Tuesday, July 27, 2010

सरकार बेईमान, तो विपक्ष भी ईमानदार नहीं

महंगाई संसद के लिए फिर डायन बन गई। जिसने जैसा ठाना, संसद के दोनों सदनों में वही किया। लालूवादी-मुलायमवादी वैल में घुसने में अबके भी अव्वल दिखे। नारा लगाया- रोको महंगाई, बांधो दाम, नहीं तो होगा चक्का जाम। पर कहीं वोटिंग की नौबत आई, सरकार ने सीबीआई दौड़ा दी। तो लालू-मुलायम का नारा पिछली बार की तरह फिर बदल जाएगा। याद है ना, जब प्रणव दा ने बजट में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ा दीं। तो लालू-मुलायम विपक्ष के साथ गलबहियां कर नारा लगा रहे थे- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बदलनी है। पर जब कटौती प्रस्ताव आया, तो लालू-मुलायम ने नारे में संशोधन कर दिया- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है। पर अभी शुरुआत, सो लालू-मुलायम ही नहीं, माया भी अपनी माया दिखा रहीं। आखिर दिखाएं भी क्यों ना, जब मरीज डाक्टर के पास आएगा, तो फीस देनी ही होगी। सो फिलहाल समूचा विपक्ष सुर मिला रहा। पर वोटिंग की नौबत आई, तो महंगाई इस राजनीतिक तिकड़ी के लिए सोलह दूनी आठ हो जाएगी। सो जुगाड़ तंत्र में महारत हासिल कर चुके मनमोहन को भी महंगाई की फिक्र नहीं। मंगलवार को आरबीआई ने रेपो और रिवर्स रेपो रेट में फिर बढ़ोतरी कर दी। ताकि मध्यम वर्ग पर कर्ज का बोझ बढ़ जाए और मार्केट में तरलता बनी रहे। पर ऐसे उपाय पिछले छह साल से करती आ रही सरकार। फिर भी महंगाई नहीं रुकी। अब महंगाई रोकना सरकार के बूते में नहीं। सो येन-केन-प्रकारेण महंगाई दर घटाने की कोशिश। मनमोहन दिसंबर तक महंगाई दर पर काबू पाने का भरोसा दिला रहे। तो प्रणव दा दो महीने में। पर मनमोहन राज के पिछले छह साल में इतने भरोसे दिलाए गए, अब तो भरोसा शब्द भी अपना भरोसा खो चुका। तभी तो मनमोहन सरकार वोटिंग वाले नियम के तहत बहस से कन्नी काट रही। पर सत्तापक्ष हो या विपक्ष, किसी ने हार नहीं मानी। अलबत्ता रार ठन गई। विपक्ष कामरोको प्रस्ताव के तहत ही बहस का खम ठोक रहा। तो सरकार ने भी गांठ बांध ली, भले संसद का कामकाज रुक जाए, पर कामरोको प्रस्ताव मंजूर नहीं। यानी सरकार की नीयत में खोट। अगर महंगाई सचमुच काबू में आने वाली होती, तो सरकार खम ठोककर बहस को राजी होती। पर हंगामे के बावजूद सरकार के तेवर देखिए। लोकसभा में हंगामे के बीच ही मुरली ने तान छेड़ी। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने बयान दिया, तो कीमत बढ़ोतरी को ईको-फ्रेंडली बताया। दलील दी- पेट्रोल महंगा होगा, तो लोग न गाडिय़ां चलाएंगे, न प्रदूषण होगा। अब इसे सरकार की हताशा नहीं, तो और क्या कहेंगे। मुरली यह भूल गए, कीमत बढ़ोतरी का असर सिर्फ कार वालों पर नहीं हुआ। अलबत्ता रोजमर्रा की सभी चीजें महंगी हो गईं। पर बेसुरी सरकार से किसी सुर की उम्मीद ही कहां। साल भर से अनाज सडऩे की रपट आ रही। पर शरद पवार को कभी नहीं दिखा। अब मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया। लाखों टन अनाज क्यों सड़ रहा? सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा। कहा- अनाज का एक भी दाना बरबाद नहीं होना चाहिए। इसे गरीबों में बांटा जाए। अगर विशेषज्ञों की मानें, तो देश में जितने टन अनाज सड़ रहा, उससे बीस करोड़ लोगों को साल भर का भोजन दिया जा सकता। पर पवार को क्रिकेट की फिक्र। मनमोहन को विकास दर की। सचमुच महंगाई की रफ्तार और पिछले छह साल में मनमोहन सरकार के बयान देखें। तो सरकार का नकारापन साफ दिखेगा। पर सरकार बेईमान, तो ईमानदार विपक्षी दल भी नहीं। महंगाई पर दो दिन का सांकेतिक हंगामा होगा। फिर किसी भी नियम के तहत बहस की खानापूर्ति होगी। पर महंगाई जहां है, उससे पीछे नहीं, आगे बढ़ेगी। अगर विपक्ष ईमानदारी से सरकार को घेरे, तो कोई मुरली देवड़ा ऐसी बेहूदी दलील देने की हिम्मत नहीं करेगा। पर बीजेपी धरना या अनशन कांची कामकोटि के शंकराचार्य की गिरफ्तारी पर करेगी। गोवा में राष्ट्रपति राज लगे, तो पणजी से जंतर-मंतर तक हिला दिया। पर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कैरोसिन-रसोई गैस के दाम में बढ़ोतरी पर वैसा आंदोलन क्यों नहीं करता? रैली करने या संसद में बहस की औपचारिकता से सरकार की हिटलरशाही बंद नहीं होगी। बात अधिक पुरानी नहीं, पर विपक्षी दलों के लिए नजीर। भले ममता बनर्जी फिलहाल यूपीए का हिस्सा। पर याद है ना, सिंगूर में किसानों की जमीन की खातिर 25 दिन तक आमरण अनशन किया। तो बंगाल से लेकर रायसिनी हिल तक हिल गया। तबके राष्ट्रपति कलाम ने खुद बुद्धदेव से दो बार बात की। आखिर वही हुआ, जो ममता ने चाहा। जब बंगाल जैसे वामपंथी गढ़ में छोटी सी पार्टी की नेता ममता इतना दम-खम दिखा सकतीं। तो राष्ट्रीय पार्टी बीजेपी क्यों नहीं? अगर आडवाणी-सुषमा-जेतली-गडकरी एलान कर दें। जब तक रसोई गैस और कैरोसिन की बढ़ी कीमतें वापस नहीं होतीं, धरने पर बैठे रहेंगे। सचमुच विपक्ष ऐसा ठान ले, तो सरकार की इतनी हिम्मत नहीं, जो कीमत वापस न ले। जनता भी ऐसे नेताओं को सिर-आंखों पर बिठाती। जैसे ममता को बंगाल में। पर जुझारूपन अब राजनीति की डिक्शनरी से हट गया। सो महंगाई पर जैसी सरकार, वैसा विपक्ष। कवि सुदामा पांडे धूमिल ने सही लिखा- संसद तेल की वह घानी है, जिसमें आधा तेल और आधा पानी है। और यदि यह सच नहीं, तो एक ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों? जिसने सत्य कहा, उसका बुरा हाल क्यों?
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27/07/2010

Monday, July 26, 2010

हर मुद्दे पर किचकिच, क्या यही है लोकतंत्र?

