Wednesday, November 18, 2009

तो क्या अब चीनी-अमेरिकी भाई-भाई?

इंडिया गेट से

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तो क्या अब चीनी-
अमेरिकी भाई-भाई?
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 संतोष कुमार
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         अब तय हो चुका, बीजेपी का किला नितिन गडकरी ही संभालेंगे। बुधवार को बीजेपी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर तो गडकरी शब्द के अर्थ भी पार्टी मंच से बता गए। गडकरी, यानी गढ़ की रक्षा करने वाला। किले को मजबूत करने वाला। यानी कमजोर हो रहे बीजेपी के किले को संघ ने नाम का गडकरी थमा दिया। सो बीजेपी में गडकरी का गुणगान भी शुरू हो गया। यों गडकरी शब्द शिवाजी महाराज के वक्त खूब इस्तेमाल होता था। शिवाजी किला फतह करते जाते। उसकी रक्षा के लिए सिपाही भी तैनात होते जाते। सो गढ़ की रक्षा करने वालों इन सिपाहियों को ही गडकरी कहा गया। अब शिवाजी के गडकरी तो इतिहास की बात। पर संघ के गडकरी बीजेपी के कितने काम आएंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। सो फिलहाल तो बीजेपी के धुरंधर सरकार को घेरने में जुट गए। आखिर जन, गण, मन की घड़ी आ ही गई। गुरुवार को शीत सत्र शुरू होगा। तो संसद के बाहर गन्ना किसान दर्द उड़ेलेंगे। सदन के भीतर विपक्ष की गर्जना। सो संसद सत्र के लिए मुद्दों की भरमार और विपक्ष के तेवरों ने सरकार की तबियत नासाज कर दी। सो अपने अभिषेक मनु सिंघवी ने बुधवार को ही बचावी पेंतरा ढूंढ लिया। बोले- 'अंदरूनी कलह से बचने के लिए विपक्ष सत्र को बाधित करने की मंशा पाले हुए है।Ó यानी बीजेपी जब भी मुद्दा उठाकर हंगामा करेगी। तो कांग्रेस जवाब में यही दलील देगी। पर क्या गन्ना किसानों की आवाज या महंगाई, भ्रष्टïाचार, आतंकवाद जैसे मुद्दे उठाना विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं? अब अगर बीजेपी इन मुद्दों पर सरकार से जवाब तलब करे। तो सरकार को सीधे-सीधे जवाब देना चाहिए। ताकि संसद में बहस का स्तर उम्दा हो। आम जनता का संसद के प्रति भरोसा बढ़े। ब्रिटिश विद्वान सर आइवर जैनिंग्स ने लोकतंत्र के बारे में यही तो लिखा था। अगर किसी देश की जनता स्वतंत्र है या नहीं, यह पता करना हो। तो पहले यह पता करो कि उस देश में विपक्षी दल है या नहीं। और अगर है, तो उसकी स्थिति कैसी है। यानी लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूती ही बेहतर शासन की नींव। सो जनता के मुद्दे से मुंह छिपाने को विपक्ष के अंदरूनी झगड़ों पर हमला कहां तक उचित? पर सरकार भी विपक्ष को जवाब देने की तैयारी का दावा कर रही। सो भले घरेलू मुद्दों पर राजनीतिक नफा-नुकसान बहस में दिखे। पर अंतर्राष्टï्रीय मामले में एकजुटता की जरूरत। अब अमेरिका की चीन से गलबहियां अपनी चिंता का विषय। अमेरिका ने यू-टर्न लेते हुए तिब्बत पर पहली बार चीन का साथ दिया। यही अमेरिका दलाईलामा को चीन के खिलाफ अंतर्राष्टï्रीय मंच मुहैया कराता रहा। हर तरीके से मदद के साथ-साथ मानवाधिकार की दुहाई देता रहा। ताकि चीन को काबू में रख सके। पर मंदी ने अमेरिका को हिला दिया। अब चीन आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर। सो ओबामा सीधे चीन को शरणागत हो गए। पर चीन कम चालाक नहीं। जब खुद महाशक्ति बनने की ओर। तो डूब रही महाशक्ति को सहारा क्यों दे। सो भारत के खिलाफ फिलहाल अमेरिका का साथ निभाएगा। ताकि अरुणाचल के तवांग पर अपना दावा मजबूत कर सके। सो अमेरिका-चीन की गलबहियां भारत के लिए दोहरी चिंता की वजह। साझा बयान तो अमेरिका-चीन का जारी हुआ। पर जिक्र भारत-पाक मुद्दे की हो गई। ओबामा-जिंताओ ने मिलकर भारत-पाक के मामलों में दखल देने की प्रतिबद्धता जता दी। चीन तो पहले ही पाक को शह देता रहा। अब अमेरिका ने उसे दक्षिण एशिया का दादा घोषित कर दिया। यानी अब दोनों मिलकर कश्मीर में अपनी नाक घुसेड़ेंगे। पर