? लोकायुक्त के अधिकार कर्नाटक में सही, तो दिल्ली में गलत कैसे? सीएजी की रिपोर्ट जब मुफीद नहीं लगी, तो कांग्रेस ने खूब सवाल उठाए। खुद शीला लो-फ्लोर बस की खरीब के मामले में सीएजी की रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेंकने वाली टिप्पणी कर चुकीं। कपिल सिब्बल ने तो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को ही झुठला दिया। अब उसी घोटाले के महाराजा ए. राजा के खिलाफ 31 मार्च तक सीबीआई चार्जशीट दाखिल करने जा रही। सरकार की जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट को बता चुका- इस घोटाले में छह देशों में हवाला के जरिए पैसे का लेन-देन हुआ। सो सिब्बल-शीला के दावों की हवा तो उनकी ही जांच एजेंसियां निकाल रहीं। अब तो जेपीसी के कांग्रेसी अध्यक्ष पी.सी. चाको भी रंग दिखाने लगे। यों जेपीसी की अभी पहली मीटिंग भी नहीं हुई। पर चाको ने मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी की जांच के दायरे पर सवाल उठा दिया। पर जेपीसी बनने से पहले इन्हीं चाको की कांग्रेस पीएसी की मुरीद थी। खुद मनमोहन पीएसी के सामने पेशी की पेशकश कर चुके। अब जेपीसी बन गई, तो कांग्रेस को पीएसी का दायरा बढ़ता दिख रहा। सो चाको बतौर जेपीसी अध्यक्ष कांग्रेसी रंग दिखाएंगे या सचमुच संसद का मान रखेंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा। पर स्पेक्ट्रम घोटाले में बुधवार को एक नया मोड़ आ गया। जब ए. राजा के बेहद करीबी रहे सादिक बाशा की रहस्यमयी मौत हो गई। परिवार वालों और चेन्नई पुलिस ने सुसाइड बताया। पर परिस्थितियां ऐसीं, हत्या की साजिश से सीधे-सीधे इनकार भी नहीं किया जा सकता। सादिक बाशा की कंपनी में राजा की बीवी डायरेक्टर थीं। बाशा को राजा का फंड मैनेज करने वाला कहा जाता था। सीबीआई अब तक चार बार पूछताछ कर चुकी थी। कहा जा रहा था- राजा का कोई बेहद करीबी सीबीआई का एप्रूवर बनने वाला। यानी बाशा सरकारी गवाह बन जाता, तो राजदारों की पोल खुल जाती। सीबीआई ने बाशा को फिर पूछताछ के लिए समन किया था। पर उससे पहले ही कथित आत्महत्या ने सबको चोंका दिया। खुद सीबीआई इसे आश्चर्यजनक मौत करार दे रही। तो टू-जी घोटाले का पर्दाफाश करने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी की दलील- बाशा की मौत से जांच प्रभावित होगी। बीजेपी ने तो सीधे-सीधे हत्या की आशंका जता दी। पर कांग्रेस की जयंती नटराजन ने सीधी टिप्पणी के बजाए बीजेपी पर चुटकी ली। बोलीं- बीजेपी कुछ अधिक जागरूक है। सो हत्या का निष्कर्ष निकाल लिया। बीजेपी को हर बात में षडयंत्र ही नजर आता। पर हम रिपोर्ट का इंतजार करेंगे। अब जयंती के जवाब का मतलब समझना मुश्किल नहीं। पर सत्तापक्ष हो या विपक्ष, किसी की हेकड़ी कम नहीं। बुधवार को गुजरात के मुद्दे पर राज्यसभा में रार ठन गई। वायब्रेंट गुजरात में हजारों करोड़ों के निवेश पर एमओयू दस्तखत हुए। गुजरात कांग्रेस की ओर से शिकायती चिट्ठी आई। तो संघीय ढांचे को अनदेखा कर आयकर विभाग के अधिकारी अनुराग शर्मा ने नोटिस भेज दिया। सो अरुण जेतली ने सरकार से जवाब मांगा। केंद्र-राज्य की इस लड़ाई में आसंदी पर बैठे सभापति हामिद अंसारी भी घेरे में आ गए। पर गुजरात के मुद्दे ने बीजेपी के अंदरूनी मतभेद को एक बार फिर सतह पर ला दिया। लोकसभा में यह मुद्दा एक सैकिंड के लिए भी नहीं उठा।
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16/03/2011

Tuesday, March 15, 2011

तो क्या सरकार वाया वाशिंगटन चल रही?

