Friday, June 25, 2010

तो पैंतीस साल बाद भी मानसिकता 'इमरजेंसी' की

महंगाई सिंह.... माफ करिए मनमोहन सिंह की सरकार तेरह महीने की हो गई। पर तेरह महीने में ही आम आदमी का चौथा निकाल दिया। तो सोचो, बाकी के तीन साल ग्यारह महीने में क्या होगा? मनमोहन सरकार की दूसरी पारी में चौथी बार पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़े। बाईस मई 2009 को दूसरी बार शपथ ली। तो जुलाई में दाम बढ़ाए। फिर आम बजट में प्रणव दा ने कीमत बढ़ा इतिहास रचा। पहली अप्रैल से बीएस-4 मानक लागू होने से कीमतें बढ़ीं। अब चौथी बार में कीमतें ऐसी बढ़ाईं, आम आदमी का दम निकाल दिया। जमाखोर, घूसखोर, सूदखोर, यहां तक कि आदमखोर भी सुना। पर कोई चुनी हुई सरकार गरीबखोर और आम आदमी खोर हो जाएगी, किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। शुक्रवार को पेट्रोल 3.73 रुपए, डीजल दो रुपए, कैरोसिन तीन रुपए और रसोई गैस 35 रुपए महंगी हो गई। आठ साल बाद पहली बार गांव की रोशनी का सहारा कैरोसिन तेल महंगा हुआ। गांव में बिजली के खंभे और तार भले पहुंच गए हों। पर बिजली नहीं पहुंची, सो गांव में दीये और लालटेन ही सहारा। अब कोई पूछे, क्या यही है आम आदमी की सरकार? पर सरकार और कांग्रेस मजबूरी का रोना रो रहीं। देश की तरक्की के लिए उठाया गया कदम बता रहीं। तो क्या अब आम आदमी की लाश पर देश का विकास होगा? जब गरीब महंगाई की वजह से भूखे मर जाएंगे, तो विकास किसके लिए होगा? कभी कॉमन वैल्थ गेम्स के नाम पर आम आदमी की कमर तोड़ी जा रही, तो कभी विकास दर के नाम पर। आखिर कब तक आम आदमी ही पिसता रहे? अबके जो कीमतें बढ़ीं, सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं। अलबत्ता अब कुछ भी ऐसा नहीं, जो सस्ता मिल सके। अब तो जहर भी महंगा हो चुका। कुएं, तालाब, नदियां भी सूख चुकीं। सो डूब मरना भी मुश्किल हो चुका। बाकी बची ट्रेन, तो पता नहीं कब केंसिल हो जाए। सो मुरली देवड़ा ने जब कीमतें बढ़ाने का एलान किया। तो दोहरी बेशर्मी भरे अंदाज में कह दिया- 'अभी तो थोड़ा भाव बढ़ाया है। भगवान करेगा, मार्केट में भाव थोड़ा ठीक होगा, तो हम घटा देंगे।' पहली बेशर्मी यह, इतनी कीमतें बढ़ाईं, पर कह रहे- थोड़ा भाव बढ़ाया। दूसरी और सबसे बड़ी बेशर्मी, सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया। पर मुरली देवड़ा भगवान के नाम पर भी आम आदमी को ठग रहे। असल में तेल की कीमतें अब सरकारी नियंत्रण से बाहर हो चुकीं। सो मुरली देवड़ा तो क्या, उनके आका भी घटाने की नहीं सोच सकते। अब तो तेल कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय बाजार के हिसाब से कीमतें तय करेंगी। हर पखवाड़े नफा-नुकसान का जायजा होगा। तो कंपनियां आम आदमी का हित नहीं, अपना लाभांश देखेंगी। सो तेल पर अब खुला खेल फर्रुखाबादी होगा। पर सवाल, कब तक आम आदमी को ठगेगी अपनी सरकार? हर बार वही देश की तरक्की का रोना-धोना और कीमतें बढ़ाना। पर संयोग देखिए, मनमोहन की पहली पारी खत्म होने को थी। तब भी जून में दाम झटके से बढ़ाए गए। अबके दूसरी पारी का पहला साल पूरा हुआ। तो झटके से आम आदमी को हलाल कर दिया। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 140 प्रति बैरल पहुंच गई थी। चार जून 2008 को पेट्रोल पांच रुपए, डीजल तीन रुपए, रसोई गैस 50 रुपए महंगा हुआ था। महंगाई की मार झेल रही जनता को मनमोहन ने जुबानी सांत्वना देने की कोशिश की। पहली बार ऐसा हुआ, जब पीएम ने बढ़ी कीमतों पर राष्ट्र को संबोधित किया। तब मनमोहन ने जो कहा, आप देख लो- 'हमने विकास किया, पर चिंता की बात, तरक्की के साथ महंगाई भी बढ़ी। पर बढ़ी कीमतों से तो तेल कंपनियों के घाटे का सिर्फ दसवां हिस्सा पूरा होगा। नब्बे फीसदी बोझ सरकार उठाएगी। कर्ज और बांड समस्या का समाधान नहीं। कंपनियों को घाटे में डालकर हम अपना भविष्य बिगाड़ रहे। हमें अपने लिए नहीं, अपनी पीढ़ी के लिए सोचना चाहिए। पेट्रोल-डीजल-एलपीजी-बिजली-पानी की बचत करें। आपको किफायती बनना होगा। भविष्य में सही दाम चुकाने होंगे।' यानी हर बार एक ही दलील। तो कोई पूछे, आखिर विकास किसका हो रहा? पर नेताओं की नौटंकी का जवाब नहीं। जून 2008 में चुनावी साल था। तो सोनिया गांधी के निर्देश पर कांग्रेस शासित राज्यों में सेल्स टेक्स घटाने का ड्रामा हुआ। दिल्ली में शीला सरकार ने रसोई गैस में 40 रुपए की छूट दी। सिर्फ दस रुपया बढऩे दिया। पर दिल्ली और केंद्र के चुनाव निपटे। तो सब्सिडी वापस ले ली। अबके फिर यह संभव, जनता का विरोध देख सोनिया चिट्ठी लिख दें। दिखावे की खातिर कैरोसिन के दाम घट जाएं। पर सचमुच देश की विडंबना, आज 35 साल बाद भी इमरजेंसी की मानसिकता खत्म नहीं हुई। आज के दिन ही 1975 में इंदिरा ने इमरजेंसी लगाई। पर कांग्रेस की मानसिकता जून 2008 और जून 2010 में वैसी ही दिख रही। समूचा देश महंगाई की मार से कराह रहा। फिर भी तेल-रसोई गैस के दाम में बढ़ोतरी का साहस शायद कांग्रेस ही कर सकती। पर यूपीए के सहयोगियों की नौटंकी भी कम नहीं। ममता, पवार, करुणा की हरी झंडी लेकर ही शुक्रवार को दाम बढ़े। पर तीनों ने बढ़ोतरी पर एतराज जताना शुरू कर दिया। फिर भी सरकार के साथ ही रहेंगे, भले आम आदमी तड़प-तड़प कर क्यों न मर जाए। मानसून सत्र में अपने सांसदों, मंत्रियों के वेतन-भत्ते पांच गुना बढ़ेंगे। सो मन्नू भाई की मोटर तो पम-पम चलेगी। बाकी आम आदमी वही फटे हाल, बदहाल, पैदल।
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25/06/2010

