कांग्रेस की तीन दिनी महाकथा का समापन हो गया। अब इसे महाधिवेशन कहिए या कार्नीवल। कांग्रेस की यही खूबी, जो भी हो, डंके की चोट पर करती। चाहे वह पाप हो या पुण्य का काम। सो भ्रष्टाचार के साये में कांग्रेस ने मंथन तो किया। पर बीजेपी को खरी-खरी सुना ही कर्तव्य की इतिश्री कर ली। अब कोई विपक्षी दल ऐसा मंथन करे, तो सत्ता से दूरी का दर्द समझा जा सकता। पर जब सत्ता में बैठी कांग्रेस ऐसा कर रही, तो भ्रष्टाचार का भला क्या बिगड़ेगा? बीजेपी ने अगर पाप किया, या कर रही। तो आज वही गठरी सिर पर ढोने को मजबूर। पर कांग्रेस उस पाप से अपना पाप नहीं छुपा सकती। कर्नाटक पर भले बीजेपी दोहरापन दिखा रही। पर क्या विपक्ष के रवैये से देश में कांग्रेस को लूट का लाइसेंस मिल गया? कांग्रेस को स्पेक्ट्रम, आदर्श और कॉमनवेल्थ घोटाले पर जवाब देना था। पर कांग्रेस ने शायद इन घोटालों की मजबूत जड़ें देख लीं। सो अब जब कांग्रेस को कोई सुगम राह नहीं दिख रही। तो आक्रमण ही बेहतर बचाव का मंत्र अपना लिया। संसद का सत्र लोकतंत्र में काला इतिहास बना गया। तो अब कांग्रेसी जेपीसी को ही कमतर बताने में जुट गए। सोनिया-राहुल-पीएम और गाल बजाने वाले दिग्विजय ने एक सुर में पीएसी को बेहतर बताया। मंगलवार को मनमोहन ने तुरुप का पत्ता फेंका। बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी के सामने पेश होने का ऑफर कर दिया। बोले- सीएजी रपट के बाद मंत्री को हटाया। सीबीआई, ईडी, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से जांच, सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग और पीएसी की जांच चल रही। पीएसी के पास वह सारी शक्तियां, जो जेपीसी को दी जा सकतीं। सो जेपीसी का कोई मतलब नहीं। पर बीजेपी ने संसद ठप किया, जबकि मेरे पास छुपाने को कुछ नहीं। अब कोई पूछे- छुपाने को कुछ नहीं, तो जेपीसी क्यों नहीं? जब आप आधा दर्जन एजेंसियों से जांच कराने को राजी। तो जेपीसी से भागने का कुछ तो मतलब होगा। बीजेपी के अरुण जेतली ने तो फौरन सवाल उठाया- चुप्पी तोडऩे के लिए पीएम का स्वागत। पर शासनकर्ता जांच के लिए खुद मंच का चयन नहीं कर सकता। अगर पीएम गलत नहीं, तो सीमित अधिकार वाली पीएसी से जांच पर जोर क्यों दे रहे? उन ने आरोप मढ़ा- पीएम देश से बहुत सी बातें छुपा रहे। मसलन, तीन साल तक मनमोहन चुप क्यों रहे? कैग रपट से पहले तक राजा का बचाव क्यों करते रहे? सीवीसी पद पर दागी थॉमस के लिए वीटों क्यों किया? सिर्फ जेतली नहीं, वामपंथी सीताराम येचुरी ने भी पीएम को अपने दिन याद कराए। येचुरी बोले- एनडीए काल में मनमोहन ने जेपीसी के लिए तीन हफ्ते तक संसद का बॉयकाट किया था। सो दोहरे मापदंड न अपनाएं। यानी भ्रष्टाचार अब विशुद्ध रूप से राजनीति के मैदान का फुटबाल बन गया। तू चोर, तो मैं भी चोर की लड़ाई शुरू हो गई। विपक्ष ने संसद के बाद सडक़ पर बिगुल फूंका। तो कांग्रेस महाधिवेशन से सोनिया ने भी हुंकार भरी। जैसे विपक्ष मैदान में, वैसे हम भी कूदेंगे। बाकायदा विपक्ष की रैलियों के जवाब में विधानसभा वार रैली का एलान कर दिया। सोनिया ने अपने समापन भाषण में दो-टूक कहा- हमारा रिकार्ड एनडीए से बेहतर। पी. चिदंबरम ने तो भविष्यवाणी कर दी- अगले एक दशक तक बीजेपी सत्ता में नहीं आने वाली। उन ने विपक्ष को बतलाया, हम शासन करना जानते हैं। ऐसा ही गुरूर कांग्रेस ने बोफोर्स के वक्त भी दिखलाया था। अबके तो 206 सांसद को ही तीन चौथाई बहुमत मानकर फूल रही। पर सवाल- एनडीए से तुलना करना ही शासन? या कांग्रेस सिर्फ शासन करना ही जानती, सुशासन देना नहीं? आखिर यह कैसा मंथन, जब भ्रष्टाचार अपने चरम पर। तो कांग्रेस अपना दामन साफ दिखाने के बजाए बीजेपी के दामन में झांक रही। आतंकवाद के मुद्दे पर तो सख्त कार्रवाई के बजाए मजहबी चासनी लगाई जा रही। अयोध्या फैसले और बिहार की हार के बाद कांग्रेस की तय रणनीति के तहत दिग्विजय सिंह ने मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण की कमान थाम ली। सो अब बीजेपी भी मान रही, दिग्विजय का यह हथकंडा कांग्रेस-बीजेपी दोनों के लिए फायदेमंद। यानी वोट बैंक का चश्मा पहन दोनों खेल रहे। पर महाधिवेशन से आम आदमी को क्या मिला? पीएम ने महंगाई की बात की। तो इस बात की खुशी जताई कि महंगाई दर कम हो रही और मार्च तक साढ़े पांच फीसदी पर ले आएंगे। पर मंगलवार को ही एक खबर सुनने को मिली- चंडीगढ़ में एक व्यक्ति को जब प्याज की कीमत 65 रुपए बताई गई। तो हार्ट अटैक हो गया। मनमोहन राज में महंगाई दर भले ऊपर-नीचे होती रही। पर महंगाई हमेशा बढ़ती रही। चिदंबरम ने एनडीए का मखौल उड़ाया। विकास दर की ढपली बजाई। पर देश की जनता देख रही, किसका कितना विकास हुआ। भ्रष्टाचार के आरोपों को महाधिवेशन के मंच से निराधार बताया गया। तो सवाल- किस आधार पर राजा का इस्तीफा लिया? सीबीआई, ईडी, पाटिल कमेटी, शुंगलू कमेटी, सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग, इनकम टेक्स और सीएजी क्या लकीर पीट रहीं? यानी कुल मिलाकर कांग्रेस महाधिवेशन में भ्रष्टाचार पर भजन तो हुआ। पर भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई से अधिक बीजेपी को कोसा। भ्रष्टाचार का पर्दाफाश तो नहीं, पर विपक्ष के आरोपों का पर्दाफाश करने का खम ठोक दिया। अब विपक्ष और कांग्रेस दोनों जनजागरण अभियान चलाएंगी। कोई भी भ्रष्टाचार पर उदाहरण पेश करने को तैयार नहीं। अलबत्ता भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार खेल रहीं। ताकि जनता इसी उधेड़बुन में उलझ जाए कि भ्रष्टाचार के इस खेल में कौन सांपनाथ, कौन नागनाथ।
