Monday, May 10, 2010

पहले अमेरिका, अब चीन की पैरवी का क्या मतलब?

पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन की वजहों में चीन से हार का सदमा भी माना जाता। हाल ही में चीनी अतिक्रमण बढ़ा था। तो संसद और संसद के बाहर विपक्ष ने यही वजह गिना कांग्रेस को झकझोरने की खूब कोशिश की। वाकई नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया था। पर चीन ने पीठ में खंजर घोंप दिया। सो 1962 का वह जख्म आज भी कोई भारतवासी भुला नहीं पाता। वैसे भी चीन की साम्यवादी सरकार जिस नीति की पोषक, उस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। पर अपनी ही मिट्टी में जन्मे और रचे-बसे कुछ चीनी पैरोकार भी। सो गाहे-ब-गाहे चीनी प्रेम दिखा ही जाते। यूपीए-वन की सरकार में लेफ्ट अपने समर्थन की वसूली कर रहा था। जब-तब चीनी कंपनियों को विशेष रियायत देने की आवाज उठती रहती थी। तब लेफ्ट सरकार का हिस्सा नहीं, अलबत्ता बाहर से समर्थन दे रहा था। पर अबके सरकार के मंत्री ही चीनी कंपनी की लॉबिंग कर रहे। अपने जयराम रमेश वन व पर्यावरण मामले के स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री। पर लगता है, पद में स्वतंत्र क्या जुड़ा, जयराम कुछ अधिक ही स्वतंत्र हो गए। सो अबके उन ने चीन में जाकर अपने गृह मंत्रालय की मीन-मेख निकाली। दूर संचार क्षेत्र की एक चीनी कंपनी हुआवेई का निवेश भारत में नहीं हो पा रहा। अपने पी. चिदंबरम सुरक्षा कारणों से चीन के मामले में काफी सतर्क। पर कंपनी से ज्यादा जयराम रमेश को अखर गया। बीजिंग में कह दिया- गृह मंत्रालय का रुख जरूरत से ज्यादा रक्षात्मक और सावधानी बरतने वाला। सो चीनी निवेश की खातिर गृह मंत्रालय को नरम रुख अपनाना चाहिए। अब गृह मंत्रालय पर कांग्रेसी खेमे से यह दूसरी बड़ी टिप्पणी। पहले दिग्विजय सिंह उंगली उठा चुके। अब एक मंत्री ने सवाल उठा दिया। तो कांग्रेस में खलबली मच गई। हमेशा की तरह कांग्रेस ने मंत्री के बयान से दूरी बना ली। बीजिंग से सोमवार की सुबह लौटे जयराम ने पीएम से बात की। तो पीएम ने सलाह दी- दूसरे मंत्रालय के कामकाज पर टिप्पणी न करें। जहां तक चीन से संबंध का सवाल, तो सरकार के रुख में कोई भ्रम नहीं। अब आप इसे पीएम की फटकार कहेंगे, या कुछ और। अपनी नजर में तो यही लग रहा, जैसे पीएम सफाई दे रहे। वैसे विदेशी धरती पर अपने घर की पोल खोलना यूपीए सरकार की नई आदत नहीं। अपने पीएम तो देश में कभी-कभार ही बोलते। विदेश दौरे के वक्त घरेलू मुद्दों पर खुलकर बोलते। याद है, कैसे एटमी डील का वाजपेयी ने विरोध किया। तो मनमोहन ने वाशिंगटन में जॉर्ज बुश से वाजपेयी का नाम लेकर शिकायत की थी। सो जब मनमोहन ही ऐसा करें, तो फिर जयराम गलत कहां। यों जयराम ने एक गलती जरूर की। मनमोहन विदेश में जाकर विपक्ष पर हमलावर रहे। तो जयराम अपनी ही सरकार की पोल खोलने लगे। सो कांग्रेस ने फौरन बयान को गैरवाजिब बताया। उचित फोरम पर बात रखने की नसीहत दी। पर यह कोई पहला मौका नहीं, जब जयराम को ऐसी नसीहत मिली हो। वैसे तो यूपीए-टू की टीम मनमोहन में बयान बहादुरों की कमी नहीं। पर कोपेनहेगेन समिट से पहले पिछले साल अक्टूबर में भी जयराम ने सरकार की फजीहत कराई थी। जब पीएम को चिट्ठी लिख सलाह दी, भारत अपना स्टैंड बदल ले। तकनीकी के लिए सहायता की शर्त छोड़ जी-77 से खुद को अलग कर यूएस का साथ दे। यानी जयराम की सलाह थी, गुटनिरपेक्ष देशों की नेतागिरी छोड़ अमेरिका की बात मान लो। पर बवेला मचा, बीजेपी ने अमेरिका के लिए लॉबिंग करने का आरोप लगाया। खुद कांग्रेस ने अपने होनहार जयराम से दूरी बना ली। तो बीस अक्टूबर 2009 को सार्क देशों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में क्योटो प्रोटोकॉल पर ही राजी होना पड़ा था। संसद में भी सफाई देनी पड़ी थी। बीटी बैंगन पर भी जयराम ने खूब लॉबिंग की। पर आखिरकार लौट के घर आना पड़ा। तो खुन्नस में वरिष्ठ मंत्रियों पर ही खीझ उठे। फिर गंदगी के मामले में देश के लिए नोबल प्राइज का सुर्रा छेड़ सुर्खियों में छाए। प्रोजैक्ट को लेकर केबिनेट में कमलनाथ से तू-तू, मैं-मैं। डिग्री लेते वक्त गाउन पहनना एक परंपरा। पर जयराम ने पहनने के बाद मंच से उसे उतार फेंका। दलील दी, यह गुलामी की निशानी। पर कोई पूछे, मंच पर आने से पहले पहना ही क्यों था? जयराम को मीडिया की सुर्खी बनना खूब पसंद। तभी तो दिन में एकाध प्रेस कांफ्रेंस कर ही लेते। पर जयराम का विवाद से यहीं नाता खत्म नहीं। यूपीए-वन में जब रामसेतु पर हलफनामे में गड़बड़ हुई थी। तो अंबिका सोनी से इस्तीफा मांगने वालों में सबसे पहले खड़े थे जयराम। पर अबके चीन की पैरवी कर फंस गए जयराम। बीजेपी तो झारखंड का अपना आचरण भूल जयराम के आचरण पर सवाल उठाए। पीएम को इस्तीफा मांगने की सलाह दी। बीजेपी ने चिदंबरम की नीति को जायज ठहराया। कहा- चीनी हैकर इतने सक्रिय हो चुके, सो चिदंबरम की नीति सही। वाकई चीन की विस्तारवादी नीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चीन के बारे में यहां तक कहा जाता, उसने दुनिया के महत्वपूर्ण देशों के दस्तावेज चुराने के लिए हैकरों की एक आर्मी तैयार कर ली है। ऐसे में किसी चीनी कंपनी के हित में कोई भारतीय मंत्री इस हद तक जाए, तो क्या कहेंगे आप? आखिर चीन में ऐसी क्या आवभगत हुई, जो विदेश में देश की नीति पर सवाल उठा दिए? कभी अमेरिका, तो कभी चीन की पैरवी का क्या मतलब?
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10/05/2010