Thursday, June 24, 2010

तो जसवंत के भी जिन्ना अब बीजेपी को मंजूर

सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते। पर झारखंड में बीजेपी 27 दिन बाद लौटे। बिहार में साढ़े चार साल बाद होश में आए। जसवंत सिंह की किताब समझने में दस महीने चार दिन लगा दे। तो उसे आप भूला कहेंगे या कुछ और। अब आप चाहे जो भी कहें, अपने जसवंत सिंह तो बीजेपी में लौट आए। बीजेपी दफ्तर में खूब ढोल-नगाड़े बजे। आडवाणी-गडकरी-सुषमा ने अगवानी की। पर जैसे जसवंत की दलील सुने बिना बीजेपी से बाहर निकाला। वैसे ही अब बीजेपी वापसी पर कोई दलील नहीं दे पा रही। सो जसवंत की वापसी तो करा ली। पर जून के महीने में बीजेपी नेताओं ने अपनी जुबां पर अघोषित इमरजेंसी थोप ली। आखिर बीजेपी के नेता बोलें भी, तो किस जुबां से। दस महीने पहले जसवंत के लिए बड़े तो बड़े, छुटभैये बीजेपी नेता भी संसदीय भाषा में गाली दे रहे थे। लोकसभा चुनाव की हार के बाद बीजेपी में भूचाल आ गया था। तो तय हुआ, शिमला में चिंतन बैठक कर चिंता दूर करेंगे। पर तभी अपने जसवंत सिंह की किताब 'जिन्ना: भारत विभाजन के आईने में' लांच हुई। यों जसवंत ने अपनी किताब में जिन्ना के बारे में वही लिखा, जो पांच जून 2005 को कराची में आडवाणी कह चुके। पर जसवंत की किताब में सरदार पटेल की भूमिका पर भी सवाल उठे। सो बीजेपी ने शिमला में चिंतन से पहले 19 अगस्त 2009 को जसवंत अध्याय समाप्त कर दिया। पर बीजेपी की अदालत में जसवंत के कोर्ट मार्शल से पहले नेताओं ने जो ताना-बाना बुना, जरा उसकी झलक दिखा दें। जसवंत की किताब 17 अगस्त को लांच हुई। लोकार्पण समारोह में बीजेपी का एक भी नेता नहीं पहुंचा। भूले-बिसरे श्याम जाजू पहुंच गए थे। पर किसी को न देख, उलटे पांव लौट आए। फिर 24 घंटे के भीतर बीजेपी के नेताओं के बयान देखिए। सुषमा स्वराज ने तब कहा था- 'सरदार पटेल का अपमान, देश का अपमान। सो बीजेपी जसवंत से सहमत नहीं।' अगले दिन 18 अगस्त को राजनाथ सिंह का बयान जारी हुआ। तो साथ में दस जून 2005 को जिन्ना पर संसदीय बोर्ड के प्रस्ताव की याद दिलाई। फिर मुरली मनोहर जोशी ने कहा था- 'जिन्ना पाकिस्तानियों के आदर्श हो सकते हैं, भारतीयों के नहीं।' उनका इशारा जसवंत के पाक प्रेम पर था। विनय कटियार ने तो जसवंत को सीधे-सीधे जिन्ना हाउस में जाकर पनाह लेने की नसीहत दी थी। यह तो ऑन रिकार्ड टिप्पणियां थीं। अब जरा ऑफ रिकार्ड भी देख लो। एक वरिष्ठ नेता ने कहा था- 'बीजेपी में रहकर मलाई खाने के बाद अब वैचारिक बदला लेने के लिए जसवंत ने किताब लिखी।' इस नेता ने तो यहां तक कहा- पहले राजस्थान से चुनाव लड़े, अबके गोरखालैंड से। अब अगला चुनाव 'इस्लामाबाद' से लड़ेंगे। क्या बीजेपी के ये नेता दस महीने पहले कही अपनी बात भूल गए। जसवंत को जब निकाला गया, तो आडवाणी हों या जेतली-सुषमा-राजनाथ। दलील दी, जसवंत ने विचारधारा को चुनौती दी, सो बर्खास्तगी का फैसला करना पड़ा। पर क्या अब जसवंत की किताब विचारधारा को आत्मसात हो गई? जसवंत ने बीजेपी में वापसी के बाद वही रुख अपनाया, जो जिन्ना पर आडवाणी ने अपनाया था। जसवंत बोले- 'मैं किताब का लेखक हूं। कोई लेखक अपनी किताब से कैसे मुकर सकता। मैं अपनी किताब पर अटल हूं।' अब जसवंत वापसी के बाद भी वही तेवर दिखा रहे। तो यह साफ हो गया, बीजेपी ने विचारधारा की बलि चढ़ा दी। गुरुवार को जब जसवंत की सम्मान सहित वापसी हुई, तो गडकरी ने वर्करों के लिए आदर व सम्मान का दिन बताया। आडवाणी ने खुशी के साथ-साथ मन का सुकून करार दिया। पर सनद रहे, सो चिंतन बैठक के आखिर में 21 अगस्त 2009 को आडवाणी ने अपना दुखड़ा कुछ यों सुनाया था- 'तीस साल तक साथ रहे जसवंत। सो निकालने से कष्ट होना लाजिमी। पर जसवंत ने बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ काम किया। इसलिए निष्कासन से कम में वर्कर संतुष्ट नहीं होते।' यानी जसवंत की बर्खास्तगी जायज ठहराई। पर कोई पूछे, दस महीने पहले वर्करों की संतुष्टि के लिए निकाला। तो अब जसवंत की वापसी वर्करों के लिए 'आदर-सम्मान' की बात कैसे हो गई? पर गडकरी तबकी बात को बीता हुआ कल बता रहे। तो क्या बीजेपी की नीति चाल, चरित्र, चेहरा भी अब बीती बात हो गई? बीजेपी के तमाम फैसले तो यही बता रहे। जसवंत की वापसी पर चुप्पी साध बता दिया, विचारधारा से कैसे समझौता कर रहे। झारखंड में सिद्धांतों की बलि चढ़ाई। तो राम जेठमलानी को राज्यसभा भेज वाजपेयी जैसे व्यक्तित्व के सम्मान को तिलांजलि दे दी। बाकी बीजेपी में फैसलों की रफ्तार राजस्थान से बेहतर कौन समझेगा। साल होने को, पर विधानसभा में नेता तय नहीं कर पाई। अब जसवंत की वापसी भी अपना असर दिखाएगी। पर पार्टी की मूल नीतियों से गडकरी के हाथों समझौता कहीं अंदरूनी साजिश तो नहीं? आडवाणी भले रिटायर हो चुके। पर 16-17 सितंबर 2005 की चेन्नई वर्किंग कमेटी में संघ के खिलाफ आडवाणी की भड़ास याद करिए। सो कहीं ऐसा तो नहीं, आडवाणी धीरे-धीरे बीजेपी को संघ से मुक्त कराने में लगे? बीजेपी के हालिया फैसले और आडवाणी के प्रभाव यही इशारा कर रहे। जनसंघ जमाने में जब पहली बार 1964 में संघ के स्वयंसेवक बछराज अध्यक्ष बने, तो वाजपेयी ने नहीं माना। विजयवाड़ा अधिवेशन में नहीं गए। आखिर ऐसी परिस्थिति बनी, संघ के नामित बछराज साल भर के भीतर कुर्सी छोडऩे को मजबूर हो गए।
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24/06/2010

