मौसम ने करवट ली, ठंड ने कंपकपाना शुरू किया। तो सरकार भी अब ठिठुरने लगी। सीवीसी पीजे थॉमस ने आखिर इस्तीफा नहीं दिया। शायद कांग्रेस और थॉमस ने अब ठान लिया, जब तक सुप्रीम कोर्ट प्याज नहीं खिलाए। तब तक सीवीसी का इस्तीफा नहीं होगा। कोर्ट ने आखिरी सुनवाई के लिए 27 जनवरी की तारीख मुकर्रर करते हुए थॉमस और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया। चीफ जस्टिस एसएच कपाडिय़ा की खंडपीठ ने कहा- हमने फाइल देख ली है और अब आखिरी सुनवाई करेंगे। कोर्ट ने बाकायदा थॉमस को सफाई पेश करने के निर्देश दिए। तो अब थॉमस ने भी कोर्ट के सामने सारे दस्तावेज रखने की दलील दी। पर सुप्रीम कोर्ट की मंशा पिछली दो टिप्पणियों में साफ हो चुकी। फिर भी थॉमस हैं कि कुर्सी से चिपके हुए। सरकार की ओर से इशारे के बाद भी थॉमस अब इस्तीफे को राजी नहीं। यानी सरकार अपने ही जाल में उलझ गई। अब या तो कोर्ट थॉमस की नियुक्ति को रद्द करे, या फिर सरकार महाभियोग लाए। थॉमस भी तकनीकी दांवपेच से वाकिफ। सो भ्रष्टाचार के इस खेल में अकेले शहादत क्यों दें? वैसे भी लानत-मलानत यूपीए सरकार की फितरत बन चुकी। सो अब इंतजार बासठवें गणतंत्र दिवस की अगली सुबह का। पर जरा कांग्रेस की दलील सुनिए। थॉमस की नियुक्ति पर अभी भी कोई पछतावा नहीं। अलबत्ता संवैधानिक पद पर नियुक्ति के सभी मानदंडों को पूरा करने वाला बता रही। अभिषेक मनु सिंघवी ने बहुमत के फैसले से थॉमस की नियुक्ति का पुराना राग दोहराया। पर सवाल, जब पैनल में पीएम-गृहमंत्री और नेता विपक्ष हो। तो क्या फैसला होगा, कोई भी अनुमान लगा सकता। तभी तो सुषमा ने थॉमस का विरोध किया। पर पीएम-गृहमंत्री ने सत्ता की धौंस जमा दी। क्या इसे बहुमत का फैसला कहेंगे? क्या पीएम या गृहमंत्री कभी सपने में भी विपक्ष के सुर में सुर मिला सकते? सो थॉमस की नियुक्ति बहुमत का फैसला नहीं। अलबत्ता सत्तापक्ष की दादागिरी कहिए। पर अब कांग्रेस और सरकार बेचारगी की मुद्रा में। थॉमस कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं। सो सारी फजीहत कांग्रेस की झोली में गिर रहीं। पर फिलहाल कांग्रेस की हालत नंगा नहाए क्या, और निचोड़े क्या जैसी। कहते हैं ना, मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जेपीसी जांच को लेकर संसद ने गतिरोध के पुराने रिकार्ड की बराबरी कर ली। हर्षद मेहता कांड के वक्त 17 दिन के गतिरोध के बाद जेपीसी बनी थी। सोमवार को स्पेक्ट्रम मामले में गतिरोध का सत्रहवां दिन था। सो अठारहवें दिन इतिहास दोहराएगा, ऐसी उम्मीद तो नहीं दिख रही। पर कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम जरूर हो चुकी। बंगाल चुनाव के मद्देनजर ममता बनर्जी ने भी जेपीसी मानने का दबाव बढ़ा दिया। शरद पवार और करुणानिधि भी पक्ष में। करुणानिधि को लग रहा, अगर गतिरोध जारी रहा, तो तमिलनाडु में अहम चुनावी मुद्दा बनेगा। और अगर जेपीसी बन जाए, तो फिलहाल राजा पर बना फोकस शिफ्ट होकर मनमोहन की ओर जाएगा। यानी भ्रष्टाचार के भंवर में डूबने की आशंका। सो करुणानिधि की दलील सुनिए। उनने कहा- बेहद अफसोस की बात है कि पढ़े-लिख भी यह मानने को तैयार हैं कि एक व्यक्ति एक नील 76 खरब रुपए की बड़ी राशि का घोटाला कर सकता। करुणानिधि ने बकासुर का जिक्र करते हुए कहा- लोग सोचते थे बकासुर का मुंह 30 हजार मील लंबा हो सकता था, जिसकी भूख कभी शांत नहीं होती। यों करुणा के कहने के निहितार्थ अलग। पर उन ने यह तो साफ कर दिया, घोटाले में एकला राजा ही नहीं, समूची टीम शामिल। सचमुच अगर राजा ही दोषी होते, तो कांग्रेस जेपीसी बनाने में इतनी हील-हवाली न करती। पर कांग्रेस की मुश्किल सोमवार को तब और बढ़ गई, जब गैर यूपीए-गैर एनडीए के 11 दलों ने न सिर्फ जेपीसी मांगी, अलबत्ता पीएम को भी तलब करने का इरादा जता दिया। सीताराम येचुरी और गुरुदास दासगुप्त ने सवाल उठाया- जब बिल क्लिंटन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री संसदीय समिति के सामने पेश हो सकते। तो हमारे शासन प्रमुख को बुलाने में क्या गलत। वैसे भी मनमोहन को जेपीसी का सामना करने का पुराना अनुभव। येचुरी ने तो साफ कहा- देशहित में पीएम जेपीसी से भयभीत नहीं, पर कांग्रेस जरूर डरी हुई। सचमुच कांग्रेस का डर सोमवार को उजागर हो गया। जब यूपीए की इमरजेंसी मीटिंग बुला ली। विपक्षी दलों ने खम ठोक दिया- शीत सत्र में जेपीसी नहीं बनी, तो बजट सत्र में भी मांग जारी रहेगी। यानी कांग्रेस का संकट अभी खत्म नहीं। जेपीसी और थॉमस का मामला तो गले में हड्डी की तरह अटक चुका। अगर शीत सत्र पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, तो संसदीय इतिहास में एक और काला अध्याय जुड़ेगा। पर बात मुसीबत की, तो लुटी-पिटी कांग्रेस को जम्मू-कश्मीर के स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पताल पहुंचाने का बंदोबस्त कर दिया। कांग्रेस कोटे से मंत्री श्यामलाल शर्मा ने कश्मीर समस्या का फार्मूला रैली में सुझा दिया- कश्मीर को आजादी दे दो, जम्मू को राज्य और लेह-लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दो। यानी संसद के प्रस्ताव और संविधान की भावना के खिलाफ राष्ट्रद्रोह जैसा बयान। सो अब कांग्रेस जेपीसी और थॉमस के बाद श्यामलाल शर्मा के बयान में फंसी। पुराने जमाने में कहते थे- त्रिदोष यानी एक साथ तीन बीमारी- कफ, पित्त और वात का कोई इलाज नहीं। अब कांग्रेस एक साथ तीन बीमारी का सामना कैसे करेगी, यह वक्त ही बताएगा।