Friday, May 7, 2010

तो पक्ष-विपक्ष फील गुड में, ठगा सा आम आदमी

अब जाति पूछो साधु की। तो राजनीतिक दबाव में कबीरवाणी पलटेगी। बजट सत्र के आखिरी दिन विपक्षी दबाव असर दिखा गया। जनगणना में जाति शामिल करने की मांग पर पी. चिदंबरम ने टालू रवैया अपनाया। तो हंगामा मच गया। आखिर सोनिया-प्रणव ने लालू-शरद-मुलायम से गुफ्तगू की। फिर पीएम ने भरोसा दे ही दिया। जातीय जनगणना पर केबिनेट में जल्द फैसला करेंगे। पर सुषमा स्वराज का दावा, अब जनगणना में जाति का कॉलम शामिल होगा। सो बजट सत्र का समापन शांतिपूर्ण माहौल में हुआ। पर बजट सत्र ने कई मायनों में इतिहास रचा। राज्यसभा में महिला बिल पास हुआ। तो सात बवाली सांसदों ने मर्यादा ताक पर रख दी। मार्शल का इस्तेमाल भी इसी सत्र की गौरवगाथा में लिखा जाएगा। संसद कैसे चुनावी अखाड़ा बन चुका, इसकी मिसाल तो माननीयों ने कई बार दी। राज्यसभा में अरुण जेतली पर मणिशंकर अय्यर की अभद्र टिप्पणी। लोकसभा में सुदीप बंदोपाध्याय और वासुदेव आचार्य के बीच हुआ संवाद। फिर अनंत कुमार बनाम लालू की भिड़ंत। सबका निचोड़ आखिर में यही निकला। किसी ने माफी मांगी, तो किसी ने खेद जताया। शक्तियों से लैस संसद वैसे ही असहाय दिखी, जैसे गांव में चौक-चौराहे पर बैठा बुजुर्ग। आसंदी ने भी कोई ठोस फैसला नहीं लिया। सो सांसदों ने संसद को बपौती मान लिया। पर शुक्रवार को आखिरी दिन स्पीकर मीरा कुमार की व्यथा जुबां पर आ ही गई। सदन में बेवजह हंगामे में बीते पल-पल का ब्यौरा दिया। लगे हाथ नसीहत, अगर ऐसा ही चलता रहा, तो नहीं बचेगा संसदीय लोकतंत्र। सांसदों को सोचना होगा, कैसे छवि सुधारें, क्योंकि मीडिया और जनमानस में सांसदों की छवि खराब हो रही। अब मीरा की व्यथा जायज। पर क्या ऐसा कहने वाली वह पहली स्पीकर? सोमनाथ चटर्जी हों या मनोहर जोशी या जीएमसी बालयोगी या पीए संगमा। सबने गाहे-ब-गाहे सांसदों के हंगामे पर चिंता जताई। पर सिर्फ चेहरे बदलते रहे, सांसदों का चरित्र नहीं बदला। आखिर कैसे बदलेगा। आप गुरुवार का किस्सा लो। सुषमा स्वराज ने बतौर नेता अनंत कुमार की असंसदी टिप्पणी पर बिना इफ एंड बट के माफी मांगी। पर पता है, बीजेपी के वरिष्ठ महासचिव, नीति नियंता संसदीय बोर्ड के कर्ता-धर्ता माननीय अनंत कुमार ने बाद में क्या कहा। अनंत बोले- सुषमा ने मेरा नाम लेकर माफी नहीं मांगी। सो 543 सांसदों में कोई भी हो सकता है। अब बीजेपी की अनंत कथा को क्या कहेंगे। सुषमा स्वराज का माफीनामा क्या अनंत में सुधार ला पाया? अनंत को तो यह भी पता नहीं चला, जुबां से क्या असंसदीय शब्द निकल गया। पर शुक्रवार को जब सुषमा से पूछा गया, अबके संसद में मर्यादा तोड़ू प्रकरण खूब हुए। तो सुषमा बोलीं- भले कहीं भी पार्टी नेता कुछ बोल जाएं। पर कम से कम संसद में वाणी पर संयम होना चाहिए। पर संसदीय फोरम अब बहस के लिए नहीं रह गया। अलबत्ता राजनीतिक दल सुविधा के मुताबिक नैतिकता का मापदंड तय कर रहे। हूटिंग-शूटिंग, गाली-गलौज मानो सांसदों के स्वभाव में जुड़ गया हो। राजनीतिक दल अब विरोधी नहीं, शत्रु की भांति आपस में लडऩे लगे। राजनीतिक कटुता का एक अद्भुत नमूना पिछली लोकसभा में दिखा था। लालकृष्ण आडवाणी आतंकवादी हमले पर बोल रहे थे। तो उन ने कोयंबटूर विस्फोट का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि अगर टीवी इंटरव्यू में लेट न हुए होते, तो शायद वह भी आतंक के शिकार हो गए होते। तभी सत्ताधारी बैंच से बैठे-बैठे एक सांसद ने टिप्पणी कर दी- अच्छा होता, अगर लेट न हुए होते। तबके स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने टिप्पणी सुन ली। सो चुनौती दी- हिम्मत है, तो खड़े होकर बोलो। अब तो आए दिन गुस्से में एक दल के सांसद दूसरे दल के सांसद पर कभी मुक्का तान देते, तो कभी मां-बहन की गाली दे देते। सो कब सुधरेंगे अपने माननीय, यह तो वही जानें। पर बजट सत्र में कौन जीता, कौन हारा और किसकी टांय-टांय फिस्स हुई, यह आप खुद देख लो। बजट सत्र की शुरुआत महंगाई के मुद्दे से हुई। दूसरे चरण में बीजेपी ने लाखों लोगों की रैली की। लेफ्ट की रहनुमाई में तेरह दलों ने भारत बंद किया। पर महंगाई का क्या बिगड़ा। आईपीएल पर संसद कई दिन ठप रहा। पर नतीजा क्या निकला। अब बीजेपी शशि थरूर की बलि को जीत बता रही। पर शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल के इस्तीफे पर अब भी खामोश। आईपीएल और टेलीफोन टेपिंग पर जेपीसी की मांग पीएम ने ठुकरा दी। फिर भी बीजेपी यही कह रही- हमने संसद में नियमों की हर विधा का इस्तेमाल कर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। पहली बार कटौती प्रस्ताव लेकर आए। आईपीएल पर थरूर का इस्तीफा कराया। जातीय जनगणना पर पीएम से वादा लिया। परमाणुवीय नुकसान के लिए सिविल दायित्व बिल का विरोध किया। अब कोई पूछे, महंगाई हो या आईपीएल या टेपिंग या सिविल दायित्व बिल, आखिर किसकी चली। सरकार ने जो चाहा, कर लिया। अगर विपक्ष रार ठान लेता, महंगाई पर कदम उठाए बिना वित्तीय कामकाज नहीं होने देंगे। तो शायद सरकार हरकत में आती। पर विपक्ष ने हर काम में साथ दिया। शुक्रवार को सिविल दायित्व बिल तभी पेश हो सका, जब बीजेपी-लेफ्ट वाकऑउट कर गए। बीजेपी ने वोटिंग की मांग नहीं की। अब यह विपक्ष और सत्तापक्ष की जुगलबंदी नहीं तो क्या? सत्तापक्ष बजट सत्र को अपनी जीत बता रहा, विपक्ष अपनी। यानी बजट सत्र से फील गुड में पक्ष और विपक्ष। पर ठगा सा रह गया, सिर्फ आम आदमी।
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07/05/2010

