Monday, February 21, 2011

जेपीसी मानी, पर सब कुछ लुटाने के बाद

आतंकी कसाब की फांसी हाईकोर्ट से कनफर्म हो गई। तो इधर संसद की उलझी डोर भी सुलझ गई। सो अब इसे जूते और प्याज खाना कहें या लौट कर बुद्धू घर को आया, यह आप ही तय करें। पर सरकार अब जेपीसी को राजी। मंगलवार को खुद पीएम मनमोहन जेपीसी का इरादा जताएंगे। फिर गुरुवार को दोपहर दो बजे टेलीकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल मोशन लाएंगे। जिसमें सभी मेंबरों के नाम और टर्म एंड रेफरेंस भी होंगे। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की मीटिंग में जेपीसी पर बहस के लिए चार घंटे का वक्त तय हो गया। सो सवाल- जब जेपीसी माननी ही थी, तो शीत सत्र हंगामे में व्यर्थ क्यों जाने दिया। कांग्रेस और सरकार के तमाम दांव धरे रह गए। अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की चौतरफा जांच हो रही। सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग में सीबीआई, तो पीएसी भी जांच कर रही। जस्टिस शिवराज पाटिल कमेटी अपनी जांच पूरी कर चुकी। यानी तमाम हथकंडों के बावजूद अब जेपीसी माननी ही पड़ी। सो अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की सारी जांच एक साथ चलेगी। पर कांग्रेस अब भी न तुम जीते, न हम हारे वाले अंदाज में इतरा रही। जेपीसी पर दोनों पक्षों में सहमति बन चुकी। पर कांग्रेस कह रही- अभी तक जेपीसी का एलान नहीं हुआ, सो टिप्पणी नहीं। यों दिल बहलाने को गालिब-ए-खयाल अच्छा। पर शीत सत्र से अब तक कांग्रेस अपनी फजीहत खूब करा चुकी। घोटालों पर बचाव के हर पेंतरा उलटा पड़ा। ए. राजा अपने राजदारों समेत गिरफ्तार हुए। नए-नवेले संचार मंत्री कपिल सिब्बल की काबिलियत भी धरी रह गई। पहले तो उन ने घोटाले को निल बता दिया। फिर ठीकरा ट्राई और एनडीए सरकार के सिर फोड़ा। सीएजी के गणित पर भी उंगली उठाई। पर सिब्बल की वकालत भी नहीं चली। उलटा सुप्रीम कोर्ट से फटकार मिली। पीएसी ने भी आंखें दिखा स्पीकर से शिकायत कर दी। फिर हाल ही में पीएम ने टीवी संपादकों के जरिए मोर्चा संभाला। पर गठबंधन की मजबूरी के राग ने पीएम को और कमजोर साबित कर दिया। सो अब कांग्रेस और सरकार जेपीसी को राजी। तो सवाल- सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। दिन में गर चिराग जलाया, तो क्या किया? अगर कांग्रेस शीत सत्र में ही जेपीसी को राजी हो जाती। तो सुप्रीम कोर्ट मॉनीटरिंग वाली सीबीआई जांच का झमेला न होता। पर अब जेपीसी का एलान होने जा रहा। तो काबीना मंत्री दलील दे रहे- अब बाकी जांच के कोई मायने नहीं। पर हकीकत इसके उलट। सो कहीं कई जांच के चक्कर में निचोड़ देश को घनचक्कर न बना दे। संसदीय इतिहास में अब तक चार जेपीसी बन चुकीं। कांग्रेस राज में बोफोर्स और हर्षद मेहता दलाली कांड पर जेपीसी बनी। तो एनडीए राज में मार्केट घोटाले और शीतल पेय में पेस्टीसाइड के मुद्दे पर। अब टू-जी स्पेक्ट्रम पर पांचवीं जेपीसी बनने जा रही। पर इतिहास यही इशारा कर रहा- जेपीसी अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब नहीं रही। यों पांचवीं जेपीसी कितनी सफल, रपट आने के बाद ही पता चलेगा। पर जेपीसी के गठन की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। विपक्ष ने स्पेक्ट्रम, आदर्श, कॉमनवेल्थ और इसरो-देवास डील समेत जेपीसी मांगी। पर सरकार ने सिर्फ राजा से जुड़े स्पेक्ट्रम घोटाले की जेपीसी मानी। तो सुषमा स्वराज दलील दे रहीं- विपक्षी एकता बरकरार रखने और गतिरोध तोडऩे के लिए हमने टू-जी स्पेक्ट्रम पर ही जेपीसी मान ली। यों राजनीतिक हलकों में चर्चाएं कई और। बीजेपी के एक बड़े नेता का रिश्तेदार कॉमनवेल्थ में जुड़ा। तो दूसरे का आदर्श से जुड़े लोगों से बेहतर संबंध। सो गतिरोध तोडऩे के बहाने दोनों ने आदर्श, कॉमनवेल्थ को जेपीसी से बाहर होने दिया। अब देर से ही सही, पक्ष-विपक्ष ने संसद में बना गतिरोध तोड़ा। तो मंगलवार से संसद की कार्यवाही चलेगी। सो सोमवार को परंपरा के मुताबिक नए साल के पहले सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का अभिभाषण हुआ। सरकार ने अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा। पर सरकार के एक साल के एजंडे में कुछ नया नहीं। अलबत्ता महंगाई पर काबू पाना सरकार की प्राथमिकता में। पर इसके लिए सरकार ने एक साल मांग लिया। यानी वित्तीय वर्ष 2011-12 में महंगाई पर काबू पाना सरकार की पहली प्राथमिकता। पर विकास से भी समझौता नहीं करेगी। सो राष्ट्रपति का अभिभाषण उत्साह पैदा करने वाला नहीं रहा। करीब 50 मिनट के अभिभाषण में महज दो बार ताली बजीं, वह भी मद्धिम। मिस्र में लोकतंत्र का स्वागत और महिला बिल की उम्मीद पर कुछ सांसदों ने ताली बजाई। बाकी अभिभाषण में कहीं ऐसा दमखम नहीं, जहां सांसद मेजें थपथपाने को मजबूर हुए हों। अलबत्ता कांग्रेस को पहले दिन अपने ही सांसदों से शर्मसार होना पड़ा। अभिभाषण में तेलंगाना का जिक्र नहीं था। सो कांग्रेसी सांसद राष्ट्रपति के सामने ही सोनिया के फोटू के साथ जय तेलंगाना के बैनर लहराने लगे। फिर भी बजट सत्र में पक्ष-विपक्ष की सहमति संसद ही नहीं, लोकतंत्र के लिए सुकून की बात। आखिरकार आवाम की जिद के आगे सरकार को झुकना पड़ा। मनमोहन ने तो पिछले हफ्ते की प्रेस कांफ्रेंस में भी यहां तक कह दिया था- शीत सत्र हंगामे में क्यों बरबाद हुआ, इसकी वजह मैं समझ नहीं पा रहा। पर अब सवाल- क्या पीएम को वजह समझ आ गई? सचमुच टू-जी घोटाला और इसके लिए जेपीसी का विवाद संसद का नया इतिहास रच गया। सो सरकार को जवाब देना होगा- शीत सत्र में ही जेपीसी क्यों नहीं मान गई?
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21/02/2011