कहीं ऐसा न हो, अमेरिकी-चीनी भाई-भाई बन भारत को कश्मीर में उलझा दें। उधर तवांग को चीन हथिया ले। पर चीन से अमेरिका को भी सचेत रहने की जरूरत। चीन ने पहले हिंदी-चीनी भाई-भाई कहकर भारत की पीठ में छुरा घोंपा। सो जो चीन पड़ोसी का सगा न हुआ। वह सात समंदर पार अमेरिका का क्या होगा। अब कोई पूछे, अमेरिका-चीन साझा बयान में भारत-पाक कहां से आ गए। दक्षिण एशिया में शांति का दादा क्यों बन रहे, जब किसी ने मदद मांगी ही नहीं। सो बुधवार को अपने विदेश मंत्रालय ने दो-टूक जवाब दे दिया। अमेरिका और चीन भले स्वयंभू दादा बन रहे हों। पर भारत का राष्टï्रीय हित सर्वोपरि। सो अपने विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर दिया। पाक के साथ द्विपक्षीय वार्ता के जरिए विवाद को खुद सुलझाएंगे। शिमला समझौते के तहत न तो तीसरे पक्ष की भूमिका हो सकती। और न भारत को इसकी दरकार। पर पाक से सार्थक बातचीत तभी, जब आतंकवाद का खात्मा होगा।

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18/11/2009

Friday, November 13, 2009

हेडली पर यूएस के रुख से ठगी रह गई अपनी सरकार

इंडिया गेट से
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हेडली पर यूएस के रुख से
ठगी रह गई अपनी सरकार
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 संतोष कुमार
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डेविड हेडली के मंसूबों के खुलासे ने फिर सवाल उठा दिया। आतंकवाद के खिलाफ अपनी तैयारी कितनी मुकम्मल। हाल में जनरल दीपक कपूर ने ताल ठोककर कहा था- '26/11 को मुंबई पर हमला आखिरी आतंकी वारदात। जैसे 9/11 के बाद अमेरिका ने कोई हमला नहीं होने दिया। इंडोनेशिया ने बाली विस्फोट के बाद दूसरा वाकया न होने दिया। वैसी ही अब हमारी तैयारी।' गुरुवार को अपने पी. चिदंबरम ने भी करीब-करीब यही दोहराया। भले 26/11 के बाद अपना सुरक्षा तंत्र चुस्त-दुरुस्त हुआ। पर जब तक सरकार में बैठे राजनीतिक आकाओं में कूटनीतिक साहस न हो। तो सुरक्षा तंत्र क्या बिगाड़ लेगा? डेविड हेडली का ताजा किस्सा तो यही बयां कर रहा। अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने हेडली को गिरफ्तार किया। तो लश्कर-ए-तोइबा से सांठगांठ कर अमेरिका व भारत में हमलों की साजिश का खुलासा हुआ। हेडली के भारत आने-जाने की रपट एफबीआई ने दी। तो अपनी सुरक्षा एजेंसी हेडली के फुट प्रिंट्स के पीछे-पीछे भाग रही। ताकि कोई सुराग मिल सके। हेडली 2006 से 2008 के बीच भारत आता-जाता रहा। अहमदाबाद, लखनऊ, मुंबई, आगरा, दिल्ली के होटलों में रुका। पर न अपने सुरक्षा बलों को भनक लगी। न हमलों के बाद कोई सुराग ढूंढ पाई। अब किस-किस साजिश में हेडली का हाथ। इसके पुख्ता सबूत आने बाकी। पर दिल्ली धमाके से लेकर 26/11 तक में हेडली का नाम आ रहा। खुलासे में किसी राहुल का नाम आया। तो मनमोहन सरकार सकते में आ गई। अंदेशा हुआ, कहीं राहुल बाबा का नाम तो नहीं। कहीं राहुल के खिलाफ कोई साजिश तो नहीं। सो जांच ने फौरन रफ्तार पकड़ ली। तब जाकर शुक्रवार को खुलासा हुआ। राहुल भट्टï से मिला था डेविड हेडली। जब मुंबई आया, तो वर्जिश को लेकर राहुल भट्टï से मुलाकात हुई। राहुल भट्टï नामचीन फिल्म डायरेक्टर महेश भट्टï के बेटे। जो पेशे से जिम इंस्ट्रक्टर। सो राहुल ने खुद पुलिस को सारी कहानी बताई। पर राहुल नाम की गफलत में सरकार ने फौरन आईबी-रॉ की एक टीम अमेरिका भेज दी। ताकि हेडली से पूछताछ कर जांच को अंजाम तक पहुंचाया जा सके। पर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई की पोल एक बार फिर खुल गई। अमेरिका की जुबान और नीयत में सात समुंदर का फासला। सो भारत के खिलाफ साजिश रचने वाले डेविड हेडली के बारे में रपट तो दी। पर भारतीय जांच टीम को डेविड से पूछताछ की इजाजत नहीं दी। पूछताछ की बात तो छोडि़ए। एफबीआई ने अमेरिकी मूल के गिरफ्तार आतंकी डेविड हेडली उर्फ दाऊद गिलानी और