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06/12/2010
Monday, December 6, 2010
Wednesday, December 1, 2010
निर्लज्जता की पराकाष्ठा या पराकाष्ठा के पार निर्लज्जता
निर्लज्जता की पराकाष्ठा कहें या पराकाष्ठा के पार निर्लज्जता। पी.जे. थॉमस ने सीवीसी की कुर्सी छोडऩे से इनकार कर दिया। तो सरकार ने घोटाले की फाइल से दूर रखने की दलील। विपक्ष ने भी संसद में सरकारी काम निपटाने में हंगामे के बीच ही सहयोग देना शुरू कर दिया। सो लोकतंत्र के मंदिर से पक्ष-विपक्ष की नौटंकी कब तक चलेगी, देखना होगा। यों पंद्रहवीं लोकसभा के फोटो सैशन की तैयारी पूरी हो गई। गुरुवार को सांसदों के फोटो खिंचेंगे, ताकि आने वाली पीढिय़ां इतिहास के तौर पर निहार सकें। पर संसद से पहले बात थॉमस की, जो लोक-लिहाज की परवाह किए बिना कह गए- मैं अभी भी सीवीसी का बिग बॉस। पर सवाल, जब सरकार टू-जी घोटाले की फाइल से थॉमस को दूर रख रही, तो पद पर रखने का क्या मतलब? जब सुप्रीम कोर्ट थॉमस की नीयत पर संदेह जाहिर कर चुका। तो घोटाले की फाइल से थॉमस को दूर रखने की सरकारी दलील और थॉमस का इस्तीफे से इनकार का क्या मतलब? सुप्रीम कोर्ट की पहली टिप्पणी के बाद ही गृह मंत्रालय से थॉमस की विदाई की खबर निकलने लगी थी। पर चिदंबरम से मुलाकात के बाद थॉमस का ऐसा तुर्रा क्यों? क्या यह कांग्रेस की कोई रणनीति या पोल-खोल की धमकी? चाहे जो भी हो, थॉमस की विदाई तय। अब कांग्रेस को यह तय करना कि सुप्रीम कोर्ट की चपत से ही थॉमस को चलता करती या चांटा खाकर। यों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज के.टी. थॉमस का मानना, पी.जे. थॉमस का हट जाना ही पद की गरिमा के हित में। पर जब सत्ता का नशा हो, तो कांग्रेस और थॉमस भला क्यों न इतराएं। तभी तो चौदहवें दिन भी संसद ठप हुई। पर सरकार और विपक्ष अपनी जिद से पीछे हटने को राजी नहीं। अब गतिरोध टूटने की सारी उम्मीदें दम तोड़ चुकीं। सो जरूरी संवैधानिक कामकाज निपटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई। पर तेरह दिन यानी तेरहवीं के बाद चौदहवें दिन सरकार के साथ-साथ विपक्ष की भी पोल खुल गई। विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ा। पर इस कदर भी नहीं कि सरकार को मजबूर कर सके। तभी तो प्रणव मुखर्जी ने बुधवार को तडक़े विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को फोन लगाया। अनुपूरक अनुदान मांग पारित कराने पर सहयोग मांगा। तो सुषमा ने इनकार के बजाए आडवाणी से गुफ्तगू कर एनडीए की मीटिंग बुलवा ली। मीटिंग में आडवाणी सरीखे नेताओं ने दलील दी- संवैधानिक कामकाज में रुकावट नहीं होना चाहिए। क्योंकि हमारी लड़ाई सरकार से है, संविधान से नहीं। सो विपक्ष ने हंगामे में ही अनुदान मांगें पारित कराने की हरी झंडी दे दी। प्रणव दा को संदेशा भेजा गया, तो प्रणव ने आशंका जताई। कहीं कोई विपक्षी सांसद बिल फाडऩे या स्पीकर टेबल तक पहुंचने की कोशिश तो नहीं करेगा। विपक्ष ने प्रणव दा को इस बात का भी पूरा भरोसा दे दिया। सो बुधवार को लोकसभा में अनुपूरक अनुदान मांगें पारित हो गईं। अब गुरुवार को राज्यसभा में पारित होंगी। इसी तरह रेलवे की अनुदान मांगें भी पारित कराई जाएंगी। यानी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की जुगलबंदी देखिए, एक तरफ जेपीसी की जिद। तो दूसरी तरफ बिल पास कराने में सरकार को सहयोग। अगर विपक्ष सचमुच भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गंभीर, तो इसी दांव से सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर देता। अब अगर विपक्ष की यह दलील मान लें कि वह सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहता। तो क्या जिस तरह बिल पास हुआ, क्या वह संवैधानिक? अगर सब कुछ हंगामे में ही निपट जाएगा, तो फिर संसद का क्या औचित्य? अगर सरकार और विपक्ष को संविधान की इतनी ही फिक्र। तो गतिरोध खत्म कर ऐसा फार्मूला निकालते कि संसद की गरिमा बरकरार रहती। पर दोनों को देश या संविधान की फिक्र कम, वोट बैंक की राजनीति अधिक। अगर सरकार के जरूरी कामकाज संसद में ऐसे ही निपट जाएं। तो भला कौन सी सरकार संसद चलाना चाहेगी। सरकार तो हमेशा इसी फिराक में रहती कि कम समय में अधिक काम निपट जाए। ताकि विपक्ष की घेरेबंदी से बचा जा सके। वैसे भी संसद की शक्तियों में आई गिरावट पर डा. