आखिर शरद पवार भी घेरे में आ गए। वैसे अब तक रक्षा सौदों को कोयला खदान माना गया। जहां कितना भी बेदाग छवि का चेहरा क्यों न बिठा दो, कालिख लग ही जाती। पर अब क्रिकेट में भी कोयले जैसी कहानी। आईपीएल का विवाद जबसे शुरू हुआ, तबसे अब तक काली कमाई के काले खेल का लगातार खुलासा हो रहा। अब शरद पवार भी आईपीएल टीम की बोली के मामले में फंस गए। आईपीएल की पुणे टीम के लिए सिटी कारपोरेशन ने भी बोली लगाई थी। पर जैसे कोच्चि टीम में ललित मोदी अपनी पसंद की कंपनी को फ्रेंचाइजी नहीं दिला पाए। वैसे ही शरद पवार के परिवार के शंयर वाली कंपनी सिटी कारपोरेशन भी नाकाम रही। पर ललित मोदी ने फौरन खुन्नस निकाली। सीधे विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर से पंगा लिया। सो कांग्रेस ने थरूर को विदा किया। पर आईपीएल के कमिश्नर रहे ललित मोदी की कमिश्नरी भी नहीं रही। अब वही ललित मोदी शुक्रवार को शरद पवार के बचाव में उतर आए। सोचिए, एक निलंबित, तो दूसरा ताजा-ताजा विवाद में फंसा। आखिर बचाव में आने का क्या मतलब? इसे भी आप आईपीएल का एक लीग मैच ही मानो। पर जैसे खुलासा हुआ, पवार और सुप्रिया सुले ने खंडन किया। अब जरा याद करिए, जब थरूर का मामला आया। तब भी शरद पवार के परिवार और प्रफुल्ल पटेल का नाम विवाद में उछला। पर तब सुप्रिया सुले और शरद पवार खम ठोककर यही कहते रहे- कहीं भी हमारे परिवार की आईपीएल में हिस्सेदारी या भागेदारी नहीं। पर अब सफाई देखिए। जिस सिटी कारपोरेशन में पवार के परिवार की 16 फीसदी हिस्सेदारी। जिस कंपनी ने आईपीएल की नीलामी में हिस्सा लिया। अब पवार कह रहे, कंपनी के प्रबंध निदेशक अनिरुद्ध देशपांडे पुणे टीम की नीलामी प्रक्रिया में हिस्सा लेने को उत्सुक थे। सो उन्हें निजी तौर पर शामिल होने की स्वीकृति दी गई। बकौल पवार, कंपनी बोर्ड के प्रस्ताव में यह साफ किया गया कि व्यक्तिगत तौर पर देशपांडे के अलावा किसी अंश धारक की प्रत्यक्ष या परोक्ष हिस्सेदारी नहीं होगी। पर पूछा गया, यह बात थरूर-मोदी विवाद के वक्त ही क्यों नहीं बताई? तो जवाब आया, तब जरूरी नहीं समझा। पर पवार की खीझ देखिए। यह तक कहने से गुरेज नहीं किया, अगर वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते, तो सिटी कारपोरेशन कंपनी सहारा से बोली में नहीं हारती। अब सोचो, आईपीएल में कितने ऐसे पेच होंगे। क्रिकेट में राजनेताओं की घुसपैठ की असली वजह क्रिकेट प्रेम नहीं, धन प्रेम रहा। सो शुक्रवार को कांग्रेस ने पवार को अपना बचाव खुद करने की नसीहत दी। तो बीजेपी को मौका मिल गया। बीजेपी ने सीधे पवार से इस्तीफा मांग ही लिया। अब जरा याद करिए, कैसे थरूर के मुद्दे पर बीजेपी ने 16 अप्रैल को संसद का पहिया रोक दिया। विवाद इतना बढ़ा, कांग्रेस ने 19 अप्रैल को थरूर की विदाई में ही भलाई समझी। पर थरूर का जाना आईपीएल की आड़ में चल रहे गोरखधंधे की कलई खोल गया। आखिर आईपीएल के बाद ललित मोदी को भी जाना पड़ा। बाकी जांच की रफ्तार थरूर-मोदी विदाई के बाद थम गई। पर जैसे ही थरूर हटाए गए, पवार-प्रफुल्ल का नाम सामने आ गया। तो समूचा विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ गया। तब प्रणव दा ने सदन में भरोसा दिया। पर कांग्रेस कोर ग्रुप की मीटिंग में दो मत उभरे। पहला- जेपीसी को भी मौजूदा जांच एजेंसी पर ही निर्भर रहना होगा। दूसरा- जेपीसी बनी, तो जो राज अब तक सिर्फ कांग्रेस और सरकार के पास, सबको मालूम हो जाएगा। सो तभी मन बन गया, जब अपनी जांच एजेंसी सही काम कर रही। तो जेपीसी क्यों बने। पर सनद रहे, सो तब बीजेपी का पवार-प्रफुल्ल प्रेम भी बताते जाएं। बीजेपी ने थरूर का इस्तीफा कराकर दम लिया। पर पवार-पटेल का इस्तीफा मांगना तो दूर, अलबत्ता बचाव में उतर आई। प्रेस कांफ्रेंस में एसएस आहलूवालिया पर सवालों की बौछार हुईं। तो आहलूवालिया खीझ गए। मीडिया से ही सवाल पूछना शुरू कर दिया था। पूछा, पटेल-पवार के खिलाफ आप एक भी सबूत दिखा दो। प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णो के ई-मेल पर सवाल हुआ। तो भी आहलूवालिया ने कहा- पहले मेल को पढि़ए। फिर तय करिए, वह दोषी है या नहीं। सचमुच पवार-पटेल का इतना बचाव तो एनसीपी ने भी नहीं किया। पर अब बीजेपी पवार की सफाई को थोथा बयान बता इस्तीफा मांग रही। अब जरा एनसीपी के डीपी त्रिपाठी ने 22 अप्रैल को जो दलील दी, जरा देख लें। उन ने कहा- हम खेल के राजनीतिकरण में विश्वास नहीं करते। यों इससे बड़ा मजाक कोई और नहीं हो सकता। पर दूसरा सवाल हुआ था- थरूर ने इस्तीफा दिया, तो पवार-पटेल क्यों नहीं। तब त्रिपाठी का जवाब आया- बीजेपी के लोग भी तो बीसीसीआई से जुड़े। पवार ने तो तभी कह दिया था- जिसे जो करना है, करने दीजिए। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। जब पवार पर दबाव बनाने का मौका था, तब बीजेपी बचाव कर रही थी। अब मौका नहीं, तो इस्तीफा मांग रही। कांग्रेस गठबंधन की वजह से दबाव में। सो खुद बोलने के बजाए मामला पवार पर ही छोड़ दिया। पर पवार से कोई कैसी उम्मीद करे। जिनके एक बयान से आम आदमी कराह उठता। अब ललित मोदी पवार का बचाव कर रहे। यानी आईपीएल का गोरखधंधा, बोले तो 1979 में बनी फिल्म गोलमाल को चरितार्थ कर रहा। जहां झूठे का बोलबाला, सच्चे का मुंह काला। गोलमाल है, भाई सब गोलमाल है।
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04/06/2010
Friday, June 4, 2010
Thursday, June 3, 2010
अभिव्यक्ति की 'तेरी-मेरी', तो मौलिक हक कहां?