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20/12/2010
Monday, December 20, 2010
Sunday, December 19, 2010
महाधिवेशन में मंथन वोट बैंक का, मुद्दों का नहीं
तो कांग्रेसी महाचौपाल का पहला दिन निपट गया। राजधानी के बुराड़ी में तंबुओं का शहर बसाया। देश भर से करीब 15 हजार डेलीगेट्स पहुंचे। पर भ्रष्टाचार, आतंकवाद जैसी चुनौतियां महज राजनीतिक हथकंडा बनकर रह गईं। सोनिया गांधी ने संसद सत्र के आखिरी दिन विपक्ष को ललकारा था। तो भ्रष्टाचार के मामले में शशि थरूर समेत कांग्रेसी नेताओं पर हुई कार्रवाई का जिक्र किया। सो खफा थरूर ने सोनिया को चिट्ठी लिख दी- भ्रष्टाचारियों की सूची में मेरा नाम न गिनाएं। अब थरूर की चिट्ठी या कोई और बात, सोनिया ने महाधिवेशन में किसी का नाम नहीं लिया। पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जितना गरजीं, उससे अधिक बीजेपी पर भडक़ीं। भ्रष्टाचार के लगातार खुलासों ने कांग्रेस को सचमुच शरशैय्या पर पहुंचा दिया। पर इतवार को सोनिया ने न सिर्फ कांग्रेस को उठाने की कोशिश की। अलबत्ता विपक्ष के खिलाफ आक्रामक तेवर अपना लिए। भ्रष्टाचार को बीमारी बता जड़ से खात्मे का इरादा जताया। कलमाड़ी, चव्हाण जैसों पर कार्रवाई का हवाला दे बीजेपी से पूछ लिया- क्या उसके पास ऐसा दावा करने की हिम्मत है? सोनिया ने न सिर्फ कर्नाटक, बीजेपी शासित राज्यों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। संसद में जेपीसी की मांग पर हंगामे को बंधक बनाने की हरकत बताया। पर सत्ता में बैठे नुमाइंदों का मन कब मचल जाए, ठिकाना नहीं। सो सोनिया ने अपने सभी सीएम को सलाह दी- जमीन आवंटन के विशेषाधिकार की समीक्षा करिए। अब कौनसा सीएम अमल करेगा, यह बाद की बात। सार्वजनिक मंच से ऐसी जुबानी अपील बहुतेरे करते। पर संगठन चलाना खालाजी का घर नहीं। परदे के पीछे बहुत से ऐसे काम करने पड़ते, जो नैतिक मूल्यों की ऐसी-तैसी करते हों। अब अमल की ही बात, तो महाधिवेशन में सोनिया-राहुल ने कार्यकर्ताओं की शिकायत सामने रखी। मां-बेटे दोनों ने केबिनेट मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों को नसीहत दी- थोड़ा वक्त वर्करों को भी दें। राहुल-सोनिया ने कबूला- लंबे समय से वर्करों की उपेक्षा की शिकायत पर सत्ता में बैठे नेता नहीं समझ रहे। सो सोनिया ने दो-टूक नसीहत दी- सत्ता सुख भोग रहे नेता जमीन पर पांव रख मैला नहीं होने देंगे। तो वह दिन दूर नहीं, जब उनके पांव जमीन पर रखने लायक ही नहीं रहेंगे। सोनिया ने बात तो वर्करों के दिल की कही। पर पीएम की जमकर तारीफ की। अब पीएम अच्छे और बाकी मंत्री नासमझ, तो यह फार्मूला अपनी समझ से परे। यों सचमुच वर्करों की उपेक्षा का दर्द जानना हो, तो किसी बीजेपी नेता से पूछ लो। जब एनडीए राज था, तो वाजपेयी ने मंत्रियों को हफ्ते में एक बार पार्टी दफ्तर में बैठने की सलाह दी। पर वर्करों की अपेक्षा का कोलाहल सुन फाइव स्टार कल्चर मंत्रियों के कान बहरे हो गए। फिर नतीजा क्या हुआ, दोहराने की जरूरत नहीं। सो सोनिया-राहुल ने साफ संदेश दिया- अगर मंत्रालयों में बैठ मौज कर रहे, तो उसके पीछे वर्कर का हाथ। पर अमल कितना होगा, खुद कांग्रेस को भी मालूम नहीं। फिर भी सोनिया-राहुल की पुचकार से कांग्रेसी वर्कर तो फूल गए। सो विपक्ष के खिलाफ महाधिवेशन के मंच से सबने हुंकार भरी। सोनिया ने संयत भाषा में ही सही, पर निशाना संघ को बनाया। सांप्रदायिकता की परिभाषा बता, उन संस्थाओं पर कार्रवाई की बात की, जो धर्म की आड़ में लोगों को उकसा रहीं। पर बवाल न हो, तो उन ने जोड़ा- चाहे बहुसंख्यक का कट्टरपंथ हो या अल्पसंख्यक का, कांग्रेस फर्क नहीं करती। पर जब कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कमान संभाली। तो उन ने साबित कर दिया, अब तक के सारे विवादास्पद बयानों में सोनिया-राहुल का वरदहस्त मिला होगा। वरना खुद को राष्ट्रवादी और समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधि कहने वाली कांग्रेस के इस मंच से दिग्विजय संघ को हिटलर की नाजी पार्टी न बताते। उन ने सीधा आरोप लगाया- जैसे हिटलर ने यहूदियों को निशाना बनाया, संघ मुसलमानों को बना रहा। क्या यह सांप्रदायिकता