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी मौजूं टिप्पणी कर चुके। उनके मुताबिक- यह सत्य है कि कानून बनाने एवं टेक्स लगाने की सर्वोपरि सत्ता संसद में निहित है। पर वास्तविकता यह है कि विधि अधिनियमों का गर्भाधान और जन्म मंत्रालयों में होता है। संसद में सिर्फ मंत्रोच्चारण के साथ उनका उपनयन संस्कार कर उन्हें औपचारिक यज्ञोपवीत दे दिया जाता है। सचमुच सैद्धांतिक तौर पर संसद की मर्जी से ही सरकार रह सकती। पर व्यवहार में केबिनेट ने संसद के काम और अधिकार हथिया लिए। तभी तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां भी सरकार को झकझोर नहीं पा रहीं। बुधवार को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने फिर कहा- आंखों को जो दिख रहा है, उससे अधिक भी कुछ है। पर सरकार ने अब बेशर्मी का चश्मा पहन लिया। विपक्ष ने भी संसद के काम निपटाने में सहयोग दे दिया। सो जेपीसी नहीं, अब सत्रावसान की तैयारी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने गुस्से में जो कहा और किया, सुनिए। बोले- क्या जेपीसी के सदस्य बनने वाले नेता पुलिस अधिकारी बनेंगे? यह कहकर मनीष तिवारी बीजेपी नेता राजीव प्रताप रूड़ी की कार में बैठकर निकल लिए। सो सवाल करनी नहीं, कथनी पर। जब कांग्रेस प्रवक्ता की जेपीसी के बारे में ऐसी सोच। तो फिर संसद चलाने पर इतना खर्च क्यों? क्यों न संसद का विसर्जन कर कांग्रेस को हमेशा के लिए सत्ता सौंप दें।
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01/12/2010
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01/12/2010
Tuesday, November 30, 2010
संसद ठप हो या सडक़ें जाम, भुगतेगी जनता ही
‘मुझसे कहा गया कि संसद देश की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है। जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है। लेकिन क्या यह सच है?’ संसद का ताजा हाल देख प्रख्यात कवि सुदामा पांडे धूमिल की ये पंक्तियां बिलकुल सटीक। शीत सत्र की शुरुआत नौ नवंबर को हुई। पर भ्रष्टाचार का जिन्न न सिर्फ सरकारी खजाने को, अलबत्ता संसद सत्र का पूरा महीना निगल गया। अब दिसंबर में छुट्टियों समेत तेरह दिन बचे। पर वक्त से पहले सत्र की तेरहवीं मानकर चलिए। गतिरोध तोडऩे को तीसरी मीटिंग भी नाकाम रही। या यों कहें, मीटिंग जहां से शुरू हुई, वहीं आकर खत्म हो गई। सरकार की ओर से प्रणव मुखर्जी तीन दफा प्रयास कर चुके। पहली मीटिंग रस्म अदायगी। दूसरी मेंं पीएसी के साथ बहुआयामी जांच एजेंसी का प्रस्ताव। तो तीसरी बार फोन पर सुषमा-आडवाणी को सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग में सीबीआई जांच का प्रस्ताव रखा। पर विपक्ष ने सरकार के कामचलाऊ प्रस्तावों को सुनते ही नकार दिया। सो अब मंगलवार को स्पीकर मीरा कुमार ने पहल की। पर मीटिंग में कोई नया प्रस्ताव नहीं। अलबत्ता सरकार ने एक बार फिर अपने पुराने नुस्खे ही परोस दिए। तो विपक्ष ने भी अपनी वही धुन सुना दी। जिस पर सरकार थिरकने को राजी नहीं। यानी बैताल वापस पेड़ पर लटक गया। अब इतना बड़ा घोटाला, जिसमें न सिर्फ करने वाला, अलबत्ता गिनती भी हांफने लगे। और सरकार जेपीसी न बनाने की जिद ठान ले। तो क्या संसद को देश की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण मानेंगे? क्या जनता को जनता के नैतिक विचारों का समर्पण कहेंगे? जब समूचा विपक्ष विचारधारा की राजनीति से परे हट एक सुर में जेपीसी की मांग कर रहा। तो सत्तापक्ष को इतना गुरेज क्यों? क्या भ्रष्टाचार कांग्रेस या सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं? ग्लोबल करप्शन इंडैक्स में भारत 84वें से 87वें स्थान पर पहुंच गया। तो सवाल, क्या जब तक नेता देश को न बेच दें, तब तक भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं? आखिर कांग्रेस और सरकार को कब बात समझ आएगी? सुप्रीम कोर्ट लगातार टिप्पणियां कर रहा। पर सरकार को शर्म है कि आती नहीं। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को महाघोटाला, सीबीआई को फटकार, पीएमओ से सवाल जैसी बातें हो चुकीं। अब तो मंगलवार को सीवीसी पी.जे. थॉमस की नियुक्ति पर भी आईना दिखा दिया। थॉमस पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के साथ सैक्रेट्री रह चुके। केरल के पॉम ऑयल घोटाले में चार्जशीट। सो नियुक्ति संबंधी पैनल में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने थॉमस का विरोध किया था। पर पैनल के दो अन्य मेंबर पीएम और होम मिनिस्टर ने सत्ता की धौंस दिखाई। बहुमत से थॉमस को सीवीसी की कमान थमा दी। पर अब सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ा, तो खुद की सांस थमी हुई। थॉमस को थेंक यू कहने का इशारा भी हो गया। थॉमस ने होम मिनिस्टर चिदंबरम से मुलाकात की। तो अब थॉमस का इस्तीफा महज औपचारिकता। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो-टूक कहा- सीबीआई कुल मिलाकर सीवीसी की निगरानी में काम करती। ऐसे में थॉमस के लिए स्पेक्ट्रम घोटाले की निष्पक्ष तरीके से जांच की निगरानी करना मुश्किल होगा। क्योंकि जब थॉमस टेलीकॉम सैक्रेट्री थे, तब उन ने स्पेक्ट्रम आवंटन के उस फैसले को सही ठहराया था। जिसकी आज कोर्ट और सीबीआई समीक्षा कर रही। अब ऐसी कठोर टिप्पणी के बाद फौरन थॉमस का इस्तीफा नहीं हुआ। तो यह कांग्रेस राज में ही संभव। बूटा सिंह के बिहार विधानसभा भंग करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया था। फिर भी कांग्रेस ने फौरन बूटा को रवाना नहीं किया। तभी तो मंगलवार को वनवास से लौटे कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कानूनी तुर्रा दिखाया। बोले- थॉमस इस्तीफा देंगे या नहीं, यह पता नहीं। लेकिन वह पद की सभी योग्यताएं पूरी करते हैं और सीवीसी की जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर सकते हैं। अब कांग्रेस की इस दलील को सच मानेंगे या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को? पर सवाल, जेपीसी से कन्नी क्यों काट रही कांग्रेस? सर्वदलीय मीटिंग में सरकार की ओर से फारुख अब्दुल्ला ने दलील दी- पिछली चार जेपीसी का कोई नतीजा नहीं निकला। सो इस मांग का कोई औचित्य नहीं। पर विपक्ष की नेता सुषमा ने दलील दी- अगर सरकार की यही सोच, तो क्यों न रूल बुक से जेपीसी निकाल दे। ताकि न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। मीटिंग में स्पीकर ने सिर्फ प्रश्नकाल चलने देने की भी अपील की। पर विपक्ष ने दो-टूक कह दिया- प्रश्नकाल ही नहीं, सारा काम होगा, पर पहले जेपीसी। फिर भी सरकार ने मीटिंग में जेपीसी से इनकार कर दिया। अब सरकार के पास दो ही विकल्प- या तो जेपीसी माने, वरना हंगामे में ही जरूरी विधायी कामकाज निपटा सत्रावसान करे। सत्ताधारी खेमे से विपक्ष पर संसद न चलने देने का ठीकरा फोडऩे की मुहिम पहले ही शुरू हो चुकी। सो अब एनडीए ने संसद से सडक़ तक की रणनीति बना ली। दिल्ली या मुंबई में भ्रष्टाचार पर विराट रैली कर सरकार को बेनकाब करने का फैसला किया। पर एनडीए के साथ समूचा विपक्ष एक मंच पर आए, इसका बीड़ा शरद यादव को सौंप दिया। यों इसी बीजेपी ने महंगाई पर संसद की विपक्षी एकता को सडक़ पर दिखाने से इनकार कर दिया था। पर अब बोफोर्स दोहराने और तख्ता पलट का मंसूबा पाल समूचे विपक्ष को मंच पर लाना चाह रही। पर इस राजनीति में कहीं स्पेक्ट्रम का भ्रष्टाचार भी बोफोर्स जैसी जांच बनकर न रह जाए। वैसे भी जेपीसी से संसद ठप हो या रैली से सडक़ें जाम, नुकसान तो आम जनता ही झेलेगी।
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30/11/2010
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30/11/2010
Monday, November 29, 2010
तो क्या जेपीसी की जिद पर अब सौदेबाजी होगी?
विकीलिक्स के खुलासों ने अमेरिका के प्रति दुनिया की सोच को पुख्ता कर दिया। अमेरिका ने विकीलिक्स को रोकने की तमाम कोशिशें कीं, पर नहीं रोक पाया। सो गुप्त दस्तावेज जारी हुए। तो अमेरिका की कथनी और करनी का भेद खुल गया। सामने तो हर देश की तारीफ, पर पीठ पीछे ब्लादीमिर पुतिन से लेकर हामिद करजई, निकोलस सरकोजी, गॉर्डन ब्राउन, कर्नल गद्दाफी आदि नेताओं के लिए गाली की भाषा का इस्तेमाल। किसी को कुत्ता, किसी को सनकी, चरित्रहीन, किसी को मंदबुद्धि और कई अभद्र शब्दों से उद्बोधन। यहां तक कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मुखिया तक की जासूसी कराने में कोताही नहीं बरती। यानी अमेरिका को अपने सिवा किसी पर भरोसा नहीं। सो खुलासों ने अमेरिका की बोलती बंद कर दी। खुद हिलेरी क्लिंटन दुनिया के देशों को फोन घुमा खुलासे पर भरोसा न करने की अपील करती रहीं। हिलेरी ने भारत से भी अपील की। यों अभी भारत के बारे में खुलासा आना बाकी। जॉर्ज बुश हों या बराक ओबामा, अपने मनमोहन की तारीफ में खुब कसीदे पढ़ चुके। पर अंदरूनी सोच क्या, यह तो आने वाले खुलासों में ही मालूम पड़ेगा। वैसे भी अमेरिका की फितरत कौन नहीं जानता। सो दुनिया में विकीलिक्स के खुलासों से खलबली, तो अपने देश में भ्रष्टाचार की रोज नई परतें उधड़ रहीं। संसद के शीत सत्र को तो पाला मार चुका। अब शायद मंगलवार को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार सर्वदलीय मीटिंग कर आखिरी पहल करेंगी। पर कोई नतीजा निकलेगा, आसार नजर नहीं आ रहे। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों में से कोई अपना पतनाला हटाने को राजी नहीं। सो अब बहती गंगा में सुरेश कलमाड़ी भी हाथ धोने आ गए। सोमवार को स्पीकर मीरा कुमार से मिल सीधे मीडिया स्टैंड पहुंच गए। बोले- कॉमनवेल्थ घोटाले में मैंने कुछ गलत नहीं किया। किसी भी जांच को तैयार। सो मैंने स्पीकर से मिलकर संसद में बयान देने की अनुमति मांगी। पर कोई पूछे, जब संसद न चल रही और ना ही चलने के कोई आसार। तो बयान क्या खाक देंगे। अगर कलमाड़ी सचमुच इतने ईमानदार, तो मानसून सत्र में बहस के दौरान चुप क्यों रहे? तब शरद यादव जैसे नेता ने शेरू, मोटी चमड़ी जैसे तमगे दिए। पर सचमुच कलमाड़ी पर कोई असर नहीं दिखा। सचमुच घोटालेबाज किस हद तक गिर सकते, इसकी मिसाल मुंबई में दिख रही। आदर्श सोसायटी घोटाले में अशोक चव्हाण की कुर्सी गई। तो अब अहम दस्तावेज गायब हो रहे। पहले महाराष्ट्र के शहरी विकास विभाग में रखी आदर्श सोसायटी की फाइल से चार