यों तो साहित्य समाज का दर्पण माना जाता। पर जबसे साहित्य में नेताओं की घुसपैठ हो गई। तबसे सिर्फ हल्ला ही मच रहा। कहीं कोरी कल्पना, तो कहीं कल्पना-हकीकत का तडक़ा मार घालमेल। फिर वोट के हिसाब से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला। अब ताजा विवाद सोनिया गांधी की जिंदगी पर लिखी गई काल्पनिक किताब पर। स्पेन के एक लेखक जेवियर मोरो ने स्पेनिश में एक पुस्तक लिखी- एल साड़ी रोजो। इसी पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण बना- दी रेड साड़ी। सारा विवाद अंग्रेजी संस्करण को लेकर था। किताब का प्रकाशन रोकने के लिए सात-आठ महीने पहले ही अपने अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रकाशक को नोटिस भेजा था। पर अब मामला उछला। सिंघवी ने नोटिस की बाबत सोनिया की सहमति कबूली। पर कांग्रेस ने कोई सीधी टिप्पणी नहीं की। अब जरा किताब को लेकर आपत्ति भी देखते जाएं। जेवियर मोरो ने कल्पना के आधार पर किताब लिखी। जिसमें सोनिया की जिंदगी की शुरुआत से इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी को कल्पना में ढालने की कोशिश। पर किसी की निजी जिंदगी को कल्पना में ढालकर प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना अभिव्यक्ति की कैसी स्वतंत्रता? अब किताब अभी भारत में नहीं आई। सो कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने यही दलील दी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सम्मान पर जोर दिया। पर बीजेपी को तो सिर्फ सोनिया नाम का कोई मुद्दा भर चाहिए। सो न सोचा, न विचारा, मुंह खोल दिया। बीजेपी के चीफ प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद स्पेनिश लेखक के बचाव में उतर आए। बोले- प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबको सम्मान करना चाहिए। रविशंकर ने शुक्रवार को रिलीज होने वाली फिल्म राजनीति पर कांग्रेस के एतराज पर भी सवाल उठाए। फिर स्पेनिश लेखक और प्रकाश झा के खिलाफ कांग्रेसी मुहिम को आपात काल से जोड़ दिया। पर कोई होम वर्क किए बिना क्लास में पहुंचे, तो उसकी भद्द पिटनी लाजिमी। रविशंकर बाबू के साथ भी यही हुआ। उन ने कांग्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया। आपात काल की काली छाया याद कराई। पर जब सवाल हुआ, अपने जसवंत सिंह को क्यों बीजेपी से बाहर निकाला? आखिर जसवंत सिंह ने भी तो वही किया, जिसकी बीजेपी पैरवी कर रही। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक हक का इस्तेमाल किया। जसवंत ने जिन्ना पर किताब लिखी। तो बीजेपी ने न सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला, अलबत्ता न्याय के सिद्धांत को भी मसल कर रख दिया। जसवंत को न दलील, न वकील, न अपील का मौका दिया। अपने बुजुर्ग नेता को शिमला की चिंतन बैठक में बुलाकर भी बैठक में आने से मना कर दिया। भारतीय संस्कृति में ऐसा व्यवहार तो शत्रु भी नहीं करता। पर बीजेपी ने तीस साल पुराने सहयोगी को चुटकी में बाहर निकाल दिया। सो रविशंकर अपनी ही दलील से घिर गए। पर जवाब दिया- हमने कभी जसवंत की किताब पर बैन लगाने की मांग नहीं की। बीजेपी के सक्रिय नेता थे, पर उनकी किताब हमारी विचारधारा के प्रतिकूल थी। सो निकाल दिया। अब कोई पूछे, क्या किसी दल से जुडऩे का मतलब विचारधारा की संकीर्णता में बंध जाना चाहिए? अगर विचारधारा की लक्ष्मण रेखा के भीतर ही सोच बने, तो फिर विचारधारा का विकास कहां हो पाएगा। पर कांग्रेस को घेरने आए रविशंकर यहीं तक नहीं घिरे। वह भूल गए, जसवंत की किताब 17 अगस्त 2009 को लांच हुई। बीजेपी ने एक दिन बाद ही 19 अगस्त को जसवंत का कोर्ट मार्शल कर दिया। फिर नरेंद्र मोदी सरकार ने बिना पढ़े-लिखे 20 अगस्त को गुजरात में किताब पर बैन लगा दिया। जसवंत ने सुप्रीम कोर्ट तक बैन को चुनौती दी। आखिर बैन हटाना पड़ा। फिर बीजेपी से टाइम मैगजीन में पीएम वाजपेयी पर छपे लेख का सवाल हुआ। टाइम मैगजीन के पत्रकार एलेक्स पेरी ने वाजपेयी को पियक्कड़ बताया। तो पेरी को हमेशा के लिए भारत से निकाल दिया गया। अब भले पेरी ने जो लिखा, वह खुन्नस हो। पर सोनिया की जिंदगी पर काल्पनिक किताब में बीजेपी की दिलचस्पी क्यों? अगर कुछ भी लिखने की आजादी, तो जसवंत और पेरी पर कार्रवाई क्यों? प्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसैन की अभिव्यक्ति बीजेपी को रास क्यों नहीं आई? गुजरात दंगों पर आधारित फिल्म परजानिया को किस तरह गैर आधिकारिक तरीके से मोदी सरकार ने रोका, सबको मालूम। याद करिए, सरदार सरोवर बांध को लेकर मेधा पाटकर के साथ जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमिर खान भी उतर आए। तो समूचे गुजरात में आमिर की फिल्म फना पर अघोषित बैन लग गया। अब वही बीजेपी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देकर स्पेनिश लेखक का बचाव कर रही। पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल तो आडवाणी ने भी किया था। जब जिन्ना की मजार पर जाकर पांच जून 2005 को जिन्ना को सेक्युलर बता आए। समूची बीजेपी-संघ परिवार आडवाणी के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था। तो क्या सिर्फ सुविधा के मुताबिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता परिभाषित होगी? कभी पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून का विवाद। कभी नेताओं की आत्मकथा पर विवाद। तो फतवों के जरिए आए दिन मौलिक हक पर चोट हो रही। वीपी सिंह ने आत्मकथा लिखी। तो बीजेपी को गवारा नहीं हुआ। आडवाणी ने लिखी, तो कांग्रेस को नहीं। जसवंत-आडवाणी की नजर में जिन्ना एक समान। पर सजा मिली सिर्फ जसवंत को। अब कोई पूछे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भी तेरी-मेरी, तो मौलिक हक कहां?