संवेदना और श्रद्धांजलि दे संसद के दोनों सदन उठ गए। सो सोमवार को संसद के गलियारे में ही जुबानी तीर चले। फिर मंगलवार की रणनीति बनी। सो महाभारत का असली शंखनाद सदन में होगा। विपक्षी एकता बरकरार रखने को बीजेपी ने गुजरात का मुद्दा पीछे धकेल महंगाई को प्राथमिकता दी। कामरोको का नोटिस दोनों सदनों में पहुंच गया। सो आसंदी के लिए भी चुनौती कम नहीं। पिछली दफा स्पीकर मीरा कुमार ने नियम की बारीकियां बता कामरोको ठुकरा दिया था। पर अबके विपक्ष ने नोटिस को तकनीकी बारीकियों से लैस कर दिया। दो सत्रों के बीच के अहम मुद्दे पर ही कामरोको प्रस्ताव लाया जा सकता। सो विपक्ष ने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी को नोटिस का आधार बनाया। पर सरकार और कांग्रेस भी खम ठोक चुकीं। बहस से एतराज नहीं, पर कामरोको या नियम 184 के तहत चर्चा मंजूर नहीं। महंगाई की नब्ज तो सरकार भांप चुकी। पर इलाज ढूंढे नहीं मिल रहा, सो वोटिंग करा खुद को खतरे में क्यों डाले। पर पक्ष हो या विपक्ष, महंगाई सिर्फ बहस का मुद्दा बनकर रह गई। यूपीए राज में शायद यह चौदहवीं बहस होगी। पर हर बहस भैंस के आगे बीन बजाने वाली ही साबित हुई। सो अबके भी कोई चमत्कार नहीं होगा। अलबत्ता दो-एक दिन हंगामा बरपेगा। फिर चैंबर मीटिंग में सारी सैटिंग हो जाएगी। पिछली दफा भी ऐसा ही हुआ था। आखिर में सरकार प्रश्नकाल स्थगन को राजी हो गई। विपक्ष कामरोको की जिद छोड़ गया। सो आप ही सोचो, इस दिखावे का क्या मतलब? सरकार तो हमेशा बहस से भागती। पर विपक्ष की यह जिम्मेदारी, सरकार को बहस में लाए। महंगाई हो या भोपाल त्रासदी या महिला बिल की बात। विपक्ष को चाहिए कि वह सरकार को गलती बताए। दुरुस्त करने के उपाय सुझाए। पर हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। सत्तापक्ष और विपक्ष की जुगलबंदी अब खूब होने लगी। वरना आप ही सोचो, आसंदी के कमरे में मीटिंगबाजी का क्या मतलब। सदन कोई कठपुतली या नाटक का मंच तो नहीं, जहां लिखित पटकथा का मंचन भर हो। आखिर ऐसा क्यों, जनता को दिखाने के लिए दोनों पक्ष सदन को स्थगित कराने तैयार हो जाते। फिर संसद से सडक़ तक कोई जिंदाबाद के नारे लगाता, तो कोई मुर्दाबाद के। अगर सचमुच संसद में ईमानदार बहस होने लगे। तो सरकार आम आदमी के साथ इतनी हिटलरशाही नहीं कर सकती, जितनी यूपीए सरकार कर रही। पर महंगाई का मुद्दा मंगलवार को सबसे पहले उठेगा। तो यह बीजेपी की रणनीतिक मजबूरी। असल में बीजेपी की तलवार सीबीआई के मुद्दे पर म्यान से निकली। महंगाई की रस्म अदायगी होते ही गुजरात का मुद्दा गूंजेगा। सो पीएम ने सोमवार को ही मोर्चा संभाल लिया। सीबीआई के बेजा इस्तेमाल के विपक्षी आरोप को बेतुका बताया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मॉनीटरिंग की दलील दी। यों सीबीआई सत्ताधारी दल की कठपुतली बन चुकी, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं। पर पीएम के बयान का मतलब साफ। अगर विपक्ष संसद ठप करने पर अड़ा, तो जनता में नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश होगी। पर बीजेपी भी गुजरात को लेकर समझौते के मूड में नहीं। सो अमित शाह की पैरवी के लिए राम जेठमलानी को मैदान में उतार दिया। या यों कहें, नरेंद्र मोदी ने जेठमलानी को जो गिफ्ट दिया। अब जेठमलानी रिटर्न गिफ्ट दे रहे। सो बीजेपी के एक बड़े नेता से सवाल हुआ, जेठमलानी की फीस कितनी और कौन देगा? तो जवाब आया, इकट्ठे छह साल की फीस चुका दी। यानी राजस्थान से राज्यसभा की मैंबरी के बदले जेठमलानी गुजरात में मोदी एंड कंपनी का बचाव करेंगे। पर सरकार की रणनीति अलग। कांग्रेस को मालूम, गुजरात ही एकमात्र ऐसा मुद्दा, जो विपक्ष की एकता में पलीता बन जाए। सो कांग्रेस और बीजेपी दोनों सीबीआई के मुद्दे पर हंगामाई रणनीति का इंतजार कर रहीं। यानी कम से कम पहला हफ्ता तो आप हंगामे की भेंट मानिए। महंगाई, सीबीआई, भोपाल त्रासदी, जाति जनगणना, हिंदू आतंकवाद जैसे मुद्दों पर दोनों तरफ से तीर चलेंगे। पर इसी सत्र में एक मुद्दा ऐसा भी होगा, जब संसद में भेड़चाल दिखेगी। सांसदों के वेतन-भत्ते बढऩे का बिल आएगा। तो ऐतिहासिक एकता सदन के रिकार्ड में दर्ज हो जाएगी। पर उन तीरों का क्या, जिनसे घायल हो रहा सिर्फ आम आदमी। आखिर संसद के सत्र का आम आदमी के लिए क्या महत्व? संसद में हर छोटे-बड़े मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष में तकरार हो जाती। आपस में ही किचकिच करते रहते। क्या यही है अपना लोकतंत्र? सोमवार को मानसून सत्र का आगाज हुआ। तो कारगिल विजय दिवस की ग्यारहवीं वर्षगांठ थी। पर कारगिल को लेकर भी राजनीतिक किचकिच खूब दिखी। एनडीए काल में कारगिल युद्ध हुआ। सो यूपीए उसे दिल से अपना मानने को तैयार नहीं। बीजेपी वाले भी किसी दूसरे को कॉपी राइट देने को राजी नहीं। सो सोमवार को रक्षा मंत्री एके एंटनी ने सुबह अमर जवान ज्योति जाकर श्रद्धांजलि की रस्म निभाई। तो बीजेपी ने शाम से लेकर रात तक शहीदों को याद किया। क्या अब शहादत में भी बीजेपी और कांग्रेस? क्या संसद अपनी प्रासंगिकता खोती नहीं जा रही? आखिर किसी को भी चिंता क्यों नहीं? संसद में नक्सलवाद पर भी चर्चा होगी। पर जिस तरह सत्तापक्ष और विपक्ष प्वाइंट स्कोर करने के लिए किचकिच वाली राजनीति करते। उससे नक्सलियों को क्या संदेश जाएगा? नक्सलवादी अपनी संसद को इन्हीं हरकतों की वजह से सूअरबाड़ा कहते। हर मुद्दे पर किचकिच, क्या यही है अपना लोकतंत्र?
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26/07/2010