भरा बयान नहीं? अगर संघ सचमुच ऐसी गतिविधि में संलिप्त, तो सत्ता में बैठी कांग्रेस प्रतिबंध लगाने के बजाए गाल क्यों बजा रही। दिग्विजय ने कांग्रेसियों को संघ के खिलाफ डंडा उठाने की अपील की। तो क्या इसे संवैधानिक कहेंगे? यानी महाधिवेशन के पहले दिन कांग्रेस के मंच से वह सब हुआ, जिसे सोनिया मना कर रही थीं। उन ने सादगी और संयम की बात की। तो कुछ देर बाद ही बिहार कांग्रेस के वर्करों ने मुकुल वासनिक के खिलाफ मोर्चा खोल अफरा-तफरी मचा दी। सोनिया ने गठबंधन में एकता की बात की। तो दीपा दासमुंशी ने तृणमूल कांग्रेस पर हमला बोला। पर सवाल, कांग्रेस की इस पूरी कवायद का अहम एजंडा क्या? पहले दिन ही यह साफ हो गया, संकटों से घिरी कांग्रेस ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ चुकी। कांग्रेस एकमुश्त मुस्लिम वोट बैंक अपनी झोली में वापस लाना चाह रही। सो दिग्विजय की जुबान दस जनपथ की स्क्रिप्ट पढ़ रही। पर कोई पूछे, महाधिवेशन से जनता के लिए क्या संदेश? सोनिया ने महंगाई की बात की। तो संयोग देखिए, दिल्ली में दूध के दाम इतवार से ही बढ़ गए। महंगाई पर वही छह साल से चल रही दलील। न किसान की बात, न गरीब की, न आम आदमी की। राहुल गांधी ने अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की बात कही। पर आजादी के 63 साल में नहीं पहुंचे, तो कब पहुंचेंगे? कांग्रेस ने अपने 125 साल को सेवा और समर्पण से जोड़ा। पर इसमें से आजादी के पहले के 62 साल निकाल दो, तो 63 साल से कैसी सेवा हो रही देश की?
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19/12/2010
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19/12/2010
Friday, December 17, 2010
राहुल के विचार पर हाय-तौबा जैसा क्या?
विकीलिक्स के खुलासों ने अब भारत में खलबली मचा दी। आतंकवाद पर राहुल गांधी की अमेरिकी राजदूत से बातचीत ने सियासत का पारा चढ़ा दिया। पर पहले बात सोनिया गांधी के बारे में अमेरिकी मानसिकता की। विकीलिक्स के खुलासे में अमेरिका की ओर से सोनिया को अक्षम नेता कहा गया। एटमी डील के वक्त विपक्ष को साधने में नाकाम बताया। कोई मौका न चूकने वाली नेता भी कहा। तब सरकार के सहयोगी रहे वामपंथी नेता प्रकाश कारत अमेरिकी नजर में बांह मरोडऩे वाले नेता। यानी अमेरिका के मन की बात हो, तो परवेज मुशर्रफ जैसे लोग भी अच्छे हो जाते। पर सोनिया ने 2007 में सरकार बचाए रखने को प्राथमिकता दी। तो अमेरिका अक्षम बता रहा। पर अमेरिका का दोहरापन कोई छुपी हुई बात नहीं। सो शुक्रवार को सोनिया से जुड़े खुलासे पर उतना शोर नहीं मचा, जितना राहुल बाबा को लेकर। विकीलिक्स के हवाले से अपनी मीडिया ने ज्ञान की ऐसी गंगा बहाई, बीजेपी ने राहुल को अज्ञानी करार दे दिया। खबर चली- 'राहुल ने हिंदू कट्टरपंथियों को देश के लिए बड़ा खतरा बताया।' सो बीजेपी और संघ परिवार ने राहुल को नासमझ कहा। बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले- 'राहुल का बयान बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और गैर जिम्मेदाराना। ये भारत के प्रति उनकी सोच का संकेत। राहुल के इस बयान से साफ हो गया कि वे भारतीय राजनीति के बारे में कितना कम जानते हैं।' बीजेपी का गुबार इतने से ही न निकला। रविशंकर बोले- 'राहुल ने एक ही झटके में लश्कर-ए-तोइबा और जमात-उद-दावा जैसे संगठनों और पाकिस्तान के दुष्प्रचार को सही ठहरा दिया। इससे आतंक के खिलाफ भारत की लड़ाई कमजोर होगी।' बीजेपी के बाद संघ के राम माधव ने मोर्चा संभाला। तो बोले- कांग्रेस नेताओं में आतंकवादियों का करीबी बनने की होड़ मची हुई है। इस बयान से राहुल की समझ उजागर हो गई। यानी विपक्षी बीजेपी ने राजनीतिक फायदे के लिए राहुल के बयान को भुनाने में कोई देरी नहीं की। सो जब कांग्रेस को लगा, बीजेपी राजनीतिक बढ़त ले रही। तो फौरन राहुल गांधी के हवाले से कांग्रेस का स्पष्टीकरण जारी हो गया। मामला सीधे राहुल से जुड़ा था। सो कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी हों या महासचिव जनार्दन द्विवेदी, तीन लाइन के बयान से इतर कुछ नहीं बोले। अब जरा राहुल का स्पष्टीकरण देखिए। कहा गया- 'हर प्रकार का आतंकवाद और सांप्रदायिकता देश के लिए खतरा। ऐसी गतिविधियां करने वाला कौन, यह मायने नहीं रखता। पर हमें हर तरह के आतंकवाद के प्रति सतर्क रहना होगा।' कांग्रेस प्रवक्ता ने तो बीजेपी को अपने गिरेबां में झांकने की नसीहत दी। पर जब वोट बैंक की राजनीति करनी हो। तो बीजेपी हो या कांग्रेस, भला कौन अपने गिरेबां में झांकता। अब भले विकीलिक्स पर राहुल और अमेरिकी राजदूत के बीच लंच के दौरान हुई बातचीत से बवाल मच गया। पर जरा विकीलिक्स के खुलासे का पूरा ब्यौरा देख लें। दस्तावेज के मुताबिक जब राहुल गांधी और भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर लंच पर बैठे। तो आतंकवाद पर चर्चा में राहुल