जूते और प्याज खाने वाली कहावत चरितार्थ कर भी बीजेपी झारखंड की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रही। यों पिता तुल्य आडवाणी ने अबके खम ठोक दिया। अब तक की फजीहत देख सरकार बनाने की पहल को हरी झंडी नहीं दे रहे। सो छुट्टी मनाकर लौटे गडकरी की मुसीबत बढ़ गई। अब तो अठारह में से सोलह एमएलए ने दबाव बना दिया। झारखंड बीजेपी बगावत के कगार पर खड़ी हो गई। सो सोमवार को बीजेपी ने न राष्ट्रपति राज की हिमायत की, न खारिज किया। अलबत्ता बयान देखिए- 'हम कांग्रेस की गतिविधि पर निगाह बनाए हुए।' अब कोई पूछे, जब आपने समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस सरकार बनाने से इनकार कर चुकी। तो क्या स्वर्गलोक से इंद्र आएंगे झारखंड संभालने? अब बीजेपी का नया खेल देखिए। जैसे ही राष्ट्रपति राज की ओर मामला बढ़ता दिखा। तो शिबू को समझाने में जुट गई। अब बीजेपी शिबू के सभी एमएलए की चिट्ठी मांग रही। सो सोमवार को गवर्नर फारुक ने केंद्र को रपट भेजने से पहले की रस्म निभाई। तो बीजेपी के रघुवर दास ने मंगलवार तक का वक्त मांग लिया। यानी तब तक शिबू मान गए, तो ठीक। वरना आखिर में बीजेपी कहेगी, हर-हर गंगे। पर बात बन गई, तो बीजेपी की स्क्रिप्ट भी तैयार। बानगी आप भी देखिए- हम झारखंड की जनता को चुनी हुई सरकार देना चाहते, राष्ट्रपति राज नहीं। सो झामुमो बिना शर्त समर्थन देने को राजी हुआ, तो हमने 'जनहित' में फैसला वापस लिया। अब सचमुच ऐसा हुआ, तो राजनीति पर लागू सभी कहावतों की सीमा पार हो जाएगी। पर राजनीति से और कैसी उम्मीद। अब झारखंड में महीने-डेढ़ महीने से बीजेपी-झामुमो जो चरित्र दिखा रहीं, उसे भी 'जनहित' बता रहीं। पर झारखंड में जनहित कर बीजेपी अब अपने सभी राज्यों में जन-जन का दिल जीतेगी। बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन पांच-छह जून को मुंबई में होगा। गुड गवर्नेंस ही सम्मेलन का एजंडा। सो शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कृषि, महिला-बाल कल्याण, समाज कल्याण, जल-वन पर्यावरण, इन्फ्रास्ट्रक्चर, ग्रामीण विकास, पंचायती राज और शहरी प्रबंधन पर विशेष प्रस्तुतीकरण होगा। फिर राज्यों के विशेष प्रोग्राम को आगे बढ़ाने और बीजेपी के अन्य राज्यों में भी लागू करने पर विचार होगा। यानी गडकरी ने अध्यक्षी संभालते ही जो एलान किया, उसकी पहली शुरुआत होगी। राजनीति को समाज से जोडऩे की कवायद गडकरी का एजंडा। सो संघ की सलाह को अंजाम देते हुए गडकरी ने तय कर दिया, अब बीजेपी में किसी व्यक्ति का मॉडल नहीं होगा। अलबत्ता पार्टी के मॉडल चलेगी सरकार। अब तक आडवाणी-राजनाथ सरीखे नेता बाकी मुख्यमंत्रियों को नरेंद्र मोदी मॉडल की घुट्टी पिलाते रहे। गुजरात चुनाव के बाद जब राजनाथ ने दिल्ली कार्यकारिणी में मोदी मॉडल की पैरवी की। तो तबके बीजेपी के सभी सीएम न सिर्फ खफा हुए, अलबत्ता अपनी नाराजगी का इजहार सार्वजनिक तौर से किया। यानी कोई सीएम खुद को कमतर न समझे, सो अब हर जगह बीजेपी मॉडल होगा। पर कहीं मोदी नाराज न हों, सो मुंबई की मीटिंग में उद्घाटन के बाद की-नोट भाषण नरेंद्र मोदी का ही होगा। सीएम कांफ्रेंस में बीजेपी चार्टर पेश करेगी। पर कमजोरियों को छुपाएगी। अब गडकरी की बीजेपी सीएम कांफ्रेंस को अपनी बड़ी शुरुआत के तौर पर पेश कर रहे। पर वेंकैया नायडू के अध्यक्ष रहते ऐसा सम्मेलन दिल्ली के अशोका होटल में हो चुका। तब भी गुड गवर्नेंस की बात हुई थी। सत्ता-संगठन के तालमेल की बात हुई थी। पर तबसे अब तक बीजेपी दो लोकसभा चुनाव हार चुकी। कुछ राज्य भी गंवाए। पर अब तक न सुर मिला, न ताल। अपने राजस्थान में बीजेपी ने 2008 के चुनाव में पटखनी खाई। तो आडवाणी हों या बाकी निचले स्तर के नेता, सबने समन्वय की कमी पर ठीकरा फोड़ा। पर अबके गडकरी ने एजंडे में फिर सत्ता और संगठन में तालमेल का विषय रखा। तो जरा गडकरी के परफोर्मेंस ऑडिट फार्मूले का पैमाना देखिए। बीजेपी के सीएम कौन-कौन, पहले यह देख लें। गुजरात में नरेंद्र मोदी तीसरी बार सीएम। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान दूसरी बार। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह दूसरी बार। हिमाचल में प्रेम कुमार धूमल दूसरी बार। कर्नाटक में येदुरप्पा दूसरी बार। उत्तराखंड में निशंक पहली बार। तो पंजाब-बिहार में सरकार के नेता भी बेहद अनुभवी। अब जरा देखो, इन लोगों को सत्ता-संगठन में तालमेल का पाठ कौन पढ़ाएंगे। महासचिव धर्मेंद्र प्रधान, उड़ीसा से खुद तो चुनाव हारे ही, अब पार्टी भी ढूंढे नहीं मिल रही। हर्षवर्धन, दिल्ली बीजेपी का बंटाधार उनके अध्यक्ष रहते हुआ। संघ के नुमाइंदे के तौर पर रामलाल होंगे, जो अब तक संजय जोशी जैसा करिश्मा नहीं दिखा पाए। गोपीनाथ मुंडे, जिन ने जातीय जनगणना पर पार्टी में पेच फंसाया। मुंबई में एक जिला अध्यक्ष को लेकर नितिन गडकरी से जंग छेड़ी। बीजेपी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। आखिर तब महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष गडकरी को हार माननी पड़ी थी। बी.सी. खंडूरी, जिन ने सीएम पद से हटाए जाने को लेकर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था। तो क्या अब मोदी, चौहान, रमन, येदुरप्पा, धूमल, निशंक जैसे जनरलों को हारे हुए सिपाहियों से 'सुशासन' और 'तालमेल' का पाठ पढऩा होगा? वैसे भी 2009 में बीजेपी में जो हारा, वही सिकंदर बना। सो 2010 में यह कुछ नया नहीं।
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31/05/2010
Monday, May 31, 2010
Friday, May 28, 2010
नक्सली बढ़ते जा रहे, सरकार भाग रही!