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03/06/2010
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03/06/2010
Wednesday, June 2, 2010
अब जनता ने दिखाया लेफ्टियों को 'पाछा'
अब बंगाल ममता की छांव में आने को बेताब। लोकसभा चुनाव लीग मैच था, तो निकाय चुनाव सेमीफाइनल। ममता बनर्जी ने अबके न सिर्फ लेफ्ट, अलबत्ता कांग्रेस को भी औकात बता दी। कांग्रेस ममता बिन चुनाव में उतरी। पर अबके दांव उल्टा पड़ गया। कांग्रेसी गढ़ में भी ममता का ही परचम लहराया। सो बुधवार को कांग्रेस नतमस्तक थी। अब कांग्रेस रिश्ता सुधारने में जुटी। कल तक होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसे की सीबीआई जांच को संविधान की दुहाई देकर ठुकरा रहे थे। पर ममता एक्सप्रेस बंगाल की पटरी पर बेधडक़ दौड़ी। तो चिदंबरम को संविधान और कानून समझ आ गए। अब ममता की मांग के मुताबिक सीबीआई जांच का आदेश हो गया। तो कांग्रेस ने भी ममता के पीछे चलना कबूल कर लिया। खुद ममता ने भी कोई गांठ नहीं बांधी। अलबत्ता कांग्रेस के साथ गठबंधन जारी रखने का एलान किया। पर कांग्रेस-तृणमूल के रिश्तों से इतर बंगाल चुनाव के नतीजों से यह साफ हो गया, अब लेफ्ट फ्रंट का तख्ता पलट महज औपचारिकता। सचमुच नतीजों ने लेफ्ट फ्रंट का तिलिस्म तोड़ दिया। पेंतीस साल बाद आखिर किला ढहने लगा। तो सवाल लेफ्ट फ्रंट और नेतृत्व के अस्तित्व का। जब तक ज्योति बसु सीएम रहे, बंगाल में लेफ्ट का किला मजबूत हुआ। पर कमान बुद्धदेव ने संभाली। तो पुरातन नीतियां और आधुनिक सोच के बीच लेफ्ट का कॉकटेल हो गया। वामपंथियों का हमेशा से नारा रहा- लैंड बिलोंग्स द टिलर। यानी भूमि सिर्फ खेतिहारों की। पर सत्ता का नशा सिर चढक़र बोलने लगा। तो सिंगूर और नंदीग्राम में वामपंथियों का असली चेहरा सामने आ गया। और नया नारा हो गया- लैंड बिलोंग्स द मिलर। कैसे पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार ने किसानों-मजदूरों पर गोलियां चलवाईं। समूचा देश तब जनरल डायर को याद कर रहा था। नंदीग्राम में किसानों ने अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया। तो 14 मार्च 2007 को ढाई हजार पुलिस कर्मियों ने घेरा बना गांव वालों पर गोलियां बरसा दी थीं। सिंगूर में भी किसानों की जमीन बुद्धदेव सरकार ने जबरन ली। तो ममता बनर्जी ने आमरण अनशन कर वामपंथियों का चेहरा बेनकाब कर दिया। तबके राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को सीधे दखल देना पड़ा था। कलाम ने बुद्धदेव से दो बार बात की। तब जाकर बुद्धदेव नरम पड़े और ममता का 25 दिन का उपवास टूटा। पर जैसे ही मामला ठंडा हुआ। बुद्धदेव ने टाटा को पुलिस सुरक्षा मुहैया करा नैनो प्रोजैक्ट पर काम शुरू करा दिया। पर ममता की मोर्चेबंदी ने सरकार को नाकों चने चबवा दिए। यों ममता को सीपीएम काडर ने कम परेशान नहीं किया। फिर भी ममता अपने लक्ष्य के प्रति डटी रहीं। आखिर टाटा ने सिंगूर छोड़ दिया। नंदीग्राम में एसईजेड की योजना धरी रह गई। पर जनता ने वामपंथ का असली चेहरा देख लिया। सचमुच वामपंथियों ने बंगाल को राज्य नहीं, अपना गढ़ बनाकर चलना चाहा। वामपंथियों की सोच आजादी के बाद ही साफ हो गई थी, जब 14-17 फरवरी 1948 को कलकत्ता में सम्मेलन हुआ। कलकत्ता थीसिस तैयार हुई। तो वामपंथियों ने देश की आजादी को सच्ची आजादी मानने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, अपने संविधान को दासता का घोषणा पत्र तक कहा। तब वाम नेता रणदिवे ने कहा था- भारत में भी रूस की अक्टूबर क्रांति की तर्ज पर अंतिम क्रांति शुरू की जा सकती है। फिर 1964 में वामपंथ में दो-फाड़ हुआ। तो ए.