Wednesday, June 23, 2010

गांठ का गट्ठर ले चुनाव में उतरेगा गठबंधन

आखिर वही हुआ, जो नीतिश कुमार ने चाहा। बिहार में गठबंधन की खातिर बीजेपी को सरेंडर करना पड़ा। पर दिखावे का आत्मसम्मान आस्तीन चढ़ा-चढ़ा दिखा रहे। यों सार्वजनिक तौर पर बीजेपी का रुख यही, नीतिश की शर्त गवारा नहीं। अभी भी कुर्ता फाड़ कह रही- नरेंद्र मोदी और वरुण प्रचार में जाएंगे या नहीं, यह फैसला बीजेपी करेगी। पर बुधवार को नीतिश के खास शिवानंद तिवारी ने दो-टूक एलान कर दिया, बिहार में नीतिश सीएम। सो कौन आएगा, कौन नहीं, नीतिश तय करेंगे। नीतिश के तेवर देख बीजेपी ने शर्त मानना ही मुफीद समझा। आखिर तय हो गया, मोदी को बिहार के प्रचार में न बुलाया जाएगा, न जाएंगे। बीजेपी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कुछ ऐसा ही बयान दिया। बोले- 'नरेंद्र मोदी को जहां बुलाया जाता है, वहीं जाते हैं। वह हमारे स्टार प्रचारक हैं, पर जहां तक बिहार का सवाल है, तो बिहार में नीतिश सीएम हैं और हर जगह सीएम ही स्टार प्रचारक होता।'  अब मुंडी हां में और हाथ ना में हिलाना कोई बीजेपी से सीखे। सीधा-सीधा इशारा कर दिया, मोदी बिहार नहीं जाएंगे। पर जुबां से मानना तो दूर, अभी भी तेवर दिखा रही। वेंकैया नायडू कह रहे- 'मोदी-वरुण को लेकर न कोई शर्त रखी गई और ना ही अभी उन दोनों को प्रचार से दूर रखने का कोई सवाल उठता।' पर सच्चाई वेंकैया के दावे के बिलकुल उलट। वैसे राजनीति का तकाजा यही, बीजेपी अपनी जुबां से यह बात नहीं कह सकती। सो परदे के पीछे गठबंधन की खटास दूर करने की पहल तेजी से हुई। यों नीतिश का दबदबा इसी से साफ, अब तक बीजेपी का कोई नेता सीधे बात करने सामने नहीं आ पा रहा। सो गठबंधन की खटास दूर करने की कोशिश शरद यादव के जरिए हुई। वेंकैया हों या बीजेपी के दूसरे नेता, सबने शरद यादव के सामने ही अपनी व्यथा रखी। बीजेपी के स्वाभिमान की हवा निकल गई। तो नीतिश कुमार ने भी थोड़ी नरमी दिखाई। शरद यादव के जरिए यह कहलवा दिया, गुजरात को चैक लौटाना कुछ बड़ा कदम हो गया। पर नीतिश ने खुद कुछ नहीं कहा और आप लिख लो, न कहेंगे। यों बीजेपी अभी भी कोशिश कर रही, एकाध रोज में नीतिश ही प्रेस कांफ्रेंस कर गठबंधन पर ड्रामे का पटाक्षेप करें। ताकि बीजेपी की लाज बच जाए। पर अहम सवाल, हमेशा बीजेपी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मार लेती? कहने को तो बीजेपी के पास रणनीति के बड़े-बड़े तीसमार खां। पर सिर्फ गठबंधन का ही किस्सा लो, तो मायावती हों या देवगौड़ा, चौटाला हों या नवीन पटनायक या फिर झारखंड में शिबू। बीजेपी ने सब जगह मुंह की खाई। पीढ़ी परिवर्तन के बाद बीजेपी का यह हश्र क्यों? शायद अब बीजेपी वाजपेयी की 'हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा' वाली पार्टी नहीं रही। वाजपेयी ने 24 दलों के साथ इंद्रधनुषी गठबंधन चलाकर मिसाल कायम की। पर किसी सहयोगी के आगे न कभी हार मानी और ना ही रार ठनने दी। अब झारखंड और बिहार का ही किस्सा देख लो। तो वाजपेयी की बीजेपी और गडकरी-सुषमा-जेतली की बीजेपी का फर्क साफ। कई पुराने भाजपाई तो अब यह कहते मिल जाएंगे, अटल बिहारी की बीजेपी में अब गगन विहारियों की फौज जम चुकी। तभी तो पटना में वर्किंग कमेटी के वक्त नरेंद्र मोदी पर हृदय सम्राट बनने की ऐसी धुन सवार हुई, गठबंधन की बाट लगा दी। अब मोदी के खिलाफ बीजेपी ही नहीं, एनडीए में सवाल उठने लगा। बीजेपी के मंच पर बैठने वाली चौकड़ी में से एक ने बेहद तल्खी दिखाई। उन ने साफ-साफ पूछा-  'आखिर मोदी को इश्तिहार देने की जरूरत क्या थी। हम पटना किस मकसद से गए थे, पर उस इश्तिहार ने पूरी वर्किंग कमेटी को धो दिया। अच्छा-भला गठबंधन हिला दिया।' यानी जब वरिष्ठ नेताओं ने मोदी पर भृकुटि तानी, तो मोदी भी नरम पड़ गए। उधर सुशील कुमार मोदी ने भी शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात में मोदी के इश्तिहारों पर भड़ास निकाली। आलाकमान के सामने दलील रखी, साढ़े चार साल से सब कुछ सहज चल रहा था। पर मोदी के इश्तिहार ने बखेड़ा खड़ा कर दिया। बिहार में नरेंद्र मोदी को दखल देने की क्या जरूरत थी। पर सुशील मोदी ने बंद कमरे में यह गुबार निकाला। तो बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने मजाक-मजाक में यहां तक कह दिया, इश्तिहार छपवाकर पीएम बनने चले थे मोदी। बीजेपी में एक बड़ा तबका मोदी की महत्वाकांक्षा से खार खाए बैठा। वैसे पटना में जो हुआ, भले नीतिश ने चैक लौटाकर अति कर दी। पर विवाद के सूत्रधार नरेंद्र मोदी ही। सो सिर्फ बीजेपी में ही मोदी के खिलाफ आवाज नहीं उठी, अलबत्ता शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने भी अपना गुबार निकाला। यों जब लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी महाराष्ट्र के प्रभारी बनाए गए, तभी बाल ठाकरे ने मोदी की हैसियत बता दी थी। अबके उन ने बीजेपी को नसीहत दी। मुखपत्र सामना में लिखा- 'अगर बीजेपी नरेंद्र मोदी के जरिए बिहार की सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही, तो बीजेपी को शुभकामनाएं। पर यह न भूलें, मोदी उड़ीसा, दिल्ली, महाराष्ट्र, यूपी के भी चुनाव प्रचार में गए। पर क्या हश्र हुआ, बीजेपी को बखूबी मालूम।' अब सोचो, आपस में ही बीजेपी ऐसे उलझ गई, तो गठबंधन का क्या होगा? मोदी चाहे जो कहें, पर बिहार के गठबंधन में गांठ नरेंद्र मोदी की ही देन। सो समझौते के बाद भी अब बीजेपी-जेडीयू गठबंधन गांठ का गट्ठर लेकर ही चुनावी समर में कूदेगा।
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23/06/2010