क्या नक्सलवाद पर सख्ती के लिए भी किसी 26/11 का इंतजार? आतंकवाद पर ईमानदार राजनीतिक एकता तो सिर्फ तभी दिखी थी। आनन-फानन में सरकार पोटा के रद्द कुछ प्रावधान यूएपीए कानून में वापस लाई। समूचे खुफिया तंत्र की सर्जरी हुई। एनआईए-मैक बना, अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हुई। सो पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट को छोड़ डेढ़ साल में कोई अन्य आतंकी वारदात नहीं हुई। पर 26/11 से पहले ऐसा कौन सा आतंकी हमला नहीं, जिस पर 24 घंटे के भीतर वोट बैंक की राजनीति न शुरू हुई हो। मनमोहन सरकार के 22 जुलाई के विश्वास मत के बाद जब बेंगलुरु-अहमदाबाद में 25-26 जुलाई 2008 को सीरियल बम धमाके हुए। तो याद है, बीजेपी की वरिष्ठ नेत्री सुषमा स्वराज ने क्या कहा था। उन ने खम ठोककर भाजपा शासित दोनों राज्यों में हुए धमाकों के पीछे मनमोहन सरकार का हाथ बता दिया था। फिर कूटनीति के हिसाब से सुषमा का बयान कटघरे में खड़ा हुआ। तो बीजेपी ने निजी राय बता पल्ला झाड़ लिया था। आतंकवाद पर सियासत के उदाहरण तो कई, पर यह उदाहरण वोट बैंक की सियासत की इंतिहा थी। आतंकवाद पर पहले तो ऐसी ओछी सियासत न हुई होगी, पर भविष्य का पता नहीं। राजनीति का स्तर तो ग्राउंड वाटर जैसा हो गया, जिसका स्तर लगातार घटता ही जा रहा। सो गिरी हुई राजनीति से नक्सलवाद से निपटने की क्या उम्मीद? नक्सली अब आए दिन हमला कर रहे। छह अप्रैल को दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवान मार गिराए। फिर बस में विस्फोट कर आम मुसाफिर समेत 31 लोग मार गिराए। बीच में कई छिटपुट वारदातों को अंजाम दिया। अब शुक्रवार को शुरू हुए डेढ़ घंटे ही बीते थे, पश्चिमी मिदनापुर के झारग्राम में रेल पटरी को निशाना बनाया। विस्फोट कर रेल की पटरी उड़ा दी। सो हावड़ा-कुर्ला ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के 13 डिब्बे पटरी से उतर गए। तभी विपरीत दिशा से आ रही मालगाड़ी ने टक्कर मार दी। सो गरीब 70 लोग मारे गए, 200 से भी अधिक घायल हो गए। शुरूआती जांच में ही साफ हो गया, नक्सलवादियों का संगठन पीसीपीए जिम्मेदार। पीसीपीए ने मौके पर पोस्टर भी छोड़े, जिनमें जिम्मेदारी कबूली। पोस्टर में लिखा- हमने पहले मांग की थी कि जंगल महाल से संयुक्त सुरक्षा बलों को वापस बुलाया जाए और माकपा के अत्याचारों को खत्म किया जाए। लेकिन इन मांगों को पूरा नहीं किया गया। अब सुरक्षा बलों को फौरन वापस बुलाओ। यानी नक्सलियों का यह कोई आखिरी हमला नहीं। पुलिस उत्पीडऩ के खिलाफ नक्सली काला सप्ताह मना रहे। सो आगे क्या होगा, यह समझना मुश्किल नहीं। पीसीपीए ने ही पिछले साल 27 अक्टूबर को इसी झारग्राम में कंधार दोहराने की कोशिश की थी। जब भुवनेश्वर- नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को बंधक बना लिया। बदले में जेल में बंद नक्सली नेता छत्रधर महतो की रिहाई की शर्त रखी थी। पर तब गनीमत यह रही, मुसाफिरों को कंधार प्लेन हाईजैक जैसी परेशानी नहीं उठानी पड़ी थी। अलबत्ता नक्सलियों ने आम नागरिक की सहानुभूति हासिल करने के मकसद से मुसाफिरों को ढांढस बंधाया। पर अबके पीसीपीए की मंशा धरी रह गई। नक्सली अपने काला सप्ताह के प्रति सरकार का ध्यान खींचना चाह रहे थे। पर मालगाड़ी की टक्कर ने नक्सलियों को मुश्किल में डाल दिया। आखिर शुक्रवार को ट्रेन में मारे गए और घायल हुए मुसाफिरों के दोषी नक्सली ही। सो नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अब जनदबाव बढ़ेगा। सचमुच नक्सलियों ने आतंकवाद का रुख अपना लिया। अब तो लश्कर से संबंध की खुफिया रपट भी आने लगी। पर अपनी सरकार कब तक बहस में उलझी रहेगी? आखिर नक्सलवाद पर अब भी सख्ती नहीं होगी, तो कब होगी। सरकार और कांग्रेस में कब तक मल्ल युद्ध चलेगा। हर नक्सली हमले के बाद दिग्विजय सिंह का वही राग। पर दिग्विजय से सवाल, जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का पार्ट था, तब दिग्विजय पूरे दस साल सीएम रहे। तब विकास को आदिवासी इलाके तक क्यों नहीं पहुंचाया? तब दिग्विजय को चुनाव जीतने के लिए विकास जरूरी नहीं लगता था। अलबत्ता चुनाव के वक्त दलील दी थी, विकास से चुनाव जीते