अहम पन्ने गायब हुए। जिनमें नेताओं-अफसरों की सिफारिश से लेकर सोसायटी की खातिर सडक़ की चौड़ाई कम करने के आदेश। यों कंप्यूटर में रखी सॉफ्ट कॉपी सीबीआई को मिल गई। पर सोचिए, ऐसी ‘आदर्श’ चोरी किसने की होगी? अब सोमवार को खुलासा हुआ, डिफेंस इस्टेट से एनओसी देने वाले दस्तावेज गायब हो गए। आखिर घोटाला करने वाले अपने देश के महानुभाव क्या दिखाना चाहते? क्या सचमुच सत्य, अहिंसा और बापू के दिखाए आदर्श की भी तीस जनवरी 1948 को हत्या हो गई? आखिर अपने सरकारी तंत्र में ऐसा कौन सा दीमक। जो कभी भोपाल त्रासदी के मुख्य गुनहगार वारेन एंडरसन को भगाने के रिकार्ड गृह मंत्रालय में नहीं मिलते। तो कभी बोफोर्स दलाली के आरोपी ओतावियो क्वात्रोची के भगाने वालों का पता नहीं चलता। कभी सिख विरोधी नरसंहार के दोषियों का पता नहीं चलता। आखिर अपनी व्यवस्था को चलाने वाले देश में कौन सा ‘आदर्श’ स्थापित करना चाहते? क्या लूट-खसोट, इधर का माल उधर, दूसरों की जेब साफ कर अपनी भरना यही अपनी व्यवस्था का आदर्श? फिर भी कोई भ्रष्टाचार पर हेकड़ी दिखाए। तो उसे क्या कहेंगे आप? कांग्रेस ने एक बार फिर एलान कर दिया- न जेपीसी मानेंगे, न सत्रावसान करेंगे। पर अंदरखाने कांग्रेस कैसे लकीर पीट रही, सबको मालूम। मुसीबतों का सिलसिला थम नहीं रहा। आंध्र में नेतृत्व परिवर्तन भी काम नहीं कर पाया। आखिर जगन मोहन रेड्डी और पूर्व सीएम वाएसआर की पत्नी लक्ष्मी ने इस्तीफा दे दिया। मां-बेटे ने कुर्सी और कांग्रेस दोनों छोड़ दीं। सो कांग्रेस की बोलती बंद हो गई। जगन ने सोनिया गांधी को भेजी चिट्ठी में खूब आरोप लगाए। पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया से परहेज किया। अब कांग्रेस को जगन के अगले कदम का इंतजार। सो फिलहाल संसद में विपक्ष का तोड़ ढूंढ रही। बीजेपी नेता अरुण शौरी के बयान ने सहारा दिया। शौरी ने खुलासा किया- मुकेश अंबानी के खिलाफ संसद में न बोल सकूं, सो आखिरी वक्त में पार्टी ने मेरा नाम हटा वेंकैया को मौका दिया। सो कांग्रेस को मौका मिल गया। अब कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने पूछ लिया- अब तक तो सिर्फ मैच फिक्स हुआ करते थे। बीजेपी की नैतिकता देखिए, संसद की बहस भी फिक्स होने लगी। पर शौरी का खुलासा तो कांग्रेस के लिए महज सीढ़ी। असली तोड़ तो छत्तीसगढ़ में जाकर मिला। दिल्ली के वरिष्ठ नेता की सिफारिश पर रमन सरकार ने पुष्प स्टील को माइनिंग का लाइसेंस दे दिया। जिसे बाद में हाईकोर्ट ने अवैध ठहरा दिया। पर अब कांग्रेस का दावा, सिफारिश करने वाले बीजेपी के बड़े नेता का नाम उसे मालूम। सो मनीष तिवारी बोले- रमन सिंह उस बड़े नेता का नाम बताएं, वरना हम बताएंगे। सचमुच सिफारिश करने वाले में जिस बीजेपी नेता का नाम, गर खुलासा हो जाए, तो बीजेपी की जड़ें हिल जाएंगी। सो कांग्रेस ने इशारा कर दिया, ताकि जेपीसी की जिद छोड़ विपक्ष किसी और समझौते पर राजी हो जाए। यानी ‘आदर्श’ बनाने में बीजेपी-कांग्रेस चोर-चोर सगे भाई।
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29/11/2010
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29/11/2010
Friday, November 26, 2010
लो हजार रुपए के घोटाले में 35 पैसे की नैतिकता
26/11 की दूसरी बरसी भी बीत गई। पर अपनी सरकार आज भी वही राग अलाप रही, जो दो साल पहले अलापा था। दोषियों को नहीं बख्शेंगे.. पाक ने गुनहगारों पर ठोस कार्रवाई नहीं की। पर सिर्फ यह कहते-कहते कब तक श्रद्धांजलि देंगे नेता? मुंबई में श्रद्धांजलि के कई कार्यक्रम हुए। अपनी संसद ने भी श्रद्धांजलि की रस्म अदा कर हंगामा शुरू कर दिया। सो 11वें दिन भी संसद नहीं चली। प्रणव मुखर्जी ने संसद न चलने का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ दिया। कांग्रेसी खेमे से लगातार यही संदेश देने की कोशिश हो रही। ताकि जनता विपक्ष को संसद के कामकाज में रुकावट का जिम्मेदार माने। पर विपक्ष भी कम नहीं। विपक्ष का मानना यही, अगर संसद भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही, तो कांग्रेस की मंशा ही सवालों के घेरे में होगी। यानी पक्ष-विपक्ष की अपनी-अपनी रणनीति में संसद रण बन गई। शुक्रवार को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने सरकारी पक्ष से बातचीत के बाद आडवाणी-सुषमा को फोन घुमाया। बिहार में नीतिश कुमार के शपथ ग्रहण में गए आडवाणी-सुषमा ने स्पीकर को अपना पुराना स्टैंड दोहरा दिया। स्पीकर ने सरकार की ओर से बहस के प्रस्ताव पर राजी होने की अपील की थी। पर आडवाणी-सुषमा ने जेपीसी के सिवा कोई अन्य प्रस्ताव मानने से इनकार कर दिया। सचमुच भ्रष्टाचार के जितने बड़े खुलासे हो रहे, संसद में बहस का कोई औचित्य नहीं। अगर संसद में बहस हो भी, तो क्या होगा। यही ना, सभी दलों को संख्या बल के आधार पर भाषण देने का टाइम दिया जाएगा। फिर आखिर में संबंधित विभाग के मंत्री अपना जवाब दे देंगे। बस अथ श्री भ्रष्टाचार कथा का शीतकालीन अध्याय खत्म। सो कांग्रेस बिना किसी लोकलाज के खम ठोककर कह रही- सरकार