Tuesday, June 22, 2010

बिहार में होय वही, जो नीतिश रचि राखा

तो बिहार में होय वही, जो नीतिश रचि राखा। पर बीजेपी भी अब आत्मसम्मान दिखा रही। आत्मसम्मान भी पटना पहुंचकर जागा। जब नीतिश ने न्योता देकर खाना नहीं खिलाया। वैसे बीजेपी पटना में चुनावी शंखनाद के बजाए कपास ओटकर लाई। अगर पटना में ही कपास ओटने के बजाए सीधे हरि भजन किया होता, तो यह नौबत नहीं आती। आखिर नीतिश ने बीजेपी वर्किंग कमेटी के दिन जो एलान किया था, हफ्ते भर बाद उसे कागजी जामा पहना दिया। अब नया तो कुछ हुआ नहीं। पर बीजेपी को हफ्ते भर बाद समझ आई, आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा रहे नीतिश। अब ऐसी शिकायत बिहार बीजेपी के नेता अरसे से कर रहे। एक बारगी तो सुशील कुमार मोदी के खिलाफ बीजेपी में दो-फाड़ हो गया। गुप्त वोटिंग के जरिए विधायकों की रायशुमारी करा आलाकमान ने सुशील मोदी को अभयदान दे दिया। साढ़े चार साल से बिहार बीजेपी नीतिश के आगे नतमस्तक। कभी ऐसी त्यौरियां नहीं चढ़ाईं, जैसी अबके चढ़ा रही। सो बीजेपी-जदयू विवाद में लालू, पासवान, कांग्रेस जैसे मुहाने पर पहुंच चुके दलों की लाटरी खुल गई। मानसून अभी दिल्ली तो नहीं पहुंचा। मौसम विभाग की मानें, तो मानसून बिहार में ही ठहर चुका। सो मानसून में सब नहा रहे। लालू तो दिल से दुआ कर रहे, गठबंधन कल टूटे, सो आज टूट जाए। सो उन ने नीतिश पर बिहार की छवि खराब करने का आरोप लगाया। बोले- नीतिश अल्पसंख्यकों को बेवकूफ बनाने का स्टंट कर रहे। यों बेवकूफ बनाने को ही राजनीति कहते। जिसकी मिसाल लालू ने 15 साल तक बिहार में दी, बाकी पांच साल रेलवे में। कांग्रेस तो यूपी दोहराने के चक्कर में। जैसे यूपी के चतुष्कोणीय मुकाबले में कांग्रेस बाजी मार गई। वैसे ही बिहार में चतुष्कोणीय मुकाबला चाह रही। ताकि खफा सवर्ण और मुस्लिम वोट कांग्रेस की झोली में गिरे। पर फिलहाल गठबंधन टूटने की आस लगाए विरोधियों की मंशा पूरी होती नहीं दिख रही। बीजेपी जबर्दस्त उथल-पुथल के दौर से गुजर रही। नीतिश कुमार ने नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी को बिहार चुनाव अभियान से बाहर रखने की शर्त रख दी। सो बीजेपी के लिए अब प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। यों बीजेपी अभी भी वही पुराना राग दोहरा रही। चुनाव में कौन नेता प्रचार करेगा और कौन नहीं, यह फैसला चुनाव के वक्त अभियान समिति करती। पर जदयू से मोदी-वरुण का नाम लेकर रखी गई शर्त गले की फांस बन गई। बीजेपी आलाकमान में फिलहाल किसी का ऐसा बूता नहीं, जो मोदी को नाराज कर सके। याद है ना, राम जेठमलानी को बीजेपी के कोटे से टिकट न देने की बात थी। पर मोदी ने चाहा, तो गडकरी ना नहीं कर सके। सो मोदी ने अब नीतिश कुमार से निजी रार ठान ली। मंगलवार को नितिन गडकरी संग नरेंद्र मोदी अपने उदयपुर में थे। तो अपनी आदत से परहेज नहीं किया। कहते हैं ना, हिरण लाख बूढ़ा हो जाए, कुलांचें भरना नहीं भूलता। बीजेपी के किसी और सीएम ने पटना में इश्तिहार देकर शेखी नहीं बघारी होगी। लेकिन मोदी की हृदय सम्राट बनने की ललक खत्म नहीं हो रही। पर वही इश्तिहार गठबंधन के लिए काल बन गया। बिहार को राहत के लिए दिए पैसे का गुणगान किया। तो नीतिश कुमार ने लौटा दिया। अब मंगलवार को उदयपुर में मोदी की वही गर्जना राजस्थान के लिए सुनाई दी। मोदी बोले- विकास की राजनीति हमारा मकसद। बहन वसुंधरा सीएम थीं, नर्मदा का पानी समय से पहले मांगा। तो हमने राजस्थान को पानी दिया। अब मुश्किल में शायद अपने अशोक गहलोत। नीतिश ने तो पांच करोड़ का चैक लौटा दिया। पर नर्मदा का पानी उलटा गुजरात कैसे लौटाएंगे। यों यह तो मजाक की बात। पर गठबंधन के लिए मंगलवार भी ऊहापोह से भरा रहा। सोमवार को सीपी ठाकुर आडवाणी-गडकरी से मिले। तो मंगलवार को सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद आडवाणी से मिले। बीजेपी कोर ग्रुप की मीटिंग तय हो गई। सो मीटिंग से पहले सुशील मोदी ने शरद यादव से मुलाकात की। फिर कांग्रेसी कल्चर में देर रात गडकरी ने मीटिंग की। तो बिहार बीजेपी के नेताओं ने जमकर भड़ास निकाली। पर हाईकमान गठबंधन न तोडऩे का फैसला कर चुका। सो सुबह चढ़ा पारा शाम को गिर गया। नीतिश केबिनेट की मीटिंग से बीजेपी के मंत्री गैरहाजिर होने वाले थे। पर शाम तक बात बन गई, सो पटना में मौजूद मंत्री केबिनेट में गए। अब गठबंधन भले बरकरार रहे, पर नीतिश विरोधी बीजेपी नेता अड़ गए। विवाद नीतिश ने शुरू किया, सो नीतिश ही खत्म करें। यों सचमुच राई का पहाड़ बन गया। अब दोनों को अहसास, बात कुछ अधिक दूर चली गई। पर नरेंद्र मोदी ने विवाद में सीधा हाथ डाल दिया। सो चुनाव प्रचार के मुद्दे पर बीजेपी ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। बीजेपी के गिरिराज सिंह ने तो कह दिया- मोदी जरूर आएंगे। पर शाहनवाज और सीपी ठाकुर ने वक्त आने पर चुनाव समिति के हवाले छोड़ दिया। यों गठबंधन बचाने के लिए बीजेपी को फार्मूला मानना ही पड़ेगा। भले बीजेपी कुर्ता फाड़ क्यों न चिल्लाएं- मोदी-वरुण आएंगे, हमारे मोदी-वरुण आएंगे। पर बिहार में बीजेपी-जदयू गठबंधन रहेगा, तो आप लिख लो, होय वही, जो नीतिश रचि राखा।
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22/06/2010