तहव्वुर राना का चेहरा तक नहीं देखने दिया। अब जरा अमेरिकी नीयत का फर्क आप खुद देख लो। जब 26/11 को मुंबई में हमला हुआ। मरने वालों में कई अमेरिकी नागरिक भी। सो अपनी जांच एजेंसियों ने कोई हील-हुज्जत नहीं की। अलबत्ता अजमल आमिर कसाब को एफबीआई के हवाले कर अलग से पूछताछ करने दी। सो अमेरिका की दोहरी नीति कब तक छिपी रहेगी। अब अपनी जांच एजेंसी और सरकार सिर्फ एफबीआई से मिलने वाली रिपोर्ट पर ही निर्भर। पर डेविड हेडली तो अपने मंसूबों को अंजाम देकर भारत से निकल चुका। सो जब तक अपनी एजेंसी पूछताछ न कर ले। अंधेरे में हाथ-पांव मारने के सिवा कोई चारा नहीं। अपनी हालत तो ऐसी, जैसे सांप के निकल जाने के बाद लकीर पर लाठी पीट रहे। यानी भारत में तबाही मचाने वाले आतंकियों से पूछताछ की खातिर भी अब अमेरिका की मुंहतकी की नौबत। अमेरिका भी यही चाह रहा। ताकि दुनिया की आंखों में धूल झोंक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का ढिंढोरा पीट सके। तो दूसरी तरफ पाक और चीन को शह देकर दक्षिण एशिया में दबदबा बनाए रखने की रणनीति। तभी तो 26/11 के हमले के बाद भले कूटनीतिक दबाव का असर दिखा। पर अब तो पाक ढीठ होकर पलटवार कर रहा। चीन से आधुनिक लड़ाकू विमान मिल रहे। अमेरिका से अरबों-खरबों की मदद। पाक में तालिबानी तांडव मचा हुआ। तो इसी नाम पर अमेरिकी सहायता मिल रही। दूसरी तरफ चीन भारत में नक्सली आतंकवाद फैलाने की तैयारी कर चुका। सो नक्सली सरकार से बातचीत की पेशकश को ठुकरा रहे। सरकार के खिलाफ जंग का एलान। सो चुनौती घरेलू हो या कूटनीतिक। सरकार में निपटने का कितना दमखम। अमेरिका ने भारत की जांच टीम को बैरंग लौटा दिया। पर मनमोहन सरकार चूं तक नहीं कर सकी। आखिर आतंकवाद के खिलाफ यह कैसी वैश्विक जंग? अगर अपनी सरकार सख्ती के साथ-साथ शक्ति की भाषा भी अपनाए। तो दोहरी नीति अपनाने वाले बेनकाब हो सकें। पर अपनी सरकार ने तो फिलहाल वैसा साहस नहीं दिखाया। अब हेडली के प्रत्यर्पण की कोशिश करेगी। सो अपनी नेशनल इनवेस्टीगेटिव एजेंसी ने हेडली-राना के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। अब अंधेरे में हाथ-पांव मार सबूत जुटाएगी। फिर अमेरिका से प्रत्यर्पण की मांग होगी। पर तब तक एफबीआई हेडली-राना को निचोड़ चुकी होगी।
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13/11.2009

Thursday, November 12, 2009

इंडिया गेट से
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पश्चाताप के आंसू: कितने
घडिय़ाली, कितने सच?
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 संतोष कुमार
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फिजां बदली, तो बीजेपी को अपना घाव दर्द देने लगा। इतिहास का पन्ना कुरेद मरहम लगा रही। पर पहले बात अध्यक्षी घुड़दौड़ की। नितिन गडकरी गुरुवार को दिल्ली आए, और निकल लिए। झंडेवालान में हाजिरी लगाई। तो अशोका रोड पहुंच रामलाल से दो घंटे की गुफ्तगू। सो सवाल हुआ, तो गडकरी ने कह दिया- 'मैं किसी दौड़ में शामिल नहीं।Ó वाकई खुद से गडकरी या कोई और दौड़ में शामिल नहीं हो सकता। दौड़ाने का जिम्मा तो मोहन भागवत ने संभाल रखा। सो जिसे चाहें, डंडा थमा दें। पर रिटायरमेंट को मजबूर आडवाणी भी खूंटा गाड़े बैठे। अब अध्यक्ष गडकरी बनें, या मोदी, शिवराज, पारिकर या कोई डार्क हॉर्स। पर बीजेपी का झगड़ा ऐसी मजाक बन चुका। अशोका रोड में लोग कहने लगे। आडवाणी ने संघ को कुछ यों संदेशा भेज दिया। तुम मुझे न चाहो, तो कोई बात नहीं। किसी और को चाहोगी, तो मुश्किल होगी। यानी भागवत चाहे लाख घोड़े दौड़ा लें। आडवाणी की मर्जी के बिना किसी को अध्यक्ष नहीं थोप सकते। पर दिल्ली से बाहर के अध्यक्ष वाला भागवत का बयान हो या आडवाणी-राजनाथ की खेमेबाजी। बीजेपी खुद में मजाक बनकर रह गई। गुरुवार को नितिन गडकरी बीजेपी हैड क्वार्टर पहुंचे। तो खबरनवीसों तक सूचना पहले पहुंच गई। सो अपनी बिरादरी वालों