चलाने का जनादेश हमको मिला। सो विपक्ष हमें डिक्टेट न करे। अब कोई पूछे, कांग्रेस को अगर सरकार चलाने का जनादेश मिला, तो क्या विपक्ष का गला घोंट देगी? कांग्रेस यह भूल रही, किसी देश में लोकतंत्र तभी तक जिंदा, जब तक विपक्ष की अलग हैसियत हो। यह नहीं कि सत्ता के नशे में सत्ताधारी दल विपक्ष की हर आवाज को जनादेश की आड़ में कुचल दे। सो फिर वही सवाल- टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो या कॉमनवेल्थ घोटाले या आदर्श सोसायटी के बाद अब फर्जी हाउसिंग लोन घोटाला। अगर कांग्रेस का दामन पाक-साफ, तो किसी भी जांच से परहेज क्यों? कांग्रेस और सरकार की ओर से दलील दी जा रही- जेपीसी बन गई, तो कभी पीएम, तो कभी मंत्री को तलब कर विपक्ष अखबारबाजी करेगा। जिससे सरकार की किरकिरी होगी। पर अगर कांग्रेस एक कदम आगे बढक़र सोचे। तो यह भी संभव, जेपीसी की जांच में कांग्रेस और सरकार के खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए। तो अखबारबाजी करने वाले विपक्ष का मुंह कैसा रह जाएगा। पक्ष हो या विपक्ष, अब जनता राजनीति के हर दांव-पेच बखूबी समझने लगी। बिहार का जनादेश इसकी ताजा मिसाल। फिर भी राजनीतिक दल सबक नहीं ले रहे। अलबत्ता सरकार और विपक्ष की जिद में ठप संसद को भी अपनी नैतिक जीत बताने की कोशिश हो रही। बीजेपी ने कर्नाटक में येदुरप्पा को न हटाकर सरकार बचा ली। तो येदुरप्पा ने नैतिकता का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पहले तो अपने बेटे-बेटियों को मुख्यमंत्री के सरकारी आवास से बाहर कर दिया। फिर देश भर के अखबारों में बड़े-बड़े इश्तिहार छापकर कर्नाटक में सुशासन का संकल्प जताया। यानी कर्नाटक एपीसोड तो निपट चुका। फिलहाल संसद में धारावाहिक चल रहा, जो एक-दो ब्रेक के साथ ही खत्म हो जाता। शुक्रवार को तीन ब्रेक लिए। फिर भी संसद नहीं चली। सो अब कांग्रेस ने नैतिकता-नैतिकता खेलना शुरू कर दिया। विपक्ष को कोसने के बाद खुद को नैतिक दिखाने के लिए संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने एलान कर दिया। जब तक संसद में गतिरोध रहेगा, कांग्रेस के सांसद भत्ता नहीं लेंगे। पर माकपाई सीताराम येचुरी बोले- कांग्रेस संसद में कामकाज नहीं चाहती। हम तो यहां काम करने आते हैं। अब किसकी मंशा कैसा, यह आप जानो। पर कांग्रेस की नैतिकता का अंकगणित भी देखते जाओ। स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ पौने दो लाख करोड़ का। यानी हिंदी में एक नील 76 खरब, तो अंग्रेजी में 1.76 ट्रिलियन। अपने देश में अरब-खरब के बाद लोग गिनती भूल जाते। पर यहां घोटाला शंख तक पहुंचने वाला था। अब अगर सिर्फ स्पेक्ट्रम घोटाले से कांग्रेस की नैतिकता को भाग दें। तो 11 दिन में कांग्रेस को लोकसभा के 208 और राज्यसभा के 72 सांसदों के भत्ते मिला दें। तो रोजाना 2000 रुपए के हिसाब से बने कुल 61लाख 60 हजार। यानी एक नील 76 खरब रुपए के घोटाले का महज 0.000035 फीसदी। आम भाषा में समझें, तो एक हजार रुपए के घोटाले में महज 35 पैसे की नैतिकता। इस अंकगणित में कॉमनवेल्थ के 70 हजार करोड़ के घोटाले शामिल नहीं। कांग्रेस भूल गई, तहलका में बंगारू लक्ष्मण ने सिर्फ एक लाख रुपए रिश्वत ली थी। तो कांग्रेस ने सत्रह दिन संसद ठप किया था। पर अबके तो इतना बड़ा घोटाला कि अपना नंबरिंग सिस्टम भी छोटा पड़ रहा। फिर भी कांग्रेस जेपीसी को राजी नहीं। अलबत्ता 35 पैसे की नैतिकता का झंडा फहरा रही। ये तो वही बात हो गई, जैसे भ्रष्टाचार के समंदर से एक बाल्टी नैतिकता का निकालना।
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26/11/2010
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26/11/2010
Thursday, November 25, 2010
संविधान नहीं, पक्ष-विपक्ष की जिद संसद पर हावी
आंध्र में कांग्रेस को आशा की किरण मिल गई। नल्लारी किरण कुमार रेड्डी ने सीएम की कुर्सी संभाल ली। तो अब शुक्रवार को नीतिश कुमार तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। बिहार में जेडीयू-बीजेपी दोनों की सीटें छप्पर फाड़ कर बढ़ीं। पर जनादेश के निहितार्थ को दोनों नेतृत्व ने बखूबी समझा। सो तय हो गया, पुराने फार्मूले पर ही सरकार का गठन होगा। अगर एक ने भी अपनी बढ़ी ताकत को सौदेबाजी का हथियार बनाया होता। तो गठबंधन में दरार लाजिमी थी। पर जनता के समझदारी भरे फैसले को जितनी सौम्यता से नीतिश ने कबूला, उतना ही संयम बीजेपी ने भी दिखाया। पर कांग्रेस को राहुल का फेल होना हजम नहीं हो रहा। यों सोनिया गांधी ने पहले दिन ही कमान संभाल लाइन दे दी। सो गुरुवार को कांग्रेस ने बिहार में राहुल के फेल होने को मीडिया की गलत धारणा बताया। जयंती नटराजन बोलीं- राहुल युवाओं के आदर्श हैं। कांग्रेस का चेहरा हैं, उन ने पार्टी महासचिव की हैसियत से प्रचार किया। जिससे कांग्रेस का काडर भविष्य के लिए प्रेरित हुआ। अब कांग्रेस की ऐसी टिप्पणी कोई चौकाने वाली बात नहीं। जीत का सेहरा हमेशा गांधी परिवार के सिर बांधने की परंपरा। हार का ठीकरा स्थानीय नेतृत्व