Monday, June 21, 2010

एंडरसन सिर्फ गुनहगार, अपनी व्यवस्था तो पापी

भोपाल त्रासदी पर जीओएम ने पीएम को रपट सौंप दी। अब शुक्रवार को केबिनेट राहत का पिटारा खोलेगी। पर राहत से पहले बात बीजेपी पर आई आफत की। शनि अमावस के दिन 12 जून को पटना में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन पर ऐसी साढ़े साती पड़ी। दोनों का हाल मियां-बीवी के झगड़े जैसा हो गया। जहां तुम बिन रहा भी न जाए, तुम संग सहा भी न जाए वाली स्थिति। सो गठबंधन का संकट दूर होने का नाम नहीं ले रहा। अब तो संकट दूर वही कर सकते, जिन ने संकट पैदा किया। अगर बीजेपी ने नीतिश कुमार की शर्त मान ली। पहले की तरह नरेंद्र मोदी को बिहार से दूर रखने का वादा किया। तो गठबंधन शायद बचा रहे। नीतिश कोसी बाढ़ राहत का पांच करोड़ गुजरात को लौटा बहुत आगे निकल चुके। सो मोदी से ठनी रार पर नीतिश ने समझौता कर लिया। तो बिहार में नीतिश की हालत वही होगी, जो यूपी में कल्याण सिंह को लाने से मुलायम की हुई। सो दोनों की रणनीति सिर्फ अपना-अपना वोट बैंक साधने की। फिलहाल सवर्ण वोट नीतिश सरकार से नाराज। पर गठबंधन टूटा, तो सवर्ण वोट सीधे कांग्रेस की झोली में जाएगा। बरकरार रहा, तो सवर्णों के लिए बीजेपी-जदयू के सिवा कोई विकल्प नहीं। नीतिश की भी मजबूरी, गठबंधन तोड़ कांग्रेस से हाथ नहीं मिला सकते। वैसे भी कांग्रेस का इतिहास रहा, उसने जिससे गठजोड़ किया, उसके लिए भस्मासुर साबित हुई। लालू, पासवान, मुलायम के उदाहरण पुराने नहीं। पर बीजेपी की बात दूसरी। उसने जिससे गठजोड़ किया, वह कंध पर ही बैठ गया। झारखंड हो या मायावती, देवगौड़ा हो या चौटाला-बंसीलाल। कभी बीजेपी ने अपनी ओर से गठबंधन नहीं तोड़ा। सो जैसी नीतिश की मजबूरी, वैसी ही बीजेपी की भी। अगर जदयू साथ छोड़ कांग्रेस से मिल गया। तो बीजेपी फिर राजनीतिक अछूत हो जाएगी। अभी जेडीयू जैसे दल की वजह से सांप्रदायिकता की चादर मटमैली हो चुकी। सो नीतिश को अहंकारी, अहसानफरामोश कहने के बाद भी बीजेपी गठबंधन तोडऩे का साहस नहीं जुटा पा रही। बिहार बीजेपी के अध्यक्ष सीपी ठाकुर आडवाणी से मिले। तो आडवाणी ने गडकरी से मिलने को कह दिया। सो आलाकमान की नब्ज भांप ठाकुर ने भी कह दिया, पखवाड़ा बीतने तक फैसला हो जाएगा। उधर शरद यादव भी गठबंधन न टूटने की दलील दे रहे। तो नीतिश कुमार ने कह दिया- 'टेंशन की बात नहीं, आप लोग रिलेक्स रहिए।' यानी नीतिश ने अपनी तैयारी पूरी कर ली। अब फैसला बीजेपी को करना। सो बीजेपी की स्थिति सांप-छछूंदर वाली हो गई। बीजेपी का स्थानीय नेतृत्व गठबंधन तोडऩे पर जोर दे रहा। तो केंद्रीय नेतृत्व जमीनी हकीकत से वाकिफ। सचमुच गठबंधन टूटा, तो विकास की ओर बढ़ा बिहार फिर ठहर जाएगा। सो बीजेपी के केंद्रीय नेता आज-कल यही गुनगुना रहे- 'तेरे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरे बिन तू कुछ भी नहीं। तेरे सारे आंसू मेरे, मेरी सारी खुशियां तेरी..। यानी गठबंधन नहीं टूटेगा, नूरी-कुश्ती चलती रहेगी। पर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बन कांग्रेस नाचने लगी। चैक लौटाने को नीतिश का गलत कदम बताया। पर आलोचना बीजेपी की कर रही। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने उत्साह में यहां तक कह दिया- 'अब देश में द्विध्रुवीय राजनीति की धारणा नेस्तनाबूद हो गई। सिर्फ कांग्रेस ही राष्ट्रीय दल, बाकी सिर्फ प्रासंगिक।'  यों दिल बहलाने को कांग्रेस-ए-खयाल अच्छा है। पर उन ने कट मोशन हो या भोपाल त्रासदी, बीजेपी के विरोध को बौखलाहट करार दिया। यों बौखलाहट में कौन, कांग्रेस बखूबी जानती। आखिर 26 साल पुराना पाप का घड़ा फूटा, तो कांग्रेस को गैस त्रासदी के शिकार लोग भी याद आ गए। अभी तक वहां पड़ा रासायनिक कचरा भी दिखने लगा। भोपाल त्रासदी के बाद कांग्रेस ने पीडि़तों के साथ कैसी त्रासदी की, सबका पर्दाफाश हो चुका। अब चेहरा बचाने को जीओएम बनाया। सोमवार को जीओएम की सिफारिश भी हो गई। तो 26 साल बाद पीडि़त परिवारों को दस लाख देना तय हुआ। अपंगों को पांच लाख मिलेंगे, घायलों को तीन लाख। पर जरा सोचिए, 26 साल में कितने खर्च कर चुके होंगे पीडि़त। मनीष तिवारी को गर्व, कांग्रेस ही एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी। पर क्या ऐसी भूमिका होती है राष्ट्रीय पार्टी की? भोपाल के पीडि़त 26 साल से लगातार इसी मांग के साथ प्रदर्शन कर रहे थे कि मुआवजा मिले, पीडि़तों का इलाज हो और रासायनिक कचरा हटाया जाए। पर दंभ भरने वाली राष्ट्रीय पार्टी ने क्या किया? जब यह हादसा हुआ था, तब कांग्रेस साढ़े चार सौ सीटों के साथ केंद्र की सत्ता में थी। राज्य में भी कांग्रेस का एकछत्र राज था। पर तब तो कांग्रेस ने कुछ नहीं किया। अब 26 साल बाद कोर्ट ने लचर कानूनी दायरे में सजा दी। तो लगा, जैसा सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, अपनी समूची व्यवस्था का जमीर जाग उठा। पर जीओएम अभी भी एंडरसन को लेकर खामोश। एंडरसन पर फिर वही पुराना राग, प्रत्यर्पण की कोशिश होगी। सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन डालेंगे। पर एंडरसन का क्या होगा, यह कांग्रेस भी जानती और आपको भी यहीं पर बता चुके। सो कांग्रेस हो या अपनी व्यवस्था के बाकी पहरुए, अब सिर्फ लफ्फाजी हो रही। राहत पैकेज के नाम पर एक बार फिर लूट मचेगी। सो भोपाल त्रासदी का दोषी अगर वारेन एंडरसन, तो त्रासदी के बाद के 26 साल की बदहाली के गुनहगार हम और आप। मीडिया समेत लोकतंत्र के सभी स्तंभ, जो गाहे-ब-गाहे चीख-चीख कर खुद की ईमानदारी का ढोल पीटते। असल में सबने मानवता के साथ पाप किया। लोक-लिहाज इन सभी स्तंभों के लिए तो सिर्फ कहने की बात। बाकी भोपाल अपनी व्यथा खुद कह रहा।
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21/06/2010

Saturday, June 19, 2010

तो राव पर ठीकरा कांग्रेसी मैनेजमेंट!