जाते, तो बिहार में लालू-राबड़ी राज न होता। पर क्या हुआ, सबको मालूम। नक्सलवाद पर चिदंबरम ने साहस दिखाया। पर सोनिया गांधी तक ने साथ नहीं दिया। सो चिदंबरम ने लाचारी जता दी। अब शुक्रवार को ताजा वारदात हुई। तो भी सरकार में जबर्दस्त ऊहापोह दिखा। ममता ने बम विस्फोट की बात कही। तो चिदंबरम-प्रणव ने इनकार किया। यानी अब भी सरकार में एक सुर नहीं। अपने मनमोहन तो राष्ट्रीय प्रेस कांफ्रेंस में बड़ी चतुराई से निकल गए। पर देश की व्यवस्था को बंदूक से लहूलुहान करने वालों से नरमी क्यों? शुक्रवार को तो भारत-पाक दोनों अपनों की बंदूक से लहूलुहान दिखे। अपने यहां नक्सलियों ने, तो लाहौर में पाक के पोसे आतंकियों ने मस्जिद में घुसकर आतंक मचाया। पर यहां बात सिर्फ अपनी। नक्सलवाद पर इतना सब कुछ हो रहा। पर अभी भी रुख स्पष्ट नहीं। सरकार, कांग्रेस और दिग्विजय जैसे बुद्धिजीवी भी ऊहापोह में। कोई ऐसा नेता नहीं दिख रहा, जो सीधी लाइन तय करे। अलबत्ता शुक्रवार की घटना के बाद रेलवे में नक्सली बैल्ट में रात को ट्रेन नहीं चलाने पर विचार हो रहा। यानी नक्सलियों के हौसले बढ़ते जा रहे और अपनी सरकार भाग रही। सोचो, अगर नक्सली दिल्ली आ गए, तो..। ---------
28/05/2010
28/05/2010
Wednesday, May 26, 2010
तो अकेला चना भी फोड़ सकता है भाड़
यों तो आईआईटी के नतीजे हर साल घोषित होते। लाखों छात्र-छात्राएं इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते। पर सफलता महज कुछ को मिल पाती। सो कुछ का मायूस होना और कुछ का खुश होना लाजिमी। पर सुपर-30 के सभी छात्र आईआईटी में अबके भी सफल रहे। लगातार तीसरी बार सुपर-30 के सभी छात्र सफल हुए। अब तक सुपर-30 संस्था से 212 छात्र आईआईटी में सफल हो चुके। पर सुपर-30 के पैदा होने से अब तक की कहानी जितनी दिलचस्प, अपनी व्यवस्था और समाज को उतना ही बड़ा तमाचा। सुपर-30 के संस्थापक आनंद ने 2002 में इसकी शुरुआत की। तो मकसद साफ रखा, सबसे गरीब और प्रतिभाशाली छात्र को मौका देंगे। सो तबसे अब तक आनंद का सफल सफर जारी। पर आनंद की जिजीविषा ही कहेंगे, जिन ने मौके से हार नहीं मानी। अलबत्ता अपनी हार से प्रेरणा लेकर गरीबी को चुनौती दी। प्रतिस्पर्धा के इस युग में कोचिंग संस्थान कुकुरमुत्ते की तरह हर रोज पैदा हो रहे। जहां इश्तिहारों, प्रचार की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर सपने खूब दिखाए जाते। कोचिंग संस्थान शिक्षा से अधिक व्यवसायीकरण पर फोकस करते। सो इन कोचिंगों में धनाढ्य घरों के बच्चे दाखिला लेते। गरीब घर का बच्चा दूर से ही इन कोचिंग संस्थानों के इश्तिहार देखता। अब आईआईटी के नतीजे आए, तो आप खुद देखना, कैसे कुछ संस्थान बड़े-बड़े इश्तिहार छपवाएंगे। कोई एक-दूसरे से खुद को कमतर नहीं बताएगा। अलबत्ता छात्रों के फोटो छाप क्रेडिट लेंगे। याद होगा, हरियाणा का एक छात्र नितिन एक साथ आईआईटी और मेडिकल में भी अव्वल आया। तो संस्थानों में नितिन को अपना बताने की होड़ मच गई। पर क्या सुपर-30 को कभी ऐसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनते देखा? आनंद जैसे लोग विरले ही मिलते। आनंद की कहानी वाकई प्रेरणादायी। गरीब परिवार के आनंद कुमार गणित में बेहद प्रतिभाशाली। शायद 1998 की बात होगी। आनंद की प्रतिभा को देख कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने मौका दिया। पर छात्रवृत्ति के बाद भी करीब 55 हजार रुपए का प्राथमिक शुल्क अदा करना जरूरी था। आनंद इतने गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे कि वह राशि भी नहीं जुटा सके। सो आनंद मौके से वंचित रह गए। पर आनंद ने हिम्मत नहीं हारी। जो खुद पर बीती, वह किसी और गरीब प्रतिभाशाली छात्र पर न बीते। सो उन ने ऐसी शुरुआत की, जिसकी उम्मीद आज के समाज और अपनी राजनीतिक व्यवस्था से नहीं की जा सकती। किसी भी क्रांति की शुरुआत की पहली शर्त समर्पण और खुद पर भरोसा होता है। पर अपनी व्यवस्था में इतना घुन लग चुका, समाज भी अछूता नहीं रहा। हर आदमी अब यही सोचता, मैं अकेला क्या करूंगा। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर आनंद जैसी शख्सियत ने बता दिया, गर आपमें गिरकर उठने का जज्बा हो। हार से सीखने का हुनर हो। मन में दृढ़ संकल्प हो। तो अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है। अगर आप ताजा हालात को ही देखो, तो देश में समस्याओं का अंबार। पर कहीं से कोई क्रांति होती नहीं दिख रही। महंगाई बढ़ी, तो दो-चार लोग चौक-चौराहे, बस-ट्रेनों में बैठकर सरकार के खिलाफ खीझ निकालेंगे। फिर गंतव्य पर उतर अपने-अपने काम में व्यस्त। सोचो, महात्मा गांधी ने भी ऐसा सोचा होता, तो क्या अपना देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो पाता? क्या आनंद कुमार ने कैंब्रिज का मौका चूकने के बाद हार मान ली होती। तो क्या सुपर-30 बनता? क्या अब तक आनंद के सहारे 212 गरीब परिवारों की किस्मत बदलती? आनंद गरीब प्रतिभाशाली छात्रों को चुनते। आईआईटी की तैयारी कराते और रहने-खाने का बंदोबस्त भी। इतना ही नहीं, सफल छात्रों के लिए शिक्षा ऋण की व्यवस्था का भी प्रयास करते। अब बुधवार को सुपर-30 के सभी छात्र सफल हुए। तो उसमें एक नालंदा का शुभम कुमार भी था। जिसका पिता एक गरीब किसान और मासिक आमदनी महज ढाई हजार रुपए। क्या यही है अपने देश की विकास दर? दिल्ली में जब-जब शीला दीक्षित ने कीमतें बढ़ाईं। दलील यही, लोगों की आमदनी बढ़ी। क्या वेतन आयोग लागू कर सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाना ही समूचे देश का पैमाना हो गया? असली विकास की तस्वीर तो शुभम जैसे गरीब बच्चे के परिवार से दिखती। पर वहां तक पहुंचेगा कौन? बिहार, जिसका नाम आते ही देश के बाकी राज्यों के लोग नाक-भौं सिकोड़ते। पर उसी बिहार में आनंद कुमार ने ऐसा कर दिखाया। अब तक 23 डॉक्यूमेंट्री फिल्म बन चुकीं। डिस्कवरी ने एक घंटे की विशेष फिल्म बनाई। विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम मैगजीन ने सुपर-30 को बेस्ट ऑफ एशिया में स्थान दिया। अब सुपर-30 ने सौ फीसदी सफलता ही हैट्रिक लगाई। तो अब संस्थान को सुपर-60 बनाने की तैयारी। सचमुच बिहार एक अनौखा राज्य है। जहां जातीय दंभ भरने वाले लोग, वहां गुणवत्ता भी भरपूर। अपराध की बात हो, तो भी बिहार। कभी परीक्षा में चोरी का किस्सा हो, तो भी बिहार का नाम आता। कभी जेपी को आंदोलन करना हो, तो भी सबसे पहले बिहार उठता। अशोक के जमाने से ही चमत्कारी राज्य रहा बिहार। जहां सबको प्रश्रय मिलता। पर बात आनंद और सुपर-30 की। भले आनंद आईआईटी के क्षेत्र में गरीबों को मौका दे रहे। पर आनंद का जीवन समाज और व्यवस्था के लिए अनुकरणीय। शिक्षा हो या विकास की कोई और पहल। सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होता।
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26/05/2010
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26/05/2010
Tuesday, May 25, 2010
तो क्या ऐसे बहाल होगा भारत-पाक में विश्वास?
मंगलवार फैसलों का दिन रहा। एक फैसला अपनी अदालत से, जहां एसपीएस राठौड़ को हवालात जाना पड़ा। दूसरा फैसला पाक से आया, जहां हाफिज सईद छूट गया। पर राठौड़ का केस अभी बंद नहीं। सो बात पाक की। पाक के लिए यह कहावत मौजूं- जाको राखे आईएसआई, बाल न बांका होय। आखिर वही हुआ, जिसका अंदेशा था। पाक के नापाक इरादे तब फिर जगजाहिर हो गए। जब पाकिस्तान में बैठा कसाब का आका बाइज्जत बरी हो गया। पाक सुप्रीम कोर्ट ने भी हाफिज सईद को मुजरिम मानने से इनकार कर दिया। मुंबई हमले के बाद भारत ने भृकुटि तानी। अपना ताजा जख्म दुनिया को दिखाया। तो दबाव में पाक ने कार्रवाई की खूब नौटंकी की। अव्वल पहले तो कसाब को पाकिस्तानी मानने से इनकार कर दिया। पर नवाज शरीफ ने फरीदकोट जाकर अपनी ही हुकूमत का नकाब उतारा। तो कसाब को अपना मान लिया। पर कार्रवाई का वही पुराना रवैया अख्तियार किया। जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद को दिसंबर 2008 में नजरबंद कर दिया। फिर भारत ने डोजियर सौंपे। तो मामला अदालत तक पहुंचा। पर पाक जुडिशियरी की फुर्ती देखिए। अपने यहां कसाब के खिलाफ तमाम पुख्ता सबूत और स्पेशल कोर्ट के गठन के बावजूद 17 महीने का वक्त लगा। पर हाफिज सईद को बरी करने में लाहौर हाईकोर्ट ने महज छह महीने भी नहीं लगाए। हाफिज 12 दिसंबर को नजरबंद हुआ। हाईकोर्ट ने दो जून 2009 