Thursday, May 6, 2010

26/11 से 06/05 ... पर मंजिल अभी दूर

पाक रे पाक, तेरा इरादा कितना नापाक। जुर्म करो इंडिया में, सजा मिले पाक में। क्या तभी होगा न्याय? अपनी स्पेशल कोर्ट ने कसाब को फांसी की सजा दी। तो फरीदकोट में रहने वाले कसाब के शुभचिंतकों ने जतला दिया, पाक हुक्मरान का अगला कदम क्या होगा। कसाबवादी पाकिस्तानियों ने भारत की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए। दलील दी, अगर सबूत था, तो पाक की अदालत में पाक के कानून के तहत सजा मिले। पर सवाल, अब तक कितने आतंकवादियों को पाक की अदालत ने सजा दी? मौलाना अजहर मसूद, जकीउर रहमान लखवी जैसों के खिलाफ भारत ने न जाने कितने सबूत दिए। पर पाक हुक्मरान भारत के दिए हर डोजियर को डाइजेस्ट कर गए और डकार तक नहीं ली। कसाबवादी यह भी भूल गए, कैसे पाक ने कसाब को अपना मानने से इनकार कर दिया था। कसाब के साथ आए बाकी नौ आतंकियों की लाश पाक ने नहीं ली। तो इसी साल जनवरी में दफना दिया गया। पर अब न्यायिक प्रक्रिया के तहत पाक बेनकाब हुआ। तो चेहरा ढांपने को बहाने ढूंढ रहा। पाक प्रवक्ता ने कसाब को फांसी पर चुप्पी साध ली। पर भारतीय नेताओं की टिप्पणी को गैरवाजिब बता दिया। यानी पाक अब भी सबक लेने को तैयार नहीं। खुद के भस्मासुरों से पाक परेशान। दुनिया में कहीं भी आतंकी वारदात हो, उसका लिंक कहीं न कहीं पाक से ही जुड़ जाता। फिर भी पाक है, कि सुधरने का नाम नहीं। अब ताजा मुद्दा न्यूयार्क के टाइम्स स्क्वायर में कार बम का। तो आरोपी पाकिस्तानी निकला। महज 48 घंटे में अमेरिकी पुलिस ने आतंकी फैजल शहजाद को गिरफ्तार कर लिया। फौरन एफबीआई का दस्ता फैजल के पाक स्थित घर पहुंच गया। अब अमेरिका को पाक में खुली छूट। तो पाक आखिर भारत की धौंस में क्यों आएगा। तभी तो 26/11 के बाद भी पाक ने आरोपियों पर ठोस कार्रवाई नहीं की। भारत ने कूटनीतिक दबाव बनाया। पर अमेरिका का दोगलापन बीच में आ गया। अब कसाब को फांसी हुई। तो अमेरिका ने फिर पाक को सख्ती का संदेश दिया। पर मुंबई हमले का मास्टर माइंड डेविड हैडली और राणा तो अमेरिकी गिरफ्त में। हैडली पर भारतीय कानून का जोर नहीं चल सकता। अमेरिका ने उस आतंकवादी से समझौता कर लिया। सो भले निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के तहत कसाब को फांसी मिली। पर अपनी नजर में यह अधूरा न्याय। लखवी हो या हैडली-राणा अपनी पहुंच से बाहर। यों विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने कसाब की सजा को पाक के लिए सबक बताया। पाक में बैठे कसाब के आकाओं के जुर्म पर मोहर बताई। प्रत्यर्पण की कोशिश का एलान किया। पर क्या पाक से ऐसी उम्मीद है आपको? अब तो पाक ऐसे पैंतरे आजमाएगा, जिनसे भारत की जांच पर सवाल उठें। यों कसाब को सजा तथ्य और पुख्ता सबूतों के आधार पर हुई। पर वाकई अपनी जांच सवालों के घेरे में। हैडली-राणा जैसे मास्टर माइंड की भनक अपनी एजेंसी को तब मिली, जब अमेरिका ने बताया। पर अमेरिका ने अपनी एजेंसी को हैडली से पूछताछ तो दूर, चेहरा तक नहीं देखने दिया। सो पाक की गुर्राहट पर वही कहावत मौजूं- सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का। पर पाक की पैंतरेबाजी आगे दिखेगी। फिलहाल कसाब को फांसी की सजा ने पीडि़तों के जख्म पर थोड़ा मरहम जरूर लगाया। विशेष जज ने भी माना, कसाब के सुधरने की गुंजाइश नहीं। सो चार मामलों में फांसी, छह मामलों में उम्रकैद की सजा दी। सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने तो मंगलवार को ही कह दिया था, कसाब को इनसान नहीं कहा जा सकता। वह एक किलिंग मशीन है, जिसका निर्माण पाक में हुआ। सो गुरुवार को फांसी की सजा का एलान हुआ। तो पीडि़त परिवारों ने फौरन फांसी पर लटकाने की अपील की। तो सजा के अमल पर कुछ सवाल भी उठे। सचमुच जब संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु को अब तक फांसी पर नहीं लटकाया गया। तो कसाब को कब लटकाएगी सरकार। जब-जब अफजल का मामला उठा, वोट बैंक की राजनीति हावी हो गई। जम्मू-कश्मीर में गुलाम नबी सीएम थे, तो रमजान महीने के आखिरी जुमे की दलील देकर फांसी की तारीख टलवा दी थी। कई मानवाधिकारवादी झोला उठाए सडक़ों पर आ गए। अफजल राष्ट्रपति को दया याचिका देने के खिलाफ था। पर झोला छाप वालों ने अफजल की पत्नी के जरिए याचिका डलवा दी। तीन-चार साल हो चुके, दया याचिका पर दिल्ली की कांग्रेस सरकार कुंडली मारकर बैठी हुई। कांग्रेसियों से पूछो। तो यही कहेंगे- लिस्ट में अफजल का नंबर आएगा, तो फैसला होगा। अब जरा दया याचिका की मौजूदा लिस्ट देखो, तो कुल 29 का आंकड़ा, जिसमें अफजल का नंबर इक्कीसवां। पिछले साल 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी हिदायत दी- दया याचिकाओं का जल्द निपटान करे। यूपीए सरकार की ओर से 24 नवंबर 2009 को लोकसभा में जवाब आया। माफी याचिका को लेकर संविधान के अनुच्छेद 72 में कोई समय सीमा नहीं। अब कहीं दो-तीन साल बाद भी कसाब को किसी अदालत से राहत नहीं मिली। और कसाब से पहले किसी ने राष्ट्रपति को दया याचिका की अर्जी नहीं दी। तो कसाब का नंबर तीसवां होगा। अगर संविधान के अनुच्छेद 72 में कोई समय सीमा नहीं, तो फिर फांसी और उम्रकैद की सजा में फर्क क्या? सो गुरुवार को यही सवाल उठा, क्या कसाब को फांसी होगी? मुंबई में 26/11 को हमला हुआ। अपनी अदालत ने 06/05 को सजा सुनाई। पर .... आखिरी मुकाम कहां?
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06/05/2010