ममता बनर्जी ने रेल बजट में राज्य सरकारों के लिए लुभावनी स्कीम जारी की। तो लगा, अब राज्य सरकारें रेलवे की व्यवस्था को दुरुस्त रखने में जोर देंगी। रेल बजट में ममता ने एलान किया था- रेल परिचालन में जिस राज्य का ट्रेक रिकार्ड उम्दा रहेगा, उसे बजट से इतर दो जोड़ी ट्रेन और सीएम की मर्जी के दो प्रोजैक्ट दिए जाएंगे। पर बजट लागू होने से पहले ही ममता स्कीम का बंटाधार हो गया। यूपी जाट आंदोलन की आग से सुलग उठा। पखवाड़े भर से जाट रेलवे ट्रेक पर बैठे हुए। लगातार ट्रेनें रद्द हो रहीं। कुछ ट्रेनों को लंबे रूट से चलाया जा रहा। मंगलवार को जाट आंदोलनकारी दिल्ली तक पहुंच गए। सो संसद में भी मामला गूंजा। अपने रामदास अग्रवाल ने राज्यसभा में जोर-शोर से मसला उठाया। केंद्र सरकार पर ढिलाई बरतने का आरोप मढ़ा। पूछा- क्या केंद्र सरकार खून-खराबा चाहती है? अब कोई और सवाल उठाता, तो हम भी नहीं पूछते। पर सवाल रामदास अग्रवाल ने उठाया। सो गुर्जर आंदोलन के वक्त भाई रामदास की रामधुन भी याद दिलाते जाएं। जब राजस्थान में पहली बार गुर्जर अपने हक की लड़ाई के लिए रेलवे ट्रेक पर बैठे। तो बीजेपी की सरकार थी। गुर्जरों पर गोलियां चलाई गईं। तो सबसे पहले बीजेपी के साहिब सिंह वर्मा ने आलोचना की। अपनी बेबाकी के लिए पहचाने जाने वाले उन्हीं दिवंगत वर्मा की मंगलवार को ही जयंती भी। पर बात रामदास की। उस वक्त राजस्थान की सीएम ने गुर्जरों को धमकी देते हुए कहा था- एनफ इज एनफ। सो अपना मानना यही, शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरे घर पर पत्थर नहीं फैंकना चाहिए। आंदोलन कांग्रेस राज में हो या बीजेपी के राज में या फिर माया-मुलायम के राज में। ऐसे आंदोलनों को जायज नहीं ठहराया जा सकता। आठ करोड़ लोग अपने निजी हक के लिए 125 करोड़ लोगों को परेशान नहीं कर सकते। आम मुसाफिर आंदोलन की मार झेल रहा। परदेस में काम करने वाले लोग आंदोलन की वजह से होली के त्योहार पर भी अपने घर नहीं जा पा रहे। हर बार आंदोलन के लिए सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता। पर सवाल- फिर उसी सरकार से अपने हित की मांग क्यों करते? दूसरों की आजादी में खलल डालने वाले आंदोलन को आंदोलन नहीं कहा जा सकता। जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अहिंसक रास्तों से देश को आजादी दिला सकते। जापान जैसा देश एटमी विनाश के बाद उठ कर विकसित देश बन सकता। तो अपने देश में आंदोलन की रूपरेखा जापानियों जैसी क्यों नहीं? पर अपने नेताओं को वोट बैंक की राजनीति अधिक मुफीद लगती। सो आंदोलन के वक्त विपक्ष में बैठने वाला अपने दिन भूल जाता। राजनीतिक सौहाद्र्र कफन ओढक़र बैठ जाता। सो सामाजिक सौहाद्र्र का माहौल कैसे बने? चुनावी घमासान में नेताओं की जुबान बिना ब्रेक के चलती। सो वोट बटोरने के लिए आरक्षण का सुर्रा छोड़ देते। पर सत्ता में आने पर वही सुर्रा अपने लिए मुसीबत बन जाता। अब जाट आंदोलन तेज हो गया। तो मंगलवार को सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक और गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने जाट नेताओं को बातचीत का न्योता दिया। अपनी सरकार के कान में पता नहीं कौन सी बीमारी। जो बिना आंदोलन के आवाज गूंजती ही नहीं। पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा फोन करें, तो एक की जगह दो-दो आवाज सुनाई देने लगतीं। अब अमेरिका से जुड़े नए खुलासे को ही देखो। विकीलिक्स ने खुलासा किया- अमेरिकी हित को देखते हुए यूपीए-वन में मणिशंकर अय्यर को पेट्रोलियम मंत्रालय से हटा मुरली देवड़ा को कमान दी गई। वजह बताई गई- मणिशंकर ईरान-भारत गैस पाइपलाइन के हिमायती थे। जो अमेरिका को पसंद नहीं। सो मणिशंकर को मंत्रालय से हटाया गया। पर अब मणिशंकर कह रहे- पेट्रोलियम मंत्रालय तो मुझे अस्थायी तौर पर दिया गया था। पर तबके अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपने आका को दस्तावेज भेजे। जिसमें खास तौर से उल्लेख किया गया कि पेट्रोलियम मंत्रालय में बदलाव अमेरिका-भारत के संबंधों के मद्देनजर हुआ। अब ऐसी सरकार को क्या कहेंगे? कभी कॉरपोरेट लॉबिस्ट केबिनेट मंत्री और विभाग तय करते, तो कभी अंकल सैम की खातिर विभाग बांटे जाते। सो मंगलवार को संसद के दोनों सदनों में विकीलिक्स के खुलासे पर विपक्ष ने मोर्चा खोला। अपने जसवंत सिंह ने मनमोहन सरकार की विदेश नीति को चिंताजनक बताया। तो पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने सरकार की विदेश नीति का समर्थन करते हुए दलील दी- इसी नीति के चलते विकास दर बढ़ रही। तो क्या भारत की सरकार अब वाशिंगटन से चलेगी? परमाणुवीय जनदायित्व बिल को लेकर मानसून सत्र में कितना हंगामा बरपा था। अमेरिकी जिद के आगे मनमोहन ने विपक्ष को अनसुना सा कर दिया था। बाद में कुछ बातें मानीं, पर आज भी किसी एटमी अनहोनी की स्थिति में मुआवजे की कीमत देखिए। तो अमेरिका और भारत में 23 गुने का फर्क। तब बीजेपी के यशवंत सिन्हा ने बढिय़ा जुमला दिया था- क्या अमेरिकियों का खून खून और भारतीयों का खून पानी? सचमुच अपनी विदेश नीति लचर दिख रही। अमेरिकी शह पर पड़ोसी पाक पैंतरेबाजी करता रहता। तो दूसरा पड़ोसी चीन अपनी चालबाजियों से बाज नहीं आता। नेपाल में माओवाद पसर चुका। तो श्रीलंका से भी संबंध बेहतर नहीं।
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15/03/2011