को रिहाई का आदेश सुना दिया। भारत के दिए डोजियर को नाकाफी माना। वैसे भी जब पाक हुक्मरान ही डोजियर को डायजेस्ट कर गए और डकार तक नहीं ली। तो वहां की जुडिशियरी से कैसी उम्मीद? पर पाक ने नौटंकी यहीं खत्म नहीं की। पंजाब प्रांत की सरकार और केंद्र ने लाहौर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने लाहौर हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी। यानी हाफिज सईद अब खुला घूमेगा। पाक की जुडिशियरी पर कौन भरोसा करेगा। पाक जबसे पैदा हुआ, कभी लोकतंत्र दिखा ही नहीं। हर दो-चार साल में नया तानाशाह पैदा हो जाता। अगर कोई चुनी हुई सरकार हुई भी, तो आईएसआई की नकेल कसी रही। चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी बनाम परवेज मुशर्रफ की लड़ाई पाक जुडिशियरी की कहानी बयां कर चुकी। अगर पाक की अदालतें वाकई निष्पक्ष, तो अब तक भारत में आतंकवाद फैलाने वाले किसी भी व्यक्ति को सजा क्यों नहीं हुई? यानी जैसा पाक हुक्मरान, वैसी ही समूची व्यवस्था। संसद पर हमले के बाद जैश-ए-मोहम्मद के मौलाना मसूद अजहर को भी पाक ने ऐसे ही नजरबंद किया था। पर वही हुआ, जो हाफिज सईद के मामले में मंगलवार को। क्या पाक हुक्मरानों को मालूम नहीं, जैश-ए-मोहम्मद हो या लश्कर या फिर जमात-उद-दावा। ये संगठन संयुक्त राष्ट्र की सूची में आतंकवादी संगठन। अंतर्राष्ट्रीय बैन लगा हुआ। फिर भी पाकिस्तान में सभी संगठन फल-फूल रहे। संगठन के नाम पर बैन लगता, तो फौरन नाम बदल लेते, काम जारी रहता। सो पाक से 26/11 के दोषियों पर कार्रवाई की उम्मीद ही बेमानी। पर अपनी सरकार को क्या हो गया। मुंबई हमले के बाद लकीर खींच दी, पाक दोषियों पर कार्रवाई करे, फिर बात होगी। आतंकवाद और शांति वार्ता को साथ न चलाने का एलान किया। पर मिस्र के शर्म अल शेख में मनमोहन-गिलानी की ऐसी गलबहियां हुईं। भावविभोर मनमोहन ने बलूचिस्तान की घंटी भी गले बांध ली। फिर भारत की ओर से पाक को बातचीत का न्योता गया। तो याद है ना, कैसे पाक विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कुरैशी ने भारत को घुटना टेकू बताया। फिर भी भारत ने वार्ता की। विदेश सचिव स्तर की बात हुई, पिछले महीने दोनों विदेश मंत्रियों ने फोन पर बात की। अब जून में चिदंबरम जाएंगे, तो 16 जुलाई को एस.एम. कृष्णा। यानी मुंबई हमले के बाद से अब तक पाकिस्तान की कार्रवाई का स्तर भले घटता रहा। पर अपने उदार मनमोहन वार्ता का स्तर बढ़ाते रहे। अब उन ने पाकिस्तान से सभी मसलों पर बातचीत के रास्ते खोल दिए। सोमवार को नेशनल प्रेस कांफ्रेंस में मनमोहन ने एलान किया- भारत और पाक के बीच रिश्तों की बहाली में विश्वास की कमी। सो थिंपू में मैंने और गिलानी ने यही महसूस किया, पहले आपस में भरोसे का माहौल बनाया जाए। मंगलवार को हाफिज सईद पर जो फैसला आया, क्या वह विश्वास बढ़ाने वाला? अब मनमोहन बताएं, ऐसे कैसे होगी विश्वास बहाली? आखिर कब तक अमेरिकी दबाव में पाक को छूट मिलती रहेगी? क्या अमेरिका में होने वाली आतंकी घटनाएं ही सिर्फ आतंकवाद? टाइम्स स्क्वायर में कार बम मिला। तो एफबीआई फैजल के पाकिस्तानी घर तक पहुंच गई। हिलेरी क्लिंटन का बयान आ गया- पाक से तार जुड़े मिले, तो पाक को कीमत चुकानी पड़ेगी। पर भारत तो दशकों से पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार। फिर भी क्या कीमत चुकाई पाक ने? जुर्म का इकबाल तो दूर, अमेरिकी शह से हमेशा उछलता रहा। अब हाफिज सईद पर फैसला आया, तो अपने विदेश मंत्रालय ने खानापूर्ति जरूर की। विदेश सचिव निरुपमा राव बोलीं- पाक ने आश्वासन दिया है, वह अपनी जमीन का उपयोग आतंकी गतिविधि के लिए नहीं होने देगा। इसलिए भारत उम्मीद करता है कि पाक हाफिज के खिलाफ सार्थक कदम उठाएगा। आखिर कब तक पाक पर भरोसा करेगा भारत। वाजपेयी बस लेकर लाहौर गए। तो नवाज शरीफ के बनाए सेनापति परवेज मुशर्रफ ने कारगिल कराया। पाक के खुंखार आतंकवादी तिहाड़ में बंद थे। तो कंधार हुआ। फिर संसद पर हमला।
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25/05/2010
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25/05/2010
Monday, May 24, 2010
बोले तो बहुत, पर कहा क्या?
