सोनिया गांधी का अध्यक्ष चुना जाना अब महज रस्म। रमजान के आखिरी शुक्रवार को बाकायदा एलान हो जाएगा। पर गुरुवार को सोनिया दरबार में मत्था टेकने को कांग्रेसियों की बेकरारी खूब दिखी। कतार ऐसी, मंत्री पर संतरी भारी पड़े। चीफ मिनिस्टर हों या केबिनेट मंत्री या सोनिया के किचिन केबिनेट के नेता। या फिर देश भर से पहुंचा हुजूम। दस जनपथ में जाने को सबको अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। दिल्ली की गर्मी और उमस भी एयरकंडीशंड में बैठने वाले नेताओं का हौसला पस्त नहीं कर पाई। ऐसी भक्ति गुरुवार को या तो मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में दिखी या दस जनपथ पर। कांग्रेसी नेताओं के चेहरों पर वही भाव दिखे, जो देश भर में दही-हांडी फोडऩे वाले ग्रुपों के। पर सब नंबर से अंदर गए। नामांकन के सैट पर मैडम की मंजूरी ली। फिर ऑस्कर फर्नांडिस को सौंप आए। कुल 56 सैट में परचे आए। पर एक परचा खानापूर्ति पूरी न होने की वजह से खारिज हो गया। किसी भक्त ने अपना चेहरा दिखाने के लिए हड़बड़ी में यों ही सैट तैयार कर लिया होगा। पर बात सैट की नहीं, माइंडसैट की। परिवारवाद राजनीति की सैट धारणा बन चुकी। परिवार-परिवार खेलने में कोई राजनीतिक दल पीछे नहीं। मुलायम सिंह के बेटे अखिलेष, कल्याण सिंह के बेटे राजबीर, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज, लालजी टंडन के बेटे गोपाल जैसे कई नेता। अपने राजस्थान में जसवंत-मानवेंद्र, वसुंधरा-दुष्यंत जैसे कई। सो परिवारवाद तो राजनीति में संस्था बन चुका। जब बीजेपी पर परिवारवाद का आरोप लगता, तो बीजेपी बचाव में कहती- नेता का बेटा नेता नहीं बनेगा, तो क्या बनेगा। पर अब सोनिया गांधी के चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुना जाना तय हो गया, तो बीजेपी की बौखलाहट कहें या घबराहट, यह आप ही तय करिए। जिन सोनिया गांधी को बीजेपी ने गूंगी गुडिय़ा कहा, उसी गुडिय़ा ने 2004 के आम चुनाव में बीजेपी को पुडिय़ा बनाकर फेंक दिया। बीजेपी फील गुड करती रह गई, जनता ने सोनिया के ऊपर हुए राजनीतिक प्रहार को खुद पर हमला माना। याद है ना 2004 के चुनाव में विदेशी मूल का मुद्दा कितना हावी था। बीजेपी के नेताओं ने सोनिया को कई अपशब्द भी कहे। इतना ही नहीं, चुनाव हारने के बाद बौखलाई बीजेपी की दो वरिष्ठ नेत्रियों ने जो सिर मुंडाने का तांडव किया, वह इतिहास बन चुका। पर 2007 में सुप्रीम कोर्ट में सोनिया के विदेशी मूल पर याचिका दायर हुई। तो चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन ने कहा था- विदेशी मूल के किसी व्यक्ति पर संवैधानिक पाबंदी नहीं। इससे पहले हाईकोर्ट ने याचिका ठुकरा वसुधैव कुटुंबकम की बात कही थी। पर अब विदेशी मूल का मामला बीजेपी की डिक्शनरी से गायब हो चुका। सो सवाल विदेशी मूल का नहीं। गुरुवार को बीजेपी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर सोनिया के चुनाव पर फब्ती कसी। यों संगठन चुनाव हर पार्टी की अंदरूनी प्रक्रिया। कौन अध्यक्ष बनेगा, यह अंदरूनी तौर पर ही तय होता। सो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दंभ भरना तो हर पार्टी का ढकोसलापन। पर बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले- पीएम पद की तरह अध्यक्ष पद का त्याग करके दिखाएं सोनिया, तब लोकतांत्रिक प्रक्रिया दिखेगी। बीजेपी ने कांग्रेस नेताओं को भी ललकारा। कहा- सोनिया को चुनौती देने की हिम्मत किसी में नहीं। यों बात सोलह आने सही। पर कोई पूछे, बीजेपी के किस अध्यक्ष के चुनाव में वोटिंग की नौबत आई? सीताराम केसरी और सोनिया के पहली बार के चुनाव में बाकायदा वोटिंग हुई थी। पर बीजेपी की दलील, हर बार नया अध्यक्ष बना। कांग्रेस संविधान में ब्लाक, जिला और प्रदेश अध्यक्ष के लिए दो साल का टर्म फिक्स, तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए क्यों नहीं? यानी बीजेपी के निशाने पर नेहरू-गांधी परिवार। बीजेपी का अंदरूनी लोकतंत्र कैसा, यह किसी से छुपा नहीं। सो बीजेपी की दलील पर कहावत याद आ गई- छज बोले, तो बोले, छलनी भी बोले, जिसमें खुद हजारों छेद। बीजेपी ने कांग्रेस के परिवारवाद को आड़े हाथों लिया। पर भूल गई, बीजेपी का अध्यक्ष भले कोई नेता बनता हो, पर बनता वही है, जिसे संघ चाहता। बीजेपी में अध्यक्ष ही नहीं, पार्टी का हर नीतिगत फैसला संघ की सहमति के बाद ही लिया जाता। नितिन गडकरी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी कार्यकर्ताओं की मंजूरी से नहीं हुई। अलबत्ता संघ ने नागपुर से दिल्ली भेजा। पर हश्र क्या हुआ, खुद गडकरी अच्छी तरह जानते। अपना दर्द कई बार नागपुर में करीबियों को बता चुके। कैसे बीजेपी का चेहरा बनने आए थे, पर मोहरा बनकर रह गए। झारखंड में शिबू संग सरकार का फैसला गडकरी के पहुंचने से पहले ही हो चुका था। मीटिंग में गडकरी पहुंचे, तो एलान करने का जिम्मा सौंप दिया गया। यों बीजेपी के ऐसे लोकतांत्रिक किस्से कई। पर अगर बीजेपी ने फब्ती कसी, तो कांग्रेस ने भी कोई लोकलिहाज नहीं किया। अलबत्ता दरबारियों ने पलट कर कह दिया- चार बार नहीं, मौका मिला तो चालीस बार सोनिया को ही अध्यक्ष बनाएंगे। मतलब साफ, कांग्रेसियों को नेहरू-गांधी खानदान का एक चेहरा चाहिए। यानी लोकतंत्र राजनीतिक दलों में सिर्फ कहने की बात। अलबत्ता दो-चार लोग बैठकर एजंडा तय करते। बाकी लाखों-करोड़ों वर्कर मानने को मजबूर। सो कुल मिलाकर कांग्रेस को हमेशा एक चेहरे की जरूरत। तो बीजेपी में बदलते चेहरे के बावजूद नेतृत्व मोहरा ही दिखता।
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02/09/2010
Thursday, September 2, 2010
Wednesday, September 1, 2010
विपक्ष जीता, न सरकार, हार गया आम आदमी