के. गोपालन, ज्योति बसु, प्रमोद दासगुप्त, पी. रामामूर्ति ने सीपीएम बनाई। अब जरा उस सीपीएम की बनाई नीति का मजमून देखो- उद्योग धंधों का राष्ट्रीयकरण हो, जमींदारी प्रथा खत्म हो, भूमिहीन-कमजोर तबकों के बीच भूमि बांटी जाए, किसानों-खेतिहर और गांव के गरीब को मुफ्त जमीन दी जाए, गरीब किसानों को किसी भी सूरत में उसके खेतों से बेदखल न किया जाए। पर सिंगूर-नंदीग्राम में उसी सीपीएम सरकार ने क्या किया। किसानों-गरीबों से जमीन छीनने के लिए खून की नदियां बहा दीं। पर संसद से सडक़ तक खूब हंगामा बरपा। फिर भी वामपंथियों ने अफसोस नहीं जताया। अलबत्ता स्टालिन की भाषा बोलती रही। नंदीग्राम में नरसंहार के बाद तबके सीपीएम सांसद हन्नान मौला की टिप्पणी याद दिलाते जाएं। कहा था- नंदीग्राम में अपराधी तत्व। सो 15 मरे तो क्या, पांच सौ भी मर जाएं, हम पीछे नहीं हटेंगे। जब वामपंथियों की सोच ऐसी, तो पाप का घड़ा एक न एक दिन फूटना ही था। अब तो लेफ्ट फ्रंट ही टूट के कगार पर। सिंगूर-नंदीग्राम में भी सीपीएम के सहयोगियों ने मोर्चा खोला था। पर सत्ता का गुमान इस कदर हावी था, सीपीएम ने किसी की नहीं सुनी। अपने बुद्धिजीवी वर्ग को भी कुपित कर लिया, जो सीपीएम का थिंक टेंक हुआ करता था। नंदीग्राम में नरसंहार का एक वाकया तब महाश्वेता देवी ने बयां किया था। कैसे कुछ स्त्री-पुरुषों के गुप्तांगों-जननागों में गोली मारी गई, जिससे लोग नित्य क्रियाएं भी नहीं कर पा रहे। पर नंदीग्राम से पहले ही सीपीएम काडर की बेशर्मी दिखने लगी थी। मेधा पाटेकर और ममता बनर्जी के आंदोलन चल रहे थे। तब सीपीएम सेंट्रल कमेटी के एक सदस्य विनय कोंगार ने खुले आम कहा था- 'मेधा और ममता नंदीग्राम जाएंगी, तो सीपीएम समर्थक उन्हें अपना पाछा दिखाएंगे।' सचमुच ऐसा हुआ भी, जब मेधा नंदीग्राम गईं। तो सीपीएम कॉडर ने अपना पेंट खोलकर पाछा दिखाया था। सो सांच को आंच नहीं। बंगाल की जनता ने अब उसी सीपीएम को 'पाछा' दिखा दिया।
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Tuesday, June 1, 2010
बहाली एनएसी की, बयां कर रही हाल सरकार का
मेंगलोर हादसे के 11वें दिन सरकार ने रपट जारी करके ही दम लिया। पर रिपोर्ट टू द पीपुल से पहले बात झारखंड की। झारखंड में राष्ट्रपति राज लग गया। गवर्नर ने अपनी रपट केंद्र को भेज दी थी। सो मंगलवार को केबिनेट ने सिफारिश मंजूर कर राष्ट्रपति को भेज दी। पर महीने भर से बटेर ढूंढ रही बीजेपी बौखला उठी। सो बीजेपी के कानूनदां महासचिव रविशंकर प्रसाद कांग्रेस पर बरसे। आरोप मढ़ा, राष्ट्रपति राज के जरिए कांग्रेस सौदेबाजी का रास्ता बना रही। पर कोई पूछे, महीने भर से बीजेपी-शिबू के बीच क्या हो रहा था? क्या गरमी के मौसम में रेन डांस कर रही थी बीजेपी? ये तो वही बात हो गई, हम करें तो लीला, वो करें तो करेक्टर ढीला। वैसे भी झारखंड में राष्ट्रपति राज के सिवा कोई विकल्प नहीं। पर रविशंकर बाबू की दलील, विधानसभा निलंबित नहीं, बर्खास्त कर नए चुनाव हों। अगर वाकई बीजेपी इतनी ईमानदार, तो सोमवार को ही यह मांग क्यों नहीं रखी? अलबत्ता सोमवार को भी जीभ लपलपा रही थी। यों निलंबित विधानसभा में बीजेपी कोई उपवास नहीं करेगी। अलबत्ता झामुमो ने सीएम की कुर्सी दी, तो फिर सत्ता का फलाहार करने में परहेज नहीं करेगी। वैसे संवैधानिक प्रक्रिया भी यही कहती। अगर कोई राजनीतिक दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है, तो पहले विधानसभा को निलंबित कर राष्ट्रपति राज होना चाहिए। ताकि इस बीच राजनीतिक दल आपस में फिर विचार-विमर्श कर लोकतांत्रिक सरकार के गठन की कोशिश करें। फिर भी कोई हल न निकले, तो विधानसभा भंग करना आखिरी विकल्प। सो झारखंड में अब तक जो हुआ, कांग्रेस या गवर्नर पर उंगली उठाना मुनासिब नहीं। सत्ता की बंदरबांट का इतना लंबा ड्रामा चला और केंद्र ने गवर्नर से रपट नहीं मांगी, यही बड़ी बात। फिर भी बीजेपी हांडी कांग्रेस के सिर फोड़ रही। तो यह महज खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे वाली कहावत को चरितार्थ करना। पर अब झारखंड की बाजी कांग्रेस के हाथ आ गई। सो बीजेपी लाख छटपटाए, अब वही होगा, जो दस जनपथ को मंजूर। अगर कांग्रेस का गणित बैठ गया, तो सरकार बनेगी। पर बीजेपी-झामुमो ने फिर कोई जमा-खर्च किया। तो वही होगा, जो बिहार में हुआ था। शुरुआत में विधानसभा निलंबित थी। पर जैसे ही पासवान के एमएलए टूटकर नीतिश संग जाने लगे। तो तबके गवर्नर बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश भेज दी। यानी झारखंड में अगर घोड़े कांग्रेस के अस्तबल में गए, तो ठीक। भाजपा के अस्तबल में गए, तो अंजाम सबको मालूम। सो राजनेताओं की जुबान का क्या भरोसा। अब मंगलवार को मनमोहन ने दूसरी पारी का पहला रिपोर्ट कार्ड जारी किया। तो यूपीए के फ्लैगशिप प्रोग्राम