Friday, February 18, 2011

तो क्या क्रिकेट के शोर में दबाएंगे भ्रष्टाचार?

संसद में घोटाला कप की गूंज होगी। तो बाहर क्रिकेट वल्र्ड कप की। सो कांग्रेसी अब बड़ी आस लगाए बैठे, भ्रष्टाचार का घेरा कुछ कमजोर होगा। शुक्रवार को कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद से लेकर राजीव शुक्ल तक यही दुआएं करते दिखे। शकील बोले- मीडिया अब क्रिकेट की अधिक खबरें दिखाएगा। सो लोगों का ध्यान भ्रष्टाचार के मुद्दे से हट जाएगा। राजीव शुक्ल भी करीब-करीब यही बोले। संसद का बजट सत्र और वल्र्ड कप साथ-साथ, देखते हैं लोग किसको देखेंगे। पर दोनों के चेहरों पर अजीब सी मुर्दनी हंसी दिखी। अब वल्र्ड कप के उत्साह से कोई भ्रष्टाचार को ढांपना चाहे, तो ऐसे नेताओं को क्या कहेंगे। यों कई बार अति उत्साह के चक्कर में गड़बड़झाले हो जाते। कांग्रेस तो इस दौर से गुजर अब जेपीसी को झुक गई। मंगलवार को लोकसभा में शायद खुद पीएम जेपीसी का प्रस्ताव रखेंगे। बहस की औपचारिकता निभा एलान हो जाएगा। सो शुक्रवार को संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कह दिया- बुधवार से पहले जेपीसी पर फैसला हो जाएगा। यानी मंगलवार को संसद में मंगल की उम्मीद करिए। पर बात अति उत्साह के मारों की। तो भला लालकृष्ण आडवाणी को कैसे भूल सकते। आडवाणी पीएम नहीं बन सके, पीएम इन वेटिंग ही रह गए। पर कामकाज का ढर्रा पीएम जैसा ही अपना रखा। याद होगा, चुनावी समर के बीच कैसे आडवाणी हर क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ मीटिंग कर एजंडा पेश करते थे। अभी भी वही ढर्रा जारी। सो ब्लैक मनी के मामले पर विशेषज्ञों की टास्क फोर्स बना दी। टास्क फोर्स ने पता नहीं कहां से टास्क लिया। सोनिया-राजीव के भी स्विस बैंक में अकाउंट बता दिए। आडवाणी ने डेढ़ घंटे की प्रेस कांफ्रेंस में टास्क फोर्स की पूरी रपट को खूब बांचा। पर सोनिया गांधी ने चिट्ठी लिख एतराज जताया। तो आडवाणी ने फौरन चिट्ठी लिख सोनिया से माफी मांग ली। दलील दी- अगर आपने पहले खंडन कर दिया होता, तो टास्क फोर्स इस खंडन को ध्यान में रखती। अब इसका क्या मतलब? मान लो, हम-आप खंडन न करें, तो आडवाणी की टास्क फोर्स हमारा-आपका भी नाम ले देगी? सवाल- टास्क फोर्स ने किस आधार पर सोनिया-राजीव का नाम लिया? महज सोनिया के खंडन से ही आडवाणी ने कैसे मान लिया? यों ऐसी गलतियां आडवाणी कई दफा कर चुके। जब आडवाणी ने लोकसभा चुनाव से पहले अपनी आत्मकथा- माई कंट्री, माई लाइफ लिखी। तो ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार और एक-दो मुद्दे ऐसे, जिन पर बाद में माफी मांगनी पड़ी। पर कांग्रेस को आडवाणी की माफी राजनीतिक चाल नजर आ रही। जब आडवाणी ने अपनी किताब लिखी थी, तब होली के दिन पत्नी कमला के साथ सोनिया के घर गए थे। किताब के बहाने मेल-जोल बढ़ाने की कोशिश की थी। पर कांग्रेस ने किताब को आधार बना आडवाणी को कई दफा घेरा। अबके होली करीब, तो आडवाणी ने सिर्फ सोनिया के खंडन से ही माफी मांग ली। सो सवाल- जब सोनिया का खंडन मान रहे, तो आडवाणी कभी मनमोहन सिंह की बात को सच क्यों नहीं मानते? सो एक कांग्रेसी ने चुटकी ली- सीबीआई के पचड़े से बचने की कोशिश हो रही। सीबीआई ने बाबरी ढांचा केस में आडवाणी समेत आठ लोगों पर मुकदमा वापस लेने के हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। सो मामला फिर खुला, तो कांग्रेस के खिलाफ तनी बीजेपी की तोपें फुस्स हो जाएंगी। पर दबी जुबान में ही सही, कांग्रेस ने सीबीआई के बेजा इस्तेमाल की बात मान ली। सो बजट सत्र में सरकार और विपक्ष की बांसुरी खूब बजेगी। बैंड तो बेचारे आम आदमी का बज रहा। सरकार की चालाकी कहें या बेशर्मी, शुक्रवार को महंगाई दर पीएम के अनुमान से भी नीचे आ गई। हुआ यों कि सरकार ने अब महंगाई दर मापने का नया सूचकांक जारी कर दिया। सो नए सूचकांक के मुताबिक अब महंगाई दर महज छह फीसदी। तो महंगाई नीचे लाने का मनमोहिनी-प्रणवी फार्मूला आप खुद देख लो। यों विशेषज्ञों ने तो पहले ही बता दिया- नई पैदावार का मौसम आ गया, सो महंगाई तो खुद-ब-खुद नीचे आएगी। सरकार भी बजट में कुछ लोक-लुभावन एलान करने की सोच रही। पिछले बजट में प्रणव दा ने पेट्रोल के दाम बढ़ा इतिहास रचा। तो अबके घटाकर रचेंगे। सचमुच संसद का बजट सत्र सरकार के लिए इम्तिहान जैसा। महंगाई-भ्रष्टाचार-ब्लैकमनी और माननीय सीवीसी पी.जे. थॉमस का मामला फोकस में रहेगा। सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण में पूरे साल का एजंडा झलकेगा। तो भ्रष्टाचार से लडऩे के सोनिया मंत्र का जाप होगा। पर ए. राजा ने तो थम ठोककर कह दिया- मैं जल्द बेदाग होकर लौटूंगा। सचमुच नेताओं के मामले में जनता को अभी भी ठोस कार्रवाई का भरोसा नहीं। पर बजट सत्र अबके सचमुच इतिहास रचने जा रहा। जेपीसी जांच का एलान होगा। जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर वोटिंग होगी। सभापति हामिद अंसारी ने महाभियोग को मंजूरी दे दी। पर बजट सत्र में जहां सरकार को खुद को साबित करने की चुनौती। तो विपक्ष पर भी कर्नाटक-गुजरात जैसे मामलों में दिखाने का दबाव। पर नीयत किसी की साफ नहीं। तभी तो कांग्रेसी क्रिकेट के शोर में भ्रष्टाचार दबाने की कोशिश कर रहे।
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18/02/2011