ने उनसे कहा- 'भारत के कुछ मुस्लिम समुदायों में चरमपंथी गुट लश्कर-ए-तोइबा के समर्थन के सबूत हैं, लेकिन देश के लिए बड़ा खतरा कट्टरपंथी हिंदू गुटों का बढऩा है, जो मुस्लिम समुदाय के साथ धार्मिक तनाव और राजनीतिक टकराव पैदा करते हैं।' यानी राहुल के मुताबिक पाकिस्तान स्थित गुटों से होने वाले आतंकवादी हमलों पर कट्टरपंथी हिंदुओं की प्रतिक्रिया चिंता की बात। सचमुच अगर देश में इस तरह प्रतिक्रिया होने लगे, तो फिर देश के हालात क्या होंगे? माना, राहुल हों या कोई और, वोट बैंक की राजनीति या तुष्टिकरण में पीछे नहीं। सबका अपना-अपना स्वार्थ और वोट बैंक होता। राजनीति करने वाले वैसे भी दूध के धुले नहीं होते। राहुल गांधी अयोध्या फैसले के कुछ दिन बाद ही मध्य प्रदेश दौरे के वक्त संघ और सिमी को एक तराजू में तोल आए थे। पर सियासत के तमाम खुरपेच के बावजूद अगर राहुल और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बातचीत को गहराई से देखें। तो शायद यही कहेंगे, मचा शोर पहलू में बहुत, पर चीरा तो कतरा ए खूं न निकला। राहुल ने किसी जनसभा में यह टिप्पणी नहीं की। सो कम से कम इस बयान को वोट बैंक की राजनीति नहीं कह सकते। अलबत्ता यह राहुल की गंभीर चिंता को दर्शा रहा। सो किसी भी राष्ट्रभक्त नागरिक को सकारात्मक सोच दिखाने की जरूरत। अगर कथित इस्लामिक आतंकवाद के जवाब में कथित हिंदू आतंकवाद विकराल रूप धर ले। तो देश की तस्वीर क्या होगी? ऐसा भी नहीं कि मालेगांव और अजमेर जैसे ब्लास्ट में हिंदू कट्टरपंथियों की भूमिका नहीं। आम तौर पर किसी भी देश में अल्पसंख्यक खुद को थोड़ा असुरक्षित मानते। पर जब बहुसंख्यक आबादी के कुछ लोग बदले की आग भडक़ाएंगे। तो पाक और भारत में क्या फर्क रह जाएगा? पाक आज अपनी ही आग में कैसे झुलस रहा, जगजाहिर। अब राजनीति का सवाल, तो बीजेपी को भी अपना इतिहास याद रखना होगा। अगर राहुल का बयान आतंकवाद पर लड़ाई कमजोर करने वाला। तो फिर 28 जुलाई 2008 को दिया सुषमा स्वराज का बयान क्या था? जब 25-26 जुलाई 2008 को बेंगलुरु-अहमदाबाद में सीरियल बम ब्लास्ट हुए। तो सुषमा ने बम धमाके का आरोप सीधे केंद्र सरकार पर फोड़ दिया। दो बीजेपी शासित राज्यों में एक साथ हुए धमाकों को उन ने मनमोहन के विश्वास मत से जोड़ा था। यों बीजेपी ने बाद में बयान से दूरी बना ली। पर सुषमा ने अपना बयान वापस नहीं लिया। सुषमा ने तो बाकायदा बीजेपी के मंच से बयान दिया था। राहुल ने तो लंच भेंट में अनौपचारिक बातचीत की।
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17/12/2010
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17/12/2010
Thursday, December 16, 2010
अड़तालीस साल बाद भी चीन के सामने दब्बू क्यों?
चीन की चकल्लसबाजी असर दिखा गई। पिछले साल अक्टूबर में भारत-चीन रिश्तों में जबर्दस्त तल्खी आई। तीन अक्टूबर 2009 को पीएम मनमोहन अरुणाचल के चुनावी दौरे पर गए थे। तब दस दिन बाद यानी तेरह अक्टूबर को चीन ने मनमोहन के दौरे पर सवाल उठाया। अरुणाचल को विवादास्पद बता पीएम के दौरे पर एतराज जताया। तब भारत ने थोड़ी सख्ती दिखाई, चीनी राजदूत को तलब कर लिया था। फिर भी चीन ने अपना डरावना चेहरा दिखाना बंद नहीं किया। भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश में चीन ने पाक से खूब पींगें बढ़ाईं। पाक पीएम यूसुफ रजा गिलानी और चीनी राष्ट्रपति हू जिन्ताओ के बीच हुई मीटिंग में झेलम पनबिजली प्रोजैक्ट और काराकोरम मार्ग में सहयोग का वादा हो गया। तब जिन्ताओ ने बाकायदा बयान दिया था- भले वैश्विक परिस्थितियां बदल रहीं, पर पाक और चीन के लोग आपस में दिल से जुड़े हुए। यों चीन की ऐसी दिल्लगी कौन नहीं जानता। पंडित नेहरू के जमाने में चीन ने अपने साथ भी दिल्लगी की थी। सो चीन का पाक प्रेम सिर्फ भारत पर हौवा बनाने के लिए। चीनी फार्मूला, दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त। फिर वीजा डिप्लोमैसी का खेल किया। तो कभी अरुणाचल के लोगों को वीजा नहीं, तो कभी कश्मीर के बाशिंदों को स्टेपल्ड वीजा दिया। कश्मीर को भारत से अलग मान चीनी दूतावास लंबे समय से पासपोर्ट के बजाए कोरे कागज पर मुहर लगाता था। चीनी अतिक्रमण के किस्से तो पिछले साल इस कदर बढ़ गए थे कि कभी अरुणाचल तो कभी उत्तराखंड से खबरें आतीं। पर मनमोहन सरकार ने चुप्पी साध ली। यानी पिछले अक्टूबर से लेकर हाल तक चीन ने भारत पर दबाव बनाने के हर पेंतरे आजमाए। पर भारत ने आंखों पर गांधारी की तरह पट्टी बांध ली। सो चीनी प्रधानमंत्री का चार सौ के दल-बल के साथ भारत दौरा हुआ। तो अपनी तैयारी का नमूना देखिए। न स्टेपल्ड वीजा पर भरोसा मिला, न यूएन सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का। न मुंबई हमले के लिए पाक की निंदा, न सीमा पर चीनी अतिक्रमण की बात। पर चीन की चालाकी देखिए, वेन जियाबाओ जिस मकसद से आए, उसे पूरा कर लिया। भारत