Wednesday, May 5, 2010

अट्ठाईस मिनट ही मर्यादा में रह पाए अपने सांसद

अपनी संसद को सचमुच ग्रहण लग चुका। एक विवाद सुलटता नहीं, दूसरा गले पड़ जाता। दोनों सदनों में बुधवार का दिन माफीनामे का रहा। दिल से कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर हाल-फिलहाल राष्ट्रपति कोटे से राज्यसभा में मनोनीत हुए। सोमवार को उन ने विपक्ष के नेता अरुण जेतली को फासिस्ट कह दिया था। मणिशंकर को खुन्नस थी, दंतेवाड़ा कांड पर बहस के दौरान जेतली ने इशारों में ही उन्हें हाफ माओइस्ट कह दिया था। पर मणि ने सीधी टिप्पणी कर दी। सो राज्यसभा में तबसे गतिरोध जारी था। यों सरकार के वित्तीय कामकाज में विपक्ष ने अड़ंगा नहीं लगाया। पर बाकी कामकाज ठप पड़े थे। वैसे भी राज्यसभा में बिन विपक्ष के समर्थन के कांग्रेस का एक कदम भी चलना संभव नहीं। सो सरकार में शामिल कांग्रेसी मणिशंकर से खफा हो गए। माफी मांगने का दबाव बनाया। तो मणि ने प्रणव, बंसल, पृथ्वीराज की एक नहीं सुनी। जनार्दन द्विवेदी का फरमान गया। तो भी मणि नहीं डिगे। आखिर में दस जनपथ का संदेश ही काम आया। सो बुधवार को मणिशंकर को खेद जताना पड़ा। लोकसभा में भी कुछ ऐसा ही गतिरोध था। तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय ने मंगलवार को सीपीएम के वासुदेव आचार्य के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की। पर माफी मांगने को राजी नहीं। सो बुधवार को मीरा कुमार ने आसंदी से टिप्पणी की। सुदीप के कल के आचरण और शब्द को अशोभनीय करार दिया। बोलीं- सदस्य के ऐसे आचरण को मैं खारिज करती हूं और उम्मीद करती हूं कि भविष्य में इस सदन का कोई भी सदस्य आसंदी को ऐसी कठोर टिप्पणी के लिए मजबूर नहीं करेगा। अब आसंदी से ऐसी टिप्पणी हो, फिर भी सुदीप सदन में माफी न मांगें। तो ऐसे जनाब को क्या कहेंगे आप। पर वासुदेव माफी की मांग पर अड़ गए। सो दोपहर तक सदन ठप रहा। तो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की ओर से फार्मूला आया। विपक्ष की ओर से तमाम दलों के नेताओं ने वासुदेव से अपील की। सुदीप को माफ कर दो। वासुदेव ने भी बड़े होने के नाते बड़ा दिल दिखाया। बात रफा-दफा हो गई। पर सुदीप का गुरूर नहीं टूटा। बोल पड़े, संसद में कैसे व्यवहार करना, यह मुझे सीपीआई से सीखने की जरूरत नहीं। वाकई ममता बनर्जी के दल को वासुदेव से सीखने की क्या जरूरत। खुद ममता ही सिखाने को काफी। उदाहरण तो कल यहीं पर आपको बता चुके। पर माफीनामा चाहे जितने हो जाएं, मर्यादा तोड़ू रोग का इलाज नहीं हो रहा। आखिर हो भी कैसे, जब कोई पीठासीन अधिकारी सख्ती न दिखाए। सिर्फ माफीनामा और भत्र्सना कर देने से मर्यादा तोडऩे वालों का कुछ नहीं बिगड़ता, ना ही कोई शर्मिंदगी महसूस होती। अलबत्ता संसद की मर्यादा धूमिल जरूर हो जाती। तभी तो दोपहर दो बजे दोनों सदनों में माफीनामा हुआ। पर अट्ठाईस मिनट बाद ही मर्यादा फिर टूट गई। जनगणना में जाति और राष्ट्रीयता को लेकर बहस शुरू हुई। बीजेपी से अनंत कुमार ने मोर्चा संभाला। तो अनंत का फोकस पूरी तरह से बांग्लादेशी घुसपैठ पर रहा। सो लालू विचलित होकर पूछ बैठे, मुद्दे पर क्यों नहीं आ रहे। अपनी पार्टी का एजंडा क्यों चला रहे। इस पर सुषमा ने जवाब दिया, क्या आरजेडी का एजंडा चलाएं। तो लालू ने आरएसएस का एजंडा बता दिया। सो जैसे कांग्रेसी संसद में विरोधियों के मुंह से सोनिया गांधी का नाम सुनकर ही भडक़ जाते। वैसे ही बीजेपी संघ परिवार का नाम सुन। सो अनंत तैश में आ गए। लालू यादव को देशद्रोही और गद्दार कह दिया। बस क्या था, हंगामा शुरू हो गया। सदन स्थगित होकर फिर बैठा। तो अनंत ने सफाई दी- मैंने लालू को गद्दार नहीं कहा। बल्कि यह कहा कि लालू तय करें, वह भारत के साथ हैं या बांग्लादेश के साथ या पाक के साथ। पर लालू गुस्से से लाल हो चुके थे। अनंत गलती मानने को राजी नहीं हुए। तो मुक्का बांध लालू अनंत को मारने दौड़े। पर मुलायम और गुरुदास दासगुप्त ने रोक लिया। सो शाम तक गतिरोध नहीं टूटा। अब सुषमा स्वराज और अनंत कुमार खम ठोककर कह रहे- जब कुछ गलत नहीं कहा, तो शब्द वापस लेना या माफी किस बात की। पर एक कहावत है, कबूतर के आंख मूंद लेने से बिल्ली भाग नहीं जाती। सदन का रिकार्ड चीख-चीखकर कह रहा, अनंत ने लालू को गद्दार कहा। सदन में शरद यादव ने भी कहा- मुझे भी ऐसा लगा, आप प्रोसीडिंग देख लो। रिकार्ड में नहीं है, तो अलग बात, पर बहुत लोगों ने सुना। शरद यादव ने सोलह आने सही कहा। अब जरा रिकार्ड में दर्ज अनंत का बयान आप देख लो- हम बांग्लादेश के साथ नहीं, घुसपैठियों के साथ नहीं, वोट बैंक पॉलिटिक्स के साथ नहीं, हम आप जैसे देश को बेचने के लिए तैयार नहीं हैं, आप देश के साथ .... (गद्दारी) कर रहे हैं। यों गद्दारी शब्द कार्यवाही से हटा दिया गया। आसंदी पर बैठे डिप्टी स्पीकर करिया मुंडा की टिप्पणी भी रिकार्ड में दर्ज। जब कहा- प्लीज डू नॉट यूज दैट वर्ड। फिर भी अनंत सीनाजोरी कर रहे, तो क्या कहेंगे। अब सुषमा-अनंत की दलील, अगर गद्दार शब्द असंसदीय। तो माधुरी गुप्ता के बारे में सदन में किस शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। पर बीजेपी लाख दलील दे, सदन का रिकार्ड यही कह रहा, अनंत झूठ बोल रहे। अब भी अनंत ने माफी नहीं मांगी, तो सदन में बहस संभव नहीं। अगर ऐसा हुआ, तो बीजेपी और सरकार की सांठगांठ उजागर होगी। जाति जनगणना पर सरकार में ही दो-फाड़। बिन बहस सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ। तो सरकार को बचने का मौका मिल जाएगा।
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05/05/2010