रहीम का एक दोहा है- बड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोलें बोल। रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मा मोल। पर अपने राजनेता जनता को ईवीएम का बटन दबाने के सिवा कोई हक नहीं देना चाहते। सो मानसून सत्र में किसका मान बढ़ा और किसका नहीं, यह खुद ही तय कर लिया। बीजेपी ने तो बेहिचक कह दिया- संसद सत्र में विपक्ष के बिना सरकार सून रही। यानी जहां-जहां बीजेपी ने साथ दिया, सरकार आगे बढ़ी। जहां अड़ंगा डाला, पीछे हट गई। पर संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल भी पलटवार करने से नहीं चूके। बोले- लोकसभा में 45 घंटे, राज्यसभा में 35 घंटे हंगामे में बरबाद हुए। फिर भी लोकसभा में बीस और राज्यसभा में दो बिल पारित कराए। यों सत्तानशीं बंसल के जवाब से कोई हैरत नहीं। सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दल जनता के प्रति उदासीन हो ही जाते। पर विपक्ष का आत्ममुग्ध होना कितना न्यायोचित? सत्र निपटा, तो बीजेपी के दोनों नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेतली उपलब्धि का पिटारा खोलकर बैठ गए। कहा- मानसून सत्र का निचोड़ यही, हम जीते, सरकार हारी। सुषमा बोलीं- सरकार के लिए यह सत्र रेफर एंड डेफर वाला रहा। जहां हमने साथ दिया, सरकार ने बिल पारित कराया। जहां विरोध किया, सरकार ने बिल वापस ले लिया। बतौर विपक्ष बीजेपी ने अपनी भूमिका पर आत्मसंतोष जताया। कहा- हमने सरकार को कॉमनवेल्थ, भोपाल गैस कांड, एटमी जनदायित्व बिल पर घेरा। जहां सरकार ने हमारी बात मानी, समर्थन दिया। और जहां सरकार और अन्य विपक्षी दलों ने बीजेपी का साथ नहीं दिया, वहां भी हम अपनी बात पर डटे रहे। यानी अगर बीजेपी की सारी दलील मान लें, तो मानसून सत्र में वही हुआ, जो बीजेपी ने चाहा। तो सवाल- आम आदमी को महंगाई से निजात क्यों नहीं दिला पाई? क्यों नियम 184 और कामरोको प्रस्ताव से हटकर सरकारी प्रस्ताव के आगे घुटने टेके? जम्मू-कश्मीर की बहस पर मंत्री का जवाब क्यों नहीं ले पाई? भूमि अधिग्रहण पर यूपी के किसानों ने 15 अगस्त के दिन गोलियां खाईं। पर विपक्ष ने सिर्फ संसद घेराव कर अपनी चादर क्यों फेंक दी? क्यों नहीं किसानों के लिए आर-पार की बात हुई? क्यों नहीं मौजूदा सत्र में ही भूमि अधिग्रहण बिल लाने की रार ठानी? बिल तो 2007 से ही तैयार। क्यों नहीं एटमी जनदायित्व बिल जैसी रार ठानी? क्या बराक ओबामा को खुश करने के लिए ही सरकार से हाथ मिलाया? भोपाल गैस त्रासदी की चर्चा से क्या निकला? सरकार ने तो दो-टूक कह दिया- किसके फोन से एंडरसन को छोड़ा और भगाया गया, इसका रिकार्ड नहीं। फिर भी बीजेपी ने एटमी जनदायित्व बिल पर इतनी जल्दबाजी क्यों होने दी? अगर बीजेपी चाहती, तो इसी बिल की एवज में आम आदमी की खातिर डील करती। पहले भूमि अधिग्रहण बिल लाने और महंगाई पर अंकुश की बात करती। पर विपक्ष ने ऐसा नहीं किया। सो बीजेपी मानसून सत्र को अपनी जीत बता इतनी आत्ममुग्ध क्यों, यह वही जाने। पर संसद तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर। संसद में किसने कैसी भूमिका निभाई, किसको कितने नंबर मिले, यह तय करने का हक जनता को। पर सरकार हो या विपक्ष, खुद ही हार-जीत तय कर रहे। सचमुच सरकार और विपक्ष की इस हार-जीत की लड़ाई में आम आदमी ठगा महसूस कर रहा। मानसून सत्र तो बीत गया, पर महंगाई लगातार डेंगू सा डंक मार रही। अब जरा हार-जीत की जंग में दोनों पक्षों का एक नमूना देखिए। मंगलवार को राज्यसभा में एजूकेशनल ट्रेबुनल बिल अटक गया। कांग्रेस के ही केशव राव ने मोर्चा खोला। तो बाकी विपक्ष भी उठ खड़ा हुआ। पर कपिल सिब्बल बिल पर वोटिंग को अड़ गए। सो संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने फौरन बात संभाली। सिब्बल को मनाने की कोशिश की। पर सिब्बल नहीं मान रहे थे। आखिर में बिल वापस लिया और गुस्से में सदन से बाहर निकल गए। सिब्बल की नाराजगी ऐसी, संसदीय कार्य मंत्री के फ्लोर मैनेजमेंट पर जेतली-सुषमा सरीखे सवाल उठा दिए। बुधवार को तो सिब्बल ने बाकायदा पीएम से मिल बंसल की शिकायत भी कर दी। पर बंसल ने भी जवाब देने में देर नहीं की। फ्लोर मैनेजमेंट को सिर्फ अपनी नहीं, बिल पेश करने वाले मंत्री की भी जिम्मेदारी बताई। अब सिब्बल बनाम बंसल में जीत सिब्बल की तो नहीं हुई। असल में जिस बिल पर सरकार में ही जंग छिड़ी, वह मामला सीधे राहुल गांधी से जुड़ा। स्टेंडिंग कमेटी की सिफारिशों को सिब्बल ने नजरअंदाज कर बिल पेश किया। इसी कमेटी में राहुल गांधी भी मेंबर। सो केशव राव ने कड़ा एतराज जताया। विपक्ष के नेता अरुण जेतली सिब्बल के घमंड से तो आहत बैठे ही थे। सिब्बल सहयोग मांगने के लिए विपक्ष के नेता के पास खुद नहीं गए। अलबत्ता एक अफसर भेज दिया। अब नेहरू-गांधी परिवार का मामला हो, तो सिब्बल की क्या बिसात। सो बंसल ने पीएम से हुई शिकायत की परवाह नहीं की। सिब्बल के धुर विरोधी जनार्दन द्विवेदी ने भी बंसल के सुर में सुर मिलाया। कहा- लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का हक। केशव राव ने कुछ गलत नहीं किया। अब जरा इसी बिल पर विपक्ष की भूमिका देखिए। जेतली-सुषमा ने सरकार के फ्लोर मैनेजमेंट पर सवाल तो उठाया। पर खुद बीजेपी का यह कैसा मैनेजमेंट, जो लोकसभा में बिल पास हो गया, राज्यसभा में अटक गया। यों सुषमा बोलीं- लोकसभा में हमारे पास नंबर कम थे। पर विपक्ष ने पहले ही राज्यसभा में अटकाने की धमकी दे दी होती, तो बिल राज्यसभा तक पहुंचता ही क्यों। पर अब बीजेपी भागने का रास्ता ढूंढ रही।
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01/09/2010
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01/09/2010
Tuesday, August 31, 2010
अनाज तो बंट जाएगा, पर व्यवस्था की सड़ांध का क्या?