का मध्य वर्गीय बाजार अमेरिका-चीन समेत औद्योगिक देशों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र। सो पहले ओबामा ने अपना काम किया। पर अमेरिका से भी भारत को रणनीतिक साझेदारी मिली। अमेरिका ने चीन की तरह भारत को पूरी तरह दबाव में नहीं रखा। पर चीनी पीएम वेन जियाबाओ और मनमोहन की वार्ता के बाद छह अहम बिंदुओं पर समझौते हुए। चीन सौ बिलियन डालर के व्यापार का खाका बना गया। पर बदले में भारत ने क्या हासिल किया? भारत-चीन के बीच व्यापार में असंतुलन किसी से छुपा नहीं। स्टेपल्ड वीजा तक के मुद्दे पर जियाबाओ ने टका सा जवाब दिया। खुद भरोसा देने के बजाए अधिकारियों पर टाल दिया। सो कुल मिलाकर चीन की साल भर की कोशिश सफल रही। पर अपनी सरकार की तैयारी ऐसी रही, हर मोर्चे पर डिफेंसिव दिखे। या यों कहें, सरेंडर कर दिया, तो अतिशयोक्ति नहीं। सचमुच मनमोहन सरकार आंतरिक मोर्चे में ही उलझी रह गई। भ्रष्टाचार के भंवर से निकलने की कोशिश में वेन जियाबाओ को वॉकओवर दे दिया। मनमोहन सरकार जेपीसी और सुप्रीम कोर्ट को सफाई देने की तैयारी में ही लगी रही। यों गुरुवार को थोड़ी राहत मिली, जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच की मॉनीटरिंग कबूल ली। अब विपक्ष की मजबूरी, सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठा सकता। सीबीआई, सीवीसी, पीएसी, एक सदस्यीय कमेटी से जांच को ठुकरा चुका। पर सुप्रीम कोर्ट ने निगरानी का बीड़ा उठाया। तो बीजेपी को स्वागत करना ही पड़ा। पर भ्रष्टाचार के मुद्दे से सरकार को घेरने की देशव्यापी रणनीति का एलान हो चुका। सो बीजेपी के राजीव प्रताप रूड़ी बोले- कोर्ट की पहल का स्वागत। पर यह जेपीसी का विकल्प नहीं। यानी अगर जांच की यही रफ्तार रही, तो बजट सत्र आते-आते जेपीसी मांग की हवा निकल चुकी होगी। पर बात चीन की, जिसने साबित कर दिया। बॉर्डर तो बहाना, असली लड़ाई बाजारवाद की। पिछले साल जब दोनों देशों में वार ऑफ वर्ड चरम पर था, तब 15 अक्टूबर को यही बात आपको बताई थी। पर सवाल, हम खुद को चीन से कमजोर मान मनौवैज्ञानिक हार क्यों कबूल रहे? दुनिया अब 1962 जैसी नहीं। भारत को 1962 की भूल से सबक लेकर अपनी बढ़ती ताकत का भरोसा होना चाहिए। जब आर्थिक महामंदी ने दुनिया को झकझोर दिया। तो सिर्फ भारत और चीन ही ऐसे दो देश, जिन ने मंदी को मात दी। सो चीन की कोशिश हमेशा यही होगी, भारत मजबूत ताकत बनकर न उभरे। इतिहास साक्षी, कैसे माओत्सेतुंग ने भारत को सबक सिखाने का एलान किया था। कैसे लाल झंडा बीजिंग से होकर काठमांडू, कलकत्ता और लंदन तक पहुंचाने का दंभ भरा था। यह नहीं भूलना चाहिए। चीन ने आज भी पीओके में 43,180 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा जमा रखा। पर दबाव बनाने को भारत पर पूर्वोत्तर में 90,000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जाने का दावा ठोक रहा। सो चीन से रिश्तों में सावधानी जरूरी, समर्पण नहीं। यों इस डर की जिम्मेदार भी कांग्रेस। अपने नटवर सिंह ने एक बार कहा था- अगर 1962 की हार का विश्लेषण किया होता, तो डरने की बात नहीं होती। पर तबके पीएम को बचाने के लिए तबके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने जिम्मेदारी ओढ़ ली थी। अफसोस, अड़तालीस साल बाद भी चीन संग कूटनीति में दब्बू निकला भारत।
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16/12/2010
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16/12/2010
Wednesday, December 15, 2010
जनता की जेब पर डाका, डीएमके पर छापा
अब हलाल नहीं, झटके में आम आदमी की गर्दन उतरने लगी। सो रातों-रात पेट्रोल की कीमत बढ़ा ऐसा झटका दिया, लोग उफ भी न कर पाए। महंगाई को बढ़ा जनता का गला दबाना कोई अपने नेताओं से सीखे। रात में कीमतें बढ़ाईं, तडक़े देश भर में सीबीआई के छापे डलवा दिए। सो दिन भर अपनी मीडिया का जो भोंपू महंगाई पर बजता, सीबीआई के छापों में ही उलझा रहा। तभी तो न जनता का आक्रोश बाहर आ सका, न राजनीतिक दलों के पहले जैसे तेवर दिखे। यों युवा मोर्चा के बैनर तले जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर कीमत वापस लेने की मांग की। पर कांग्रेस की दबंगई का इतिहास कौन नहीं जानता। जब कांग्रेस ने एक बार कमिटमेंट कर दी, तो खुद की भी नहीं सुनती। अगर जेपीसी की ना कर दी, तो कोई माई का लाल हां नहीं करवा सका। भले संसद के समूचे सत्र की ऐसी-तैसी हो गई। ऐसे ही एटमी डील पर मनमोहन ने कमिटमेंट कर दी, तो लेफ्ट की समर्थन वापसी भी बेअसर रही। पर यह काहे का लोकतंत्र, जहां जनता की आवाज झटके से काटे जाने वाले बकरे की तरह दबा दी जाती। क्या यह लोकतांत्रिक तानाशाही नहीं? अगर सरकार को ऐसी ही तानाशाही दिखानी, तो कभी महंगाई पर क्यों नहीं दिखाती? पर जनता की फिक्र तो सिर्फ चुनावी मौसम में ही। तभी तो पिछली बार मनमोहन अमेरिका की खातिर सरकार कुर्बान