तो संसद में हंगामे का स्तर बढ़ा, बहस का नहीं

मुंबई की लोकल ट्रेनें क्या ठहरीं, अपनी संसद भी ठहर गई। खुद सीएम अशोक चव्हाण ने आंकड़े बताए। तो माना, मोटरमैन की हड़ताल से समूची मुंबई को लकवा मार गया। वाकई लोग काम पर नहीं पहुंच पाए। और जैसे-तैसे कर जो पहुंचे भी, वो काम नहीं कर पाए। सो संसद में जमकर बलवा हुआ। राज्यसभा तो चली, पर लोकसभा नहीं। बीजेपी-लेफ्ट-शिवसेना ने रेल मंत्री ममता बनर्जी को घेरा। पर ममता तो कोलकाता के निगम चुनाव में परचे भरवा रही थीं। सो सरकार को जवाब देना भारी पड़ गया। पवन बंसल ने ममता के दिल्ली लौटते ही बयान का भरोसा दिया, पर बात नहीं बनी। सो अपनी नेता पर हमला देख तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय कूद पड़े। बंसल के जवाब से खफा सीपीएम के वासुदेव आचार्य ने ममता की गैरहाजिरी पर सवाल उठाए। तो सुदीप आपा खो बैठे। हाथों से इशारा करते हुए चुप... चुप...। बंगाली में ही ऐसी गाली का इस्तेमाल हुआ, जो लोकसभा में पहले भी हो चुका। सो हंगामा हड़ताल से हटकर सुदीप पर टिक गया। स्पीकर मीरा कुमार ने मौके की नजाकत भांप सदन स्थगित कर दिया। पर विपक्ष ने रार ठान ली, सुदीप माफी मांगें, तभी सदन चलने देंगे। अब देर शाम हड़ताल तो खत्म हो गई। पर संसद का क्या, उसकी गरिमा तो न जाने कितनी बार खत्म हुई। सुदीप बंदोपाध्याय ने स्पीकर से मुलाकात के बाद भी यही खम ठोका, किसी सूरत में माफी नहीं मांगेंगे। अलबत्ता सुदीप ने बीजेपी-लेफ्ट से माफी की मांग कर दी। सुदीप बोले, संसद में कैसा व्यवहार करना है, यह मुझे कोई और न सिखाए। वाकई सुदीप को किसी और से सीखने की क्या जरूरत, जब इतनी तेज-तर्रार नेत्री की रहनुमाई में काम कर रहे। सनद रहे, सो सदन की मर्यादा वाले दो-चार किस्से बताते जाएं। शुरुआत ममता बनर्जी से ही। चौदहवीं लोकसभा में सोमनाथ चटर्जी स्पीकर थे। चार अगस्त 2005 की बात है, स्पीकर ने ममता का कामरोको प्रस्ताव खारिज कर दिया। ममता की शिकायत थी, बंगाल में वाम मोर्चा सरकार बांग्लादेशी घुसपैठियों को फर्जी तरीके से वोटर बना रही। पर मौका नहीं मिला, तो दोपहर बाद जब आसंदी पर डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल आए। तो ममता धड़धड़ाते हुए वैल में घुसीं। अपने साथ लाए तमाम दस्तावेज आसंदी के मुंह पर दे मारे। साथ में कारण सहित अपना इस्तीफा भी सौंप दिया। ममता कुछ ऐसा ही 1997 में भी कर चुकीं, जब रामविलास पासवान रेल मंत्री थे। रेल बजट में बंगाल की उपेक्षा का आरोप लगाकर वैल में घुसीं और आसंदी पर शॉल फेंक दिया। साथ में सांसदी से इस्तीफा भी। पर न स्पीकर सोमनाथ ने इस्तीफा मंजूर किया, और ना ही पी.