पर। वैसे भी बिहार के नतीजों के दूसरे दिन ही इलाहाबाद की रैली में चाटुकार कांग्रेसियों ने अपनी भक्ति का भोंडा प्रदर्शन कर दिया। जब पोस्टरों में सोनिया को भारत माता, तो राहुल गांधी को कृष्ण दिखाया। अब कांग्रेसी चाहे जितनी दलीलें दें, पर बिहार की जनता ने काम को जनादेश देकर अपना संदेश दे दिया। सो जनता की उम्मीदों को पूरा करने हनक के साथ नीतिश शुक्रवार को फिर कमान संभालेंगे। तो विकास की पटरी पर लौटा बिहार अब रफ्तार भरेगा। पर दुर्भाग्य, लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में दस दिन से कोई काम नहीं हो रहा। अलबत्ता पक्ष-विपक्ष की रार यही संदेश दे रही। भले संसद का सत्र भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाए, पर किसी भ्रष्टाचारी को बलि चढ़ाने वाली जेपीसी नहीं बनेगी। सो अब सत्रावसान की खबरें जोर पकडऩे लगीं। तो सरकार और कांग्रेस पर भ्रष्टाचार से भागने का आरोप न लगे, सो विपक्ष को हंगामाई साबित करने की मुहिम तेज हो गई। गुरुवार को राज्यसभा के चेयरमैन हामिद अंसारी ने मीटिंग बुलाई। पर संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने दोहरा दिया, जेपीसी नहीं मानेंगे। सरकार और कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी ने भी हाथ खड़े कर दिए। बोले- मैं नहीं जानता यह गतिरोध कैसे खत्म होगा। मैं समाधान नहीं ढूंढ पा रहा, फिर भी कोशिश कर रहा हूं। लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने एक बार फिर गतिरोध दूर करने और सदन चलने देने की अपील की। यानी सरकार की ओर से यह संदेश देने की कोशिश तेज हो गई कि वह संसद चलाने के पक्ष में। पर विपक्ष अड़ंगा डाल रहा। प्रणव दा और बंसल ने बाकायदा विपक्ष को चुनौती दी, अगर पीएसी की जांच और सरकार पर भरोसा नहीं। तो अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। बंसल ने तेरह दिसंबर तक सत्र चलाने की मंशा का इजहार किया। पर भ्रष्टाचार की जांच में अविश्वास प्रस्ताव का क्या मतलब? विपक्ष ने सरकार को अल्पमत में नहीं बताया। अलबत्ता भ्रष्टाचारियों को शिकंजे में लाने के लिए जेपीसी की मांग की। अगर सरकार के मन में कोई खोट न होता, तो जेपीसी पर ऐसी रार न ठनती। अब भले सरकार जुबां से तेरह दिसंबर तक सत्र चलाने का एलान कर रही। पर गुरुवार की सारी बयानबाजियों में मंशा समय पूर्व सत्रावसान की ही। सो सत्तापक्ष की रणनीति भांप विपक्ष भी अब अपना नंबर बढ़ाने में जुट गया। गुरुवार को सारे मुलायमवादी जेपीसी की मांग को लेकर संसद के परिसर में धरने पर बैठ गए। अगर 1962, 1965, 1971 और कारगलि युद्ध को छोड़ दें। तो विपक्ष के बारे में हमेशा अवसरवादी होने की धारणा बनी हुई। विपक्ष की भूमिका का मतलब सिर्फ यहीं तक सीमित रह गया कि हमेशा ऐसे मौकों की तलाश करो, जिससे सरकार पर छींटाकशी की जा सके। चरित्र हनन कर जनता में छवि बिगाड़ी जा सके। कुल मिलाकर सत्तापक्ष को बदनाम कर ही विपक्ष अपनी भूमिका की इतिश्री मान लेता। पर सत्तापक्ष को भी संसद की फिक्र नहीं रही। संसद को हमेशा ऐसे घुमाने की कोशिश की, मानो बपौती हो। वरना भ्रष्टाचार के इतने बड़े-बड़े खुलासे हो रहे। सुप्रीम कोर्ट से आए दिन ऐसी टिप्पणियां आ रहीं, जो सरकार को शर्मसार कर रहीं। फिर भी ऐसे बर्ताव कर रही, मानो, शर्म-हया बेच खाई हो। गुरुवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को लताड़ा। पूछा, अब तक स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा से पूछताछ क्यों नहीं हुई। कोर्ट एक दिन पहले ही इस घोटाले को महाघोटाला करार दे चुकी। फिर भी सरकार का गुरूर देखिए, जेपीसी नहीं मान रही। अब पक्ष-विपक्ष की इसी कटुता के बीच 26/11 की दूसरी बरसी का वक्त आ गया। पर क्या श्रद्धांजलि महज औपचारिकता भर होगी या संसद एकजुट होकर आतंकवाद को कुचलने का सच्चा संकल्प लेगा? सिर्फ मुंबई हमला ही नहीं, 26/11 की तारीख अपने संविधान के लिए भी अहम। इकसठ साल पहले 26/11 को ही संविधान सभा ने देश के संविधान को मंजूरी दी थी। पर अफसोस, आज संविधान नहीं, सत्तापक्ष और विपक्ष की जिद संसद पर हावी।
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25/11/2010
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25/11/2010
Wednesday, November 24, 2010
तो अब लफ्फाजी नहीं, सिर्फ विकास मांग रही जनता