अंत भला, तो सब भला। मानसून सत्र का परदा गिर गया। पर आखिरी दिन सांसदों ने जमकर काम किया। सत्तापक्ष ने ताबड़तोड़ बिल निपटाए। तो विपक्ष भी जनहित के मुद्दे उठाने में पीछे नहीं रहा। सो बीजेपी अपनी पीठ आप ठोक रही। तो सरकार भी अपना काम निपटाने को उपलब्धि बता रही। पर सचमुच मानसून सत्र से अवाम को क्या मिला? महंगाई पर सत्र के शुरू में चर्चा हुई। तो आखिर में खुले में पड़ा अनाज मुफ्त बांटने को लेकर। अनाज सडऩे का मामला लंबे समय से उठ रहा। पर अपने शरद पवार लंबी तानकर सो रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 12 अगस्त को सरकार को अनाज मुफ्त बांटने को कहा। तो 19 अगस्त को शरद पवार ने उसे कोर्ट की सलाह बता पल्ला झाड़ लिया था। पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई। कहा- गरीबों में मुफ्त अनाज बांटने की बात सलाह नहीं, आदेश। सो लोकसभा में खूब हंगामा बरपा। विपक्ष ने सरकार को घेरा। तो सदन में आकर पवार ने आदेश के पालन का भरोसा दिया। पर पुछल्ला जोड़ दिया, अभी सुप्रीम कोर्ट का फाइनल आर्डर नहीं मिला। यानी जब तक आर्डर नहीं मिलेगा, भले अनाज सड़ जाए, गरीबों को नहीं देगी सरकार। पवार को उम्र के पड़ाव पर पता नहीं क्या हो गया। बीते इतवार को ही बयान दिया- जब लोग कोल्ड ड्रिंक खरीद सकते, तो महंगी सब्जी क्यों नहीं। अब जब देश का कृषि व खाद्य मंत्री ऐसा बेहूदा बयान दे, तो मुफ्त अनाज की उम्मीद कैसे की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भले मानवीय दृष्टिकोण से सरकार को आदेश दिया। पर यह कितना व्यवहारिक? आखिर सरकार किस तंत्र के जरिए मुफ्त अनाज बांटेगी? पीडीएस का हाल तो अरुणाचल के पूर्व सीएम गेगांग अपांग की गिरफ्तारी से हाल ही में उजागर हुआ। सो भले सुप्रीम कोर्ट का फैसला देखने-सुनने में मन को भा रहा हो। पर हकीकत यही, अनाज बंटा, तो बिचौलियों की ही बल्ले-बल्ले होगी। जरूरतमंदों तक वैसे ही पहुंचेगा, जैसे राजीव गांधी ने गांव तक पहुंचने वाले एक रुपए की कहानी बताई थी। सरकारें जनता के मुद्दों के प्रति किस तरह उदासीन रहतीं, यह कोई छुपी हुई बात नहीं। सो सुप्रीम कोर्ट का आदेश तात्कालिक तौर पर सही। पर दीर्घकालिक हिसाब से मुफीद नहीं। कोर्ट ने कोई ऐसा आदेश नहीं दिया, जो सरकार को मजबूर करे कि हर जिले-शहर में गोदाम बने। ताकि कभी अनाज सडऩे की नौबत न आए। बदहाल पीडीएस को दुरुस्त करने की बात नहीं हुई। सो मुफ्त अनाज बांटने का आदेश सुनने में अच्छा लग रहा। पर जैसी अपनी व्यवस्था, उसमें व्यवहारिक नहीं। अब भले सुप्रीम कोर्ट की लताड़ से बचने को कागजों पर अनाज मुफ्त बंट जाए। अनाज सडऩे से बच जाए। पर व्यवस्था की सड़ांध का क्या? गरीब-गुरबों की जुबां पर व्यवस्था को कोसना कोई नई बात नहीं। पर व्यवस्था के रहनुमाओं ने कभी फिक्र नहीं की। सचमुच मानसून सत्र में भले आम आदमी के मुद्दे उठे हों। पर आम आदमी का न भला हुआ, न होने के आसार। अपने वामपंथी सीताराम येचुरी ने राज्यसभा में मौजूं सवाल उठाया। कहा- पीएम ने महंगाई पर संसद में जुबां नहीं खोली। पर अमेरिका को खुश करने वाले एटमी बिल की खातिर न सिर्फ बहस में दखल दिया, अलबत्ता दोनों सदनों में बहस के वक्त अधिकांश समय मौजूद रहे। आखिर ऐसा क्यों, अमेरिका की खातिर मानसून सत्र की अवधि बढ़ गई। अब नवंबर में बराक ओबामा भारत आ रहे। तो संसद का विशेष सत्र बुलाया जाएगा। यों आवभगत के लिए सत्र बुलाने में कुछ गलत नहीं। पर कभी किसानों की आत्महत्या पर विशेष सत्र क्यों नहीं होता? महंगाई सातवें आसमान पर, फिर भी विशेष सत्र क्यों नहीं? जनहित के मुद्दे हमेशा सियासत की भेंट क्यों चढ़ जाते? अब मंगलवार को सांसदों ने जितनी फुर्ती अपनी जेब भरने के लिए दिखाई, उतनी आम आदमी के लिए क्यों नहीं? राज्यसभा में सांसदों के वेतन-भत्ते का बिल चार बजकर 23 मिनट पर पेश हुआ। और पूरी बहस के बाद चार बजकर 52 मिनट पर पारित भी हो गया। यानी आधा घंटा भी नहीं, महज 29 मिनट में ही सांसदों की जेबें भर गईं। फिर भी बहस में मांगने वालों ने कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस के राशिद अल्वी ने सांसदों के वेतन पर मीडिया में मचे शोर पर खीझ निकाली। याद दिलाया, आज से दो सौ साल पहले 1814 में अमेरिकी सिनेटर की सैलरी साढ़े छह हजार रुपए थी। हमारी तनख्वाह साठ साल में 27 बार बढ़ी, पर अभी भी महज 16 हजार। पर अपने सांसद क्यों भूल जाते अमेरिका और भारत की प्रति व्यक्ति आय का फर्क। यों शिवसेना के भरत राउत ने मीडिया का साथ दिया। बोले- मीडिया की आवाज जनता की आवाज होती। सो सांसदों को आत्म मंथन करना चाहिए। उनके वेतन पर ही इतना शोर क्यों मचता? अगर हम जिम्मेदारी से काम करें, तो शोर नहीं मचेगा। बात सोलह आने सही। पर नेताओं को तो मीठा-मीठा घप, और कड़वा-कड़वा थू करने की आदत। भूल जाते, वेतन उसे दिया जाता, जिसे सरकार नौकरी पर रखती। सांसदों को तो जनता चुनकर भेजती। फिर अपनी सैलरी खुद तय करने का हक क्यों मिले? जनता को ही यह हक क्यों न दिया जाए? सही मायने में तो जन प्रतिनिधि को वेतन मिलना ही नहीं चाहिए। वह सिर्फ भत्ते के हकदार। पर आलोचनाओं के बाद भी सांसदों ने कितना लोकलिहाज किया? जाते-जाते मालामाल हो गए। सो व्यवस्था के इस चेहरे को क्या कहें? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अनाज तो बंट जाएगा। पर फिर वही सवाल, व्यवस्था की सड़ांध कब दूर होगी?
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31/08/2010
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31/08/2010
Monday, August 30, 2010
तो राजा के लिए बिल, राजस्थानी को झुनझुना
तो सीबीआई से शुरू, सीबीआई पर ही खत्म। मानसून सत्र के आखिर में बीजेपी को सीबीआई का मुद्दा याद आ गया। सत्र से पहले सीबीआई के बेजा इस्तेमाल पर ही पीएम के लंच का बॉयकाट किया था। पर पूरे सत्र में इस मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी। अब सत्र की अवधि दो दिन बढ़ गई। तो सोमवार को दोनों सदनों में बवाल काटा। घंटे भर संसद ठप करा संतुष्ट हो गई। सो चुटकी लेने वालों ने नरेंद्र मोदी इंपैक्ट बताया। यों बीजेपी की मानिए, तो मोदी का फोन आया जरूर था। पर मामला उठाने के लिए नहीं, उठाने से रोकने के लिए। गीता जौहरी ने सीबीआई की धमकी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डाली, तो मोदी ने मना किया। अब सच जो भी हो, इतना तो साफ हो चुका। पीएम के लंच का बॉयकाट हो या सोमवार को संसद में हंगामा, मोदी का फोन आया था। पर सीबीआई का मुद्दा निपटा, तो एनीमी प्रॉपर्टी बिल हंगामे की वजह बना। सुप्रीम कोर्ट ने राजा महमूदाबाद की 1100 प्रॉपर्टी वापस करने का आदेश दिया। तो सरकार ने फैसले को गलत मानते हुए अध्यादेश जारी कर दिया। सो राजा महमूदाबाद को संपित्त वापस नहीं मिली। अब मुस्लिम सांसदों के दबाव में सरकार अध्यादेश में संशोधन चाह रही। सलमान खुर्शीद ने मोर्चा संभाल मुस्लिम सांसदों को लामबंद किया। सोनिया-पीएम-चिदंबरम तक अलख जगाई। सो मुस्लिम वोट की खातिर सरकार इतिहास रचने को तैयार हो गई। अध्यादेश संसद सत्र न होने के वक्त लाया जाता। पर सत्र में जस का तस अध्यादेश को कानूनी जामा मिलता। अबके सरकार जिस खातिर अध्यादेश लाई, संशोधन जोड़ उसे ही पलटना चाह रही। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत बताया था। पर संशोधन के साथ बिल पास हो जाए। तो राजा महमूदाबाद को सारी प्रापर्टी वापस मिल जाएगी। सो बीजेपी ने एतराज किया। पर लालू-मुलायम को तो अपने वोट बैंक की फिक्र। बीजेपी की दलील, अगर राजा को प्रॉपर्टी वापस मिली, तो सारे किरायेदारों को बाहर कर देगा। पर चिदंबरम बीजेपी की इस आपत्ति को दूर करने को राजी थे। फिर भी बीजेपी ने प्रॉपर्टी वापस करने की मुखालफत की। सो विरोध को देखते हुए सरकार ने सोमवार को बिल वापस ले लिया। अब शीत सत्र में बिल लाने का एलान हुआ। पर सरकार के इरादे नेक नहीं। सो सुषमा स्वराज ने सदन में ही हमला बोला। पूछा- क्या सरकार कोई नया अध्यादेश लाने की सोच रही? चिदंबरम ने कोई जवाब नहीं दिया। पर चाल देखिए, मौजूदा अध्यादेश सत्र खत्म होते ही लेप्स हो जाएगा। फिर सरकार अभी जो संशोधन चाह रही थी। उसी संशोधन के साथ नया अध्यादेश ले आएगी। फिर शीत सत्र में विपक्ष ने विरोध किया, तो भी सरकार की राजनीतिक सेहत पर फर्क नहीं पड़ेगा। संविधान के तहत यह प्रावधान, अगर कोई अध्यादेश लेप्स हो जाए। तो उसके जरिए हुआ काम मान्य होगा। यानी मौजूदा अध्यादेश के तहत राजा महमूदाबाद को प्रॉपर्टी वापस नहीं मिलेगी। पर नया अध्यादेश आया, तो सरकार और लालू-मुलायम की मंशा पूरी होगी। राजा महमूदाबाद के बेटे को 24 हजार करोड़ की प्रॉपर्टी वापस मिल जाएगी। फिर जब राजा को बैठे-ठाले इतनी संपत्ति मिलेगी। तो राजा की खातिर फुर्ती दिखाने वाले दल चुनावी चंदे के साथ-साथ वोट बैंक का भी जुगाड़ कर सकेंगे। यों एनीमी प्रॉपर्टी बिल को लेकर सरकार की नीयत में खोट। तो विपक्ष भी दूध का धुला नहीं। हदबंदी कानून देश में लंबे समय से लागू। कृषि संपत्ति सीमा तय करने का कानून 1968 में बना। तो शहरी संपत्ति सीमा का कानून 1973 में। यूपी में इस कानून के मुताबिक कोई परिवार अधिक से अधिक 33 एकड़ कृषि भूमि ही रख सकता। जबकि लखनऊ जैसे शहर में सीलिंग की सीमा एक हजार वर्ग मीटर। पर अब शहर में सीलिंग का कानून रद्द हो चुका। अगर