का ही बखान हुआ। आरटीआई, शिक्षा का हक, मनरेगा, स्वास्थ्य मिशन, भारत निर्माण आदि आदि। सरकार के कामकाज को उम्दा बताया। लगे हाथ दूसरे साल का संकल्प भी बता गए। खाद्य सुरक्षा बिल आएगा। विकास की दर साढ़े आठ फीसदी के पार जाएगी। नक्सलवाद से दृढ़ता से निपटेंगे। पर सबसे अहम दावा महंगाई से निपटने का। मनमोहन ने फिर भरोसा दिलाया, महंगाई पर जल्द काबू पाएंगे। पर कोई पूछे, पिछले पांच साल से महंगाई लगातार बढ़ क्यों रही? कभी ऐसा क्यों नहीं दिखा, जब रोजमर्रा की चीजों की कीमतें कम हुई हों। फिर भी मनमोहन अपने कामकाज को उम्दा बता रहे। अगर मनमोहन की पहली पारी छोड़ दें। तो दूसरी पारी के पहले साल में ही इतने कारनामे हुए, सरकार अराजक माहौल में दिखी। मनमोहन मजबूत तो हुए। पर कभी मंत्रियों का बड़बोलापन, तो कभी ममता का रूठना। कभी राजा पर करुणा की जिद, तो कभी विदेश, नक्सल जैसी नीतियों पर ऊहापोह। महंगाई तो सरकार के हर दावे के बाद बढ़ती ही गई। सो अब सोनिया गांधी ने खुद कमान संभाल ली। पहली पारी में दो साल बाद ही मृत हुआ एनएसी दूसरी पारी के दूसरे साल में जिंदा हो उठा। यूपीए-वन में लाभ के पद का मामला ऐसा बवंडर खड़ा कर गया। सोनिया गांधी को सांसदी तक छोडऩी पड़ी थी। कांग्रेस नेता की शिकायत पर जांच के बाद 17 मार्च 2006 को जया बच्चन को लाभ के पद की वजह से बर्खास्त किया गया। पर यह कांग्रेस के लिए ही बर्र का छत्ता बन गया। सो 23 मार्च को सोनिया गांधी ने सांसदी से इस्तीफा दिया। फिर कोई पेच न फंसे, सो सोनिया ने राजीव गांधी फाउंडेशन से लेकर तमाम पद छोड़ दिए। पर तब कानून बन जाने के बाद भी एनएसी बहाल नहीं हुई। अबके बहाल हुई, तो मतलब साफ, सरकार का कामकाज उम्दा नहीं। सो सोनिया की रहनुमाई वाली एनएसी में फिर हर क्षेत्र के विशेषज्ञ जोड़े जाने लगे। मंगलवार को चौदह हस्तियों का एलान भी हो गया। हर्षमंदर, अरुणा राय, नरेंद्र जाधव आदि सोनिया के सलाहकार होंगे। यानी नीतियां एनएसी और सोनिया तय करेंगी। मनमोहन की टीम अमल करेगी। सो बड़बोले मंत्रियों की सांस अभी से फूलने लगी। यों संवैधानिक तौर से देखो, तो सोनिया की केबिनेट सही नहीं। पर जब संगठन कमजोर हो, तो सरकार तानाशाह हो जाती। सत्ता में अहंकार हो जाता। वैसे भी मनमोहन की दूसरी पारी का पहला साल कुछ ऐसा ही रहा। सो एनएसी के बहाने सोनिया की समानांतर केबिनेट भले विपक्ष को मुद्दा थमाए। पर शायद जनता के हित में सरकार पर अंकुश लगाने का सही फार्मूला। यानी मनमोहन भले कितना भी दावा करें, पर एनएसी की बहाली सरकार का हाल बता रही।
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01/06/2010
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01/06/2010
Monday, May 31, 2010
तो हारे हुए 'सिपाही' अब 'जनरल' को सिखाएंगे पाठ
जूते और प्याज खाने वाली कहावत चरितार्थ कर भी बीजेपी झारखंड की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रही। यों पिता तुल्य आडवाणी ने अबके खम ठोक दिया। अब तक की फजीहत देख सरकार बनाने की पहल को हरी झंडी नहीं दे रहे। सो छुट्टी मनाकर लौटे गडकरी की मुसीबत बढ़ गई। अब तो अठारह में से सोलह एमएलए ने दबाव बना दिया। झारखंड बीजेपी बगावत के कगार पर खड़ी हो गई। सो सोमवार को बीजेपी ने न राष्ट्रपति राज की हिमायत की, न खारिज किया। अलबत्ता बयान देखिए- 'हम कांग्रेस की गतिविधि पर निगाह बनाए हुए।' अब कोई पूछे, जब आपने समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस सरकार बनाने से इनकार कर चुकी। तो क्या स्वर्गलोक से इंद्र आएंगे झारखंड संभालने? अब बीजेपी का नया खेल देखिए। जैसे ही राष्ट्रपति राज की ओर मामला बढ़ता दिखा। तो शिबू को समझाने में जुट गई। अब बीजेपी शिबू के सभी एमएलए की चिट्ठी मांग रही। सो सोमवार को गवर्नर फारुक ने केंद्र को रपट भेजने से पहले की रस्म निभाई। तो बीजेपी के रघुवर दास ने मंगलवार तक का वक्त मांग लिया। यानी तब तक शिबू मान गए, तो ठीक। वरना आखिर में बीजेपी कहेगी, हर-हर गंगे। पर बात बन गई, तो बीजेपी की स्क्रिप्ट भी तैयार। बानगी आप भी देखिए- हम झारखंड की जनता को चुनी हुई सरकार देना चाहते, राष्ट्रपति राज नहीं। सो झामुमो बिना शर्त समर्थन देने को राजी हुआ, तो