ए. संगमा ने। किसी सांसद का इस्तीफा तभी मंजूर होता, जब बिना कारण बताए इस्तीफा दे। यानी ममता इस्तीफे के प्रति कितनी ईमानदार थीं, यह तो इतिहास। पर संसद की मर्यादा को तार-तार करने वाले इक्के-दुक्के नहीं, अलबत्ता हमाम में सभी एक जैसे। सुदीप ने लोकसभा में तेवर दिखाए। तो वासुदेव आचार्य ने बाहर हैरानी जताई, तीस साल में कभी सदन में ऐसा बर्ताव नहीं देखा। पर आचार्य शायद तेरह मार्च 2007 का वाकया भूल रहे। लेफ्ट फ्रंट की बैसाखी पर मनमोहन सरकार थी। तबके जहाजरानी मंत्री टी.आर. बालू ने सामुद्रिक विश्वविद्यालय बिल सदन में पेश किया। तो वासुदेव की रहनुमाई में लेफ्ट ब्रिगेड सीधे मंत्री तक बिल छीनने पहुंच गया। सदन में दो बार जबर्दस्त हाथापाई, धक्कामुक्की हुई। ऐसा लगा, मानो सरकार में सिविल वार शुरू हो गया। फिर भी वासुदेव कह रहे, सदन में ऐसा बर्ताव कभी नहीं देखा। तो तकनीकी तौर पर सही ही कह रहे। जब लेफ्ट सत्ता की रिमोट थामे बैठा था, तब वासुदेव ने अपनी हरकत देखी नहीं, दिखाई थी। पहली बार ऐसा देखा है, सो तकनीकी तौर पर सही। पर गाली-गलौज का असली नमूना तो 24 अगस्त 2006 को देखा था। जब लालू और प्रभुनाथ ने भोजपुरी स्टाइल में एक-दूसरे की आरती उतारी। मां-बहन की गाली से लेकर बहन-बहनोई की रिश्तेदारी तक को भी नहीं बख्शा। सुदीप ने जो गाली दी, वह तबके स्तर से तो कम ही थी। पिछले साल 24 नवंबर को राज्यसभा में अमर सिंह और बीजेपी के एस.एस. आहलूवालिया की भिड़ंत भी कम नहीं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आठ मार्च को राज्यसभा में जो हुआ, याद ही होगा। पर सवाल, आखिर कब तक संसद हूटिंग ब्रिगेड को देखती रहेगी। क्या कभी ऐसा भी होगा, जब संसद ऐसे नेताओं को अपनी ताकत दिखाएगी? संसद अपने देश की सबसे बड़ी पंचायत। अगर किसी मांग पर सरकार तानाशाही दिखाए। तो हंगामा कर विरोध जताना जायज। पर हंगामे के बाद संसद में बहस का स्तर क्या रहता है? आईपीएल पर चार दिन संसद ठप रहा, पर नतीजा क्या? महंगाई पर दर्जनों बार बहस हुईं, पर नतीजा क्या? मिर्चपुर में दलित जिंदा जला दिए गए, पर संसद के लिए सिर्फ पांच मिनट का मुद्दा बना। आए दिन प्रश्नकाल ठप हो रहे। दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी चिंता जता चुके। पिछले शुक्रवार को लोकसभा में ग्रीन ट्रिब्यूनल बिल पास हुआ। पर सांसदों की मौजूदगी हैरानी पैदा करने वाली। पूरे तीन घंटे की बहस के वक्त कुल मिलाकर तेरह से सत्ताईस सांसद ही मौजूद। ऐसा ट्रिब्यूनल बना, जो पर्यावरण संबंधी तमाम मामले देखेगा। पर सांसद गैरहाजिर रहे। संविधान में प्रावधान, कोरम पूरा नहीं हो, तो सदन नहीं चल सकता। पर सत्तापक्ष और विपक्ष में अलिखित समझौता। सो यह परंपरा बन गई। न कोई सवाल उठाता, न कोरम की जरूरत महसूस होती।
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04/05/2010