शहर सीलिंग एक्ट लागू होता। तो न अध्यादेश की जरूरत पड़ती, न वोट के सौदागर ऐसा ख्याल दिल में लाते। पर सनद रहे, सो बता दें। शहरी सीलिंग एक्ट 1999 में एनडीए राज में बतौर शहरी विकास मंत्री राम जेठमलानी ने रद्द करवाया। तब दलील दी गई, एक हजार वर्ग मीटर में मकान के अलावा छोटा सर्वेंट क्वार्टर भी नहीं बन पाता। सो कानून ही हटा दिया गया। अब कोई कानून नहीं, सो संशोधित रूप में अध्यादेश आया। तो लोकतंत्र के इस दौर में भी राजा महमूदाबाद का वारिस सचमुच का राजा होगा। वोट की खातिर नेताओं ने संसद को सचमुच कठपुतली बना दिया। पाकिस्तान जा चुके लोगों की खातिर कानून बन रहे। लालू को तो एनीमी शब्द पर ही एतराज। देश की जनता से किए वादे शायद ही कभी पूरे होते। पर एनीमी और अमेरिका के लिए कुछ भी होगा। अब सोमवार को राजस्थानी भाषा को लेकर लोकसभा में हंगामा बरपा। तो 18 दिसंबर 2006 का गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का वादा याद कराया गया। खम ठोककर बजट सत्र 2007 में बिल लाने का एलान किया था। पर उस लोकसभा का विसर्जन हो गया, वादा पूरा नहीं हुआ। सत्ता में आने वाले यह भूल जाते, संसद सरकार और जनता के बीच मध्यस्थ का काम करती। राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में कहा था- संसद की असली संप्रभुता इसी में कि वह अपने और जनता के हक के बीच कोई फर्क न करे। लोकतंत्र को सफल बनाना है, तो संसद को अपने अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ जनता की आवाज सुनने को भी तैयार रहना चाहिए। पर अब संसद का इस्तेमाल सिर्फ वोट और निजी हित की खातिर होता।
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30/08/2010
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30/08/2010
Friday, August 27, 2010
संसद भवन, जनता हारी नैतिकता पर सांसद भारी
मांगने में माननीयों ने तो मंगतों को भी मात दे दी। शुक्रवार को लोकसभा से सांसदों के वेतन-भत्तों को हरी झंडी तो मिली ही। सांसदों ने भविष्य का बंदोबस्त करने में कसर नहीं छोड़ी। लुटियन जोन में मिले आवास अब सांसदों को छोटे लग रहे। आवास के साथ अमेरिका की तरह अलग दफ्तर नहीं मिलना साल रहा। अब वेतन-भत्ते बढऩा महज औपचारिकता रह गई। सो आगे के बंदोबस्त में जुटे। लोकसभा में छोटी बहस हुई। पर सांसदों ने बड़ी-बड़ी मांगें रखने में कोई लिहाज नहीं किया। सांसदी न रहने पर भी दिल्ली में सरकारी सुकून मिले। सो पेंशन के साथ-साथ अलग गेस्ट हाउस की भी मांग कर दी। बसपा के धनंजय ने अमेरिका की तरह 18 स्टाफ की मांग की। हर विषय पर रिसर्चरों की टीम चाहिए। असम के विश्वमुतियारी ने सांसद निधि दो से दस करोड़ की मांग की। पेंशन आठ से बीस हजार हो रही। पर पेट है कि भरता नहीं, सो 25 हजार की मांग कर रहे। लालूवादी रघुवंश बाबू ने बाकायदा संशोधन भी पेश किया। पर सरकार और सदन ने खारिज कर दिया। फिर भी मामला खत्म नहीं समझिए। संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने भरोसा दे दिया। जब सांसदों के वेतन-भत्ते के लिए अलग मैकेनिज्म बनेगा, तब सभी मुद्दों पर विचार होगा। पर मैकेनिज्म को लेकर भी आम राय नहीं। लोकसभा में वेतन-भत्ते में बढ़ोतरी बिल पर घंटे भर की खानापूर्ति बहस हुई। तो बीजेपी ने नैतिकता दिखाने की कोशिश की। बीजेपी से कोई नहीं बोला, अलबत्ता आडवाणी ने दखल दिया। उन ने वही बात दोहराई, जो अगस्त 2006 से कही जा रही। आडवाणी ने अलग मैकेनिज्म की बात की। मौजूदा सत्र में ही इसके एलान की मांग भी। फिर कांग्रेस-सपा-लेफ्ट-जदयू-तृणमूल ने भी मैकेनिज्म की पैरवी की। पर अपने रघुवंश बाबू और मायावादी धनंजय ने इसकी मुखालफत की। वेतन-भत्ते तय करने का अधिकार किसी और संस्था को देने को अपनी तौहीन बता रहे। दलील, जब संसद में सारी चीजें तय होतीं, तो सांसदों के वेतन तय करने का अधिकार किसी और को क्यों दें। अगर दूसरा व्यक्ति सांसद का वेतन तय करेगा, तो वह मालिक और हम नौकर हो जाएंगे। यों सही भी, कोई अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारता। अब इतनी दलील तो तब सामने आई, जब बिल पर महज दस सांसदों ने बोला। अगर लंबी-चौड़ी दो-चार घंटे की बहस होती, तो सांसद अपनी पोल-पट्टी खुद ही खोल लेते। यों लालूवादियों और मायावादियों की सोच लाजिमी। जहां वन मैन शो हो, वहां दूसरों को अधिकार क्यों दे? पर सांसदों की फुर्ती देखिए। महज घंटे भर में बहस के साथ बिल पारित हो गया। संसद पर यह सांसदों की मेहरबानी समझिए। वरना पहले तो चट बिल आया, पट पारित हो गया। इतना ही नहीं, अपने सांसदों ने शुक्रवार को साफ कर दिया, पहले के जमाने में नैतिकता के आधार पर वेतन कम लिए जाते