Thursday, February 17, 2011

‘घोटाला कप’ हो, तो कौन मारेगा बाजी?

क्रिकेट के महाकुंभ का रंगारंग आगाज हो गया। सो वल्र्ड कप की खुमारी अब सिर चढऩे लगी। पर अफसोस, ए. राजा अब तिहाड़ जेल से ही मैच का लुत्फ उठाएंगे। कुछ परेशानी हुई, तो अस्पताल में भरती होकर मैच देखेंगे। पर फूटी किस्मत कांग्रेस की, घोटालों ने सारा मजा किरकिरा कर दिया। जब दुनिया मैच का मजा ले रही होगी। कांग्रेस और सरकार घोटालों का हिसाब-किताब करने में मशगूल होगी। सचमुच घोटालों ने ऐसा बैंड बजाया, गुरुवार को एस-बैंड स्पेक्ट्रम की इसरो-देवास डील रद्द करनी पड़ी। सीसीएस यानी सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी की मीटिंग के बाद विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने एलान कर दिया। डील सामरिक हित में नहीं, सो इसे तत्काल रद्द किया जाता है। पर देवास मल्टीमीडिया सरकार को लगातार आंखें दिखा रहा। सो मोइली ने दो-टूक कह दिया- जब सामरिक जरूरत का सवाल हो। तो निजी कंपनी को छोडि़ए, सरकार व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए एंट्रिक्स को भी स्पेक्ट्रम नहीं दे सकती। मोइली ने कंपनी की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए साफ कर दिया- डील रद्द करने के खिलाफ कंंपनी अदालत गई, तो भी सफल नहीं होगी। हमने मामले की पूरी पड़ताल की और डील के प्रावधानों व कानून के मुताबिक इसे रद्द किया जा सकता। माना, सरकार को सामरिक हित में डील रद्द करने का हक। पर क्या डील रद्द करने से घोटाला छुप जाएगा? सरकार की हताशा का अंदाजा इसी बात से लगाइए, पीएमओ ने पिछले गुरुवार ही इसरो-देवास डील की जांच के लिए बी.के. चतुर्वेदी कमीशन बनाया था। एक महीने में रपट देने को कहा गया। पर रपट का इंतजार किए बिना, महज हफ्ते भर बाद ही डील क्यों रद्द कर दी? यानी सामरिक हित को आधार बना भले डील रद्द कर दी। पर घोटाले की पूरी तैयारी थी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सो बीजेपी ने तो सवाल उठाए ही, पीएसी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने देर से की गई छोटी कार्रवाई करार दिया। बोले- डील रद्द करना ही पर्याप्त नहीं। मामले की गंभीरता से जांच हो और जिसने डील की, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए। बीजेपी ने तो जेपीसी के दायरे में इसरो डील को भी लाने की शर्त रख दी। सो मुश्किल में मनमोहन अब क्या करेंगे? यों बुधवार को उन ने जो सफाई दी, कांग्रेसी खेमे में ही दोहरे अर्थ निकाले जा रहे। सो क्रिकेट वल्र्ड कप की ओपिनिंग सेरेमनी देखने के बजाए कांग्रेसी संसद की रणनीति और पीएम उवाच के मंथन में ही जुटे दिखे। यों औपचारिक तौर पर कांग्रेस ने गुरुवार को दोहराया- पीएम अपने मकसद में सफल हुए। वह मध्यम वर्ग को संदेश देना चाह रहे थे। सो टीवी के जरिए जनता को बताया- उतने बड़े दोषी नहीं, जितना प्रचार हो रहा। पर जरा अंदरखाने कांग्रेस की चुटीली चर्चाएं भी सुनिए। मनमोहन उवाच को कांग्रेसी रणनीतिक हिस्सा बता रहे। जिसमें पीएम ने अपनी मजबूरी बता यह जतलाने की कोशिश की, उन ने निजी तौर पर कुछ ऐसा नहीं किया, जो उन पर उंगली उठाई जा रही। यानी कांग्रेसी खेमे में मनमोहन के खिलाफ सुर उठ रहे। पीएम की पूरी प्रेस कांफ्रेंस का निचोड़ यही माना जा रहा। भले मनमोहन सरकार के मुखिया, पर राजनीतिक फैसलों में उनकी भूमिका नहीं। जितने भी गलत फैसले हुए, वह सब गठबंधन के नेताओं और मुखिया स्तर पर लिए गए। यानी मनमोहन विरोधियों की नजर में सीधे सोनिया गांधी पर उंगली उठाई गई। सचमुच मनमोहन ने बड़ी बेबाकी से मजबूरी का इकरार किया। मिजाज के मुताबिक काम न होने का अफसोस भी जताया। यानी मतलब साफ- मनमोहन अगर पीएम की कुर्सी पर बैठ अपना काम कर रहे। तो सिर्फ सोनिया गांधी की वजह से। सो पीएम ने प्रेस कांफ्रेंस में खुद को ऐसे ही पेश किया, मानो, सीईओ की भूमिका निभा रहे। यों सरकार हो या संगठन, सचमुच मनमोहन की भूमिका यही। हर जगह सोनिया की पसंद के लोग तैनात। सो मनमोहन कार्यकारी की ही भूमिका निभा रहे। यूपीए की दूसरी पारी में उन ने ए. राजा और टीआर बालू को केबिनेट में न लेने का खम ठोका। पर मजबूरी में राजा को लेना पड़ा। टू-जी घोटाले में वित्त मंत्रालय की भी सहमति रही। सो मनमोहन ने अधिक दखल नहीं दिया। यानी राजा की वजह से जो छींटे मनमोहन पर पड़ रहे, असल में उसकी जवाबदेही सोनिया गांधी की। राजनीतिक फैसले सोनिया ही करतीं। पर बतौर पीएम कांग्रेसी पाप का ठीकरा मनमोहन के सिर फूट रहा। आज भी देश की जनता निजी तौर पर मनमोहन को क्लीन मान रही। पर दस जनपथ को खुश रखने के चक्कर में मनमोहन अपनी छवि दागदार कर रहे। मनमोहन का मजबूरी गान मजाक का विषय बन चुका। पर मनमोहन कब तक मजबूरी गान गाएंगे और देश में घोटाले दर घोटाले होते रहेंगे? सो वल्र्ड कप के इस मौसम में घोटालों की बारिश देख ख्याल आ रहा- गर देश में घोटाला कप का आयोजन हो, तो कौन जीतेगा? देश में इतने घोटाले और घोटालेबाज हो चुके, घोटाला कप के लिए कई प्रायोजक मिल जाएंगे। अपने टमाटर-प्याज के किसान भाई भी राहत महसूस करेंगे। शायद खपत बढ़ेगी, तो प्याज-टमाटर की पैदावार भी बढ़े। मुर्गियां भी अधिक अंडे देने लगें।
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17/02/2011