Friday, July 23, 2010

अमित शाह नहीं, फिक्र मोदी की

मानसून सत्र से पहले तलवारें खिंच गईं। अगर विपक्ष के तरकश में भारत-पाक वार्ता, महंगाई, भोपाल गैस कांड, रेल दुर्घटना, घाटी की घटना, नक्सलवाद और सरकार में आपसी खींचतान वाले मुद्दों के तीर। तो सत्तापक्ष की झोली में हिंदू आतंकवाद, कर्नाटक में अवैध खनन, बिहार का बवंडर और अब बीजेपी को अलग-थलग करने का सबसे लजीज मुद्दा गुजरात आ गया। सो खलबलाई बीजेपी ने शुक्रवार को पीएम के घर का 'लजीज' खाना ठुकरा दिया। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में सीबीआई का शिकंजा नरेंद्र मोदी के दिल-अजीज मंत्री अमित शाह पर कसा। तो बीजेपी की बत्ती गुल हो गई। नरेंद्र मोदी की लिखी स्क्रिप्ट पर मंथन करने आडवाणी के घर बीजेपी की शीर्ष चौकड़ी बैठी। तो आर-पार का फैसला हो गया। बीजेपी के अरुण जेतली और सुषमा स्वराज ने मोर्चा संभाला। तो सीबीआई के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगाया। सुषमा बोलीं- विरोधियों के खिलाफ सीबीआई के दुरुपयोग का यह ताजा उदाहरण। सो ऐसे प्रदूषित वातावरण में हम चारों का पीएम के घर लंच पर जाना जंचेगा नहीं। पर सवाल, क्या एक आरोपी मंत्री का इतने बड़े स्तर से बचाव जंच रहा? सीबीआई ने गुजरात के गृह राज्यमंत्री को दो बार समन किया। पर अमित शाह क्यों नहीं पहुंचे? अब सीबीआई ने बाकायदा चार्जशीट दाखिल कर दी। पर बीजेपी ने अमित शाह का इस्तीफा नहीं कराया। जबकि लालू-शिबू-जेपी जैसों के खिलाफ बीजेपी ने चार्जशीट पेश होते ही इस्तीफे की मांग की थी। खुद बीजेपी ऐसी नजीर पेश कर चुकी। उमा भारती जब मध्य प्रदेश की सीएम थीं। पर हुबली तिरंगा केस में फंसीं, तो बीजेपी ने रातों-रात इस्तीफा कराया। तब बीजेपी ने इस मुद्दे को खूब भुनाया। पर अब बीजेपी के चाल, चरित्र, चेहरे को क्या हो गया? अगर अमित शाह निर्दोष, तो सीबीआई के सामने आने से कतरा क्यों रहे? शाह कई दिनों से लापता, पर बीजेपी को फिक्र नहीं। गुजरात में मंत्री माया कोडनानी भी पहले ऐसे ही फरार हुई थीं। पर बाद में जेल जाना पड़ा। अब उसी राह पर अमित शाह। अगर अमित शाह सचमुच बेदाग, तो अदालत में दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। पर बीजेपी के शीर्ष नेता जिस तरह बचाव में उतरे, उसका क्या मतलब? अगर बीजेपी के आरोप को सच मान लें, तो सवाल- सीबीआई का बेजा इस्तेमाल कौन नहीं करता। अगर सीबीआई सचमुच कांग्रेस सरकार के इशारे पर शाह को फंसा रही होगी। तो कोर्ट में सीबीआई की कलई खुल जाएगी। अगर सीबीआई पर भरोसा नहीं, तो कम से कम कोर्ट पर बीजेपी को ऐतबार होगा। बीजेपी के इस आरोप में कोई दो-राय नहीं, सरकार सीबीआई का बेजा इस्तेमाल कर रही। सचमुच सीबीआई कहने भर को ‘ऑटोनॉमस बाडी’। केंद्र में जिसकी भी सरकार बनी, सीबीआई को भोंपू बनाया। जब भी राजनीतिक मुसीबत आन पड़ी, यही भोंपू बजा दिया। तभी तो सीबीआई डायरेक्टर की तैनाती में वफादारी मापदंड बन चुका। सीनियरिटी अब कुछ भी नहीं। सरकार हमेशा ऐसा डायरेक्टर ढूंढती, जो इशारे पर काम करे। तभी तो अपने राजस्थान काडर के एम.एल. शर्मा डायरेक्टर नहीं बन पाए। सीनियरिटी और अनुभव में शर्मा का नंबर था। पर डायरेक्टर बनाए गए शर्मा से एक साल जूनियर अश्विनी कुमार। जूनियर के अंडर में काम करना शर्मा को गवारा न हुआ। सो लंबी छुट्टïी पर चले गए। पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल में कोई राजनीतिक दल पाक-साफ नहीं। यूपी में बीजेपी से माया का गठजोड़ टूटा। तो एनडीए राज में ताज कॉरीडोर केस बन गया। जो अभी भी माया के गले की फांस। राष्टï्रपति चुनाव के वक्त माया-सोनिया मिलीं। तो बात बन गई थी। पर जब माया की मांग बढऩे लगी। तो रिश्तों में दरार आ गई। माया ‘आउट’ हुईं, तो एटमी डील के लिए मुलायम ‘इन’ हो गए। सो जब विश्वास मत का संकट आया, तो कांग्रेस ने माया को सीबीआई का हौवा दिखाया था। फिर कटमोशन के वक्त हुई सौदेबाजी भी जगजाहिर। तभी तो दस फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को लताड़ पिलाई थी। जब एटमी डील की एवज में मनमोहन सरकार मुलायम को बचाने की कोशिश कर रही थी। सो कोर्ट ने सीधा सवाल पूछा था- ‘आप केंद्र सरकार के पास क्यों गए? मेरे पास क्यों नहीं आए? आप केंद्र सरकार और विधि मंत्रालय के इशारे पर काम कर रहे। अपनी मर्जी से नहीं। अब इसका (सीबीआई)भगवान ही मालिक।’ पर सीबीआई सुधरे भी कैसे। जब राजनीतिक आका गर्दन नापने को बैठे हुए। तभी तो कांग्रेस हो या बीजेपी, विपक्ष में रहते सीबीआई नहीं सुहाती। सो सचमुच सीबीआई का मतलब कांग्रेस-बीजेपी ऑफ इनवेस्टीगेशन होना चाहिए। अगर बीजेपी के अमित शाह पाक-साफ, तो भगोड़ा क्यों बने हुए? पर अब अमित शाह की गिरफ्तारी तय हो चुकी। सो बीजेपी की मुश्किल महज अमित शाह नहीं। अगर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सीधे मैदान में उतरा, तो अमित की खातिर नहीं। अलबत्ता एसआईटी के सामने नरेंद्र मोदी की पेशी के बाद अब सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में सीबीआई का अमित शाह तक पहुंचना सीधे मोदी को झुलसाएगा। गृह राज्यमंत्री अगर पूरे मामले में लिप्त, तो सवाल गुजरात की समूची संवैधानिक व्यवस्था पर। सो बीजेपी को अमित शाह की उतनी फिक्र नहीं, जितनी हिंदू हृदय सम्राट नरेंद्र मोदी की। आडवाणी-गडकरी-जेतली-सुषमा का मनमोहन के खिलाफ एलान-ए-जंग भविष्य की तैयारी। ताकि जब तक जांच की आंच मोदी तक पहुंचे, मामला पूरी तरह से राजनीति के रंग में रंग जाए।
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23/07/2010