रहे होंगे। पर अब यह नहीं चलेगा। रघुवंश बाबू ने तो एक कहावत सुना पूछ लिया, क्या ऐसा नौकर चाहिए, जो मांग-चांग के खाए और हुक्म पर तामील करे, कभी घर न जाए? कुल मिलाकर निचोड़ यही रहा, जनता के लिए न सही, अपने लिए तो लड़ेंगे। सो समूची बहस में सबने मीडिया को आड़े हाथों लिया। मीडिया में हुई आलोचना से सभी नेता सदन में उल्टी करते नजर आए। किसी ने प्राइवेट कंपनी के सीईओ से तुलना की, किसी ने भारत सरकार के सचिव से तो किसी ने अन्य देशों के सांसदों से। पर अपने सांसद क्यों भूल जाते प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत और दुनिया का फर्क? अगर कोई सीईओ वेतन के नाम पर लूट रहे, तो क्या नेता भी सरकारी खजाना लूटेंगे? जिन लालू-मुलायम ने 50,000 को नाकाफी बता 80,001 रुपए की मांग की, वह अपना दिन क्यों भूल गए। मुलायम अपने शुरुआती दिन में टीचर थे, अगर राजनीति में न आते, तो रिटायरमेंट तक महज प्राइमरी स्कूल के हैड मास्टर होते और आज पेंशन सात हजार होती। लालू किसी जमाने में दस रुपए दिहाड़ी पर मजदूरी किया करते थे। पर आज 50,000 भी कम लग रहे। अपने अधिकांश सांसद ऐसे, जिनकी आमदनी पांच साल में दुगुनी से दस गुनी तक बढ़ जाती। फिर भी कम वेतन का रोना, खर्च की बात। लालू-मुलायम तो सिर्फ उदाहरण, दिल से सभी वेतन बढ़ोतरी चाहते। पर लोकसभा में राजनीति भी हुई। लेफ्ट ने वाकआउट किया। तो ममतावादी सुदीप ने फब्ती कसी, वाकआउट करने वाले बढ़ा हुआ वेतन न लें। अब मानसून सत्र की अवधि बढ़ चुकी। सो मंगलवार को जब संसद उठेगा, तो सांसद भी मंगल गान करते उठेंगे। वेतन तो बढ़ा ही, एरियर के नाम पर करीब पांच लाख मिलेंगे। पर सांसदों और सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही देखिए। शुक्रवार को बाढ़-सूखे पर चार बजे बहस होनी थी। पर तब अपने सांसद वेतन-भत्ते बढ़ाने में लगे हुए थे। अमेरिका की खातिर संसद का सत्र दो दिन बढ़ गया। पर किसानों के लिए जमीन अधिग्रहण बिल का मामला अगले सत्र के लिए टल गया। अब सोम-मंगल को बढ़े सत्र में खूब दबाकर सरकारी काम निपटेंगे। एटमी जनदायित्व बिल से लेकर सांसदों के वेतन-भत्ते तक का मामला राज्यसभा से चुटकियों में पास होगा। सच कहें, तो संसद अब सिर्फ एक भव्य इमारत भर रह गई। जो भारत की आन-बान-शान की प्रतीक। जहां जनता और नैतिकता की फिक्र कम, बाकी अपनी खातिर सांसद कुछ भी करने को तैयार।
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27/08/2010
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27/08/2010
Wednesday, August 25, 2010
तो कांग्रेस-बीजेपी और ‘मंशा’ अमेरिका की
तेरी-मेरी यारी और संसद हमारी। कांग्रेस-बीजेपी ने मिलकर एटमी जनदायित्व बिल लोकसभा से निपटवा लिया। बुधवार को लेफ्ट तो बुद्धू ही बना रहा। बाकी कांग्रेस ने बीजेपी संग टांका भिड़ा बराक ओबामा का गिफ्ट तैयार कर लिया। लोकसभा में बिल पेश होने से पहले ही सरकार और विपक्ष की गुटरगूं हो चुकी थी। सो दोपहर बाद पीएमओ में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने 18 संशोधनों के साथ बिल पेश कर दिया। फिर देर शाम बिल पास भी हो गया। जब पक्ष-विपक्ष में हो ऐसी यारी, तो फिर संसद का रंगमंच भर होना लाजिमी। वैसे भी मौजूदा सत्र में स्वांग रचने वाली संसद का नजारा भी दिख चुका। सचमुच स्वांग रचने में नेताओं की कोई सानी नहीं। अब एटमी जनदायित्व बिल का ही पूरा किस्सा लो। तो कैसे बजट सत्र में विपक्ष ने इसी बिल पर सरकार की बोलती बंद कर दी थी। पर मानसून सत्र में ऐसा क्या बरसाया सरकार ने, बीजेपी बाग-ओ-बाग हो गई। जिन लालू-मुलायम-लेफ्ट-शरद-शिवसेना को भरोसे में लेकर बीजेपी ने बजट सत्र में बिल रुकवा दिया। अबके किसी को पूछा तक नहीं। सो बिल के लिए डील की आशंका यों ही नहीं। याद करिए मानसून सत्र से ठीक तीन दिन पहले 23 जुलाई की तारीख। गुजरात के तबके गृह राज्यमंत्री अमित शाह के खिलाफ सीबीआई ने सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। तो नरेंद्र मोदी ने आला नेताओं को फोन खडक़ा आर-पार का मंत्र थमाया। सो बीजेपी की चतुर चौकड़ी आडवाणी-गडकरी-सुषमा-जेतली ने पीएम मनमोहन के घर का जायकेदार लंच ठुकरा दिया था। सीबीआई के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगा संसद में हंगामे की तैयारी कर ली थी। पर महंगाई का मुद्दा संसद में विपक्षी एकता का आधार बना। तो बीजेपी ने सीबीआई पर बहस की मांग अगले हफ्ते के एजंडे में डाली। पर बुधवार को इधर बीजेपी के समर्थन से एटमी जनदायित्व बिल पास हुआ। उधर बीजेपी सीबीआई पर बहस की जिद छोड़ गई। अब आप क्या कहेंगे? पीएम का लंच ठुकराना, फिर उसी मुद्दे पर बहस की जिद