करने पर अड़ गए थे। अबके भ्रष्टाचार पर जेपीसी से बचने के लिए। बुधवार को देश भर में 34 जगहों पर सीबीआई ने छापे मारे। ए. राजा के करीबियों के साथ-साथ करुणानिधि की बेटी कनीमोझी तक आंच पहुंच गई। सो कीमत में बढ़ोतरी से ध्यान बंटाने को नया सुर्रा छोड़ दिया। अब कांग्रेस-डीएमके के रिश्तों में दरार की खबरें उडऩे लगीं। अपना मीडिया तो बहुमत के गुणा-भाग में भी जुट गया। करुणा निकाला, जया जोड़ी। कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा और मनमोहन का कुनबा खड़ा कर दिया। पर अपने मीडिया का करेक्टर फिर कभी तफ्सील से बताएंगे। फिलहाल बात चेन्नई में बुधवार को 27 जगह पड़े छापों से डीएमके-कांग्रेस में मची खलबली की। छापों से खफा डीएमके ने शनिवार को चेन्नई में फैसलाकुन बैठक का एलान कर दिया। पर आंकड़ों का समीकरण ऐसा, रिश्ता टूटा, तो केंद्र और राज्य दोनों की सरकार खतरे में। तमिलनाडु में अप्रैल में चुनाव होने। पर राजनीतिक हालात डीएमके के खिलाफ। सो कांग्रेस भी अब जयललिता की अन्नाद्रमुक से पींगें बढ़ाने की फिराक में। पर कांग्रेस की रणनीति, डीएमके खुद छोडक़र जाए। सो कांग्रेस जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां बना रही कि डीएमके गठबंधन छोडऩे को मजबूर हो जाए। कांग्रेस की इस रणनीति की वजह भी साफ। भ्रष्टाचार के दलदल में अब कांग्रेस भी फंसने लगी। सो डीएमके को अलग कर ए. राजा की बलि लेने की तैयारी। ताकि विपक्ष को चित कर जनता को संदेश दे सके। यानी पूरे खेल में कांग्रेस का संदेश होगा, भ्रष्टाचारी मंत्री तक को भी नहीं बख्शा। डीएमके से रिश्ता तोड़ सरकार दांव पर लगा दी। पर यही काम तो कांग्रेस ने झारखंड में मधु कोड़ा के साथ किया। कोड़ा फिलहाल तिहाड़ में, राजा को कांग्रेस कहां भेजेगी, यह भविष्य के गर्भ में। पर कछुआ से खरगोश बनी सीबीआई का काम कांग्रेस का कार्यक्रम बता रहा। सो कांग्रेस और डीएमके के बीच तलाक होना तय मानिए। अब सिर्फ वक्त, वक्ता और स्थान का इंतजार। रही बात मनमोहन सरकार पर खतरे की, तो अब अपने मनमोहन सरकार बचाने में माहिर हो चुके। पिछली बार सांसदों की बोली शुरू तो 25 करोड़ से हुई, पर कहां तक गई, मालूम नहीं। तब अमेरिका से एटमी करार वजह थी। अबके तो एक नील 76 खरब के भ्रष्टाचार पर बलि का मुद्दा। सो सांसदों के रेट क्या होंगे, भगवान ही जाने। पर अब भ्रष्टाचार हो या महंगाई, भुगतना तो आम आदमी को ही। पेट्रोल में आग लगा अब डीजल, रसोई गैस की तैयारी। पर सवाल, पेट्रोल-डीजल की कीमतें कहां जाकर थमेंगी? जब एनडीए से कांग्रेस ने सत्ता छीनी, तो दिल्ली में पेट्रोल 30 और डीजल 20 रुपए लीटर थी। पर आज पेट्रोल करीब 60, तो डीजल 40 रुपए के पार। आज भी पेट्रोल की कीमतें पाकिस्तान में 26, बांग्लादेश में 22, नेपाल में 34, बर्मा में 30, अफगानिस्तान में 36 रुपए लीटर। पेट्रोल की उत्पादन कीमत महज 20 रुपए, पर भारत में यह तेल नहीं, राजस्व का कुआं बन चुका। सो बाकी टेक्स के रूप में आम आदमी से वसूल रही सरकार। मनमोहन दूसरी बार पीएम बने, पर संयोग कहें या या कुछ और। पर पेट्रोल-डीजल, दाल, चावल, आटा, सब्जी, दूध, चीनी सभी चीजों के दाम दुगुने हो चुके। भ्रष्टाचार की रफ्तार तो ऐसी, आम आदमी गिनती भूल जाए। स्विस बैंक के एक डायरेक्टर ने कहा था- भारतीय गरीब हैं, भारत नहीं। भारतीयों के 280 लाख करोड़ रुपए स्विस बैंक में जमा, जिससे तीस साल तक भारत का टेक्सलेस बजट बन सकता। साठ करोड़ रोजगार पैदा हो सके। देश के दूरदराज गांव से दिल्ली तक चार लेन की सडक़ें बन सकतीं। पांच सौ सामाजिक परियोजनाओं को मुफ्त बिजली मिल सकती। देश के हर नागरिक को साठ साल तक दो हजार रुपए मंथली मिल सकते। पर इस धन को लाने के लिए कोई पहल नहीं। अलबत्ता पिछले छह महीने में छठी बार जनता पर बोझ डाल दिया।
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15/12/2010
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15/12/2010
Tuesday, December 14, 2010
'नर्वस न हो कॉरपोरेट, देश भले नर्वस हो जाए'
न कभी ऐसी सरकार देखी, न कभी ऐसा विपक्ष। अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर कुछ इसी अंदाज में आरोप लगा रहे। संसद ठप होने के लिए आडवाणी ने सरकार को कोसा। बोले- ऐसा कांग्रेस की वजह से हुआ। तो जवाब में कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी बोले- बीता सत्र अलग तरह से याद किया जाएगा। ऐसा विपक्षी आचरण हमने कभी नहीं देखा। अब कांग्रेस-बीजेपी ने एक-दूसरे में क्या देखा या नहीं, यह वही जानें। पर देश की जनता दोनों का आचरण बखूबी देख रही। सो भ्रष्टाचार में घिरी कांग्रेस पर आडवाणी ने फिर चोट की। सडक़ों पर संघर्ष का औपचारिक एलान हो गया। दिल्ली, मुंबई, जयपुर समेत देश के तमाम शहरों में तीन महीने तक भ्रष्टाचार विरोधी रैलियां होंगी। आडवाणी ने टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को