Thursday, July 22, 2010

मुरली और अमेरिका की फिरकी से हारा भारत!

होम मिनिस्ट्री क्या कांग्रेस या सरकार की शान नहीं? चिदंबरम ने कछुआ चाल वाली मिनिस्ट्री को खरगोश बना दिया। फिर भी दिग्विजय सिंह हों या एसएम कृष्णा, ऐसे उपहास क्यों बना रहे। जैसे होम मिनिस्ट्री कोई मिनिस्ट्री नहीं, अलबत्ता समूचे गांव की भौजाई हो। यों दिग्विजय के बयान के बाद कांग्रेस ने अपने बड़बोले नेताओं की नकेल फिर कसी। पर मनमोहन राज में बयान बहादुरों की कमी नहीं। गुरुवार को होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने भी नाम लिए बिना चुनौती दे डाली। अगर उनसे बेहतर होम मिनिस्ट्री संभाल सकते, तो बन जाएं मंत्री। पर अब विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के निशाने से कैसे निपटेंगे चिदंबरम। भारत-पाक की 15 जुलाई की वार्ता नाकाम हुई। अगले दिन पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कैसे भारत और कृष्णा को पानी पी-पीकर कोसा, सबने देखा। अपने कृष्णा इस्लामाबाद से जैसे ही दिल्ली उतरे। तो कुरैशी के बयानों का जवाब दिया। होम सैक्रेट्री जीके पिल्लई के बयान की तुलना हाफिज सईद से किए जाने को गलत ठहराया। वार्ता की रात दोनों विदेश मंत्री जब साझा प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। तो कुरैशी ने कृष्णा की मौजूदगी में भारत के होम सैक्रेट्री के बयान की तुलना आतंकी हाफिज से की थी। पर कृष्णा ने तब चुप्पी साध ली। फिर दिल्ली हवाई अड्डे पर सफाई दी, वहीं जवाब देकर माहौल खराब नहीं करना चाहते थे। यानी कृष्णा ने पिल्लई के बयान को गैरवाजिब नहीं ठहराया। पर जैसे ही अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में काबुल गए। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से मुलाकात हुई। फिर कृष्णा तो कृष्णा, मनमोहन भी कुरैशी की भाषा बोलने लगे। अब कृष्णा भी विदेश मंत्री स्तर की बातचीत का जायका खराब करने का दोष होम सैक्रेट्री के सिर मढ़ रहे। तो मनमोहन सिंह ने भी पिल्लई को फटकार लगाई। पिल्लई के बयान को कृष्णा-मनमोहन वार्ता के माहौल को बिगाडऩे वाला मान रहे। कृष्णा ने तो यहां तक कह दिया- अगर वह होम सैक्रेट्री होते, तो डेविड हेडली के खुलासे पर बयान नहीं देते। अब कोई पूछे, डेविड हेडली से पूछताछ किसलिए की? क्या हेडली का खुलासा देश के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखना चाहती सरकार? क्या हेडली का बयान केबिनेट मीटिंग में होने वाली बहस जैसा, जिसका खुलासा नहीं किया जा सकता? आखिर अमेरिका या पाकिस्तान को खुलासे पर एतराज क्यों? क्या भारत की अवाम को सच्चाई जानने का हक नहीं? अमेरिका का क्या, 9/11 के बाद उसके घर में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। सो उसने आतंकी डेविड हेडली से समझौता कर लिया। पर भारत ने कई आतंकी हमले झेले। सो आतंक फैलाने वालों को बेनकाब करना भारत सरकार की जिम्मेदारी। क्या 26/11 के बाद अमेरिकी एफबीआई ने कसाब से पूछताछ नहीं की? अमेरिका के टाइम्स स्क्वायर में बिना फटा बम मिला। तो एफबीआई सीधे फैजल के पाकिस्तानी घर पहुंच गई। पर मुंबई के हमलावर पाकिस्तान में खुले आम घूम रहे। आईएसआई और हुक्मरान पूरी सरपरस्ती दे रहे। सो अपने होम सैक्रेट्री के बयान में कुछ गलत नहीं। ना ही गलत समय पर दिया गया बयान। अलबत्ता आतंकवाद के मुद्दे पर वार्ता को केंद्रित करने के लिए हेडली के खुलासे का सार्वजनिक होना जरूरी था। अगर पाकिस्तान ईमानदार होता, तो हेडली के खुलासे के मुताबिक जांच का भरोसा दिलाता। पर आईएसआई के खिलाफ आरोप कबूलने की हिम्मत पाकिस्तान के किसी भी हुक्मरान में नहीं। सो कुरैशी की बौखलाहट उनके हर बयान में दिख रही। अमेरिका भी अपना दोमुंहापन दिखा रहा। एक तरफ पाकिस्तान को धमकी, अगर अमेरिका में कोई आतंकी हमला हुआ, तो पाक को विनाशकारी परिणाम भुगतने होंगे। पर दूसरी तरफ भारत के मामले में पाकिस्तान को शह दे रहा। तभी तो कुरैशी ने वार्ता के बाद तेवर दिखाए, अगले दिन नरमी। अब फिर तेवर दिखाने लगे। पर मनमोहन सरकार और कृष्णा की यह कैसी कूटनीति? सचमुच अमेरिकी दबाव में कूटनीति की इंतिहा हो गई। अमेरिकी प्रवक्ता पीजे क्राउले ने हेडली के बयान के सार्वजनिक होने पर चिंता तक जता दी। आखिर कब तक अमेरिका के आगे दुम हिलाती रहेगी सरकार? क्या भारत का कोई अपना आत्म सम्मान नहीं? होम सैक्रेट्री पिल्लई ने कोई अपनी मर्जी से बयान नहीं दिया होगा। सरकार ने पूरी रणनीति बनाई होगी। पर अमेरिका ने झिडक़ी लगाई। तो सारा ठीकरा पिल्लई पर फोड़ दिया। याद है ना, कैसे अमेरिका ने अपनी जांच एजेंसी को बैरंग लौटाया था। हेडली से पूछताछ तो दूर, चेहरा तक नहीं देखने दिया था। पर भारत में मनमोहन को विपक्ष ने चौतरफा घेरा। तो मनमोहन ने ओबामा से बात की। पर नवंबर 2009 में एफबीआई के जरिए छनकर आए हेडली के बयान जब मीडिया में जारी हो गए। तो अमेरिका की नीति देखिए, भारत एजेंसी को हेडली से पूछताछ की रपट शेयर करने से भी इनकार कर दिया था। अब पूछताछ कर ली, तो अमेरिका ने शर्तों का पुलंदा थमा दिया। सो अब तय करना होगा, भारत की विदेश नीति अमेरिका बनाएगा या खुद भारत। याद है ना, शर्म अल शेख में मनमोहन पाक से बातचीत को राजी हुए। तो संसद में यह कहकर बचाव किया, आतंकवाद पर कार्रवाई के बिना सार्थक बातचीत संभव नहीं। पर पाक तो आतंक पर बातचीत ही नहीं करना चाहता। सो कृष्णा के बयान से तो यही लग रहा, जीती बाजी हार गया भारत। उधर श्रीलंका के गाले मैदान पर मुरली की फिरकी ने भारत की टीम को चित किया। तो कूटनीति में अमेरिका की फिरकी ने पाक के आगे भी भारत को झुका दिया। 'एसएमके' यानी शाह महमूद कुरैशी और एसएम कृष्णा की भाषा एक हो गई।
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22/07/2010