बिहार में विकास ने लालू-पासवान का बंटाधार किया। आंध्र में के. रोसैया की अकर्मण्यता ने सीएम की कुर्सी छीन ली। तो कर्नाटक में नैतिकता पर ब्लैकमेल भारी पड़ा। बीजेपी ने येदुरप्पा को सीएम बनाए रखने का एलान कर दिया। पर बुधवार के दो विलेनों की बात फिर कभी। फिलहाल बात सिर्फ हीरो की। बिहार चुनाव में नीतिश कुमार की ऐसी आंधी चली, लालू की लालटेन बुझ गई। पासवान का झोंपड़ा उड़ गया। अब ऐसी आंधी हो, तो कांग्रेस के पंजे की क्या बिसात। देश के इतिहास में किसी गठबंधन को मिली अब तक की सबसे बड़ी जीत एनडीए के नाम दर्ज हुई। जेडीयू और बीजेपी दोनों का स्ट्राइक रेट इतना जबर्दस्त, मान्यता प्राप्त विपक्ष के लिए भी मोहताज होगी बिहार विधानसभा। एकला किसी भी दल को विपक्ष के लिए जरूरी दस फीसदी सीटें नहीं मिलीं। सो लालू-पासवान खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोंच रहे। लोकसभा के बाद विधानसभा में भी पिटे लालू जनादेश पचा नहीं पा रहे। अलबत्ता लालू-पासवान ने नीतिश को मिले तीन चौथाई बहुमत को जादुई और रहस्यमयी नतीजा करार दिया। बाकायदा ताल ठोकी- महीने भर में तथाकथित जनादेश से रहस्य का परदा उठाएंगे। लालू-पासवान की हताशा ऐसी, नीतिश को तो बधाई दी, बीजेपी को नहीं। अब विकास की ऐसी जीत हो, तो पंद्रह साल तक बिहार का बेड़ा गर्क करने वालों के पेट में दर्द लाजिमी। वह भी तब, जब लालू की बीवी राबड़ी दोनों सीटों से चुनाव हार गई हों। पासवान के दोनों भाई बिना किसी मशक्कत के निपट गए हों। तो चुनाव नतीजों पर ऐसी बौखलाहट को सांत्वना के नजरिए से ही देखना चाहिए। अब लालू-पासवान भी कहीं बेजुबान ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ें, तो कोई हैरानी नहीं। लालू ने यही कहा- अभी बोलूंगा, तो आप लोग कहोगे, हार से भन्नाकर बोल रहे। इसलिए एक महीने बाद बोलूंगा। लालू को शायद अपने दिन याद आ रहे, जब बैलेट बॉक्स से जिन निकला करते थे। पर सही मायने में लालू-पासवान के लिए यह गंभीर मंथन का वक्त। पासवान युग का तो लोकसभा में ही अंत हो चुका। अब विधानसभा के नतीजे लालू युग के अवसान के द्योतक। यों राजनीति में उठने-गिरने का दौर चलता रहता। लालू-पासवान ने अपनी तुलना इंदिरा गांधी से की। जब इमरजेंसी के बाद इंदिरा का सफाया हो गया था। पर दो साल बाद दमखम से इंदिरा लौटीं। हार के बाद लौटने का ऐसा जज्बा काबिल-ए-तारीफ। पर लालू-पासवान भूल गए, इंदिरा लौटीं, तो जनता पार्टी की कलह की वजह से। अगर लालू सचमुच राजनीतिक वापसी चाहते, तो ईमानदार ही नहीं, समझदार विपक्ष की भूमिका निभानी होगी। यों ही हार पर लकीर पीटते रहे, तो फकीर बन घूमते रह जाएंगे। नीतिश कुमार को प्रचंड बहुमत मिलना, जितना गदगद करने वाला, उतना ही चिंता का भी विषय। इतिहास साक्षी, जब-जब जनता ने किसी दल को प्रचंड बहुमत दिया, तो अगला चुनाव उसके लिए घातक साबित हुआ। नीतिश कुमार को जनता के हर तबके का वोट मिला। तो सबके मन में सिर्फ यही, विकास की रफ्तार से उसका इलाका महरूम न हो। अगर नीतिश उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे, तो जनता खुद जवाब देगी। सो नतीजों में छुपे संदेश को भांप चुके नीतिश ने भी पूरी सौम्यता दिखाई। माना, इतनी बड़ी जीत से चिंता बढ़ी। उनके पास कोई जादुई छड़ी नहीं। पर जनता के विश्वास और अपनी लगन से कामयाबी हासिल करेंगे। सचमुच नीतिश को मिले जनादेश में बदलते बिहार की महक ही नहीं, और भी उम्मीदें। बिहार की जनता ने विकास का खांचा देखा, जिसमें लालू कहीं फिट नहीं। सो नीतिश को ऐसा जनादेश दिया, जिसमें अब कोई इफ एंड बट की गुंजाइश नहीं। लोगों ने माना, नीतिश के पांच साल में भले रामराज नहीं, पर नीतिश के इरादे नेक। सो लोगों ने जात-पांत से ऊपर उठकर नीतिश को सामाजिक समरसता का हीरो बनाया। भले बिहार की राजनीति से जात-पांत अभी दूर नहीं हुआ। पर विकास के मुद्दे ने जातीय राजनीति की दीवार को कमजोर जरूर किया। यूपी के बाद बिहार में सामाजिक समरसता की लहर चली। मायावती के सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में मिसाल पेश की थी। तो अब पेशे से इलैक्ट्रॉनिक इंजीनियर नीतिश कुमार ने ऐसा शॉक दिया, लालू-पासवान ठीक से बोल नहीं पा रहे। रही बात कांग्रेस की, तो सीधे सोनिया गांधी ने बयान दे दिया, बिहार से अधिक उम्मीद नहीं थी। पर कोई पूछे, नौ सीट से चार पर आने की उम्मीद थी? बीजेपी नेता अरुण जेतली ने सही फरमाया, बिहार की जनता ने परिवारवाद की राजनीति को नकार विकास को अपनाया। सो बिहार में न राहुल चले, न लालू की बीवी राबड़ी जीतीं। न पासवान के भाई, न लालू को छोड़ गए दोनों साले साधु-सुभाष। सो नीतिश का जादू देख बाकी नेताओं में बधाई देने की होड़ मच गई। बीजेपी के तमाम दिग्गजों ने तो बधाई दी ही। होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने कहा- बिहार की जनता ने विकास का मुद्दा स्वीकार किया। अब सवाल कांग्रेस से- फिर सोनिया-राहुल चुनावी सभाओं में नीतिश के विकास का मखौल क्यों उड़ा रहे थे? पर कांग्रेस की जैसी परंपरा, चाटुकारों ने राहुल फैक्टर को अगले चुनाव की तैयारी बताया। पीएम, सोनिया, मोदी सब बुधवार को नीतिश के मुरीद दिखे। पर चुनाव नतीजों में जितनी जनता की उम्मीद, उतनी ही आशंका भी पैदा कर रही। बीजेपी-जेडीयू दोनों मजबूत हुईं, पर जेडीयू अपने बूते बहुमत से महज आठ-दस सीट दूर। सो गठबंधन के रिश्तों पर भी सबकी निगाह होगी। पर फिलहाल तो बिहार में लुट गए लालू, पिट गए पासवान। कांग्रेस का तो क्रिया-कर्म हो गया।
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24/11/2010
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24/11/2010
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