बहुआयामी बता फिर जेपीसी की मांग दोहराई। बोले- सत्र में कोई कामकाज न होना भी नतीजा देने वाला रहा। आडवाणी बोले- संसद में विपक्ष इस कदर सरकार को नहीं घेरता, तो राजा की छुट्टी नहीं होती। पर आडवाणी को मलाल, भले राजा गए, पर सरकार की जिद के चलते प्रजा को सच्चाई मालूम नहीं पड़ी। राजा के घटाले में किसने-किसने मलाई काटी, यह बात दबी हुई। सो विपक्ष जेपीसी की मांग से फिलहाल पीछे नहीं हटेगा। आडवाणी ने बजट सत्र की रणनीति पर चुप्पी साध ली। मध्यावधि चुनाव के सुर्रे को भी उन ने नकार दिया। यानी कुल मिलाकर आडवाणी ने भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द ही कांग्रेस को घेरने की कोशिश की। सरकार और कॉरपोरेट लॉबी के गठजोड़ का जिक्र कर आडवाणी ने सोनिया पर भी चुटकी ली। बोले- पीएम को तो बहुत सी बातें पता भी नहीं होतीं। सो अब तक लगता था- केबिनेट दस जनपथ से तय होता। पर नीरा राडिया के टेप से हमारा भ्रम टूट गया। अब पता लगा, सोनिया भी नहीं, कॉरपोरेट लॉबी केबिनेट तय करती। सचमुच देश और पीएम पद के लिए इससे बड़ी विडंबना नहीं हो सकती। जब पीएम का विशेषाधिकार भी कॉरपोरेट जगत के लिए दलाली करने वाले हथिया लें। तो व्यवस्था से आम आदमी क्या उम्मीद करेगा? टाटा और अंबानी के लिए लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया के टेप खुलासे से सारा देश सकते में। पर देश के हर बड़े ताजा मसलों में मौन साधने वाले बाबा मनमोहन को कोई हैरत नहीं। सो मंगलवार को पीएम मनमोहन ने ऐसी बात पर चिंता जताई, जिसका कोई राष्ट्रीय सरोकार नहीं। उन ने फोन टेपिंग से हुए बड़े खुलासे पर कोई चिंता जाहिर नहीं की। अलबत्ता चिंता इस बात पर जताई कि टेप लीक कैसे हो रहे। पीएम ने बाकायदा केबिनेट सैक्रेट्री के.एम. चंद्रशेखर को हिदायत दे महीने भर में रपट मांग ली। क्या कभी पीएम ने बढ़ती महंगाई पर महीने भर में कोई रपट मंगाई? विज्ञान भवन में इंडियन कॉरपोरेट वीक का उद्घाटन करते हुए पीएम बोले- उद्योग जगत की नर्वसनेस से हम वाकिफ । अब अपने पीएम के बारे में क्या कहें, जिन्हें कॉरपोरेट जगत के नर्वसनेस की चिंता। भले भ्रष्टाचार के भंवर को देख अपना देश नर्वस क्यों न हो जाए। पर पीएम के बयान का कॉरपोरेट जगत ने दिल से स्वागत किया। उद्योगपति और सांसद राहुल बजाज ने खुशी तो जताई। पर कॉरपोरेट और राजनीति की सांठगांठ का बखान कर गए। बोले- गैर कानूनी ढंग से राजनीतिक दल कारोबारियों से फंड लेते। सो दोनों अपनी-अपनी जगह गलत हैं। सचमुच सरकार की नीतियां कैसे खास लोगों के लिए बनतीं, यह किसी आम आदमी से पूछकर देखिए। पर कोई उद्योगपति अगर दस रुपए का चंदा देता है, तो बदले में सरकार से दस करोड़ का काम भी करवाता। पर सवाल, आखिर अपने मनमोहन कभी आम आदमी की खातिर चिंता क्यों नहीं दिखाते? संसद में अमेरिका से जुड़े मुद्दों पर बहस हो, तो पीएम एक नहीं, चार-चार बार दखल देते। पर महंगाई की बात हो, तो पीएम की जुबां नहीं खुलती। किसानों की आत्महत्या पर आत्मा नहीं कचोटती। कॉरपोरेट जगत का दर्द मनमोहन को अपना सा लगता। नमूना आप खुद देख लो। संसद सत्र निपटा, तो पीएम की जुबां टाटाओं, अंबानियों को राहत देने के लिए खुली। पर मंगलवार की रात से ही एक बार फिर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ गए। यानी मालदार कंपनियों की चिंता में आम आदमी की चिता सजाई जा रही। सो भ्रष्टाचार पर कोई नजीर पेश करने वाली कार्रवाई होगी, उम्मीद नहीं। अगर भ्रष्टाचार के प्रति चिंता होती, तो बिहार के सीएम नीतिश कुमार की तरह केंद्र में भी नेता जज्बा दिखाते। बिहार में घपले की विधायक निधि खत्म हो गई। भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जप्त कर उसके घर में स्कूल खोलने का प्रावधान बन गया। पर बिहार सरकार के इस फैसले को लागू करने में केंद्र ने साढ़े तीन साल लगा दिए। बिहार का बिल साढ़े तीन साल तक मंजूरी की बाट जोह रहा था। पर कार्यपालिका ही जब ऐसी, तो न्यायपालिका से क्या उम्मीद। अब तो छींटे न्यायपालिका पर भी पडऩे लगे। मद्रास हाईकोर्ट के जज रघुपति ने जुलाई 2009 में केंद्रीय मंत्री की ओर से धमकी की शिकायत की थी। तब हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एच.एल. गोखले ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन को नाम वाली चिट्ठी भेज दी। पर के.जी. बालाकृष्णन इनकार कर रहे। तो वही गोखले अब सुप्रीम कोर्ट में जज। सो उन ने पूरी कलई खोल दी। फिर भी बालाकृष्णन मानने को राजी नहीं। अब बालाकृष्णन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुखिया। सो आम आदमी भला किससे उम्मीद करे।
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14/12/2010
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14/12/2010
Monday, December 13, 2010
शहीदों को श्रद्धांजलि के बीच चिरायु हो भ्रष्टाचार!
संसद सत्र की बलि चढ़ गई, पर किसी भ्रष्टाचारी को बलि चढ़ाने वाली जेपीसी नहीं बनी। एक पूरे सत्र का हंगामे में गुजर जाना संसद का नया इतिहास रच गया। पर इस काले इतिहास में किसका परिहास बना? न विपक्ष, न सत्तापक्ष अपना परिहास मान रहा। यानी सचमुच अपनी संसद मजाक बनकर रह गई। तभी तो समूचा विपक्ष चीखता-चिल्लाता रह गया। सत्ता के बहरे कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब सत्र निपटने के बाद भी कांग्रेस और सरकार वही दलीलें दोहरा रहीं। जेपीसी को नकार पीएसी, सीबीआई, रिटायर्ड जज से जांच की बात। पर सवाल वही, जब कोई खुद को ईमानदार मान रहा। तो किसी भी जांच से डर कैसा? जेपीसी कोई भूत तो नहीं, वह संसद की नियमावली का ही हिस्सा। फिर कोई भी सरकार जेपीसी की मांग को कानून या संविधान की अवमानना कैसे करार दे सकती। पर अब संसद का शीत सत्र निपट गया। तो संकट के बादल बजट सत्र पर घुमडऩे लगे। एनडीए ने सोमवार को बापू की मूर्ति के सामने धरना दिया। अब सडक़ों पर विपक्ष का शंखनाद होगा। जिसकी गूंज बजट सत्र तक बरकरार रखने की तैयारी। सो संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल बोले- अगर बजट सत्र ठप हुआ, तो संवैधानिक संकट के लिए विपक्ष जिम्मेदार होगा। उन ने शीत सत्र में हंगामे की वजह से डेढ़ अरब रुपए के नुकसान का ठीकरा भी विपक्ष के सिर फोड़ा। तो बीजेपी से वेंकैया नायडू ने कमान संभाल ली। बोले- नुकसान की जिम्मेदार खुद कांग्रेस। अगर हंगामे से हुआ नुकसान अपराध, तो टू-जी स्पेक्ट्रम-कामॅनवेल्थ और आदर्श घोटाले के तीन लाख करोड़ डकारने वाले क्या अपराधी नहीं? सो बजट सत्र में किसका बाजा बजेगा, यह तभी दिखेगा। पर शीत सत्र के आखिर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने सांसदों से रू-ब-रू हुईं। तो गीता सार (क्यों व्यर्थ चिंता.. किससे व्यर्थ डरते.. कौन तुम्हारा क्या बिगाड़.... जो हुआ वह अच्छा.. जो हो रहा या जो होगा वह भी अच्छा..) का अनुसरण करते हुए जेपीसी से इनकार कर दिया। भ्रष्टाचार पर हंगामे के बीच पीएम के लंबे मौन की भी खूब तारीफ की। फिर उन ने बीजेपी को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू किया। सोनिया ने बीजेपी को कर्नाटक और तहलका की याद दिलाई। भ्रष्टाचार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया। पर सवाल, अगर बीजेपी ने भ्रष्टाचार किया, तो क्या कांग्रेस को भी भ्रष्टाचार का लाइसेंस? आखिर बचाव का यह कौनसा हथियार? भ्रष्टाचार पर अगर बीजेपी की कमीज सफेद नहीं, तो क्या कांग्रेस भी वैसी ही कमीज पहनेगी? राजनीति की यह कौन सी नैतिकता, जब छह साल एनडीए सत्ता में थी। तो कांग्रेस के 45 साल को अपनी ढाल बनाए चली। अब आठ साल बनवास के बाद कांग्रेस ने दुबारा सत्ता हासिल की। तो एनडीए के छह साल को ढाल बना लिया। आखिर जनता से यह आंख-मिचौली का खेल कब तक चलता रहेगा? यों सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की ओर से की गई कार्रवाई का भी ढोल पीटा। आदर्श घोटाले में अशोक चव्हाण का इस्तीफा, संचार घोटाले में राजा का इस्तीफा और जांच की दलील दी। पर कोई पूछे, क्या ये कार्रवाई कांग्रेस ने अंतरात्मा के धिक्कार पर की? चव्हाण हों या राजा का इस्तीफा। सीबीआई की जांच हो या सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से। कांग्रेस ने सारे कदम मीडिया, सुप्रीम कोर्ट और संसद में बने राजनीतिक माहौल के बाद उठाए। अब जब सोनिया गांधी खुद कह रहीं, कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार के मामले में छुपाने को कुछ नहीं। सो डरने की कोई बात नहीं। तो सवाल, जब छुपाने और डरने जैसी कोई बात नहीं। तो जेपीसी से डर कैसा? लोकतंत्र का तो यही तकाजा, अगर सत्तापक्ष के मन में कोई चोर नहीं। तो विपक्ष की हर शंका का समाधान करने में आगे बढक़र कदम उठाए। पर दोनों की जिद ने एक ऐसा इतिहास बना दिया, जो हर भ्रष्टाचार के वक्त याद आएगा। अगर संसद का कोई मतलब न होता, तो संविधान में एक्जीक्यूटिव आर्डर से ही सरकार चलाने का प्रावधान होता। पर संसद को सर्वोपरि इसलिए बनाया गया, ताकि सत्तापक्ष अपनी मनमानी न कर सके। फिर भी व्यवहार में संसद अब सत्तापक्ष की बपौती दिखने लगी। सो सोमवार को जब संसद हमले की नौवीं बरसी पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। तो भ्रष्टाचार पर बेनतीजा रही जंग देख यही लगा, इस बार शीत सत्र में शहीदों को श्रद्धांजलि तो दी गई। पर भ्रष्टाचार को चिरायु होने का आशीर्वाद मिल गया। अगर अपने नेता संसद का मान नहीं रख सकते। तो क्यों न संसद का विसर्जन कर श्रद्धांजलि दे देते। अपने नेताओं का कोई ठिकाना नहीं। कोई ऐसा प्रस्ताव लेकर भी आ जाए। जुबान पर कंट्रोल होता, तो दिग्विजय सिंह के बाद होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ऐसा न बोलते। दिग्विजय तो अपनी हठबयानी से पीछे हटने को राजी नहीं। पर सोमवार को चिदंबरम ने क्राइम कैपीटल बनी दिल्ली का गुनहगार प्रवासियों को बना दिया। सो संसद भवन में बिहार-यूपी के नेताओं ने चिदंबरम को जमकर कोसा। कोसने वालों में विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेसी भी शामिल। सो शाम होते-होते चिदंबरम ने बयान वापस ले लिया। पर बात तो मुंह से निकल चुकी। सो कांग्रेस की मंशा भी जगजाहिर हो गई। अगर चिदंबरम की नजर में प्रवासी दिल्ली के अपराध के लिए जिम्मेदार। तो क्या समूचे भारत में अपराध के लिए विदेशियों को जिम्मेदार कहेंगे?
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13/12/2010
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13/12/2010
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