ने भावी अध्यक्ष का तमगा थमा बधाइयां दे दीं। किसी ने कहा, चार्ज लेने आए हैं। तो किसी ने कहा, फाइल देखने। पर अब शायद मजाक की अति हो चुकी। सो बीजेपी मानो दर्द से कराह रही। बीजेपी के मुखपत्र 'कमल संदेशÓ के ताजा अंक में इसी बात का रोना-धोना। बीजेपी अब खुद से सवाल पूछ रही, जब संगठन सर्वोपरि है। तो फिर ऐसा क्यों...? अब शायद बीजेपी के नेता या वर्कर कम से कम मीडिया पर तो आरोप नहीं मढ़ेंगे। खुद बीजेपी कबूल रही। पराजय की मार झेलने के बाद जो हुआ, बीजेपी जनता को क्या मुंह दिखाए। वर्करों की भावना पहली बार 'कमल संदेशÓ में उभरी। तो हर वर्कर अपने आला नेताओं से यही पूछ रहा- 'हम जवाब क्या दें?Ó पर 'कमल संदेशÓ का संपादकीय भी फ्लैश बैक से शुरू हुआ। सो बानगी आप खुद देख लो। जैसी हार 2004 में हुई, वैसी ही 2009 में भी। फर्क इतना, तब एनडीए सरकार में था। अबके विपक्ष में। उस समय भी महाराष्टï्र, अरुणाचल, हरियाणा में बीजेपी हारी। इस बार भी यही हुआ। पर 2004 और 2009 के माहौल में जमीन-आसमान का फर्क। अभी भी पांच-सात राज्यों में सरकार होने का गर्व। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शहादत। बीजेपी के कोर मुद्दे- हिंदुत्व की विचारधारा, अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता की भी याद ताजा की। निराशा और हताशा से उबरने को जनसंघ से बीजेपी के सफर का भी जिक्र। जब पुरोधाओं ने तिल-तिल जलकर जनसंघ का 'दीयाÓ जलाया। गांव-गांव तक 'कमलÓ पहुंचाया। मनमोहन सरकार की पहली पारी में विधानसभा चुनाव जीतने का खूब बखान। ताकि पार्टी हताशा से निकल सके। बिहार में लालू राज समाप्त किया। झारखंड में संविधान की आन बचाई। पंजाब, हिमाचल और उत्तराखंड कांग्रेस से छीन लिए। प्रतिष्ठïा का मुद्दा बना गुजरात चुनाव भी कांग्रेस के मुंह पर तमाचा रहा। बीजेपी को उत्तर भारतीयों की पार्टी कहा गया। पर दक्षिण के कर्नाटक में परचम लहरा येदुरप्पा सीएम बने। नगालैंड में गठबंधन की सरकार बनी। यानी 'कमल संदेशÓ के पहले पार्ट में इतिहास से सिर्फ सुनहरे पन्ने निकाले गए। पर जिन्ना एपीसोड, उमा भारती प्रकरण, खुराना का दिल्ली प्रेम, कल्याण सिंह का जाना, राजस्थान और गुजरात की उठापटक तो आम बात रही। फिर भी इतिहास के काले पन्ने नहीं कुरेदे गए। पर अब जरा कबूलनामे के दूसरे पार्ट पर नजर फिराएं। तो राजस्थान का वसुंधरा एपीसोड और कर्नाटक का येदुरप्पा एपीसोड बीजेपी को झकझोर गया। सो 'कमल संदेशÓ में साफ लिखा गया- 'राजस्थान में हालत पतली। फिर भी राजस्थान को लेकर हाल में जो दृश्य पैदा हुआ। उससे देश भर के कार्यकर्ताओं का मन दुखी हुआ। आखिर बिना अनुशासन और दल की एकता के हम कहां रहेंगे?Ó यानी वसुंधरा प्रकरण पर भले उनके समर्थक डींगें हांक बीजेपी को ठेंगा दिखा रहे। नेता के आगे संगठन को बौना बता रहे। उनके लिए साफ नसीहत, संगठन ही सर्वोपरि। राजस्थान और दिल्ली की हार गले नहीं उतर रही। सो 'कमल संदेशÓ के जरिए बीजेपी अब बीजेपी से ही सवाल पूछ रही। हम कमजोर कहां हैं? हमारी कमजोरी क्या है? वक्त रहते कमजोरी दूर करने की जरूरत। दोषारोपण से काम नहीं चलेगा। यह बात नेतृत्व को समझनी ही होगी। आखिर ऐसे कौन से हालात, जो बीजेपी यहां तक पहुंच गई? अब बीजेपी के नेता 'कमल संदेशÓ में उठाए सवालों को कितनी गंभीरता से लेंगे, यह तो वही जानें। पर 2004 और 2009 के बाद के माहौल में बड़ा फर्क। तब बीजेपी सत्ता से बेदखल हुई थी। पर कुछ विधानसभा में जीती, तो जश्र मनाया। हारी, तो सबक नहीं लिया। अबके 2009 में सत्ता की उम्मीद थी, पर जैसे प्यासा कुएं के पास जाकर लौटने को मजबूर हो। वैसी ही झल्लाहट बीजेपी के चेहरे पर। सो बीजेपी के पश्चाताप के आंसू, कितने घडिय़ाली, कितने सच, यह तो समय ही तय करेगा।
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Monday, November 9, 2009