हमने 'जनहित' में फैसला वापस लिया। अब सचमुच ऐसा हुआ, तो राजनीति पर लागू सभी कहावतों की सीमा पार हो जाएगी। पर राजनीति से और कैसी उम्मीद। अब झारखंड में महीने-डेढ़ महीने से बीजेपी-झामुमो जो चरित्र दिखा रहीं, उसे भी 'जनहित' बता रहीं। पर झारखंड में जनहित कर बीजेपी अब अपने सभी राज्यों में जन-जन का दिल जीतेगी। बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन पांच-छह जून को मुंबई में होगा। गुड गवर्नेंस ही सम्मेलन का एजंडा। सो शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कृषि, महिला-बाल कल्याण, समाज कल्याण, जल-वन पर्यावरण, इन्फ्रास्ट्रक्चर, ग्रामीण विकास, पंचायती राज और शहरी प्रबंधन पर विशेष प्रस्तुतीकरण होगा। फिर राज्यों के विशेष प्रोग्राम को आगे बढ़ाने और बीजेपी के अन्य राज्यों में भी लागू करने पर विचार होगा। यानी गडकरी ने अध्यक्षी संभालते ही जो एलान किया, उसकी पहली शुरुआत होगी। राजनीति को समाज से जोडऩे की कवायद गडकरी का एजंडा। सो संघ की सलाह को अंजाम देते हुए गडकरी ने तय कर दिया, अब बीजेपी में किसी व्यक्ति का मॉडल नहीं होगा। अलबत्ता पार्टी के मॉडल चलेगी सरकार। अब तक आडवाणी-राजनाथ सरीखे नेता बाकी मुख्यमंत्रियों को नरेंद्र मोदी मॉडल की घुट्टी पिलाते रहे। गुजरात चुनाव के बाद जब राजनाथ ने दिल्ली कार्यकारिणी में मोदी मॉडल की पैरवी की। तो तबके बीजेपी के सभी सीएम न सिर्फ खफा हुए, अलबत्ता अपनी नाराजगी का इजहार सार्वजनिक तौर से किया। यानी कोई सीएम खुद को कमतर न समझे, सो अब हर जगह बीजेपी मॉडल होगा। पर कहीं मोदी नाराज न हों, सो मुंबई की मीटिंग में उद्घाटन के बाद की-नोट भाषण नरेंद्र मोदी का ही होगा। सीएम कांफ्रेंस में बीजेपी चार्टर पेश करेगी। पर कमजोरियों को छुपाएगी। अब गडकरी की बीजेपी सीएम कांफ्रेंस को अपनी बड़ी शुरुआत के तौर पर पेश कर रहे। पर वेंकैया नायडू के अध्यक्ष रहते ऐसा सम्मेलन दिल्ली के अशोका होटल में हो चुका। तब भी गुड गवर्नेंस की बात हुई थी। सत्ता-संगठन के तालमेल की बात हुई थी। पर तबसे अब तक बीजेपी दो लोकसभा चुनाव हार चुकी। कुछ राज्य भी गंवाए। पर अब तक न सुर मिला, न ताल। अपने राजस्थान में बीजेपी ने 2008 के चुनाव में पटखनी खाई। तो आडवाणी हों या बाकी निचले स्तर के नेता, सबने समन्वय की कमी पर ठीकरा फोड़ा। पर अबके गडकरी ने एजंडे में फिर सत्ता और संगठन में तालमेल का विषय रखा। तो जरा गडकरी के परफोर्मेंस ऑडिट फार्मूले का पैमाना देखिए। बीजेपी के सीएम कौन-कौन, पहले यह देख लें। गुजरात में नरेंद्र मोदी तीसरी बार सीएम। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान दूसरी बार। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह दूसरी बार। हिमाचल में प्रेम कुमार धूमल दूसरी बार। कर्नाटक में येदुरप्पा दूसरी बार। उत्तराखंड में निशंक पहली बार। तो पंजाब-बिहार में सरकार के नेता भी बेहद अनुभवी। अब जरा देखो, इन लोगों को सत्ता-संगठन में तालमेल का पाठ कौन पढ़ाएंगे। महासचिव धर्मेंद्र प्रधान, उड़ीसा से खुद तो चुनाव हारे ही, अब पार्टी भी ढूंढे नहीं मिल रही। हर्षवर्धन, दिल्ली बीजेपी का बंटाधार उनके अध्यक्ष रहते हुआ। संघ के नुमाइंदे के तौर पर रामलाल होंगे, जो अब तक संजय जोशी जैसा करिश्मा नहीं दिखा पाए। गोपीनाथ मुंडे, जिन ने जातीय जनगणना पर पार्टी में पेच फंसाया। मुंबई में एक जिला अध्यक्ष को लेकर नितिन गडकरी से जंग छेड़ी। बीजेपी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। आखिर तब महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष गडकरी को हार माननी पड़ी थी। बी.सी. खंडूरी, जिन ने सीएम पद से हटाए जाने को लेकर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था। तो क्या अब मोदी, चौहान, रमन, येदुरप्पा, धूमल, निशंक जैसे जनरलों को हारे हुए सिपाहियों से 'सुशासन' और 'तालमेल' का पाठ पढऩा होगा? वैसे भी 2009 में बीजेपी में जो हारा, वही सिकंदर बना। सो 2010 में यह कुछ नया नहीं।
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31/05/2010
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31/05/2010
Friday, May 28, 2010
नक्सली बढ़ते जा रहे, सरकार भाग रही!