Wednesday, July 21, 2010

आखिर लोकतंत्र को कब मिलेगा न्याय?

विपक्ष को लोकतंत्र की शान कहा जाता। अगर किसी देश की जनता की आजादी के बारे में जानना हो। तो विपक्ष के अस्तित्व भर से ही अंदाजा लगाया जा सकता। अगर लोकतंत्र में विपक्ष न हो, तो सच में वह लोकतंत्र नहीं। विपक्ष में बैठने वाले दल की यह जिम्मेदारी होती, सत्ता के नशे में चूर नेताओं के होश ठिकाने लाए। पर जब विपक्ष ही जोश में होश खो दे, तो लोकतंत्र का रखवाला कौन? बिहार विधानसभा में मंगलवार को कुर्सी के हत्थे से उठा हाथ बुधवार को चप्पल तक पहुंच गया। विधानसभा में मंगलवार के आचरण पर 17 विधायकों के निलंबन का प्रस्ताव रखा ही जा रहा था। तभी एक लालूवादी ने स्पीकर उदय नारायण चौधरी के ऊपर चप्पल दे मारी। पर चप्पल भी कम चालाक नहीं, कभी नेताओं से बैर मोल नहीं लेती। नेताओं पर चप्पल-जूते देश ही नहीं दुनिया में भी बहुत चले। पर किसी चप्पल-जूते ने सीधे नेताजी को छूने का साहस नहीं किया। अलबत्ता जॉर्ज बुश हों या पी. चिदंबरम, आडवाणी हों या मनमोहन या फिर जूता तंत्र की शुरुआत करने वाला इराकी पत्रकार मुंतजर अल जैदी। जिसने खुद भी बाद में जूते खाए, पर देखो जूता कितना समझदार। वह जानता है, पैरों की चीज पैरों में ही अच्छी लगती। सो जूते ने जैदी को भी नहीं छुआ। पर अपने नेता भले लोकतंत्र से कुछ न सीख सके, कम से कम हाल में स्थापित जूता तंत्र से ही सीख लेते। एक निर्जीव जूता मर्यादा का इतना ख्याल रखता। तो अपने नेता सजीव होकर भी मर्यादा की इतनी धज्जियां कैसे उड़ाते रहते? सचमुच बुधवार को बिहार विधानसभा, विधान परिषद और कैंपस में जो हुआ, उसे विपक्ष का विरोध भर नहीं कह सकते। स्पीकर पर चप्पल फेंकना विरोध का परिचायक नहीं। विधान परिषद के हंगामे की तस्वीर अभी जारी नहीं हुई। सो वहां की मर्यादा फिलहाल कैमरे में बंद। पर विधानसभा परिसर में कांग्रेस की एमएलसी ज्योति कुमारी ने सचमुच मर्यादा की अद्भुत ज्योति जलाई। विधान परिषद में तांडव मचाकर बाहर पहुंचीं, तो बेजुबान गमलों-पौधों पर जमकर गुबार निकाला। एक-एक कर दर्जनों गमले तोड़े। फिर भी दिल का गुबार नहीं थमा, तो गमलों से छिटके पौधों का छोर पकड़ जमीन पर पटकना शुरू कर दिया। बदहवासी तो ज्योति कुमारी के चेहरे से दिख ही रही थी। हर हरकत यही बयां कर रही थी, मानो पगला सी गई हों। अब अपनी ज्योति कुमारी की हरकत पर पर्यावरण के अजीज दोस्त जयराम रमेश क्या फरमाएंगे? विधानसभा हो या विधान परिषद, विपक्ष की खिसियाहट साफ झलकी। नीतिश कुमार की जनमानस में बनी विकास पुरुष की छवि को तोडऩे के लिए लालू-पासवान-कांग्रेस ने सारी ताकत झोंक दी। ट्रेजरी घोटाले के मामले में नीतिश कुमार बहस को तैयार थे। स्पीकर भी हामी भर चुके। पर विपक्ष को बहस से अधिक बलवे में दिलचस्पी। विपक्ष की रणनीति भी देख लो। ट्रेजरी घोटाले पर अगर सदन में बहस कर ली, तो चुनाव में ठन-ठन गोपाल बनकर जाना होगा। नीतिश अपने बचाव में खम ठोककर कहेंगे, सदन में विपक्ष को पूरा जवाब दिया। पर विपक्ष ने तब चुप्पी साध ली। लालू-पासवान-कांग्रेस नीतिश को बचाव का यही हथियार नहीं देना चाह रहे। ताकि जब जनता के बीच जाएं, तो ट्रेजरी घोटाले की आड़ में नीतिश की छवि को भी दागदार बता सकें। खम ठोककर कह सकें, देखो अगर मेरी कमीज सफेद नहीं, तो नीतिश की भी नहीं। पर बहस से भागने की विपक्षी रणनीति की पोल भी अब खुल रही। जिस सीएजी की रिपोर्ट को लालू-पासवान-कांग्रेस नीतिश के खिलाफ हथियार बना रहे। उसमें राबड़ी राज और बिहार के गवर्नर बूटा राज भी शामिल। यानी अपने लोकतंत्र की मजबूरी देखिए। बहस हो, तो भी हमाम में सभी नंगे। बहस न हो, तो भी। पर दोनों ही बहस में बदनाम हो रहा लोकतंत्र। फिर भी लालू हों या पासवान या नीतिश, सबने बुधवार की घटना को लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली बताया। पर देश के ठेकेदारों को खुद पर शर्म नहीं आई। शर्म-हया तो नेतागिरी की डिक्शनरी से ही डिलीट हो चुके। सो यह सवाल सवाल ही रह गया, लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला कौन? लालू ने नीतिश पर आरोप लगाया, नीतिश ने लालू पर। बीजेपी ने कांग्रेस पर। सो अपना लोकतंत्र समझ ही नहीं पाया, किसने गला घोंट दिया। क्या नेतागिरी शब्द की जगह अब सिर्फ गुंडागर्दी इस्तेमाल होना चाहिए? आखिर नेताओं को कायदा-कानून की परवाह नहीं, तो कम से कम लोकतंत्र के जिस मंदिर में बैठते, उसकी पवित्रता का तो ख्याल करें। जैसे मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च में जाने वाले अनुयायियों का भले रिकार्ड कैसा भी हो। पर धार्मिक स्थलों में जा उसकी पवित्रता का पूरा ख्याल रखते। सो देश की जनता को नेताओं की पवित्रता की फिक्र नहीं। फिक्र है, तो सिर्फ उस पवित्र लोकतंत्र की, जिसे अपने स्वाधीनता सेनानियों ने खून से सींचा। जैसे-जैसे मतदाता परिपक्व होते जा रहे, अपने नेता उतने ही बदहवास हो रहे। अब उन्हें समझ नहीं आ रहा, जनता को उल्लू कैसे बनाएं। सो सुर्खियों में छाने के लिए कुछ भी करने से परहेज नहीं कर रहे। संसद के बजट सत्र में कितनी बार मर्यादाएं टूटीं, हिसाब नहीं। मार्शल तक का इस्तेमाल संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ। पर जब बड़े लोगों के सदन में मार्शल आए, तो देश की विधानसभाओं ने ट्रैंड ही चला दिया। कहते हैं ना, बुरी लत जल्द लग जाती। सो संसद-विधानसभा को मर्यादा तोड़ू घुन लग चुका। ऐसे में लोकतंत्र को न्याय कब मिलेगा?
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21/07/2010