Wednesday, February 16, 2011

मजबूरी गिना, माटी की मूरत ही दिखे मनमोहन

पीएम मनमोहन ने आवाम का कितना मन मोहा, बुधवार के ऑन लाइन कमेंट्स में ही उजागर हो गया। किसी ने मनमोहन को धृतराष्ट्र कहा, किसी ने कार्टून। किसी ने कहा- बहुत हो चुका मनमोहन जी, बोलिए नहीं, अब तो गद्दी छोडि़ए। पर मनमोहन ने पहले ही गद्दी छोडऩे से इनकार कर दिया। बतौर पीएम नैतिक जिम्मेदारी कबूली, पर पद छोडऩे का सवाल हुआ। तो बोले- न ऐसा कोई ख्याल दिमाग में आया, न टर्म पूरा होने से पहले ऐसा सोचूंगा। अगर ऐसे पीएम इस्तीफा देने लगे, तो देश में हर छह महीने में चुनाव कराने पड़ेंगे। यानी मनमोहन ने एक तरफ कुर्सी के लिए खूंटा गाड़ा। तो दूसरी तरफ सरकार की गिरती साख का ठीकरा गठबंधन के सिर फोड़ दिया। गठबंधन सरकार की मजबूरियां गिनाईं। अब ए. राजा को दुबारा संचार मंत्री बनाना भले गठबंधन की मजबूरी। पर भ्रष्टाचार को न रोक पाना भी क्या गठबंधन की मजबूरी? मनमोहन ने बड़ी चतुराई से अपना दामन पाक-साफ बताया। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा को लिखी चिट्ठी और फिर राजा के जवाब को अपनी ढाल बनाया। बोले- राजा ने पारदर्शिता का भरोसा दिलाया था। ट्राई और टेलीकॉम कमीशन की ओर से नीलामी का सुझाव न देने की दलील दी थी। संचार मंत्रालय के साथ वित्त मंत्रालय भी सहमत था। सो विशेषज्ञों की वजह से मैंने बार-बार सलाह देना उचित नहीं समझा। यानी पीएम ने एक और खुलासा किया- स्पेक्ट्रम घोटाले की कड़ी में तबके वित्त मंत्री की भी भूमिका। तो क्या अब जांच एजेंसी तबके वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से भी पूछताछ करेगी? पर मनमोहन ने भ्रष्टाचारियों को सख्त सजा देने की बात कही। सच सामने लाने का दावा किया। पर सवाल हुआ- कॉमनवेल्थ घोटाले पर 90 दिन में जांच पूरी कर दोषियों को सामने लाने के दावे का क्या हुआ? तो मनमोहन बोले- देश में कानून का शासन। सो कानून अपना काम करेगा। पीएम ने सोलह आने सही कहा। पर गठबंधन की आड़ में भ्रष्टाचार की अनुमति क्या कानून का राज कहलाएगा? गठबंधन धर्म सत्ता में बने रहने के लिए भले मजबूरी हो। पर कानून के शासन में गठबंधन कोई मजबूरी नहीं होती। सो लोकतंत्र में कोई भी नेता गठबंधन को अपनी ढाल नहीं बना सकता। सो पीएम की 69 मिनट चली प्रेस कांफ्रेंस देश की आवाम को कोई खास संदेश नहीं दे सकी। पीएम कभी लाचार तो कभी बेबस दिखे। फिर भी हम होंगे कामयाब का संकल्प दोहराया। अब जरा पीएम की बेबाकी भी देखिए। उन ने अपना इरादा साफ कर दिया। विकास दर की कीमत पर महंगाई काबू नहीं करेंगे। यानी विकास दर को साढ़े आठ फीसदी से ऊपर रखने के लिए आवाम को महंगाई झेलनी होगी। यों मनमोहन ने मार्च तक सात फीसदी महंगाई दर लाने का दावा किया। पर भला देश की जनता पीएम के इस भरोसे को भी कैसे माने? पीएम ने 24 मई 2010 को भरोसा दिलाया था- दिसंबर तक महंगाई काबू कर लेंगे। फिर दो महीने पहले ही कांग्रेस महाधिवेशन के मंच से मनमोहन ने 20 दिसंबर को कहा- महंगाई दर मार्च तक साढ़े पांच फीसदी पर ले आएंगे। अब मार्च आने में महज बारह दिन बचे। तो मनमोहन सात फीसदी की बात कर रहे। सो हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। पर बात भ्रष्टाचार की। तो मनमोहन ने जेपीसी के साफ संकेत दे दिए। बोले- जेपीसी समेत किसी भी एजेंसी के समक्ष पेश होने को तैयार। वैसे भी पीएम के तौर पर मेरा आचरण सीजर की पत्नी के संदेह से परे जैसा होना चाहिए। पीएम ने बीजेपी पर सरकार को बंधक बनाने का आरोप लगाया। गुजरात के पूर्व मंत्री अमित शाह और जीएसटी के मसले पर ब्लैकमेलिंग का खुलासा किया। देवास-इसरो डील में कुछ भी न छिपाने का दावा किया। भ्रष्टाचार पर नैतिक जिम्मेदारी कबूल की। बोले- मुझे मेरी जिम्मेदारी का अहसास है, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए। पर गठबंधन की मजबूरियां हैं। सो गर पीएम ऐसे इस्तीफा देने लगे, तो हर छह महीने में चुनाव कराने पड़ेंगे। जो संभव नहीं। यानी पीएम ने माना, देश के हालात बदतर हो रहे। पर सत्ता में बने रहने के लिए गठबंधन जरूरी। सो भ्रष्टाचार को उसकी मजबूरी बता रहे। पीएम ने पहली बार बेबाकी के साथ माना, उनसे गलतियां हुई हैं। पर उतने बड़े दोषी नहीं, जितना प्रचारित किया जा रहा। यों पीएम ने मौजूदा यूपीए गठबंधन को मजबूत और प्रतिबद्ध करार दिया। पर सवाल- जब गठबंधन में कोई तनाव नहीं, तो मजबूरी गान क्यों गा रहे मनमोहन? सो बीजेपी के नितिन गडकरी ने पलटवार किया। पूछा- राजा के मामले में गठबंधन की मजबूरी। पर कॉमनवेल्थ, आदर्श और इसरो डील में क्या? उन ने आरोप लगाया- यूपीए सरकार लक्ष्मी की भक्त। जहां लक्ष्मी दर्शन के बिना कोई काम नहीं होता। सचमुच मनमोहन मैदान में उतर कर आवाम का मन तो नहीं मोह पाए। अलबत्ता जख्म को और गहरा कर दिया। सो आवाम की ओर से ऐसी-ऐसी टिप्पणियां आ रहीं, लिखना भी मुनासिब नहीं। फिर भी मनमोहन का दावा देखिए। मिस्र के हालात पर सवाल हुए। तो बोले- भारत में मिस्र नहीं दोहराएगा। पर जब देश का पीएम गठबंधन को मजबूरी बता देश के खजाने को लूटने दे। विकास के नाम पर महंगाई को बढऩे दे। गलती कबूल कर भी इस्तीफे से इनकार करे। तो शायद वह दिन दूर नहीं, जब अपना विजय चौक तहरीर स्क्वायर बन जाए।
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16/02/2011