इंडिया गेट से --------- 'राज' द्रोह पर नपुंसक क्यों अपनी राजनीति? ---------------  संतोष कुमार ----------- 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा... हिंदी हैं हम, वतन है... हिंदोस्तां हमारा।' मोहम्मद इकबाल का लिखा तराना 1904 से अब तक अपने गौरव का गीत बना हुआ। पर कौन सोच सकता, ऐसा तराना लिखने वाला कभी बंटवारे की बात करेगा। फिर भी इतिहास का यही सच। इकबाल बाद में बंटवारे के कट्टïर पैरोकार बन गए थे। ऐसा ही तराना उन ने पाक की खातिर भी लिखा। अब इकबाल तो सारे जहां से अच्छा गीत आम भारतीय की जुबान से दूर नहीं कर सके। पर सोमवार को महाराष्टï्र की विधानसभा से वही बंटवारे की बू आई। एक तरफ मराठी प्रेम, तो दूसरी तरफ देश को बांटने का संदेश। राज ठाकरे के गुंडों ने फिर देश को शर्मसार करने वाला वाकया दिखाया। पहली बार एमएनएस के 13 एमएलए चुने गए। तो राज ठाकरे के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे। सो सड़कों की लड़ाई विधानसभा पहुंच गई। विवाद का मुद्दा बनी अपनी राष्टï्र भाषा। राज ठाकरे ने अपील कम, आदेश के अंदाज में सभी विधायकों को फरमान थमा दिया था। शपथ ग्रहण सिर्फ मराठी में ही करना होगा। पर समाजवादी पार्टी के अबू आजमी ने हिंदी में शपथ का खम ठोका। सोमवार को आजमी शपथ लेने को खड़े हुए। तो राज ठाकरे के पालतुओं ने माइक छीना। हाथापाई से लेकर लप्पड़-थप्पड़ और जूते-चप्पल भी चलाए। पर आजमी का कसूर क्या? सिर्फ यही ना, राष्टï्र भाषा में शपथ ली। इसमें मराठी का अपमान कहां से? क्या मराठी संस्कृति यह कहती, किसी से जबरन अपनी जुबान बुलवाओ। क्या इंसानियत कोई संस्कृति नहीं? अगर राज ठाकरे ने अपील की थी। अपील या अनुरोध तो किसी पर बंदिश नहीं। फिर राज के गुर्गों ने इतना हंगामा क्यों बरपाया? क्या मराठी प्रेम या महाराष्टï्र राज ठाकरे के बाप की जागीर हो गई? उत्तर भारतीयों की मुखालफत कर कभी सड़कों पर तांडव, तो कभी विधानसभा में। भले सोमवार को एमएनएस की गुंडागर्दी पर फौरी कार्रवाई हुई। मर्यादा तार-तार करने वाले एमएनएस के चार एमएलए चार साल के लिए सस्पेंड कर दिए। राम कदम, शिशिर शिंदे, वसंत गीते, रमेश वांजले अब विधानसभा परिसर में भी कदम नहीं रख पाएंगे। पर यह तो कार्रवाई का टोकन भर। राज के गुर्गे फिर सड़कों पर तांडव मचाएंगे। पर दूसरा पहलू, सस्पेंड हुए चार एमएलए के इलाके की जनता खामियाजा क्यों भुगते? बेहतर तो यही होता, एमएलए बर्खास्त कर दिए जाते। एमएनएस को बैन करने की सिफारिश चुनाव आयोग से होती। राज ठाकरे के चि_ïीनुमा फरमान और बयानों पर फौरी कार्रवाई होती। ताकि ऐसे राष्टï्र द्रोहियों को दुबारा सिर उठाने का मौका न मिले। पर अपनी राजनीति में ऐसा साहस कहां। सीएम अशोक चव्हाण ने सस्पेंशन का एलान किया। तो सजा की वजह सदन में हुआ व्यवहार बताया। हिंदी के अपमान पर सवाल टाल गए। यों राज ठाकरे के खिलाफ जांच का एलान जरूर किया। पर राज तो पहले भी गिरफ्तार और रिहा होते रहे। पुलिस हाथ जोड़े खड़ी रहती। राज हाथ में सिगरेट लिए बयान देते। अबके विधानसभा में एमएनएस के एमएलए ने हाथापाई की। तो बाहर उनके नेताओं की जुबान जहर उगल रही थी। वागीश सारस्वत से लेकर सरपोतदार तक अपनी हरकत को जायज ठहराते रहे। वागीश ने यहां तक कह दिया, आजमी जैसे लोग लातों के भूत हैं, बातों से नहीं मानते। लगे हाथ एमएनएस की धमकी भी, जिसको जिस भाषा में बात करनी हो, आकर कर ले। यानी न संविधान का लिहाज, न कानून का डर। अलबत्ता राज ठाकरे तो हर कदम संविधान को श्रद्धांजलि दे रहे। आजमी की हिंदी पर हंगामा बरपाया। पर कांग्रेसी बाबा सिद्दीकी ने अंग्रेजी में शपथ ली। तो कुछ नहीं बोले। यानी अंग्रेजी मंजूर, हिंदी नहीं। अब राष्ट्रभाषा के खिलाफ लोगों को भड़काना राजद्रोह नहीं, तो और क्या? पर राज के खिलाफ ठोस कार्रवाई में किस बात का इंतजार? हिंदी भाषियों के खिलाफ मुंबई की सड़कों पर जो दुनिया ने देखा। सोमवार को विधानसभा का वाकया देखा। फिर किस बात की देरी? आखिर 'राजÓ द्रोह पर अपनी राजनीति