Monday, May 3, 2010

तो शिबू-बीजेपी में अब गुरिल्ला युद्ध

आखिर कसाब पर फैसला आ गया। सभी 86 मामलों में गुनहगार साबित हुआ। सो सजा में अब किसी को कोई शक नहीं। शक है, तो सिर्फ इस बात का। क्या सचमुच सजा के फैसले पर अमल होगा? या अफजल की तरह ही कतार में, यह तो वक्त बताएगा। पर फिलहाल सबकी निगाह मंगलवार के इंतजार में। जब स्पेशल कोर्ट कसाब को सजा सुनाएगा। अब मंगलवार को कसाब की जिंदगी तय हो जाएगी। पर झारखंड की सियासत का क्या होगा, पता नहीं। बीजेपी ने झामुमो को मंगलवार तक का अल्टीमेटम दिया था। पर नितिन गडकरी से मिल शिबू के बेटे हेमंत रांची पहुंचे। तो एलान कर दिया, शिबू बने रहेंगे। बेचारी बीजेपी हक्कीबक्की रह गई। सो सोमवार को आडवाणी-सुषमा-जेतली ने संसद भवन में मीटिंग की। फिर शाम को आडवाणी के घर गडकरी-सुषमा-जेतली समेत बड़े दिग्गज जमे। पर बीजेपी फैसला नहीं ले पा रही। अब तो झारखंड की कुर्सी पर मौजां ही मौजां सिर्फ सपना भर। पर फजीहत जमकर हो रही। सो बीजेपी के चाल, चरित्र, चेहरे में फजीहत भी जुड़ गई। बीजेपी 28 अप्रैल को ही आर या पार कर लेती। तो न सिर्फ वर्करों का मनोबल बढ़ता। जनता के बीच बीजेपी खम ठोककर कहती, देखो, जनहित में कर दी कुर्सी कुर्बान। पर शिबू-हेमंत ने ऐसा पासा फेंका, बीजेपी लार टपकाने लगी। छोटी कुर्सी कुर्बान कर बड़ा हीरो बन जाती। पर बड़ी कुर्सी के लालच में छोटापन दिखा दिया। शिबू की गलती को माफ कर अपनी रहनुमाई में सरकार बनाने को राजी हो गई। पर शिबू कोई राजनीति के अनाड़ी नहीं। जो छोटी सी भूल की खातिर बड़ी कुर्सी छोड़ दें। सो गडकरी के घर शनिवार को झामुमो नेता जुटे। तो तीन घंटे तक तर्क-वितर्क चलता रहा। हेमलाल मुर्मू ने शिबू के कुर्सी से हटते ही पार्टी में टूट का अंदेशा जताया। तो अपने राजनाथ ने कह दिया, ऐसे नहीं तो वैसे कुर्सी जाएगी ही। फिर झामुमो ने शिवसेना का उदाहरण रखा। कैसे राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने एनडीए के खिलाफ वोट किया। सो बीजेपी से सवाल पूछा, तब बीजेपी ने शिवसेना से नाता क्यों नहीं तोड़ा। तो बीजेपी ने जवाब दिया, शिवसेना ने तब डंके की चोट पर प्रतिभा पाटिल को वोट दिया था। शिबू सोरेन ने तो भरोसा दिया एनडीए को, वोट यूपीए को डाल आए। सो शिवसेना ने उस वक्त जो किया, वह उसका सिद्धांत था। अबके शिबू ने जो किया, वह विश्वासघात। आखिर में बीजेपी ने दो-टूक कह दिया, कांग्रेस के कुशासन से झारखंड को बचाने के प्रति झामुमो वाकई ईमानदार। तो बीजेपी की रहनुमाई में सरकार बनाने को राजी हो, वरना समर्थन वापसी का फैसला लागू होगा। बीजेपी ने सोचा, मजबूर शिबू पर दबाव बनाएंगे। तो सीएम की कुर्सी मिल जाएगी। पर शिबू की गुगली में बीजेपी गोल-गोल घूमने लगी। अब झारखंड के झमेले से बाहर कैसे निकले, बीजेपी को समझ नहीं आ रहा। या यों कहें, गुरुजी ने झारखंड के जंगलों में बीजेपी ऐसा फंसा दिया। बीजेपी प्यास के मारे तड़प रही। बीजेपी ने राष्ट्रीय पार्टी होने की हेकड़ी दिखाई। तो शिबू-हेमंत ने अपनी सियासत शुरू कर दी। झारखंड की राजनीति में गुरुजी का कितना दबदबा, यह तो विधानसभा के आंकड़े ही बता रहे। तमाम आरोपों के बाद भी शिबू 18 एमएलए ले आए। अब दिल्ली में कुछ, और रांची में हेमंत वाणी कुछ और। तो इसके पीछे क्या वजह, यह तो सोमवार को बीजेपी नेताओं की पेशानी देखकर समझ आ गया। शिबू सोरेन ने सुबह ही गडकरी-सुषमा-जेतली को फोन घुमाया। अपील की, झारखंड केबिनेट की बैठक होने जा रही। सो अपने मंत्रियों को शामिल होने के लिए कहें। पर बिना मंत्रियों से पूछे ही तीनों सूरमाओं ने कह दिया, केबिनेट मीटिंग में बीजेपी का मंत्री नहीं आएगा। पर गुरुजी कोई नाम के ही गुरु नहीं। बीजेपी कोटे के मंत्री केबिनेट बैठक में जाने को तैयार हो रहे थे। तभी दिल्ली में बैठे सूरमाओं को भनक लग गई। तो डिप्टी सीएम रघुवर दास समेत कइयों को फोन घुमाया गया। पर इन मंत्रियों की चालाकी देखिए। सीधे फोन पर नहीं आए, अलबत्ता मातहतों के जरिए संदेशा दिलवाया। अभी बाहर से आते हैं, तो बात करवाते हैं। सो सूरमाओं को बात समझ आ गई। फौरन आडवाणी के घर जमा हुए। पर तब तक बीजेपी कोटे के मंत्री शिबू की रहनुमाई में कई सरकारी फैसलों को हरी झंडी दे चुके थे। यानी झारखंड की इस राजनीति में गुरुजी ने बीजेपी को बता दिया, गुरिल्ला युद्ध किसे कहते हैं। अब तक बीजेपी समर्थन वापसी की हेकड़ी दिखा रही थी। पर खुद के एमएलए टूटते दिख रहे। सो आडवाणी के घर फैसला हुआ, आज-कल में पर्यवेक्षक भेजा जाए। विधायकों से बात कर तत्काल समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंप दो। ताकि न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। अब इस झारखंड के झंझट में कौन पिटा, यह बताने की जरूरत नहीं। बीजेपी की हालत तो उस कहावत वाली हो गई। चले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। कहां बीजेपी सीएम बनाने का सपना देख रही थी। पर पूरे एपीसोड में सिर्फ फजीहत करवाई। अब सुषमा स्वराज कह रहीं, इस हफ्ते आर या पार का फैसला हो जाएगा। मंगलवार का अल्टीमेटम दिया तो गुरुजी को था। पर खुद के लिए कब्रगाह बन गया। आखिर गुरुजी ने बीजेपी को बता दिया, झारखंड में यों ही लोग उन्हें गुरु नहीं कहते।
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03/05/2010