Tuesday, February 15, 2011

अबके आवाम का कितना मन मोह पाएंगे मनमोहन?

हुस्नी मुबारक के कोमा में पहुंचने की खबर ने अपने नेताओं के भी कान खड़े कर दिए। सो संसद सत्र से पहले सुलह-सफाई का दौर शुरू हो गया। एक तरफ विपक्ष के साथ जेपीसी पर सहमति बनाने की कोशिशें हो रहीं। ताकि सदन में बहस के बाद ही जेपीसी का एलान हो। तो दूसरी तरफ छवि सुधारने के लिए पीएम मनमोहन सिंह ने खुद मोर्चा संभाल लिया। पीएम बुधवार को खबरिया चैनलों के संपादकों से रू-ब-रू होंगे। तो शायद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उठ रहे सवालों का सीधा जवाब देने की कोशिश करेंगे। पर भ्रष्टाचार के इस मौसम में पीएम अब भला क्या तीर मारेंगे? जब मौका था, तो पीएम ने घोटालों के राजा का पुरजोर बचाव किया। और तो और, पिछले साल 22 मई को जब मनमोहन ने बतौर पीएम सातवें साल में प्रवेश किया। तो दो दिन बाद यानी 24 मई 2010 को देश की आवाम से रू-ब-रू हुए। तब उन ने महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद, विदेश नीति, मंत्रियों का बड़बोलापन, तेलंगाना, राहुल गांधी, रिटायरमेंट, सीबीआई का बेजा इस्तेमाल, अफजल की फांसी, सोनिया से मतभेद जैसे करीब दो दर्जन मुद्दों पर 75 मिनट तक सवालों के जवाब दिए। पर तब भी पीएम ने गांधी परिवार से जुड़े सवालों के सिवा कोई ऐसा जवाब नहीं दिया, जो देश को दिशा दे सके। तब उन ने दिसंबर तक महंगाई काबू में लाने की बात की थी। पर महंगाई ने पीएम की बात नहीं मानी। यों फिलहाल महंगाई से बड़ी मुसीबत भ्रष्टाचार। पर जरा गौर से देखिए, 24 मई को मनमोहन ने भ्रष्टाचार पर क्या कहा था। उन ने कहा था- मंत्री ए. राजा से बात हो चुकी। भ्रष्टाचार की कोई शिकायत मिलेगी, तो कार्रवाई करेंगे। अब सवाल- क्या टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला 24 मई के बाद हुआ? क्या स्पेक्ट्रम घोटाले की भनक पीएम को तभी लगी, जब नवंबर में सीएजी ने अपनी रपट दी? सीबीआई ने तो 2008 में ही स्पेक्ट्रम घोटाले की एफआईआर दर्ज कर ली थी। शुरुआती जांच में ही 22,000 करोड़ के राजस्व नुकसान का खुलासा हो गया था। पर तब ए. राजा मंत्री थे, पीएम गठबंधन की मजबूरी में कार्रवाई से बच रहे थे। सो पीएम ने गर तभी कदम उठा लिया होता। तो आज छवि सुधार मुहिम में न जुटना पड़ता। सो अब आप ही सोचिए, क्या बुधवार को पीएम के जवाबों से देश की अवाम में कोई उम्मीद जगेगी? पीएम का खुद बचाव में उतरना मुद्दे की गंभीरता को जगजाहिर कर रहा। सचमुच अब तक कांग्रेस या कोई मंत्री घोटालों पर सरकार का बचाव करने में सक्षम नहीं दिखा। ले-देकर कानूनदां कपिल सिब्बल ने वकालत झाडऩे की कोशिश जरूर की। पर हारे हुए पक्ष के वकील की तरह ही नजर आए। अब तो कपिल सिब्बल की मुश्किलें भी बढ़ती जा रहीं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही लताड़ लगा चुका। रही-सही कसर मंगलवार को पीएसी के समक्ष पेश सीबीआई के डायरेक्टर ए.पी. सिंह ने पूरी कर दी। सीबीआई ने सीएजी की तरह स्पेक्ट्रम घोटाले में नुकसान का कोई आंकड़ा तो नहीं दिया। पर सीबीआई ने राजस्व नुकसान की बात कबूल ली। सो पीएसी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी बोले- सीबीआई घोटाले के आपराधिक पहलुओं की जांच कर रही। सो फिलहाल कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं। पर सीबीआई ने नुकसान की बात मानी। यानी सिब्बल एक बार फिर झूठे साबित हुए। सात जनवरी को सिब्बल ने पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन के साथ प्रेस कांफ्रेंस की थी। तो उन ने आंकड़ों और शब्दों का ऐसा मायाजाल बुना। एक नील 76 खरब के स्पेक्ट्रम घोटाले को निल बता दिया। पर अब सिब्बल की काबिलियत धरी रह गई। सो मनमोहन आवाम का मन मोहने खुद मैदान में उतर आए। मनमोहन की पीसी से पहले सरकारी तैयारियां भी खूब हो रहीं। जेपीसी गठन के साफ संकेत मिलने शुरू हो गए। कांग्रेस की महज एक ही शर्त- सदन में बहस हो जाए, ताकि थोड़ी लाज बची रहे। फिर भ्रष्टाचार से लडऩे के उपाय सुझाने वाली जीओएम की फैसलाकुन मीटिंग भी हो गई। जिसमें सोनिया गांधी के पंच मंत्र को जस का तस मान लिया। सरकार अपने मंत्रियों के विवेकाधीन कोटे को खत्म करने का मन बना रही। ताकि करीबियों को फायदा पहुंचाने का आरोप न लगे। भ्रष्ट नौकरशाही पर नकेल कसने के लिए तय समय में मुकदमे की अनुमति देने का भी प्रावधान। अगर कोई अदालत नौकरशाह के खिलाफ आरोप तय कर दे। तो 90 दिन के भीतर सरकार को मंजूरी का फैसला करना होगा। भ्रष्टाचार के मामले को फास्ट ट्रेक कोर्ट में चलाने, अनुशासनात्मक कार्रवाई साल भर में पूरी करने जैसी सिफारिशें भी जीओएम ने कीं। सो मनमोहन शायद बुधवार को यही तमाम कदम मीडिया को गिनाएं। पर मनमोहन के सिर मुसीबत अकेले नहीं आई। मंगलवार को बीजेपी ने कोलकाता में पदाधिकारियों की मीटिंग की। बंगाल चुनाव में जीरो से हीरो बनने के फार्मूले पर मंथन करने गई। पर सरकार को घेरने का एक और मुद्दा मिल गया। सो बीजेपी ने प्रस्ताव पारित कर चार सूत्री मांग रख दी। सरकार भ्रष्टाचार पर जेपीसी बनाए, इसरो-देवास डील पर सीधे मनमोहन सफाई दें, महंगाई पर काबू पाने को फौरी कदम उठाए जाएं। और नया मुद्दा फोन टेपिंग का, तो बीजेपी ने सरकार से आधिकारिक बयान की मांग रख दी। अभी तो टू-जी घोटाले में खिलाड़ी कंपनियों के किस्से सामने नहीं आए। सो जब पूरी कलई खुलेगी, तो क्या करेंगे मनमोहन और उनकी सरकार? अभी तो राजा की भी पीएसी के सामने पेशी बाकी।
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15/02/2011