नपुंसक क्यों बनी बैठी? कांग्रेसी सत्यव्रत हों, या सिंघवी। लालू हों या शाहनवाज। सिर्फ कड़ी भत्र्सना तक ही सीमित रहे। लालू ने इतना जरूर चेताया, देश टूटेगा, तो महाराष्टï्र की वजह से। पर जब लालू कांग्रेस के साथ पावरफुल थे, तब कार्रवाई का दबाव क्यों नहीं बनाया। महाराष्टï्र और केंद्र में तब भी कांग्रेस, आज भी कांग्रेस सत्ता में। विपक्षी बीजेपी की हालत तो न तीन में, न तेरह में। आपसी लड़ाई में ही इस कदर उलझी। राज कौन, शायद मालूम नहीं होगा। सो उससे आग या खून खौलने की उम्मीद ही बेमानी। पर कांग्रेस तो आजादी की आन, बान, शान वाली पार्टी। फिर भी खून क्यों नहीं खौल रहा? क्या खून इतना ठंडा पड़ चुका। जो संविधान की श्रद्धांजलि देने वाले और मानवता को कुचलने वाले राज को रोक नहीं पा रही। राज के सिर्फ तेरह पालतुओं ने हंगामा मचाया। तो मुंबई में हाई अलर्ट करना पड़ा। अब भी अगर राजनीति ऐसी ही नपुंसक बनी रही। तो इकबाल की मानसिकता वाले राज जैसे लोग बढ़ते जाएंगे। बाकियों को इकबाल का लिखा गीत भुलाना होगा। --------- 09।11।2009

Wednesday, November 4, 2009

Hindi Blogosphere: ब्लॉगवाणी Blogvani Hindi Agregator

Hindi Blogosphere: ब्लॉइंडिया गेट से---------------चोली-दामन जैसा रिश्ता राजनीति और भ्रष्टाचार का ------------------------तो शरद पवार ने फिर मुह खोला। सो न जाने महंगाई अब कहाँ जाकर थमेगी। ख़ुद पवार को भी मालूम नहीं। सो महंगाई का भूत दिखाकर कट लिए। कभी मंदी की दुहाई, तो कभी पैदावार में कमी की दलील। पर इन नेताओं से यह पूछकर देखो, कौन सा महकमा मलाईदार तो चट बता देंगे। मलाईदार महकमों का मामला न होता तो महाराष्ट्र में सरकार न बन गई होती। पर चुनावी खर्च सूद समेत निकालना जरूरी सो कांग्रेस-एनसीपी मलाई छोड़ने को राजी नहीं। अब गवर्नर ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया। तो कमोबेश शायद अब कुछ जुगाड़ फिट हो जाए। पर जनता की गाढ़ी कमाई की लूट कैसी मचेगी, यह मधु कोड़ा से पूछकर देख लो। अमीर बनने का सबसे शॉर्टकट तरीका बन चुकी राजनीति। मधु कोड़ा तो फर्श से अर्श तक पहुंचने का ताजा उदाहरण। पर पूछताछ हुई तो बीमार पड़ गए। पर छापे में अहम दस्तावेज जांच एजेंसी के हाथ लगे। सो बुधवार को इनकम टेक्स विभाग ने कोड़ा का घर सील कर दिया।जब झारखंड राज्य बना, तो बीजेपी कोटे से मंत्री थे। पर राज्यसभा चुनाव में पैसा लेकर क्रॉस वोटिंग की तो बीजेपी ने निकाल दिया। पर दूसरा चुनाव निर्दलीय जीते तो कांग्रेस-लालू-शिबू ने मिलकर सीएम बना दिया। सो कोड़ा ने जमकर कारगुजारी दिखाई। किसको कितना शेयर मिला, पता नहीं। पर अकेले कोड़ा ने चार हजार करोड़ जमा कर लिए। मंत्री-सीएम रहते कोड़ा दुबई-बैंकाक भी घूम आए। पर केंद्र सरकार को भनक भी न लगी। कहीं ऐसा तो नहीं, राजनीतिक शेयर मिल गया। तो सरकारी तंत्र ने आंख मूंद ली हो। कोड़ा इलाज के बहाने जिन देशों में गए। उन देशों से ही अकूत संपत्ति की पोल खुल रही। अब झारखंड चुनाव हो रहे। तो कांग्रेस खुद को बेदाग दिखाने की कोशिश में कोड़ा पर शिकंजा कसवा रही। पर यह तो वही बात, चोरी में भी साथ दिया। अब चौकीदार बन जनता को बरगला रही। यों कोड़ा तो सिर्फ भ्रष्टाचार की कड़ी। राजनीति और भ्रष्टाचार का तो चोली-दामन जैसा रिश्ता बन चुका। वरना चार आने का नेता यों ही करोड़पति नहीं बन जाता। फिर भी अपना इरादा किसी पर उंगली उठाने का नहीं। पर राजनेताओं का इतिहास-भूगोल याद करा दें। ताकि आप खुद उनका क्वनागरिक शास्त्रं तैयार कर सकें। हाजी मस्तान पोर्टर से स्मगलर, और स्मगलर से नेता बन गए। भजनलाल 1950 के दशक में चुन्नियां बेचा करते थे। चार आने का टिकट नहीं खरीद पाने की वजह से धर लिए गए थे। फिर किस्मत ऐसी बदली, चार बार सीएम, दो बार केंद्र में मंत्री और अब हरियाणा में किंगमेकर बने हुए। ओमप्रकाश चौटाला साधारण किसान परिवार से थे पर सीबीआई की नजर में 2000 करोड़ के