बोले तो बहुत, पर कहा क्या? सातवें साल में पहुंचे पीएम मनमोहन सिंह ने सभी मसलों को छुआ। पर पीएम की बात करें, पहले जरा जिम्मेदार विपक्ष की जिम्मेदारी देखिए। आखिरकार सत्ताईसवें दिन बीजेपी ने शिबू से समर्थन खींच लिया। सो पहली मई को यहीं पर लिखी कहावत याद दिलाते जाएं। लिखा था- भानुमती ने खसम किया, बुरा किया। करके छोड़ा, उससे बुरा किया। छोडक़र फिर पकड़ा, ये तो कमाल ही किया। पर बीजेपी तो उस कहावत को भी पीछे छोड़ गई। अबके फिर साथ छोड़ा, पर गवर्नर ने शिबू को सात दिन का वक्त दिया। सो बीजेपी के चरित्र का अब क्या पता। कहीं कर्नाटक दोहराने की कोशिश न करे। यों अरुण जेतली ने अंग्रेजी में सीधे-सीधे कहा- इनफ इज इनफ। अब जेतली कह रहे- झारखंड का फैसला सामूहिक था। राजनीति में वैसे भी पहले दिन हार नहीं मानते। यानी जेतली की मानें, तो बीजेपी ने सत्ताईसवें दिन हार मानी। पर बीजेपी के इस नए चरित्र का रचयिता कौन? जब आडवाणी, जेतली, सुषमा, जोशी, यशवंत जैसे दिग्गज शिबू संग रास रचाने के खिलाफ थे। तो क्या संघ, राजनाथ और गडकरी ने बेड़ा गर्क कराया? गडकरी तो बीजेपी की राजनीति का सारा फार्मूला छोड़ सात समंदर पार बायोडीजल का फार्मूला समझ रहे। अब कोई पूछे, सत्ताईस दिन तक झारखंड को झूला झुलाने का जिम्मेदार कौन? अब झारखंड के लिए भी बीजेपी कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही। तो इसे क्या कहेंगे आप? पर कहते हैं- त्रिया चरित्रम, मनुष्यस्य भाग्यम दैवम न जानम। राजनीति का चरित्र कब, क्या होगा, किसी को नहीं मालूम। तभी तो बीजेपी ने अपना देखा नहीं, सोमवार को जंतर मंतर पर काला दिवस मनाने बैठ गई। मनमोहन यूपीए-टू का एक साल पूरा होने पर देश-विदेश की मीडिया से रू-ब-रू थे। तो बीजेपी मातम मना रही थी। अब यह मातम झारखंड का था, या वाकई विपक्ष की जिम्मेदारी। यह बीजेपी ही जाने, पर मनमोहन भी कम नहीं। भले देश में महंगाई कम होने का नाम न ले। पर मनमोहन राजनीति के माहिर खिलाड़ी हो चुके। सो सोमवार को 75 मिनट तक सवालों की बौछार हुईं। पर किसी समस्या को लेकर स्थिति साफ नहीं। यों पीएम ने महंगाई, विदेश नीति, आतंकवाद, नक्सलवाद, जातीय जनगणना, सरकार के काम को नंबर, मंत्रियों का बड़बोलापन, भ्रष्टाचार, तेलंगाना, केबिनेट में राहुल, रिटायरमेंट, कट मोशन, सीबीआई का दुरुपयोग, माया-मुलायम से डील, अफजल की फांसी, सोनिया से मतभेद, एनएसी का गठन, पानी पर राज्यों की लड़ाई, अमेरिकी एजंडे पर चलना, केंद्रीय योजनाओं में राज्यों की मनमर्जी, निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसे दो दर्जन मुद्दे छुए। पर सिवा गांधी परिवार से जुड़े सवालों के, मनमोहन का जवाब देश को दिशा देने वाला नहीं। अब जवाब की बानगी देखिए। महंगाई दिसंबर तक काबू में लाने का एलान। जनता की तकलीफ भी बयां की। पर देश के पीएम ने उम्मीद जताई, दिसंबर तक महंगाई की दर पांच-छह फीसदी तक ले जा पाएंगे। यों अर्थशास्त्र में दर का कम होना और महंगाई का कम होना, दोनों में अंतर। वैसे भी महंगाई को लेकर यह कोई नई टिप्पणी नहीं। पिछले पांच साल में पीएम-मंत्री-योजना आयोग कई बार कह चुके। पर पीएम की चालाकी देखिए। सवाल में यह भी था- आपसे पहले के पीएम के दौर में जब मंत्री बयान देता था, तो अगले दिन महंगाई कम होती थी। पर अब जब-जब मंत्री बयान देते, महंगाई बढ़ जाती, ऐसा क्यों? आखिर वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी। पीएम सवाल को ही गोल कर गए। आतंकवाद पर भी वही जवाब, कार्रवाई होनी चाहिए। नक्सलवाद पर केंद्र राज्य मिलकर काम करेंगे। भ्रष्टाचार पर दलील, मंत्री ए. राजा से बात हो चुकी। भ्रष्टाचार की कोई शिकायत मिलेगी, तो कार्रवाई करेंगे। क्या पीएम को भ्रष्टाचार के बारे में मालूम नहीं? सीबीआई के दुरुपयोग का सवाल हुआ। तो जवाब- हम दखल नहीं देते। माया-मुलायम से डील की बात। तो कहा- आप गलतफहमी के शिकार। जातीय जनगणना पर बात। तो जवाब- केबिनेट में अभी चर्चा जारी। विदेश नीति पर पाक के लिए सारे दरवाजे खोल दिए। तेलंगाना पर कमेटी रपट का इंतजार। नदी जल बंटवारा आने वाले समय में गंभीर मसला बनेगा। पर जिन मुद्दों का सीधा जवाब आया, उन्हें भी देखिए। मंत्रियों को नसीहत, केबिनेट मीटिंग में अपनी बात रखें, सार्वजनिक मंच पर नहीं। मंत्रियों की बला भी मनमोहन ने अपने सिर ले ली। कह दिया- दंतेवाड़ा हो या मंगलोर, बतौर पीएम संसद और देश के प्रति मेरी जवाबदेही। यानी अब कोई भी घटना हो, मंत्री को नैतिकता ओढऩे की जरूरत नहीं। फिर सवाल- सोनिया से मतभेद पर। तो पीएम ने कहा- रंच मात्र भी मतभेद नहीं। न ही एनएसी सुपर केबिनेट, अलबत्ता सलाह देने वाली संस्था। राहुल को केबिनेट में लाने की बात, तो पीएम कई बार चर्चा कर चुके। फिर सवाल राहुल के लिए गद्दी छोडऩे का हुआ। तो मनमोहन बेहिचक बोले- कांग्रेस तय करे, तो राहुल क्या, किसी के लिए भी कुर्सी छोड़ दूंगा। पर लगे हाथ रिटायरमेंट से इनकार। कहा- मेरा काम अभी अधूरा। कहीं ऐसा तो नहीं, गांधी परिवार की विरासत को लौटाना ही मनमोहन की बड़ी जिम्मेदारी? पीएम-राहुल भले पार्टी और सरकार में लोकतंत्र की बात करें। पर जैसा विशेषाधिकार राहुल का, क्या किसी और कांग्रेसी को मिल सकता? कांग्रेस में महासचिव तो दस। पर सिर्फ राहुल ही ऐसे, जो जब चाहें, केबिनेट में आ-जा सकते। सो पीएम की नेशनल प्रेस कांफ्रेंस का मकसद साफ।
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24/05/2010
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24/05/2010
Saturday, May 22, 2010
'हादसे' से हादसे तक का सफर....