तो राम जेठमलानी पर बीजेपी की जिद पूरी हुई। कांग्रेस गच्चा खा गई। या यों कहें, अबके राजस्थान में जादूगर का जादू नहीं चला। सो राजस्थान में ही नहीं, कर्नाटक में भी कांग्रेस का धन-पशु वाला तुरुप नहीं चला। राजस्थान में संतोष बागड़ोदिया को निर्दलीय तो उतारा, पर फजीहत करा दी। चार निर्दलियों के जुगाड़ से अपने राम का बेड़ा पार करा लिया। अब राज्यसभा चुनाव का झंझट निपटा, तो शुक्रवार को सरकार ने भोपाल गैस पीडि़तों की सोची। पी. चिदंबरम की रहनुमाई वाली जीओएम की मीटिंग दो दिन और होगी। फिर सोमवार को पीएम को शुरुआती रिपोर्ट सौंपे जाने की संभावना। पर जरा सुध लेने की रफ्तार देखिए। जीओएम का गठन हुआ नौ जून को। पर पहली मीटिंग नौ दिन बाद हुई। वह भी तब, जब अपने मनमोहन ने दस दिन में रपट मांगी। पर बात पहली मीटिंग की। सो जीओएम ने अपनी लक्ष्मण रेखा तय कर ली। राहत, पुनर्वास और मुआवजे पर फोकस होगा। पर वारेन एंडरसन को लेकर अभी मुट्ठी बंद कर ली। चिदंबरम ने मीटिंग के बाद सभी पहलुओं पर गौर करने का भरोसा दिया। पर लगे हाथ जीओएम की लक्ष्मण रेखा भी बता दी। जैसे नक्सलवाद पर चिदंबरम ने खुद के सीमित अधिकार की दुहाई देकर हाथ खड़े किए थे। अब एंडरसन पर भी अधिकारों की दलील। जीओएम को महज राहत, पुनर्वास पर फौकस बता रहे। यानी 26 साल बाद अपने लोगों की सुध ले रही सरकार। यों 26 साल पहले जब 15-20 हजार लोग त्रासदी के शिकार हुए। तो कांग्रेस ने सिर्फ और सिर्फ वारेन एंडरसन की फिक्र की। एंडरसन पर मेहरबानी दिखाते हुए स्वदेश वापसी का पुख्ता बंदोबस्त किया। भले भोपाल की जनता त्रासदी की आग में जल रही। यों त्रासदी की आग अभी भी नहीं बुझी। सो लपटें सीधे दस जनपथ को झुलसाने लगीं। तो कांग्रेस 26 साल बाद देश के पीडि़त लोगों पर भी मेहरबान हो गई। पर एंडरसन को भगाने के आरोप से घिरी कांग्रेस की दलील सचमुच चौंकाने वाली। पंद्रह-बीस हजार भारतीयों की मौत पर एक विदेशी एंडरसन भारी पड़ा। कांग्रेस यही तो दलील दे रही। अगर तब एंडरसन को सेफ पैसेज नहीं दिया होता। तो उसका खून हो जाता। तो क्या सिर्फ अमेरिकियों का खून असली और भारतीयों का नकली? अपने मनमोहन अमेरिका और ओबामा के काफी मुरीद। पर नुकसान का मुआवजा कैसे हासिल किया जाता, यह सचमुच अमेरिका से सीखना चाहिए। मैक्सिको की खाड़ी में तेल फैलाने वाली ब्रिटिश कंपनी बीपी को आखिर 20 अरब डालर का हर्जाना भरने को राजी होना पड़ा। यह मुआवजा अमेरिकी कानून के तहत तय साढ़े सात करोड़ डालर से इतर है। हर्जाना वसूलने के लिए ओबामा ने सबसे पहले बीपी के अध्यक्ष टोनी हेवर्ड को लंदन से वाशिंगटन बुलवाया। फिर संसदीय कमेटी के सामने पेश किया। और आखिर में ब्रिटिश कंपनी को झुकना पड़ा। क्या कांग्रेस की पूर्व या मौजूदा सरकार में बराक ओबामा जैसा माद्दा है? क्या मनमोहन एंडरसन को वापस लाने की सोच भी सकते? सोचना तो दूर, अजीब-ओ-गरीब दलीलें दी जा रहीं। अब पीडि़तों के जख्म निचली अदालत के फैसले से हरे हो चुके। तो उस जख्म पर मुआवजे का मरहम लगाने की तैयारी। क्या 26 साल बाद मुआवजा सही व्यक्ति तक पहुंचेगा? जिस देश में लोग पशुओं का चारा खा जाते, बाढ़ और सूखे के शिकार लोगों का निवाला निगल जाते, जहां मंत्री अपनों को रेवड़ी बांटने में बेखोफ देश को चूना लगा जाते। ऐसे लूट तंत्र वाले देश की व्यवस्था से कैसी उम्मीद? जब 26 साल में भोपाल गैस पीडि़तों तक इंसाफ नहीं पहुंचा। तो अपनी लूटखसोट वाली व्यवस्था में मुआवजा कहां तक पहुंचेगा। कांग्रेस की हमेशा यही रणनीति। जब नानावती रिपोर्ट के बाद सिख विरोधी दंगे के शिकार परिवारों के जख्म हरे हुए, तो मनमोहन ने संसद में माफी मांगी। फिर जीओएम ने मुआवजे से मुंह बंद करने की कोशिश की। सीबीआई से जगदीश टाइटलर को बरी करवा कर ही दम लिया। अब भोपाल गैस त्रासदी में भी यही होगा। कांग्रेस कभी भी गांधी-नेहरू खानदान पर उंगली उठती नहीं देख सकती। कांग्रेस की हमेशा यही रणनीति, मीठा-मीठा दस जनपथ का, बाकी कड़वा-कड़वा कांग्रेजन का। सो भोपाल कांड में कई पूर्व अधिकारियों ने राजीव सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। तो अब नया खुलासा कांग्रेस की रणनीति के मुताबिक। पूर्व विदेश सचिव एमके रसगोत्रा ने एंडरसन को सेफ पैसेज देने के मामले में नरसिंह राव को जिम्मेदार ठहरा दिया। राव को एंडरसन पर मेहरबान बताया। राजीव गांधी को पूरे मामले में पाक-साफ बताने की कोशिश की। पर राव के बेटे रंगाराव ने पिता का नाम घसीटने पर एतराज जताया। पर नेहरू-गांधी खानदान से इतर पीएम बनने वाले कांग्रेसी नेताओं को कांग्रेस कभी अपना नहीं मानती। तभी तो पिछले यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त राहुल गांधी ने 1992 के बाबरी मस्जिद कांड के लिए राव को दोषी ठहरा दिया। तब कहा था- अगर उस वक्त नेहरू-गांधी खानदान का पीएम होता, तो बाबरी विध्वंस न होता। अब भोपाल का ठीकरा भी राव के सिर। सो अब भोपाल त्रासदी पर राजनीतिक मैनेजमेंट की तैयारी।
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Thursday, June 10, 2010

अब तो साफ हो, कौन थे अर्जुन के 'कृष्ण' ?