Tuesday, July 20, 2010

बिहार में दंगल, दिल्ली में वर्जिश

अपनी दिल्ली, राजस्थान में बदरा बरसे। तो बिहार में कुर्सियां बरसीं। नीतिश कुमार का पहला टर्म पूरा हो रहा। दूसरे टर्म से पहले सत्तापक्ष और विपक्ष ने विधानसभा को ही अखाड़ा बना लिया। नीतिश-बीजेपी सत्ता में वापसी की मुहिम में जुटे। तो पिछली बार जमीन सूंघ चुके लालू-पासवान वापसी की राह ढूंढ रहे। नीतिश सरकार ने भी आखिरी वक्त में विपक्ष को मुद्दा थमा दिया। जब सीएजी रपट में खुलासा हुआ, सरकार ने 11,412 करोड़ खर्च तो किए, पर कोई हिसाब नहीं। सो हाईकोर्ट ने ट्रेजरी घोटाले में सीबीआई जांच के आदेश दे दिए। अब नीतिश सरकार फटाफट खर्चे के बिल बनाने में जुटी। सो बिहार विधानसभा में मानसून सत्र के पहले दिन ही हंगामा मच गया। विपक्ष वैल में पहुंचा, तो सत्तापक्ष से मंत्री-विधायक भी धमके। सो जमकर हाथापाई हुई। जिसके हाथ में जो आया, एक-दूसरे को दे मारा। सो करीब दर्जन भर विधायक घायल हो गए। पर सीएम नीतिश मुस्करा कर चल दिए। सदन में सीएम, डिप्टी सीएम मौजूद हों और हंगामा इस कदर बढ़ जाए। तो नैतिकता की उम्मीद किससे करें। सो लालू-पासवान ने नीतिश पर हमला बोला। कहा- विपक्ष संवैधानिक हक के तहत सदन में विरोध कर रहा था। पर नीतिश की शह से सत्तापक्ष ने मारपीट की। यों सत्तापक्ष में बैठा नेता अपने चेले-चपाटों को कैसे शह देता, यह लालू से बेहतर कोई बता भी नहीं सकता। मनमोहन की पिछली पारी में लालू 24 सांसदों के साथ सबसे बड़े सहयोगी थे। सो रेल मंत्री रहते भी रुतबा पीएम-सीएम से कम नहीं था। घटना 24 अगस्त 2006 की, जब लोकसभा में तबके जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह और लालू की तू-तू, मैं-मैं हो गई। दोनों के बीच बहस गाली-गलौज तक पहुंच गई। तो लालू के इशारे पर उनसे साले साधु यादव सांसदों की बैठने वाली बैंच को लांघते हुए प्रभुनाथ को मारने पहुंच गए। पर बीच में सांसद बृजभूषण शरण सिंह खड़े हो गए। सो साधु अपनी हरकत को अंजाम नहीं दे पाए। पर लालू हाथ उठा-उठा कर उकसाते दिखे। मुंह से गालियों के फूल बरसाते रहे। सो बाद में माफी मांगनी पड़ी। अब राजनीतिक मतभेद मनभेद बन गए। सो संसद हो या विधानसभा, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की वर्जिश का अड्डा बन गए। जनता के बीच जाने से पहले नेतागण सदन में ही वार्म-अप करते, ताकि मैदान में फुर्ती रहे। सो यूपी, उड़ीसा, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसी कई विधानसभा यह ट्रेंड अपना चुकीं। हर बार राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी दलील होती। दोनों पक्ष एक-दूसरे को जमकर कोसते। पर अपने गिरेबां में झांकते तक नहीं। अब नीतिश सरकार खर्च का हिसाब क्यों नहीं दे पाई या सचमुच घोटाला हुआ, यह तो जांच में साफ होगा। पर इतना तो जरूर हुआ, नीतिश राज में बिहार का कायापलट हो रहा। अगर रुपए खर्च नहीं होंगे, तो कायापलट कैसे संभव। अब हिसाब-किताब किसने नहीं रखा, यह तो बाद की बात। पर लालू-राबड़ी राज में पैसे खर्च ही नहीं हुए थे। कुछ फंड वापस केंद्र को चला जाता था, तो कुछ लालूवादी डकार जाते थे। पर साढ़े चार साल तक नीतिश के खिलाफ विपक्ष को ढूंढे कोई मुद्दा नहीं मिला। सो चुनावी साल में लालू-पासवान को तो समझो सीएजी ने मुंह मांगी मुराद थमा दी। यों सीएजी बनी ही मीन-मेख निकालने को। अगर काम कुछ भी न हो और कागजी पेट भर दो, तो सीएजी को एतराज नहीं होगा। यही हुआ था, जब सीएजी ने दिल्ली की शीला सरकार पर सवाल उठाए। लो फ्लोर बसों की खरीद के मामले में सीएजी ने रपट में कहा था कि अधिक कीमत पर बस खरीदी गई। पर तब शीला ने सीएजी को खरी-खरी सुनाने में देर नहीं की। सीएजी की रपट को कूड़ेदान में डालने को कह दिया। सीएजी जैसी संस्था की जरूरत पर ही सवाल उठा दिए। यानी कुल मिलाकर सीएजी कभी सत्तापक्ष को नहीं भाया। अलबत्ता विपक्ष के लिए हर रपट वरदान बन जाती। पर सीएजी और नीतिश के विवाद में आम आदमी का मुद्दा तो छूट गया। लालू-पासवान ने महंगाई पर मोर्चा निकाला। तो केंद्र को कम, नीतिश को खूब कोसा। पर अब बाकी मुद्दे गौण हो गए। सो बिहार के बाद अब दिल्ली में भी तैयारी हो रही। विपक्ष ने भारत बंद कर महंगाई पर तेवर दिखाए थे। तो अब सरकार ने विपक्षी एकता में सेंध लगाने को वही पुराना फार्मूला तय कर लिया। संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होगा। तो विपक्ष के तेवर देख सरकार मुद्दों की प्राथमिकता तय करेगी। पर इतना तय हो गया, विपक्षी एकता तोडऩे को हिंदू आतंकवाद और महिला आरक्षण बिल का सुर्रा छोड़ेगी सरकार। लेफ्ट तो वैसे भी ममता की बढ़ती राजनीतिक बेल से परेशान। सो बीजेपी के साथ दिखकर अपना और बंटाधार नहीं करेगी। लालू-पासवान भी बिहार चुनाव को देख बीजेपी संग बांसुरी नहीं बजाएंगे। रही बात मुलायम की। तो हिंदू आतंकवाद और महिला आरक्षण ही तोडऩे को काफी। अगर कांग्रेस सचमुच अपनी रणनीति में कामयाब हुई। बीजेपी-लेफ्ट के सहयोग से जबरन महिला बिल पास कराने की ठानी। तो कहीं ऐसा न हो, सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बिहार में भी गठबंधन टूट जाए। याद है ना, इसी सदन में शरद यादव ने एलान किया था- अगर महिला आरक्षण बिल पास हुआ, तो सुकरात की तरह जहर पी लेंगे। अब बिल पास हो या नहीं हो, पर विपक्षी एकता टूटनी तय। बिहार विधानसभा जैसी तस्वीर दिल्ली में दोहराए। तो हैरानी नहीं। सांसदों के वेतन-भत्ते बढऩे भी तय। पर महंगाई का बाल बांका नहीं होगा। यों केबिनेट सैक्रेट्री केएम चंद्रशेखर ने भरोसा दिलाया, दिसंबर तक महंगाई दर पांच-छह फीसदी पर आ जाएगी।
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20/07/2010