छोड़ देना क्या किसी सौदेबाजी की शंका नहीं? अब भले बीजेपी सौदेबाजी से इनकार करे या सवाल पूछने पर भडक़ उठे। पर सरकार ने एटमी बिल की खातिर बीजेपी को पटा इतना मैसेज तो जरूर दे दिया। जैसे सीबीआई के आगे लालू-मुलायम-माया-अजित। कुछ वैसी ही अब बीजेपी भी। अगर ऐसा नहीं, तो जिस सीबीआई के मुद्दे पर राष्ट्रपति भवन तक मार्च हुआ। देश भर में सीबीआई के मुख्यालयों पर प्रदर्शन हुए। उसी सीबीआई के बेजा इस्तेमाल पर बहस की जिद बीजेपी ने कैसे छोड़ दी? अब सुषमा कह रहीं- संसद के सत्र में सरकार के कई बिल पास होने, सो वक्त नहीं। क्या विपक्ष से कोई ऐसी दलील की उम्मीद करेगा? क्या यह विपक्ष का सरेंडर नहीं? बिल पास होने को संसद का सत्र बढ़ रहा। फिर भी बीजेपी सीबीआई पर बहस नहीं मांग रही। पर जब अमेरिका की खातिर विपक्ष समर्थन दे रहा हो, तो सरकार के हौसले बुलंद क्यों न हों। सो हील-हुज्जत के बाद बिल पेश हुआ। तो सरकार ने बीजेपी की तमाम शर्तें मान लीं। पर लेफ्ट को ठेंगा दिखा दिया। यों लेफ्ट की मांग अमेरिका को किसी भी सूरत में मंजूर नहीं होतीं। सो बीजेपी से समझौता सरकार को मुफीद रहा। अब लोकसभा में बिल पास हो गया। राज्यसभा से पास होकर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलेगी। फिर कानून बन जाएगा। पर कानून क्या सचमुच जनता को राहत दिलाएगा? अगर इरादे नेक हों, तो कानून के बिना भी जनता का हित संभव। पर जब इरादे नेक न हों, तो कानून कुछ नहीं कर सकता। वैसे भी आम धारणा यही, कानून सिर्फ गरीबों के लिए होता, बड़े लोगों के लिए नहीं। सो एटमी जनदायित्व बिल की खातिर मनमोहन के सिपहसालारों ने जितने खेल किए, उससे तो नीयत ही साफ नहीं दिखती। पहले बिल में 500 करोड़ की बात हुई। फिर 1500 करोड़ की सीमा तय हुई। फिर भी विदेशी कंपनियों को बचाने के लिए नौकरशाही का सुझाया ‘एंड’ शब्द जोड़ दिया। विपक्ष ने एतराज किया, तो एंड हटाकर ‘इंटेंट’ यानी मंशा शब्द जोड़ दिया। अब मंशा शब्द भी हट चुका। पर जरा सोचिए, जिस बिल को सरकार ने पेश किया, उसमें खुद 18 संशोधन लेकर आई। सो भले एटमी जनदायित्व बिल अब कुछ दिनों में कानून बन जाएगा। नवंबर में भारत दौरे पर आ रहे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को तोहफा मिल जाएगा। पर सचमुच कभी कोई एटमी हादसा हुआ, तो आप देख लेना, विदेशी कंपनियां उसी तरह सस्ते में छूट जाएंगी, जैसे वॉरेन एंडरसन छूट गया। हम और आप यानी आम जनता तो सिर्फ आंसू बहाएगी, जैसा भोपाल त्रासदी पर बहा रही। अगर सरकार की मंशा जनता के हित की होती, तो कभी बिल पर शब्दों का ‘कॉमनवेल्थ’ नहीं होता। पता नहीं अपने नेताओं को क्या हो गया। जो शपथ तो देशहित की लेते, पर विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए कभी विपक्ष से डील तो कभी शब्दों का खेल करते। सो अगर एटमी जनदायित्व बिल का सरकारी भाषा में मतलब निकालें, तो रेलवे के प्लेटफार्म पर लिखा होता है ना- यात्री अपने सामान की रक्षा खुद करें। उसी तरह जनदायित्व का मतलब जनता के लिए दायित्व नहीं, अलबत्ता जनता का ही दायित्व। अगर कुछ हुआ, तो भुगतेगी जनता, सरकारें तो आती-जाती रहतीं। तभी तो पीएम ने भी दिलासा दी, अमेरिकी दबाव में कुछ नहीं कर रहे। सबका ख्याल रखा। बीजेपी के जसवंत ने सदन में सरकार पर अमेरिकी पिछलग्गू बनने का आरोप लगाया। बिल पर जल्दबाजी को ओबामा की अगवानी बताया। पर आखिर में कांग्रेस-बीजेपी साथ-साथ।
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25/08/2010
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25/08/2010
Friday, August 13, 2010
‘सात’ की महिमा और रिकार्ड मनमोहन का
तो इसे कहते हैं सत्ते पे सत्ता। भले मनमोहन सिंह की लोकप्रियता का ग्राफ गिर गया। पर लाल किले की प्राचीर से सातवीं बार झंडा फहराने का रिकार्ड बनाएंगे। अटल बिहारी वाजपेयी से आगे निकल तीसरे पायदान पर होंगे मनमोहन। पंडित नेहरू के नाम सत्रह बार का, तो इंदिरा के नाम सोलह बार का रिकार्ड। अपने मनमोहन वहां तक पहुंचेंगे, ऐसी उम्मीद बेमानी। इंडिया टुडे का सर्वे आया, तो वाजपेयी-मनमोहन का फर्क देखिए। करीब ढाई-तीन साल से वाजपेयी सक्रिय राजनीति से दूर। मनमोहन साढ़े छह साल से पीएम। पर पीएम पद के लिए लोकप्रियता का सर्वे हुआ, तो मनमोहन को एक फीसदी लोगों ने पसंद किया। वाजपेयी को सोलह फीसदी ने। लोकप्रियता के मामले में अव्वल रहे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। सचमुच बहुत कम समय में राहुल ने युवा वर्ग में खासी लोकप्रियता अर्जित कर ली। सो अब कांग्रेस की मुश्किल, सर्वे को नकारे या स्वागत करे। पर बात लोकप्रियता की, तो देखिए कैसे वाजपेयी