अब कांग्रेस डैमेज कंट्रोल में जुट गई। अभी तो जितने नेता, उतनी बातें। पर दस जनपथ से एक मास्टर स्ट्रोक आएगा। फिर भोपाल गैस त्रासदी पर भी कांग्रेस गंगा नहा लेगी। कांग्रेस में हमेशा यही होता। आप इतिहास उठाकर देख लो। पीएम की कुर्सी का त्याग हो या लाभ के पद के विवाद में सांसदी से इस्तीफा। राष्ट्रपति चुनाव हो या लोकसभा स्पीकर का। सबसे अहम, तेल की दलाली में वोल्कर रपट के बाद अपने नटवर सिंह की विदाई। नटवर जिनके खून में कांग्रेस रचा-बसा। पर कांग्रेस ने उस खून को कैसे खुद से अलग किया, सबको मालूम। यों कांग्रेस झूठ को भी सच बनाकर परोसने की कला में माहिर। जब वोल्कर रपट में तेल की दलाली की आंच कांग्रेस नेतृत्व तक पहुंचने लगी। तो बड़ी चालाकी से नटवर को हटाया गया। अगर सचमुच नटवर तेल के खेल में गुनहगार थे। तो सीधे कांग्रेस से बाहर क्यों नहीं निकाला। पर आप खुद देखो। नटवर का नाम जब वोल्कर रपट में आया, विपक्ष ने घोड़ा खोल दिया। तो मनमोहन ने पहले विदेश मंत्रालय छीना, पर केबिनेट मंत्री बने रहे। फिर कांग्रेस ने अपने मुखपत्र के संपादकीय मंडल से हटाया। पर वर्किंग कमेटी से बाहर करने से पहले जूनियर नेता कपिल सिब्बल से बयान दिलवा दिया। ताकि नटवर खुद इस्तीफा देकर कांग्रेस छोड़ जाएं। फिर जब एटमी डील पर नटवर ने मनमोहन को घेरने की कोशिश की। बीजेपी के यशवंत, सपा के अमर, लेफ्ट के सीताराम के साथ मिलकर डी-4 बनाया। तो आधी रात को कांग्रेस ने निलंबन का फैसला लिया। फिर नटवर ने पीएम मनमोहन से लेकर प्रणव मुखर्जी तक को वफादारी याद दिलाई। सो आखिर वही हुआ, नटवर को कांग्रेस से विदा होना पड़ा। यानी कांग्रेस ने वोल्कर रपट में नटवर को इस तरह उलझाए रखा कि विपक्ष आगे तक सवाल ही नहीं उठा पाया। सो कांग्रेस ने नटवर प्रकरण को लंबा खींच दस जनपथ पर उठ रही उंगली की दिशा ही मोड़ दी। यानी नटवर प्रकरण सिर्फ एक उदाहरण, ताकि भोपाल त्रासदी पर कांग्रेस की रणनीति साफ हो। अब कांग्रेस ने सियासत की बिसात बिछा दी। कांग्रेस के ही नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरु कर चुके। ताकि विपक्ष के सवाल की धार भोंथरी हो सके। अब गैस कांड के मुख्य अभियुक्त वारेन एंडरसन की भगाने में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की भूमिका पर सवाल उठा। खुद तात्कालीन डीएम ने खुलासा किया। तो मध्य प्रदेश में अर्जुन के साथ मंत्री और बाद में उत्तराधिकारी बने दिग्विजय सिंह बचाव में उतर आए। भले राजनीतिक स्तर पर दोनों नेताओं के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा। यानी मौसेरे भाई वाली कहावत चरितार्थ हो रही। दिग्विजय की दलील देखिए, एंडरसन को भगाने में राज्य सरकार की नहीं, अलबत्ता केंद्र की भूमिका संभव। उन ने साफ तौर से माना, एंडरसन को रिहा कर अमेरिका भगाने के पीछे अमेरिकी दबाव से इनकार नहीं किया जा सकता। पर दिग्विजय के बयान के फौरन बाद कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी ने असहमति जता दी। सारा ठीकरा राज्य के सिर फोड़ दिया। अब आप बयानों के विरोधाभास को खुद देख लो। जब कोई सीएम बिना पीएमओ की मंजूरी के खुद विदेश नहीं जा सकता। तो वह किसी और को कैसे भगा सकता है? वह भी राज्य सरकार के विमान में। एंडरसन को रिहा करने का आदेश अब स्वर्ग सिधार चुके तबके चीफ सेक्रेट्री ब्र्हम स्वरुप ने दिया था। डीएम-एसपी ने बिना सवाल उठाए आका के हुक्म की तामील की। डीएम की कार से एंडरसन सरकारी दामाद की तरह विमान में सवार होकर दिल्ली पहुंचा था। अब सवाल, तबके सीएम अर्जुन सिंह ने चीफ सेक्रेट्री को रिहाई का आदेश किसके कहने पर दिया? यों जनता पार्टी के सर्वेसर्वा सुब्रहमण्यम स्वामी ने ट्विटर पर खुलासा किया, एंडरसन ने अर्जुन सिंह के ट्रस्ट को तीन करोड़ चंदा दिया था। पर चंदा लेकर कोई सीएम इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकता। वैसे भी विदेश मामले पर राज्य नहीं, अलबत्ता केंद्र का अधिकार। सो एंडरसन को भगाने के लिए मची अफरा-तफरी बिना दिल्ली में बैठे आका के संभव नहीं। चीफ सेक्रेट्री ने तो तत्कालीन गृह सचिव के.एस. शर्मा को भरोसे में भी नहीं लिया। यानी भोपाल त्रासदी की सबसे बड़ी गुनहगार तो कांग्रेस हो गई। खुद तबके सूचना व प्रसारण मंत्री वसंत साठे ने खुलासा किया। एंडरसन को भगाए जाने की जानकारी केंद्र-राज्य दोनों को थी। सो बीजेपी ने कांग्रेस से मांग कर दी, देश से माफी मांगो। पर अब कांग्रेस अपना खेल करेगी। अर्जुन अगर कुछ बोलेंगे, तो हश्र नटवर जैसा ही होगा। अगर नहीं बोले, तो भी कांग्रेस अर्जुन को ही बलि का बकरा बनाएगी। कांग्रेस नेताओं के परस्पर विरोधी बयानों के बाद आप खुद देखना, कैसे दस जनपथ से फरमान आएगा और तमाम विरोधों की हवा उड़ जाएगी। पर सियासत की पिच पर कांग्रेस-बीजेपी चाहे जो खेल खेले। पर यह तो साफ हो चुका, भोपाल त्रासदी के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के लिए कांग्रेस कभी ईमानदार नहीं रही। जैसे सिख विरोधी दंगे के लिए अपने मनमोहन ने बीस साल बाद देश से माफी मांगी, कुछ ऐसा ही मानसून सत्र में भोपाल त्रासदी के लिए हो जाए, तो हैरानी नहीं। पर वसंत साठे के बयान के बाद गुरुवार को मौजूदा सूचना व प्रसारण मंत्री का बयान आया। बोलीं- 'जीओएम सभी तथ्य को सामने लाएगा। देश से कुछ भी नहीं छुपाया जाएगा। सरकार पूरी पारदर्शिता बरतेगी। पीएम मनमोहन के कार्यकाल में कोई चीज छुपाई नहीं जाती।' चलो माना, मनमोहन के कार्यकाल में कुछ नहीं छुपाई जाती। तो क्या यह मान लें, 1984 वाले पीएम के कार्यकाल में बहुत कुछ छुपाया गया? इशारा साफ, एंडरसन को भगाने वाला कौन। अर्जुन सिंह तो जरिया थे,  'कृष्ण' तो दिल्ली में थे।
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10/06/2010