Monday, July 19, 2010

... मातम के लिए अभी आंसू बचाए रखिए

'आज करे सो काल कर, काल करे सो परसों। इतनी जल्दी क्या है, जब जीना है बरसों।' रेलवे का मूल मंत्र अब यही हो गया। अपने नेता तो बरसों जीएंगे। आम आदमी यों ही हादसों का शिकार होता रहेगा। सो नीतिश कुमार के रेल मंत्री वक्त से ही टक्कर रोधी उपकरण (एंटी कोलीजन डिवाइस) हर रेल बजट भाषण में जगह पा जाता। भले अब तक पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे को छोड़ किसी ट्रेन में यह डिवाइस नहीं लगे। जब सीके जाफरशरीफ रेल मंत्री थे, तो कोंकण के एमडी बी राजामोहन को पूरी छूट मिली। उन ने डिवाइस तैयार तो किया। पर महंगी टेक्नोलॉजी की वजह से व्यापक अमल में नहीं लाया गया। भले हादसे-दर-हादसे मुसाफिर मरते जा रहे। मुआवजों से लेकर राहत तक धन पानी की तरह बह रहा। पर अपनी तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो रहा। अपने नेताओं को तो विदेशी माल लाने में ही फायदा नजर आता। कम से कम इसी बहाने विदेश टूर का मौका मिल जाता। कुछ मातहत भी कमीशन से मालामाल हो जाते। सो विदेशी माल के आगे देशी की क्या औकात। अब अगर महंगी टेक्नोलॉजी से रेलवे को परहेज, तो अपनी ही रिसर्च डिजाइन एंड स्टेंडर्ड ऑर्गनाइजेशन की सुध क्यों नहीं लेती। जी हां, रेलवे की अपनी रिसर्च विंग है। पर अब तक कोई आविष्कार नहीं कर पाई। हर बार सिर्फ जुबानी तीर चलते। हर रेल मंत्री अपनी डफली आप ही बजाता। तभी तो नीतिश के बाद पासवान, लालू और अब ममता रेल मंत्री। पर रेल मंत्रालय के बदलते चेहरों के साथ सुरक्षा के मुकम्मल उपाय तो नहीं हुए। पर हर रेल मंत्री का भाषण अपग्रेड होता चला गया। अगर पुराने भाषण छोड़ दें, तो ममता बनर्जी की ओर से 24 फरवरी 2010 को पेश रेल बजट ही देख लें। अब तक एंटी कोलीजन डिवाइस तो लगे नहीं। पर ममता ने अबके ट्रेन के डिब्बे और इंजन भी टक्कर रोधी बनाने का एलान कर दिया। लगे हाथ विजन-2020 का खाका भी परोसा। सालाना एक हजार किलोमीटर रेल लाइन बिछाने का लक्ष्य। अगले दस साल में नेटवर्क में 25 हजार किलोमीटर के इजाफे की तैयारी। पर क्या रेलवे का इतना बड़ा नेटवर्क कोलकाता के एक कमरे में बैठकर चलाया जा सकता? ममता ने बजट भाषण में खुद बताया था। कैसे जब देश आजाद हुआ, तो 1950 में रेलवे के पास 53,596 किलोमीटर की लाइन थी। पर 58 साल बाद भी यह नेटवर्क 64,015 किलोमीटर पर सिमटा हुआ। यानी सालाना औसत 180 किलोमीटर रहा। पर जब रेलवे का इतिहास इतना बिगड़ा हुआ। तो ममता बनर्जी कायापलट को मंत्रालय में बैठना गवारा क्यों नहीं समझतीं? सचमुच जब भारत आजाद हुआ था। तब चीन के पास भारत की तुलना में एक चौथाई रेल लाइनें भी नहीं थीं। पर अब दुनिया में चीन का नेटवर्क सबसे बड़ा। सो अपने रेल मंत्रियों ने नया ट्रेंड शुरू कर दिया। बजट भाषण में लच्छेदार जुमलों से दिल जीतने की खूब कोशिश होती। भले ट्रेन में मुसाफिरों का सफर अंग्रेजी का सफर क्यों न हो। सच्चाई यही, रेलवे को नेताओं ने राजनीति की ट्रेन बना लिया। जिस राज्य का मंत्री बना, ट्रेन की दिशा उधर ही मुड़ गई। सो दुधारू गाय होकर भी रेलवे मरणासन्न दिख रही। आखिर बिना चारा रेलवे कब तक दूध दे? अब तो खड़ी ट्रेन में भी पीछे से टक्कर आम बात हो गई। पिछले साल 21 अक्टूबर को मथुरा के पास रुकी मेवाड़ एक्सप्रेस को पीछे से गोवा एक्सप्रेस ने टक्कर मार दी थी। फिर दो जनवरी को इटावा में लिच्छवी-मगध और गोरखधाम-प्रयागराज की ऐसी ही टक्कर हुई थी। ममता के चौदह महीने के टर्म में अब तक करीब दर्जन भर दुर्घटनाएं हो चुकीं। कुछेक में नक्सलवादियों का भी हाथ। जिनमें 27 अक्टूबर 2009 को राजधानी एक्सप्रेस को बंधक बनाना और 28 मई 2010 को ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पटरी से उतारना शामिल। सो ममता को अबके भी साजिश नजर आ रही। रेलवे जिम्मेदारी ओढऩे को तैयार नहीं। केबिन मास्टर अपनी चूक से इनकार कर रहा। तो रेलवे बोर्ड के डायरेक्टर विवेक सहाय ड्राइवर की चूक से। जांच के नाम पर सब अपनी जिम्मेदारी से बच रहे। पर अब तक की दुर्घटनाओं की जांच का नतीजा क्या निकला? किसकी जिम्मेदारी तय हुई और रेलवे ने क्या सबक लिया? सो अब तो यही लग रहा, न रेलवे दोषी, न महकमा चलाने वाले नेता। अगर सचमुच कोई जिम्मेदार, तो वह है आम आदमी। अपना लोकतंत्र है ही ऐसा, जहां जनता खुद के लिए खुद जिम्मेदार। अगर नेता जिम्मेदारी ओढऩे लगें, तो फिर राजनीति कौन करेगा। हर हादसे के बाद वही होता, जो सोमवार को हुआ। बंगाल के बीरभूम के निकट सैंथिया स्टेशन पर खड़ी वनांचल एक्सप्रेस को पीछे से आ रही उत्तरबंग एक्सप्रेस ने जोरदार टक्कर मारी। साठ से ज्यादा मौतें हो चुकीं, सैकड़ों घायल। पर हादसों पर राजनीति शुरू हो गई। ममता पर लालू-पासवान के साथ लेफ्ट-बीजेपी ने भी हमला बोला। तो निचोड़ यही था, ममता का ध्यान रेल भवन से ज्यादा रायटर्स बिल्डिंग पर। सो ट्रेन बेलगाम दौड़ रही। सोमवार को हादसे की जगह राहत ट्रेन राहत काम पूरा होने के बाद पहुंची। तो उसमें पीने का पानी भी नहीं था। जब नेताओं की आंख का पानी मर चुका, तो पीने का पानी कहां से मिले? क्या लच्छेदार भाषणों से ही हो जाएगी रेलवे की सुरक्षा? इंटर लॉकिंग सिस्टम, एंटी कोलीजन डिवाइस क्या सिर्फ कागजों तक रहेंगे? आखिर कब तक रेलवे को रेलवे के भरोसे छोड़ा जाए? अब तो सरकार को विशेष पहल कर महकमा दुरुस्त करना होगा। वरना नेताओं का तो कुछ नहीं, पर हम-आप मातम के लिए आंसू बचाए रखें। क्योंकि आज का हादसा कोई आखिरी नहीं....।
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19/07/2010