आज भी सभी वर्गों में लोकप्रिय। मनमोहन पिछली बार के सर्वे में नंबर वन थे। पर अबके सात उम्मीदवारों में मनमोहन सातवें स्थान पर आए। सो देश की जनता का मूड मौजूदा पीएम के लिए ऐसा हो, तो सातवीं बार झंडा फहराना मनमोहन की उपलब्धि होगी या देश की मजबूरी? आजादी की चौंसठवीं सालगिरह पर यह क्या। एक अर्थशास्त्री पीएम सातवीं बार लालकिले की प्राचीर से जनता को तब संबोधित करेगा, जब महंगाई भी सातवें आसमान पर। सरकार की तानाशाही सातवें आसमान पर। तभी तो संसद में महंगाई से लेकर कॉमनवेल्थ के भ्रष्टाचार और भोपाल गैस त्रासदी तक, बहस तो हुई, पर कोई असर नहीं। अलबत्ता अब मनमोहन सरकार ने अपनी एक थीम बना ली। हर बहस में सरकार एक ही जवाब देती, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले। एंडरसन को राजीव गांधी ने नहीं भगाया, यह सरकार को मालूम नहीं। पर किसने भगाया, इसके भी रिकार्ड नहीं। महंगाई पर तो चाहे जितनी बहस करा लो, कम नहीं होगी। भ्रष्टाचार तो राजनीति का शाश्वत नियम। आने वाले वक्त में भ्रष्टाचार पर भी कोई कॉमनवेल्थ हो जाए, तो अचरज नहीं। वैसे अपना सुझाव यही, लालकिले की प्रचार से मनमोहन एलान कर दें, भ्रष्टाचार मंत्रालय बनेगा। ताकि भ्रष्टाचार से आने वाले धन की निगरानी हो सके और एक हिस्सा सरकारी खजाने में भी जमा हो। अगर पेट्रोल-डीजल की तरह भ्रष्टाचार से अधिक उगाही करनी हो, तो बाकी मंत्रालयों की प्रतियोगिता करवा लो। मुनादी करवा दो- जो मंत्रालय भ्रष्टाचार कोष में जितना धन जमा करवाएगा, उसे और मलाईदार मंत्रालय दिया जाएगा। सचमुच भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी अंदर घुस चुकीं, उखाडऩा मुमकिन नहीं। सो क्यों न भ्रष्टाचार को सरकारी मान्यता दे दी जाए। संसद तक व्यवस्था के घुन को रोकने में नाकाम हो रही। संसद तो सिर्फ कर्मकांड की जगह भर रह गई। अब अंकल सैम ओबामा भारत आ रहे। तो परमाणुवीय दायित्व बिल तोहफा में देने की तैयारी। सो अब मानसून सत्र की अवधि बढ़ेगी। यही होता है, कोई बिल हो या किसी मुद्दे की बहस, सारी रणनीति सदन के बाहर ही तय हो जाती। सो संसद में न बहस का कोई स्तर रहा और ना ही सरकार पर कोई असर पड़ता। संसद की प्रासंगिकता कैसे चौपट हो रही, इसकी एक छोटी सी मिसाल शुक्रवार को भी दिखी। लोकसभा में तकनीकी खामी की वजह से अंग्रेजी अनुवाद सांसदों तक नहीं पहुंच रहा था। ऊर्जा राज्यमंत्री भरत सिंह सोलंकी हिंदी में जवाब दे रहे थे। तभी डीएमके के टीआर बालू हत्थे से उखड़ गए। अंग्रेजी अनुवाद नहीं होने पर एतराज जताया। तो स्पीकर ने तकनीकी खामी का हवाला दे फौरन चैक करने का भरोसा दिया। पर बालू को तो मुद्दा मिल गया। इसी बीच सोलंकी के सीनियर मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अंग्रेजी में बोलने की हिदायत दी। सोलंकी अंग्रेजी में बोलने लगे। फिर बालू हैडफोन फेंक सदन से जाने लगे। हंगामा बढ़ा, तो सदन कुछ देर के लिए ठप करना पड़ा। फिर बाद में सब ठीक हो गया। तो हिंदी के पैरोकार हंगामा करने लगे। सवाल उठा, अंग्रेजी की ही पैरवी क्यों? तमिल, तेलुगु, मलियाली, उर्दू की बात क्यों नहीं। हिंदी का अपमान सही नहीं। बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे ने एक कदम आगे बढक़र कहा- सभी भाषा एक समान नहीं, अलबत्ता हिंदी राष्ट्रभाषा है। ऐसा दर्जा किसी और भाषा को नहीं। पर सवाल, मुंडे कभी राज या उद्धव ठाकरे की टिप्पणी पर यह दलील क्यों नहीं देते? बीजेपी का मराठी-हिंदी विवाद पर ढुलमुल रुख जगजाहिर। पर बात बालू की। तो इतिहास साक्षी, डीएमके ने भाषायी विवाद की पीएचडी कर रखी। अगर बालू कुछ देर इंतजार कर लेते, तो कोई आफत नहीं आती। पर छोटी सी बात पर संसद को अखाड़ा बनाने वालों ने संघीय ढांचे की फिक्र नहीं की। यही डीएमके 1950 के दशक में अलग द्रविड़ स्थान देश की मांग कर रही थी। अक्टूबर 1963 में संविधान का सोलहवां संशोधन कर अखंड़ता की खिलाफत करने वालों पर रोक लगाई। तो डीएमके वालों ने राज्य स्वायत्तता का राग अलापा था। यह वही डीएमके है, जिसने नारा दिया था- भारत भारत वालों के लिए और तमिलनाडु तमिल लोगों के लिए। भारत के नक्शे तक जलाए गए। उत्तर-दक्षिण में भेदभाव का बीज बोने की कोशिश की। तो क्या अब संसद में भी राज ठाकरे जैसी राजनीति होगी? क्या अपने सांसद संसद को खत्म करने पर आमादा हो गए? क्या आजादी की चौंसठवीं सालगिरह पर सातवीं बार झंडारोहण करने जा रहे मनमोहन सरकार की यही उपलब्धि?
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13/08/2010
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13/08/2010
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