Monday, February 14, 2011

फैसला ही नहीं, लकीर भी खींचे न्यायपालिका

कभी महंगाई तो कभी भ्रष्टाचार, आखिर सरकार कबूलने लगी। शासन के कामकाज में ही नहीं, नैतिकता में भी गिरावट। होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने पहले महंगाई को सरकार के बूते से बाहर बताया। अब शासन और नैतिक स्तर पर गिरावट की बात मान ली। पर नेताओं की फितरत कैसी, यह भी दोहरा दी। चिदंबरम ने कहा- ऐसी गिरावट कोई नई बात नहीं। यानी सत्ता का नाजायज फायदा उठाने में कोई दल पीछे नहीं। पर भ्रष्टाचार के मुद्दे ने जनता के बीच जगह बना ली। उधर मिस्र में हुस्नी मुबारक का तीन दशक का राज खत्म हो गया। सो भारत में भी कुछ लोग वैसी ही क्रांति की बात कर रहे। ऑन लाइन चर्चाओं में लोग एक-दूसरे से पूछ रहे- क्या अपने यहां भी कोई तहरीर स्क्वायर है? पर क्या अब अपने देश में क्रांति की मानसिकता है? लोगबाग चौपालों पर चर्चा खूब करेंगे। पर मानसिकता वही- भगत सिंह पैदा हो, पर पड़ोसी के घर। सचमुच जनता में क्रांति की भावना नहीं रही। समाज सुविधा भोगी हो चुका। या यों कहें- जो सुविधा भोगी नहीं, वह दो जून की रोटी जुगाडऩे में ही दिन-रात बिता देता। सो क्रांति की अलख कैसे जगे? यों अब बीजेपी मिस्र की क्रांति से प्रभावित। सो देश में जेपी जैसा आंदोलन खड़ा करना चाहती। पर जेपी जैसा कौन, यह बीजेपी को मालूम नहीं। आखिर मालूम भी कैसे हो, जब राजनीति से लोगों का भरोसा उठ चुका। क्या आज देश में कोई ऐसा सर्वमान्य नेता, जिसे क्रांति का अगुआ बनाया जा सके? पर जनता के दिल की चिंगारी कब शोला बन जाए, पता नहीं चलता। सो महंगाई-भ्रष्टाचार से जूझ रही कांग्रेस ने बजट सत्र से पहले फिर मत्थापच्ची की। जेपीसी पर सर्वदलीय मीटिंग के बात कांग्रेस कोर ग्रुप की सोमवार को पहली मीटिंग हुई। तो जेपीसी के तौर-तरीकों पर चर्चा हुई। विपक्ष की धार भोंथरी करने के लिए कांग्रेस जेपीसी को तो राजी। पर संसद में बहस के बाद। राष्ट्र्पति अभिभाषण के अगले दिन ही विपक्ष जेपीसी का एलान चाह रहा। पर कांग्रेस ने सोमवार को बीजेपी को घेरा। मनीष तिवारी बोले- स्पेक्ट्रम पर एनडीए राज की कलई खुल रही, सो बीजेपी बहस से कतरा रही। यानी शौरीनामा से कांग्रेस को राहत की उम्मीद। बजट सत्र में जेपीसी की बहस होगी, तो अरुण शौरी का भी मामला आएगा। पर बीजेपी को घेरने की सोच रही कांग्रेस अपने बड़बोले मंत्रियों का क्या करेगी? विदेश मंत्री यूएन में जाकर पुर्तगाली विदेश मंत्री का भाषण पढ़ आते। चिदंबरम-सिब्बल-जयराम के तो बोल बड़े ही अनमोल। सोमवार को ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने नई ऊर्जा भर दी। कह दिया- पीएम 90 फीसदी विकास दर चाहते। अब इसे ऊर्जा मंत्री की ऊर्जा कहें या पॉवरकट। जब नौ फीसदी विकास दर लाने में खुद सरकार हांफ रही। इतनी विकास दर में ही महंगाई अपना तांडव नृत्य दिखा रही। तो सोचिए, 90 फीसदी में क्या हाल होगा। इतना ही नहीं जब आठ-नौ फीसदी विकास दर में एक नील 76 खरब तक के घोटाले हो रहे। जब 90 फीसदी होगा, तो सोचिए, इकाई-दहाई वाले अपने नंबरिंग सिस्टम का क्या होगा? पर फिलहाल बात संसद सत्र की तैयारी की। कांग्रेस अब जनता की नब्ज भांप जेपीसी को राजी दिख रही। तो बीजेपी को भी कर्नाटक मामले में सोमवार को थोड़ी राहत मिल गई। कर्नाटक हाईकोर्ट ने विधानसभा स्पीकर के फैसले पर मुहर लगा दी। पांच निर्दलीय एमएलए की याचिका खारिज कर दी। अब ये एमएलए सुप्रीम कोर्ट जाने का दावा कर रहे। पर गवर्नर हंसराज भारद्वाज अब क्या करेंगे। उन ने स्पीकर के फैसले की वजह से ही येदुरप्पा सरकार को दुबारा बहुमत हासिल करने की हिदायत दी थी। पर हाईकोर्ट ने स्पीकर के फैसले को जायज माना। मौकापरस्त निर्दलीय एमएलए पहले बीजेपी से जुड़े। पर बाद में पाला बदल लिया। यों विश्वासमत हासिल करने का येदुरप्पाई तरीका भी जायज नहीं। पर गवर्नर हंसराज ने भी मिशनरी क्लब में शामिल होने की ठान रखी। गवर्नरों के जेहादी तेवरों की कई कहानी। राजस्थान में चौथे चुनाव के बाद किसी को बहुमत नहीं मिला। तो विरोधी दलों ने संयुक्त मोर्चा बना महारावल लक्ष्मण सिंह को नेता चुना। पर तब गवर्नर संपूर्णानंद ने मोर्चे से कम सीट वाली कांग्रेस के नेता मोहनलाल सुखाडिय़ा को शपथ दिला दी। हरियाणा में 1982 में लोकदल-बीजेपी गठबंधन की सीटें सबसे अधिक थीं। राज्यपाल जी.डी. तपासे ने राजभवन में समर्थकों की परेड की हिदायत दी। पर परेड से एक दिन पहले ही तपासे ने तपाक से भजनलाल को सीएम पद की शपथ दिला दी। सिब्ते रजी, एस.सी. जमीर, रोमेश भंडारी, बूटा सिंह, रामलाल, वेंकट सुब्बैया जैसे कई गवर्नर अपने जेहादी तेवर दिखा इतिहास में नाम दर्ज करा चुके। पर गवर्नरों को ऐसा मौका पाला बदलू विधायकों की वजह से ही मिलता। सो कर्नाटक हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर स्पीकर के फैसले को सही ठहराया। पर इतिहास साक्षी, गवर्नर और विधानसभा स्पीकरों ने मौका मिलने पर संविधान का मखौल उड़ाने में कभी कसर नहीं छोड़ी। सो मौकापरस्त नुमाइंदों को सजा भी मिलनी चाहिए। न्यायपालिका का फैसला सही। पर फिर कभी ऐसा न हो, ऐसी लकीर भी न्यायपालिका को ही खींचनी होगी। अपने नेताओं पर जनता को एतबार नहीं। सो शासन की कमजोरी हो या नैतिकता में गिरावट या लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन। न्यायपालिका को ही लकीर खींचनी होगी।
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14/02/2011

Friday, February 11, 2011

‘अर्थशास्त्र’ को क्यों चुभ रही ‘नैतिकता’?