जब 2009 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आए, तो खुद कांग्रेस भी भौंचक रह गई थी। भाजपा का भौंचक होना तो लाजिमी ही था, क्योंकि नतीजों से पहले पार्टी ने सपनों का बुर्ज खलीफा तैयार कर लिया था। तब दोनों पक्षों में चुस्की लेने वाले नेताओं ने यह कहते हुए मजाक उड़ाया, हादसा हो गया। सचमुच महंगाई, महामंदी, बेरोजगारी जैसी विकट समस्या के बावजूद मनमोहन सरकार की सत्ता में वापसी हो गई, तो भले हादसा नहीं, पर हैरानी पैदा जरूर कर गई। महंगाई तब ऐसे आगे बढ़ी, जैसे सुनामी की लहर हो। भले सुनामी की लहर बाद में कमजोर पड़ जाती, पर महंगाई कमजोर नहीं, अलबत्ता महंगाई कंट्रोल करने की बात करने वाले पस्त होकर बैठ गए। मंदी से भारत उबरा जरूर, पर आम आदमी का रस निचोड़ गया। बेरोजगारी इस कदर बढऩे लगी थी, लोगों के वेतन में बढ़ोतरी तो दूर, नौकरियां छिनने लगी थीं। तब खुद प्रणव मुखर्जी ने नियोक्ताओं को फार्मूला दिया था, नौकरी मत छीनो, भले वेतन घटा दो। यानी विपक्ष की अंदरूनी लड़ाई से इतर ऐसा कोई भी फैक्टर नहीं, जो तब सरकार के पक्ष में था। फिर भी मनमोहन सत्ता में लौटे, तो कहने वालों ने हादसे की संज्ञा दे दी। लेकिन शनिवार को मनमोहन सरकार की दूसरी पारी का पहला साल पूरा हुआ, जश्न की तैयारी थी, तभी विमान हादसे ने रंग फीका कर दिया। हादसे से सरकार का पहला साल पूरा हुआ, हादसे की छाया में ही दूसरे साल की शुरुआत। लेकिन क्या आज के हादसे के बाद भी सरकार की तंद्रा टूटेगी? नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने 15 मई को जब मंगलोर हवाई अड्डे के इस रन-वे का उद्घाटन किया था, तो खुद से आगे बढक़र माना था, अभी रन-वे की लंबाई अंतर्राष्ट्रीय मानकों के मुताबिक नहीं, सो अंतर्राष्ट्रीय विमानों के उड़ान भरने और उतरने के हिसाब से तैयार करने के लिए एक हजार फीट लंबाई बढ़ानी होगी, जिसके लिए वह सौ करोड़ की योजना मंजूर कर रहे हैं। अब हफ्ते भर बाद ही हादसा हो गया, तो सवाल, क्या रन-वे में सुधार के लिए इस हादसे का इंतजार था? दुर्घटना में किसकी गलती, यह तो जांच की बात, लेकिन क्या आज का हादसा हम, आप और हमारी सरकार को कल भी याद रहेगा? या फिर राजनीति का एडहॉकपन ही चलता रहेगा। अपनी व्यवस्था ने हमेशा पानी सिर से निकलने के बाद ही तो कदम उठाया है। महंगाई बढ़ी, तो फिक्र की, रोजगार न मिलने से युवा राह भटक गए, तो अब उन्हें वापस लाने के लिए जड़ों तक जाने की फिक्र। चुनाव हो, तो कर्ज माफी की फिक्र, वरना किसान आत्महत्या करता रहे, आम आदमी पिसता रहे, कोई फिक्र नहीं करता। अब मंगलोर विमान हादसे की जांच को कोई दिशा भी नहीं मिली कि मानवीय भूल की बात तेजी पकडऩे लगी। यानी पायलट पर दोष मढऩे की तैयारी, जो अपनी सफाई देने के लिए जिंदा होकर नहीं लौट सकता। लेकिन सवाल, जब हफ्ते भर पहले मंत्री ने रन-वे को अंतर्राष्ट्रीय मानक के मुताबिक नहीं माना, तो मंत्री-सीएम और समूचा अमला फीता काटने क्यों पहुंच गया? लेकिन हादसे पर सियासत भले आज नहीं, कल शुरू जरूर होगी। नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल नपे-तुले अंदाज में नैतिक जिम्मेदारी ओढ़ेंगे, इस्तीफे की वही परंपरा निभाएंगे, जो चिदंबरम-जयराम रमेश ने निभाई। लेकिन आखिर में वही होगा, जो अपनी व्यवस्था की लकीर। आज और कल हादसे की बात होगी, फिर जांच के बहाने फाइल बंद और अगले हादसे का इंतजार। यानी महंगाई से त्रस्त जनता के लिए मौजूदा सरकार की वापसी शायद किसी हादसे से कम नहीं। सो हादसे से शुरू, हादसे से पहले साल का अंत, अब अगले हादसे का इंतजार।
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22/05/2010
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22/05/2010
Friday, May 21, 2010
तो मजबूत होकर और भी मजबूर हुए मनमोहन
शनिवार को यूपीए की दूसरी पारी की पहली सालगिरह। सो सरकारी खेमा सजधज कर तैयार हो गया। पीएम के घर भोज की तैयारी। फिर सोमवार को उपलब्धियों के पिटारे के साथ मनमोहन मीडिया से रू-ब-रू होंगे। यानी पहले पेट, फिर जनता से भेंट। पर समूची कांग्रेस हफ्ते भर से फील गुड कर रही। उपलब्धियां ऐसे गिना रही, जैसे दिलीप कुमार सूट-बूट पहन कर साला मैं तो साहब बन गया.. .. गीत गुनगुना रहे। अब ऐसा नहीं कि कांग्रेस या सरकार को हकीकत मालूम न हो। जनता महंगाई से कितनी त्रस्त, किसान-गरीब की हालत कैसी, यह जगजाहिर। पर कांग्रेस अपनी नाकामी कैसे स्वीकारे। राजनीति में इतनी ईमानदारी होने लगे, तो राजनीति काजनीति हो जाए। पर यहां तो राजनीति का मतलब जनता के लिए काम से नहीं, जनता पर राज करना हो चुका। अब आप यूपीए का पिछला पांच साल छोड़ दो। सिर्फ दूसरी पारी के पहले साल का ही हिसाब-किताब देखिए। कांग्रेस ने जनता से जुड़े गंभीर से गंभीर मुद्दों पर मैदान छोडऩे की रणनीति अपनाई। विपक्ष जब-जब एकजुट हुआ, कांग्रेस ने एकता को तार-तार करने की शतरंजी चाल चल दी। महंगाई पर संसद से सडक़ तक आवाज बुलंद हुई। तो कांग्रेस ने महिला बिल का लंगड़ा घोड़ा दौड़ा दिया। अब साल पूरा हुआ, देश को हिसाब-किताब देने का वक्त। तो कहीं महंगाई, आंतरिक सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे जश्न पर हावी न हो जाएं। सो बहस छेडऩे वाले बुद्धिजीवियों को नक्सलवाद की बहस में उलझा दिया। नक्सली हमले बढ़े, नक्सलवाद पर चिदंबरम के सख्त कदम उठे। तो कांग्रेस ने चिदंबरम की ही टांग खींच दी। नक्सलवाद पर ऐसी बहस छेड़ दी, जिसका ओर न छोर। भले नक्सली अपनी हिंसक वारदात को लगातार अंजाम दे रहे। पर गिनाने के लिए कांग्रेस के पास क्या उपलब्धि, जरा देखिए। यूनिक आई-डी कार्ड बन रहा। नरेगा का बजट बढ़ा दिया। फूड सिक्यूरिटी बिल आ रहा। नेशनल हैल्थ बिल आएगा। शिक्षा के हक को मौलिक अधिकार बनाया। महिला बिल राज्यसभा से पारित कराया। कांग्रेस की नजर में यही जनकल्याण के मुद्दे। पर असलियत तो यही, पहली पारी के मुकाबले मनमोहन की दूसरी पारी कहीं अधिक दुश्वार। महज साल भर में सरकार असहमति के भंवर में घूमती दिखी। शर्म अल शेख में विदेश नीति का चौथा हुआ। तो देश में आकर मंत्रियों-नौकरशाहों ने तेरहवीं कर दी। पहली बार बलूचिस्तान का जिक्र पाक के साथ साझा बयान में आया। मुंबई हमले के बाद अपना स्टैंड साफ था। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं करेगा, बात नहीं होगी। पर कूटनीति का चालीसा तो तब हो गया, जब भारत ने खुद आगे बढक़र बातचीत की पहल की। तब पाक ने भारत को खुलेआम घुटना टेकू कहा। अमेरिकी दबाव में भारत ने वार्ता शुरू की। पर अमेरिका ने आतंकवादी डेविड हैडली से भारत को पूछताछ नहीं करने दी। सादगी को लेकर मनमोहन के दोनों विदेश मंत्रियों की संस्कृति तो सबने देखी। दस जनपथ से फटकार लगी, तब फाइव स्टार होटल छोड़ा। शशि थरूर ने तो साल भर में ही इतनी फजीहत कराई, आखिर सालगिरह से पहले ही बलि चढ़ गए। पर कांग्रेस का मतभेद यहीं खत्म नहीं हुआ। इसी साल मनमोहन के सिपहसालार केबिनेट मीटिंग में एक-दूसरे से खूब भिड़े। ममता ने महिला बिल से लेकर कटौती प्रस्ताव तक कांग्रेस को नचाया। अब पहले साल में ही दोनों के बीच दूरियां बढ़ गईं। स्पेक्ट्रम घोटाले में ए. राजा पर उंगली उठी। फिर भी मनमोहन नहीं हटा पाए। इसी साल मनमोहन और सोनिया के बीच भी दूरी दिखी। जब आरटीआई एक्ट में संशोधन को लेकर दोनों के बीच चिट्ठियों से बात हुई। मनमोहन ने खुद को दस जनपथ के साये से अलग दिखाने की कोशिश की। पर पहली पारी में लाभ के पद के विवाद की वजह से खत्म हुई राष्ट्रीय सलाहकार परिषद अबके बहाल हो गई। यों दूसरी पारी में कांग्रेस बेहद मजबूत होकर उभरी। जनता ने पिछली पारी में 145 सीटें दी थीं। तो अबके कांग्रेस के पास 207 सांसद हो गए। पर मजबूती के बाद भी सरकार मजबूर दिखी। कटौती प्रस्ताव ने मनमोहन सरकार की मजबूती की कलई खोल दी। आजाद भारत के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब बजट में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े। पहली बार विपक्ष गिलोटिन डिमांड पर कटौती प्रस्ताव लेकर आया। पर मजबूत कांग्रेस ने तिकड़म का सहारा लिया। लालू-मुलायम को लॉलीपाप दिया। तो मायावती को सीबीआई का सहारा। पर लालू-मुलायम के गैरहाजिर रहने और माया के 22 सांसदों के वोट के बाद भी मनमोहन को कुल 289 वोट मिले। अगर 22 सांसद निकाल दो, तो बचे 267 सांसद। लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 का। सो साल भर का जमा-खर्च यही, मजबूत होकर भी मजबूर सरकार। पर सिर्फ सत्ता पक्ष का ही हिसाब नहीं, विपक्ष का भी जरूरी। कांग्रेस की नीति भविष्य के हिसाब से बदल रही। युवा नेतृत्व तराशे जा रहे। पर बीजेपी का हाल किसी से छुपा नहीं। पुराने सिर-फुटव्वल छोड़ दो। तो झारखंड की कहानी बीजेपी की हालत बयां कर रही। नितिन गडकरी सिर्फ नाम के लिए गढ़ के रक्षक। खुद की जुबां पर नियंत्रण नहीं। किसी को कुत्ता कह रहे। पर जिसके लिए गडकरी ने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया। कुछ हिसाब उनका भी हो जाए। मुलायम-लालू अपने गिरगिटिया अंदाज की वजह से विश्वसनीयता खो रहे। तो लेफ्ट ले-देकर बंगाल का किला बचाने में जुटा।
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21/05/2010
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21/05/2010
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