Friday, April 30, 2010

दो दिन की फजीहत, फिर मौजां ही मौजां

एक मशहूर कहावत है- भानुमती ने खसम किया, बुरा किया। करके छोड़ा, उससे बुरा किया। छोडक़र फिर पकड़ा, ये तो कमाल ही किया। अब बीजेपी बुरा न माने, पर झारखंड में बीजेपी-झामुमो का रिश्ता कुछ ऐसा ही हो गया। जब शिबू संग दिसंबर में बीजेपी ने गलबहियां कीं। तो राजीव प्रताप रूड़ी जैसे कइयों ने आपत्ति जताई थी। पर तब बीजेपी ने सभी रूडिय़ों की राय को निजी बता खारिज कर दिया। अबके कट मोशन में शिबू ने दगा किया। तो बीजेपी दगाबाज बता दूर हो गई। समर्थन वापसी का फैसला बुधवार को हुआ। शुक्रवार आते-आते फैसला टल गया। बीजेपी ने जनता के हित में लिया समर्थन वापसी का फैसला अपने हित की खातिर होल्ड पर रख दिया। अब होल्ड तो सिर्फ दिखावा। असल में फैसला रद्द समझिए। अब झारखंड में सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन होगा, गठबंधन में कोई बदलाव नहीं। बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड शुक्रवार को फिर बैठा। तो सहमति बन गई, नए फार्मूले पर सरकार बनाई जाए। सो अब कोई शक नहीं, शिबू की झामुमो के सहयोग से बीजेपी अपना सीएम बनाएगी। पर बाप-बेटा गच्चा न दे जाएं, सो पहले दो-टूक बात करने का फैसला हुआ। अब शनिवार को बीजेपी के रणनीतिकार बाप-बेटे से बात करेंगे। फिर बीजेपी स्टेट यूनिट के साथ शिबू-हेमंत बैठेंगे। आमने-सामने की बातचीत में मंत्रालयों की बंदरबांट होगी। ताकि शिबू बहुमत साबित करने से पहले देवगौड़ा की तरह ही कोई तेरह सूत्री फार्मूला न थमा दें। कर्नाटक में देवगौड़ा ने येदुरप्पा को सीएम बनवा दिया। पर विश्वासमत से पहले राजनाथ को तेरह सूत्री शर्त भेज दी। सो सात दिन में ही येदुरप्पा की सरकार गिर गई थी। अब कहीं शपथ ग्रहण के बाद शिबू-हेमंत ने कोई नई शर्त रख दी। तो अभी ही ऊहापोह में फंसी बीजेपी का तब क्या होगा। सो हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही। शनिवार को शिबू-हेमंत के अलावा सभी सहयोगियों से भी बात होगी। नई सरकार का पूरा रोड मैप बनेगा। ताकि बीजेपी की रहनुमाई में बनने वाली सरकार अस्थिरता के भंवर में फंसी न रहे। बीजेपी ने जिस शिबू को विश्वासघाती बताया। अब उन पर उतना ही एतबार। बीजेपी को लग रहा, अपना सीएम बना, तो शिबू अपने बेटे हेमंत को डिप्टी सीएम बनवाएंगे। यानी शिबू को अपने बेटे के राजनीतिक कैरियर की फिक्र होगी। सो सरकार की स्थिरता बनी रहेगी। पर झामुमो के दो बड़े नेताओं ने वीटो लगा दिया। साइमन मरांडी और टेकलाल महतो एनडीए के साथ जाने के खिलाफ। दोनों ने एलान कर दिया, हम यूपीए के साथ सरकार चाहते हैं। शिबू के वोट का मतलब भी यही बताया। पर शिबू की असली रणनीति कुछ और थी। शिबू को अपनी खातिर कोई सीट नहीं मिल रही थी। सो यूपीए को पटाने की कोशिश की। अपनी मर्जी से सरकार के पक्ष में वोट किया। ताकि कांग्रेस गदगद हो अपनी गोद में बिठा ले। फिर झारखंड में बेटा, तो केंद्र में अपनी बात बन जाए। पर कांग्रेस ने भाव नहीं दिया। वैसे भी एक-दो वोट से सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला था। सो कांग्रेस ने बेवजह आफत मोल लेना मुफीद न समझा। अब शिबू-हेमंत करते क्या, सो उलटे पांव लौट आए। बीजेपी से मिन्नतें शुरू कर दीं। सीएम की कुर्सी का ऑफर बीजेपी भी ठुकरा नहीं पाई। पर मुश्किल, साइमन और टेकलाल का टेक कैसे हटाए। अब भले मंत्री पद की रेवड़ी से टेक हट जाए। अर्जुन मुंडा या यशवंत सिन्हा में से कोई सीएम हो जाएं। पर बीजेपी जनता और अपने वर्करों को कैसे समझाएगी। आखिर मंगलवार को कट मोशन पर मुंह की खाई। तो बुधवार को शिबू से समर्थन वापसी की चाल चल दी। गुरुवार को गवर्नर से मिलने का टाइम तीन बार बदला। फिर भी समर्थन वापसी की चिट्ठी नहीं सौंप चरित्र दिखा दिया। आखिर में शुक्रवार को चेहरा भी साफ हो गया। जब पार्लियामेंट्री बोर्ड ने अपना ही फैसला रोक लिया। सो शुक्रवार को जब अनंत कुमार ने यह एलान किया, समर्थन वापसी का फैसला होल्ड पर। तो लगा, अपने देश के मतदाता बहुत पहले मैच्योर हो चुके। बीजेपी ने तो जनहित का फैसला होल्ड पर रखा। पर जनता तो बीजेपी को पहले ही होल्ड कर चुकी। छह साल सत्ता में बिठाकर पार्टी विद डिफरेंस देख लिया। सो 2004 के बाद 2009 में भी जनता ने विपक्षी बैंच पर ही होल्ड कर दिया। अब बीजेपी भी जनता के जुल्म-ओ-सितम कब तक सहती। सो बाहरी आवरण उतार दिया। झारखंड में 36 से 30, 30 से 18 सीट पर आ गई। फिर भी कह रही, जनता चाह रही, झारखंड में सरकार बनाए। पर जरा शुक्रवार को हुए पार्लियामेंट्री बोर्ड की कहानी बताते जाएं। आला नेता इस बात को तो राजी थे, अपनी सरकार बन जाए। पर झमेला यही, बुधवार का फैसला शुक्रवार को ही कैसे पलट दें। मीडिया में होने वाली किरकिरी भारी पड़ेगी। सो झारखंड के झमेले पर बोर्ड के सामने तीन बातें रखी गईं। फैसला पलटने से होने वाली फजीहत, शिबू-हेमंत की चिट्ठी और सरकार गठन का नया फार्मूला। आखिर में जब सबने राय दी, तो निचोड़ यही निकला। भले दो-चार दिन मीडिया में फजीहत हो, पर सीएम की कुर्सी नहीं छोडऩी चाहिए। जब सरकार बन जाएगी, तो मीडिया और लोग भूल जाएंगे। आखिर संपादकीय से अपनी राजनीति नहीं चलाई जा सकती। तो समझ गए ना आप। यही है बीजेपी की नई थ्योरी। दो दिन की फजीहत, फिर कुर्सी पर बैठ मौजां ही मौजां। चाल, चरित्र, चेहरा तो 1980 के दशक की बात।
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30/04/2010