हर घोटाले की तरह अब एस-बैंड घोटाले को भी झुठलाने की कोशिश हो रही। टू-जी स्पेक्ट्रम में कांग्रेस और पीएम ने शुरुआत में राजा को खूब बचाया। पर सीएजी ने बाजा बजाया, तो अब वही राजा जेल की हवा खा रहे। फिर कॉमनवेल्थ घोटाले में संसद से सडक़ तक जमकर लीपापोती की। पर कैसे धीरे-धीरे परतें उधड़ीं, कलमाड़ी एंड कंपनी के लोगबाग शिकंजे में आए। अब शुक्रवार को कलमाड़ी के ओएसडी शेखर देव गिरफ्तार कर लिए गए। अब ओएसडी अपने आका के हुक्म को बिना कोई काम तो करेगा नहीं। सो सवाल- जब पीए या ओएसडी गिरफ्तार हुआ, तो आका कलमाड़ी क्यों नहीं? अब इसरो से जुड़े घोटाले का खुलासा हुआ। सीधे पीएम तक आंच पहुंची। तो पहले पीएमओ ने कोई डील न होने की सफाई दी। फिर लीगल ओपीनियन के बाद बी.के. चतुर्वेदी की रहनुमाई में कमीशन बना दिया। अब शुक्रवार को संचार मंत्री कपिल सिब्बल बचाव में उतरे। बोले- जब इसरो का देवास के साथ कांट्रेक्ट लागू ही नहीं हुआ। तो स्पेक्ट्रम आवंटन का सवाल कहां से उठता? पर देवास मल्टीमीडिया ने तो शिकंजा कस दिया। देवास ने कहा- करार रद्द नहीं किया जा सकता। गुरुवार को ही कंपनी के अध्यक्ष रामचंद्रन विश्वनाथन ने कहा- उनकी कंपनी ने इस आवंटन को हासिल करने के लिए सभी योग्यता पूरी कीं और सरकार से सभी मंजूरी ली हैं। फरवरी 2006 में केबिनेट और अंतरिक्ष विभाग ने उसकी पुष्टि की थी। ऐसे में इस करार से कोई पक्ष अब पीछे नहीं हट सकता। हम स्पेक्ट्रम मिलने का इंतजार कर रहे हैं, जिसमें पहले ही दो साल की देर हो चुकी है। यानी अब सिब्बल चाहे जितनी सफाई दें या शब्दों का जाल बुनें। पर कंपनी ने दो-टूक कह दिया- स्पेक्ट्रम देना होगा। वरना कानूनी कार्रवाई होगी। अगर करार तोड़ा गया, तो सरकार को हर्जाना भी भरना पड़ेगा। अब कंपनी पुचकारने से मान गई, तो ठीक। वरना सरकार फिर सांसत में होगी। सो कपिल सिब्बल के खिलाफ अरुण शौरी ने मोर्चा खोला। टू-जी घोटाले पर जस्टिस पाटिल कमेटी की रपट खारिज कर दी। सिब्बल पर राजा को बचाने का आरोप मढ़ा। शौरी ने टू-जी घोटाले में पीएम की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। पर कांग्रेस शौरी की दलील को बौखलाहट बता रही। यों बौखलाहट किस खेमे में, यह तो कांग्रेसी बेहतर जानते। तभी तो गाहे-ब-गाहे पीएम और कांग्रेसी नेता सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता पर सवाल उठा रहे। सो शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने फिर तल्खी दिखाई। सुनवाई तो अमर सिंह फोन टेपिंग मामले की हो रही थी। पर पीएम के बयान से खफा सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कोई भी सरकार मजबूत न्यायपालिका नहीं चाहती। न्यायपालिका के लिए आवंटित बजट को ही देखिए, जो जीडीपी के एक फीसदी से भी कम है। कोर्ट ने निचली अदालतों में मामला लटके रहने पर चिंता जताई। पर कहा- देश में अदालतों और मैन पॉवर की कमी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सोलह आने सही। सरकार में कोई भी हो, सब-कुछ अपनी मुट्ठी में कर लेना चाहता। संसद को तो सत्ताधारी अपनी बपौती बना ही चुके। जुडिशियरी को गिरफ्त में लेने की अंदरखाने खूब बिसातें बिछतीं। भले मनमोहन जुडिशियरी को दायरे में रहने की नसीहत दें। कार्यपालिका-विधायिका के काम-काज में दखलंदाजी पर एतराज जताएं। पर इतिहास साक्षी- नेताओं ने कैसे जुडिशियरी को प्रभावित करने की कोशिश की। संविधान लागू होने के बाद से 1972 तक परंपरा रही रिटायर होने वाले चीफ जस्टिस की सलाह से दूसरे वरिष्ठ जज को चीफ जस्टिस बनाने की। यों 1964 में स्वास्थ्य कारणों से जफर इमाम को वरिष्ठता के बावजूद चीफ जस्टिस नहीं बनाया गया। पर 1973 में जब चीफ जस्टिस सीकरी रिटायर हुए। तो जस्टिस शेलट, हेगड़े और ग्रोवर की वरिष्ठता लांघ अजीत नाथ रे को बना दिया गया। तब सीकरी ने कहा था- यह सरकारी निर्णय राजनीतिक था। जस्टिस छागला ने इसे न्यायिक इतिहास का सर्वाधिक अंधेरा दिन करार दिया। तब विधि के जानकार पालकीवाला ने कहा था- अनुभव से हमें सीखना चाहिए कि राजनीति में न्याय के तत्वों का प्रवेश उचित, पर न्याय में राजनीति का प्रवेश विनाशकारी। इस नियुक्ति के विरोध में शेलट, हेगड़े और ग्रोवर ने इस्तीफा दे दिया था। यही प्रक्रिया जनवरी 1977 में भी दोहराई गई, जब जस्टिस रे रिटायर हुए, तो एच.आर. खन्ना का नंबर था। पर जस्टिस मिर्जा हमीदुल्ला बेग चीफ जस्टिस बनाए गए। सो खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। अब मनमोहन से सवाल- क्या इंदिरा राज के ये दो उदाहरण जुडिशियरी में दखल नहीं थे? भ्रष्टाचार अपने चरम पर। फिर भी कोई कठोर संदेश देने के बजाए जुडिशियरी पर खीझ उतरना नकारापन नहीं, तो और क्या। कोर्ट ने सड़ते अनाज को मुफ्त बांटने की सलाह दी थी। तो पीएम ने नीतिगत मामलों में दखल बताया था। पर पीएम ने अभी तक देश को यह नहीं बताया, सड़ते अनाज, गरीबों की योजना में हो रहे भ्रष्टाचार, महंगाई, असुरक्षा, भूख को लेकर सरकार की क्या नीति? अर्थशास्त्री मनमोहन आखिर संतुलन क्यों नहीं बना पा रहे? सचमुच जब भी नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच झगड़ा हुआ। जीत हमेशा अर्थशास्त्र की हुई। स्वार्थ कभी भी खुद को पीछे नहीं हटाता, जब तक कि उसे मजबूर करने के लिए कोई और बड़ी ताकत मौजूद न हो। सो अर्थशास्त्री मनमोहन के राज में धूल फांक रही नैतिकता। सवाल- भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कोर्ट की नैतिक टिप्पणी सरकार को क्यों चुभ रही?
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11/02/2011