मालिक। बूटा सिंह अकाली पत्रिका अखबार के दफ्तर में पानी पिलाने का काम करते थे। पर देश के होम मिनिस्टर की कुर्सी तक पहुंच गए। बेटा हाल ही में एक करोड़ की रिश्वत लेते धरा जा चुका। नरसिंह का झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड। दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन साल की सजा दी। पर सुप्रीम कोर्ट ने संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला बताकर बरी कर दिया। पंडित सुखराम के घर संचार घोटाले में छापा पड़ा। तो मंत्री के सरकारी आवास से साढ़े चार करोड़ मिले। पर वही सुखराम कभी मंडी के स्कूल में क्लर्क थे। दिल्ली आए, तो सर्वेट क्वार्टर में रहे। उस जमाने में पंद्रह रुपए की साइकिल आती थी। पर सुखराम की हैसियत से बाहर थी। यों सुखराम पहले नेता हुए, जिन्हें भ्रष्टाचार में सजा मिली। अब लालू यादव को ही लो। बिहार में साढ़े नौ सौ करोड़ का चारा घोटाला सबको चौंकाने वाला। कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा के परिवार की आधिकारिक संपत्ति साढ़ सात सौ करोड़। चुनाव आयोग को हलफनामे में इतना बताया। तो बाकी भगवान ही जाने। पर कभी देवगौड़ा जूनियर इंजीनियर के नीचे ड्राफ्टमैन हुआ करते थे।बीजेपी के येदुरप्पा की मुसीबत बने रेड्डी बंधुओं की संपत्ति सात हजार करोड़। जो सिर्फ 2004 से 2009 के बीच बनी। आंध्र में वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन के अकेले की संपत्ति पांच सौ करोड़। कहां से आए इतने पैसे? कोई निचले स्तर से उठकर देश की बागडोर संभाले, तो गौरव की बात। पर संपत्ति भी देश जैसी विशाल हो जाए, तो क्या कहेंगे? तमिलनाडु में जयललिता हों या करुणानिधि। जयललिता ने अपनी आत्मकथा में खुद लिखा। जब उनकी मां की मौत हुई, तो अंतिम संस्कार को पैसे न थे। लाश घर में पड़ी थी, पर वह फिल्म की शूटिंग में गईं। ताकि 51 रुपए का बंदोबस्त हो सके। आज जयललिता क्या हैं, बताने की जरूरत नहीं। बीजेपी में प्रमोद महाजन के शुरुआती दिन मुफलिसी में गुजरे। पर राजनीति में आए, तो संपत्ति बेहिसाब हो गई। ये सारे उदाहरण तो सिर्फ एक झलक। कई सफेदपोश तो ऐसे, जिन पर जांच एजेंसी हाथ डालने की हिमाकत भी नहीं कर सकती। पर उनका इतिहास और वर्तमान खुद हकीकत बयां कर रहा। आम आदमी तो दो जून की रोटी जुटा ले, तो संतोष की सांस लेता। पर राजनेताओं का पेट भरता ही नहीं। सुरसा की तरह मुंह फैलाए बैठे। करोड़ों-करोड़ों निगल रहे, पर डकार का नाम नहीं। सो भ्रष्टाचार पर नकेल, सिर्फ कहने की बात।-------०४/११/2009 गवाणी Blogvani Hindi Agregator
इंडिया गेट से --------------- चोली-दामन जैसा रिश्ता राजनीति और भ्रष्टाचार का ------------------------ तो शरद पवार ने फिर मुह खोला। सो न जाने महंगाई अब कहाँ जाकर थमेगी। ख़ुद पवार को भी मालूम नहीं। सो महंगाई का भूत दिखाकर कट लिए। कभी मंदी की दुहाई, तो कभी पैदावार में कमी की दलील। पर इन नेताओं से यह पूछकर देखो, कौन सा महकमा मलाईदार तो चट बता देंगे। मलाईदार महकमों का मामला न होता तो महाराष्ट्र में सरकार न बन गई होती। पर चुनावी खर्च सूद समेत निकालना जरूरी सो कांग्रेस-एनसीपी मलाई छोड़ने को राजी नहीं। अब गवर्नर ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया। तो कमोबेश शायद अब कुछ जुगाड़ फिट हो जाए। पर जनता की गाढ़ी कमाई की लूट कैसी मचेगी, यह मधु कोड़ा से पूछकर देख लो। अमीर बनने का सबसे शॉर्टकट तरीका बन चुकी राजनीति। मधु कोड़ा तो फर्श से अर्श तक पहुंचने का ताजा उदाहरण। पर पूछताछ हुई तो बीमार पड़ गए। पर छापे में अहम दस्तावेज जांच एजेंसी के हाथ लगे। सो बुधवार को इनकम टेक्स विभाग ने कोड़ा का घर सील कर दिया।