क्या नक्सलवाद पर सख्ती के लिए भी किसी 26/11 का इंतजार? आतंकवाद पर ईमानदार राजनीतिक एकता तो सिर्फ तभी दिखी थी। आनन-फानन में सरकार पोटा के रद्द कुछ प्रावधान यूएपीए कानून में वापस लाई। समूचे खुफिया तंत्र की सर्जरी हुई। एनआईए-मैक बना, अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हुई। सो पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट को छोड़ डेढ़ साल में कोई अन्य आतंकी वारदात नहीं हुई। पर 26/11 से पहले ऐसा कौन सा आतंकी हमला नहीं, जिस पर 24 घंटे के भीतर वोट बैंक की राजनीति न शुरू हुई हो। मनमोहन सरकार के 22 जुलाई के विश्वास मत के बाद जब बेंगलुरु-अहमदाबाद में 25-26 जुलाई 2008 को सीरियल बम धमाके हुए। तो याद है, बीजेपी की वरिष्ठ नेत्री सुषमा स्वराज ने क्या कहा था। उन ने खम ठोककर भाजपा शासित दोनों राज्यों में हुए धमाकों के पीछे मनमोहन सरकार का हाथ बता दिया था। फिर कूटनीति के हिसाब से सुषमा का बयान कटघरे में खड़ा हुआ। तो बीजेपी ने निजी राय बता पल्ला झाड़ लिया था। आतंकवाद पर सियासत के उदाहरण तो कई, पर यह उदाहरण वोट बैंक की सियासत की इंतिहा थी। आतंकवाद पर पहले तो ऐसी ओछी सियासत न हुई होगी, पर भविष्य का पता नहीं। राजनीति का स्तर तो ग्राउंड वाटर जैसा हो गया, जिसका स्तर लगातार घटता ही जा रहा। सो गिरी हुई राजनीति से नक्सलवाद से निपटने की क्या उम्मीद? नक्सली अब आए दिन हमला कर रहे। छह अप्रैल को दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवान मार गिराए। फिर बस में विस्फोट कर आम मुसाफिर समेत 31 लोग मार गिराए। बीच में कई छिटपुट वारदातों को अंजाम दिया। अब शुक्रवार को शुरू हुए डेढ़ घंटे ही बीते थे, पश्चिमी मिदनापुर के झारग्राम में रेल पटरी को निशाना बनाया। विस्फोट कर रेल की पटरी उड़ा दी। सो हावड़ा-कुर्ला ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के 13 डिब्बे पटरी से उतर गए। तभी विपरीत दिशा से आ रही मालगाड़ी ने टक्कर मार दी। सो गरीब 70 लोग मारे गए, 200 से भी अधिक घायल हो गए। शुरूआती जांच में ही साफ हो गया, नक्सलवादियों का संगठन पीसीपीए जिम्मेदार। पीसीपीए ने मौके पर पोस्टर भी छोड़े, जिनमें जिम्मेदारी कबूली। पोस्टर में लिखा- हमने पहले मांग की थी कि जंगल महाल से संयुक्त सुरक्षा बलों को वापस बुलाया जाए और माकपा के अत्याचारों को खत्म किया जाए। लेकिन इन मांगों को पूरा नहीं किया गया। अब सुरक्षा बलों को फौरन वापस बुलाओ। यानी नक्सलियों का यह कोई आखिरी हमला नहीं। पुलिस उत्पीडऩ के खिलाफ नक्सली काला सप्ताह मना रहे। सो आगे क्या होगा, यह समझना मुश्किल नहीं। पीसीपीए ने ही पिछले साल 27 अक्टूबर को इसी झारग्राम में कंधार दोहराने की कोशिश की थी। जब भुवनेश्वर- नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को बंधक बना लिया। बदले में जेल में बंद नक्सली नेता छत्रधर महतो की रिहाई की शर्त रखी थी। पर तब गनीमत यह रही, मुसाफिरों को कंधार प्लेन हाईजैक जैसी परेशानी नहीं उठानी पड़ी थी। अलबत्ता नक्सलियों ने आम नागरिक की सहानुभूति हासिल करने के मकसद से मुसाफिरों को ढांढस बंधाया। पर अबके पीसीपीए की मंशा धरी रह गई। नक्सली अपने काला सप्ताह के प्रति सरकार का ध्यान खींचना चाह रहे थे। पर मालगाड़ी की टक्कर ने नक्सलियों को मुश्किल में डाल दिया। आखिर शुक्रवार को ट्रेन में मारे गए और घायल हुए मुसाफिरों के दोषी नक्सली ही। सो नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अब जनदबाव बढ़ेगा। सचमुच नक्सलियों ने आतंकवाद का रुख अपना लिया। अब तो लश्कर से संबंध की खुफिया रपट भी आने लगी। पर अपनी सरकार कब तक बहस में उलझी रहेगी? आखिर नक्सलवाद पर अब भी सख्ती नहीं होगी, तो कब होगी। सरकार और कांग्रेस में कब तक मल्ल युद्ध चलेगा। हर नक्सली हमले के बाद दिग्विजय सिंह का वही राग। पर दिग्विजय से सवाल, जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का पार्ट था, तब दिग्विजय पूरे दस साल सीएम रहे। तब विकास को आदिवासी इलाके तक क्यों नहीं पहुंचाया? तब दिग्विजय को चुनाव जीतने के लिए विकास जरूरी नहीं लगता था। अलबत्ता चुनाव के वक्त दलील दी थी, विकास से चुनाव जीते जाते, तो बिहार में लालू-राबड़ी राज न होता। पर क्या हुआ, सबको मालूम। नक्सलवाद पर चिदंबरम ने साहस दिखाया। पर सोनिया गांधी तक ने साथ नहीं दिया। सो चिदंबरम ने लाचारी जता दी। अब शुक्रवार को ताजा वारदात हुई। तो भी सरकार में जबर्दस्त ऊहापोह दिखा। ममता ने बम विस्फोट की बात कही। तो चिदंबरम-प्रणव ने इनकार किया। यानी अब भी सरकार में एक सुर नहीं। अपने मनमोहन तो राष्ट्रीय प्रेस कांफ्रेंस में बड़ी चतुराई से निकल गए। पर देश की व्यवस्था को बंदूक से लहूलुहान करने वालों से नरमी क्यों? शुक्रवार को तो भारत-पाक दोनों अपनों की बंदूक से लहूलुहान दिखे। अपने यहां नक्सलियों ने, तो लाहौर में पाक के पोसे आतंकियों ने मस्जिद में घुसकर आतंक मचाया। पर यहां बात सिर्फ अपनी। नक्सलवाद पर इतना सब कुछ हो रहा। पर अभी भी रुख स्पष्ट नहीं। सरकार, कांग्रेस और दिग्विजय जैसे बुद्धिजीवी भी ऊहापोह में। कोई ऐसा नेता नहीं दिख रहा, जो सीधी लाइन तय करे। अलबत्ता शुक्रवार की घटना के बाद रेलवे में नक्सली बैल्ट में रात को ट्रेन नहीं चलाने पर विचार हो रहा। यानी नक्सलियों के हौसले बढ़ते जा रहे और अपनी सरकार भाग रही। सोचो, अगर नक्सली दिल्ली आ गए, तो..। ---------
28/05/2010
28/05/2010
Wednesday, May 26, 2010
तो अकेला चना भी फोड़ सकता है भाड़
यों तो आईआईटी के नतीजे हर साल घोषित होते। लाखों छात्र-छात्राएं इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते। पर सफलता महज कुछ को मिल पाती। सो कुछ का मायूस होना और कुछ का खुश होना लाजिमी। पर सुपर-30 के सभी छात्र आईआईटी में अबके भी सफल रहे। लगातार तीसरी बार सुपर-30 के सभी छात्र सफल हुए। अब तक सुपर-30 संस्था से 212 छात्र आईआईटी में सफल हो चुके। पर सुपर-30 के पैदा होने से अब तक की कहानी जितनी दिलचस्प, अपनी व्यवस्था और समाज को उतना ही बड़ा तमाचा। सुपर-30 के संस्थापक आनंद ने 2002 में इसकी शुरुआत की। तो मकसद साफ रखा, सबसे गरीब और प्रतिभाशाली छात्र को मौका देंगे। सो तबसे अब तक आनंद का सफल सफर जारी। पर आनंद की जिजीविषा ही कहेंगे, जिन ने मौके से हार नहीं मानी। अलबत्ता अपनी हार से प्रेरणा लेकर गरीबी को चुनौती दी। प्रतिस्पर्धा के इस युग में कोचिंग संस्थान कुकुरमुत्ते की तरह हर रोज पैदा हो रहे। जहां इश्तिहारों, प्रचार की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर सपने खूब दिखाए जाते। कोचिंग संस्थान शिक्षा से अधिक व्यवसायीकरण पर फोकस करते। सो इन कोचिंगों में धनाढ्य घरों के बच्चे दाखिला लेते। गरीब घर का बच्चा दूर से ही इन कोचिंग संस्थानों के इश्तिहार देखता। अब आईआईटी के नतीजे आए, तो आप खुद देखना, कैसे कुछ संस्थान बड़े-बड़े इश्तिहार छपवाएंगे। कोई एक-दूसरे से खुद को कमतर नहीं बताएगा। अलबत्ता छात्रों के फोटो छाप क्रेडिट लेंगे। याद होगा, हरियाणा का एक छात्र नितिन एक साथ आईआईटी और मेडिकल में भी अव्वल आया। तो संस्थानों में नितिन को अपना बताने की होड़ मच गई। पर क्या सुपर-30 को कभी ऐसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनते देखा? आनंद जैसे लोग विरले ही मिलते। आनंद की कहानी वाकई प्रेरणादायी। गरीब परिवार के आनंद कुमार गणित में बेहद प्रतिभाशाली। शायद 1998 की बात होगी। आनंद की प्रतिभा को देख कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने मौका दिया। पर छात्रवृत्ति के बाद भी करीब 55 हजार रुपए का प्राथमिक शुल्क अदा करना जरूरी था। आनंद इतने गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे कि वह राशि भी नहीं जुटा सके। सो आनंद मौके से वंचित रह गए। पर आनंद ने हिम्मत नहीं हारी। जो खुद पर बीती, वह किसी और गरीब प्रतिभाशाली छात्र पर न बीते। सो उन ने ऐसी शुरुआत की, जिसकी उम्मीद आज के समाज और अपनी राजनीतिक व्यवस्था से नहीं की जा सकती। किसी भी क्रांति की शुरुआत की पहली शर्त समर्पण और खुद पर भरोसा होता है। पर अपनी व्यवस्था में इतना घुन लग चुका, समाज भी अछूता नहीं रहा। हर आदमी अब यही सोचता, मैं अकेला क्या करूंगा। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर आनंद जैसी शख्सियत ने बता दिया, गर आपमें गिरकर उठने का जज्बा हो। हार से सीखने का हुनर हो। मन में दृढ़ संकल्प हो। तो अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है। अगर आप ताजा हालात को ही देखो, तो देश में समस्याओं का अंबार। पर कहीं से कोई क्रांति होती नहीं दिख रही। महंगाई बढ़ी, तो दो-चार लोग चौक-चौराहे, बस-ट्रेनों में बैठकर सरकार के खिलाफ खीझ निकालेंगे। फिर गंतव्य पर उतर अपने-अपने काम में व्यस्त। सोचो, महात्मा गांधी ने भी ऐसा सोचा होता, तो क्या अपना देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो पाता? क्या आनंद कुमार ने कैंब्रिज का मौका चूकने के बाद हार मान ली होती। तो क्या सुपर-30 बनता? क्या अब तक आनंद के सहारे 212 गरीब परिवारों की किस्मत बदलती? आनंद गरीब प्रतिभाशाली छात्रों को चुनते। आईआईटी की तैयारी कराते और रहने-खाने का बंदोबस्त भी। इतना ही नहीं, सफल छात्रों के लिए शिक्षा ऋण की व्यवस्था का भी प्रयास करते। अब बुधवार को सुपर-30 के सभी छात्र सफल हुए। तो उसमें एक नालंदा का शुभम कुमार भी था। जिसका पिता एक गरीब किसान और मासिक आमदनी महज ढाई हजार रुपए। क्या यही है अपने देश की विकास दर? दिल्ली में जब-जब शीला दीक्षित ने कीमतें बढ़ाईं। दलील यही, लोगों की आमदनी बढ़ी। क्या वेतन आयोग लागू कर सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाना ही समूचे देश का पैमाना हो गया? असली विकास की तस्वीर तो शुभम जैसे गरीब बच्चे के परिवार से दिखती। पर वहां तक पहुंचेगा कौन? बिहार, जिसका नाम आते ही देश के बाकी राज्यों के लोग नाक-भौं सिकोड़ते। पर उसी बिहार में आनंद कुमार ने ऐसा कर दिखाया। अब तक 23 डॉक्यूमेंट्री फिल्म बन चुकीं। डिस्कवरी ने एक घंटे की विशेष फिल्म बनाई। विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम मैगजीन ने सुपर-30 को बेस्ट ऑफ एशिया में स्थान दिया। अब सुपर-30 ने सौ फीसदी सफलता ही हैट्रिक लगाई। तो अब संस्थान को सुपर-60 बनाने की तैयारी। सचमुच बिहार एक अनौखा राज्य है। जहां जातीय दंभ भरने वाले लोग, वहां गुणवत्ता भी भरपूर। अपराध की बात हो, तो भी बिहार। कभी परीक्षा में चोरी का किस्सा हो, तो भी बिहार का नाम आता। कभी जेपी को आंदोलन करना हो, तो भी सबसे पहले बिहार उठता। अशोक के जमाने से ही चमत्कारी राज्य रहा बिहार। जहां सबको प्रश्रय मिलता। पर बात आनंद और सुपर-30 की। भले आनंद आईआईटी के क्षेत्र में गरीबों को मौका दे रहे। पर आनंद का जीवन समाज और व्यवस्था के लिए अनुकरणीय। शिक्षा हो या विकास की कोई और पहल। सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होता।
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26/05/2010
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26/05/2010
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