जब झारखंड राज्य बना, तो बीजेपी कोटे से मंत्री थे। पर राज्यसभा चुनाव में पैसा लेकर क्रॉस वोटिंग की तो बीजेपी ने निकाल दिया। पर दूसरा चुनाव निर्दलीय जीते तो कांग्रेस-लालू-शिबू ने मिलकर सीएम बना दिया। सो कोड़ा ने जमकर कारगुजारी दिखाई। किसको कितना शेयर मिला, पता नहीं। पर अकेले कोड़ा ने चार हजार करोड़ जमा कर लिए। मंत्री-सीएम रहते कोड़ा दुबई-बैंकाक भी घूम आए। पर केंद्र सरकार को भनक भी न लगी। कहीं ऐसा तो नहीं, राजनीतिक शेयर मिल गया। तो सरकारी तंत्र ने आंख मूंद ली हो। कोड़ा इलाज के बहाने जिन देशों में गए। उन देशों से ही अकूत संपत्ति की पोल खुल रही। अब झारखंड चुनाव हो रहे। तो कांग्रेस खुद को बेदाग दिखाने की कोशिश में कोड़ा पर शिकंजा कसवा रही। पर यह तो वही बात, चोरी में भी साथ दिया। अब चौकीदार बन जनता को बरगला रही। यों कोड़ा तो सिर्फ भ्रष्टाचार की कड़ी। राजनीति और भ्रष्टाचार का तो चोली-दामन जैसा रिश्ता बन चुका। वरना चार आने का नेता यों ही करोड़पति नहीं बन जाता। फिर भी अपना इरादा किसी पर उंगली उठाने का नहीं। पर राजनेताओं का इतिहास-भूगोल याद करा दें। ताकि आप खुद उनका क्वनागरिक शास्त्रं तैयार कर सकें। हाजी मस्तान पोर्टर से स्मगलर, और स्मगलर से नेता बन गए। भजनलाल 1950 के दशक में चुन्नियां बेचा करते थे। चार आने का टिकट नहीं खरीद पाने की वजह से धर लिए गए थे। फिर किस्मत ऐसी बदली, चार बार सीएम, दो बार केंद्र में मंत्री और अब हरियाणा में किंगमेकर बने हुए। ओमप्रकाश चौटाला साधारण किसान परिवार से थे पर सीबीआई की नजर में 2000 करोड़ के मालिक। बूटा सिंह अकाली पत्रिका अखबार के दफ्तर में पानी पिलाने का काम करते थे। पर देश के होम मिनिस्टर की कुर्सी तक पहुंच गए। बेटा हाल ही में एक करोड़ की रिश्वत लेते धरा जा चुका। नरसिंह का झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड। दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन साल की सजा दी। पर सुप्रीम कोर्ट ने संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला बताकर बरी कर दिया। पंडित सुखराम के घर संचार घोटाले में छापा पड़ा। तो मंत्री के सरकारी आवास से साढ़े चार करोड़ मिले। पर वही सुखराम कभी मंडी के स्कूल में क्लर्क थे। दिल्ली आए, तो सर्वेट क्वार्टर में रहे। उस जमाने में पंद्रह रुपए की साइकिल आती थी। पर सुखराम की हैसियत से बाहर थी। यों सुखराम पहले नेता हुए, जिन्हें भ्रष्टाचार में सजा मिली। अब लालू यादव को ही लो। बिहार में साढ़े नौ सौ करोड़ का चारा घोटाला सबको चौंकाने वाला। कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा के परिवार की आधिकारिक संपत्ति साढ़ सात सौ करोड़। चुनाव आयोग को हलफनामे में इतना बताया। तो बाकी भगवान ही जाने। पर कभी देवगौड़ा जूनियर इंजीनियर के नीचे ड्राफ्टमैन हुआ करते थे।बीजेपी के येदुरप्पा की मुसीबत बने रेड्डी बंधुओं की संपत्ति सात हजार करोड़। जो सिर्फ 2004 से 2009 के बीच बनी। आंध्र में वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन के अकेले की संपत्ति पांच सौ करोड़। कहां से आए इतने पैसे? कोई निचले स्तर से उठकर देश की बागडोर संभाले, तो गौरव की बात। पर संपत्ति भी देश जैसी विशाल हो जाए, तो क्या कहेंगे? तमिलनाडु में जयललिता हों या करुणानिधि। जयललिता ने अपनी आत्मकथा में खुद लिखा। जब उनकी मां की मौत हुई, तो अंतिम संस्कार को पैसे न थे। लाश घर में पड़ी थी, पर वह फिल्म की शूटिंग में गईं। ताकि 51 रुपए का बंदोबस्त हो सके। आज जयललिता क्या हैं, बताने की जरूरत नहीं। बीजेपी में प्रमोद महाजन के शुरुआती दिन मुफलिसी में गुजरे। पर राजनीति में आए, तो संपत्ति बेहिसाब हो गई। ये सारे उदाहरण तो सिर्फ एक झलक। कई सफेदपोश तो ऐसे, जिन पर जांच एजेंसी हाथ डालने की हिमाकत भी नहीं कर सकती। पर उनका इतिहास और वर्तमान खुद हकीकत बयां कर रहा। आम आदमी तो दो जून की रोटी जुटा ले, तो संतोष की सांस लेता। पर राजनेताओं का पेट भरता ही नहीं। सुरसा की तरह मुंह फैलाए बैठे। करोड़ों-करोड़ों निगल रहे, पर डकार का नाम नहीं। सो भ्रष्टाचार पर नकेल, सिर्फ कहने की बात। ------- ०४/११/2009