तो जैसे को तैसा के चक्कर में राजनीति की ऐसी-तैसी हो रही। अब दिग्विजय सिंह ने नितिन गडकरी से पूछ लिया, बताओ तुम्हारा बाप कौन? यानी सीधे-सपाट शब्दों में कहें, तो संयत भाषा में नेता मां-बहन की गाली पर उतर आए। गडकरी ने दिग्विजय को औरंगजेब की औलाद कहा था। अफजल को कांग्रेस का दामाद बताया। तो दिग्गी के भाजपाई भाई लक्ष्मण को अखर गया। सो लक्ष्मण ने शर्त रखी, गडकरी माफी मांगें, वरना बीजेपी छोड़ देंगे। पर अब बीजेपी के लिए लक्ष्मण सिंह काम के नहीं रहे। सो गुरुवार को बीजेपी ने ही निकाल दिया। गडकरी की जुबान पूर्व सांसद पर भारी पड़ी। सिर्फ दिग्विजय नहीं, कांग्रेस महासचिव बी.के. हरिप्रसाद ने कर्नाटक विवाद पर बीजेपी से पूछ लिया- बताओ रेड्डी बंधु रिश्ते में तुम्हारे क्या? उत्तराखंड कांग्रेस ने तो उसी दिन पूछ लिया था- अगर अफजल को कांग्रेस का दामाद बता रहे, तो बताओ मसूद अजहर कौन थे? भले भाषाई अभद्रता दोनों तरफ से हो रही। पर अगर आप किसी को मां-बहन की गाली देंगे। तो बदले में लड्डू की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। सबको अपने-अपने वोट बैंक की फिक्र। सो गाली-गलौज में भी सब अपना फायदा देख रहे। कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने में जुटी। तो बीजेपी हिंदू वोट बैंक दुरुस्त करने में। उधर यूपी में मुलायम सिंह ने भी पासा फेंक दिया। कल्याण सिंह से बढ़ाई पींगों पर मुसलमानों से माफी मांग ली। पर वोट को मजहब में उलझाकर कब तक उल्लू सीधा करते रहेंगे राजनेता? दिग्विजय सिंह ने तो मानो ठान ली हो, संघ को बदनाम करके छोड़ेंगे। ताकि जनभावना सीधे संघ के खिलाफ बन जाए। पर दिग्विजय का भांडा तो सीबीआई ने ही फोड़ दिया। कांग्रेस मालेगांव, अजमेर जैसे कुछ ब्लास्ट के लिए सीधे संघ को जिम्मेदार ठहरा रही थी। मीडिया में लगातार खबरें आने लगीं। पर तेरह जुलाई को सीबीआई के डायरेक्टर अश्विनी कुमार ने खंडन कर दिया। कहा- अब तक की जांच में ना संघ की कोई भूमिका, ना ही संघ के किसी व्यक्ति से पूछताछ हुई। सो ना-ना करते गुरुवार को बीजेपी खुलकर संघ के बचाव में उतर आई। कांग्रेस को चेतावनी दी- संघ की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाए, तो खामियाजा भुगतना होगा। पर हफ्ते भर से बीजेपी की हवाइयां उड़ी हुई थीं। संघ का मसला संघ के सिर ही छोड़ दिया था। पर जब मीडिया में खुलासा होने लगा, संघ के बड़े नेताओं पर उंगली उठने लगी। तो मामला राजनीतिक हो गया। कांग्रेसी दिग्विजय के बयानों ने बीजेपी को मजबूर कर दिया। अब तक बीजेपी-संघ यही दलील दे रही थीं, कानून अपना काम करेगा। दोषी कोई भी हो, बख्शा नहीं जाना चाहिए। पर अब संघ परिवार आक्रामक मूड में आ गया। सीबीआई डायरेक्टर के बयान के बाद दिल्ली में जुटे संघ के नेता मंथन कर रहे। माना जा रहा, अब संघ मीडिया में छपी खबरों के खिलाफ मानहानि का नोटिस देगा। यों संघ की बात सही, जब जांच एजेंसी ही सबूत से इनकार कर रही। तो दिग्विजय किस आधार पर आरोप लगा रहे। अगर दिग्विजय के पास अपने सबूत, तो क्यों नहीं सरकार को देते। केंद्र में आखिर कांग्रेस की ही सरकार। अगर सचमुच संघ परिवार हिंदू आतंकवाद का केंद्र। तो बैन क्यों नहीं लगवाते? आखिर मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर राजनीति क्यों? पर कांग्रेस और संघ का बैर कोई नया नहीं। संघ पर अब तक तीन बार बैन लग चुका। पहली बार महात्मा गांधी की हत्या के बाद चार फरवरी 1948 को। यों गांधीजी की हत्या सिर्फ बहाना थी। असल में तबके गृहमंत्री सरदार पटेल को कांग्रेस संगठन और देश की जनता का भरोसा हासिल था। पंडित नेहरू को डर था, कहीं संघ का सहयोग लेकर पटेल उन्हें सत्ता से न हटा दें। सो गांधीजी की हत्या के बहाने अपनी हसरत पूरी की। पर जांच में साफ हो गया, गांधीजी की हत्या में संघ की कोई भूमिका नहीं। फिर नेहरू ने संघ के पास संविधान न होने को आधार बनाया। पर संघ ने कुछ समय के बाद संविधान उपलब्ध करा दिया। सो जुलाई 1949 में बैन हटाना पड़ा। फिर इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के बाद चार जुलाई 1975 को संघ पर बैन लगाया। पर संघ में बढ़ती लोगों की आस्था की वजह से 1977 के चुनाव में इंदिरा की हार हुई और इस्तीफा देने से पहले 22 मार्च 1977 को उन ने बैन हटा दिया। फिर बाबरी विध्वंस के बाद दस दिसंबर 1992 को नरसिंह राव ने बैन लगाया। पर कोर्ट ने चार जून 1993 को बैन हटा दिया। यानी कांग्रेस ने जब-जब संघ पर बैन लगाया, आखिर मुंह की ही खानी पड़ी। सन 1948 हो या 1975 या फिर 1992, संघ पर सत्ता का कुठाराघात उसे और मजबूत कर गया। बीजेपी का सत्ता तक पहुंचना उसी का नतीजा। सो कांग्रेस अब येन-केन-प्रकारेण संघ को बदनाम करने में जुटी। हिंदू आतंकवाद का जुमला दिग्विजय सिंह के दिमाग की उपज। जिसे उन ने गुजरात विधानसभा चुनाव के वक्त इस्तेमाल किया। तो चुनाव आयोग की फटकार भी खानी पड़ी थी। पर साध्वी प्रज्ञा केस के बाद अजमेर ब्लास्ट मामले में देवेंद्र गुप्त की गिरफ्तारी ने दिग्विजय को फिर मौका दे दिया। गुरुवार को इंदौर में संघ व बीजेपी को हिंदू आतंकवाद की मदद करने वाला संगठन बताया। समझौता ब्लास्ट पर भी संघ को कटघरे में उतारा। अब सीबीआई को सच मानें या दिग्विजय को? दिग्विजय का एजंडा तो बटला से लेकर दंतेवाड़ा और भोपाल त्रासदी तक साफ हो चुका। पर अब दिग्विजय लाख चिल-पों करें, संघ को तो सीबीआई का सहारा मिल गया।
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15/07/2010
Thursday, July 15, 2010
Wednesday, July 14, 2010
तो आगे भी जुबां से ही मिटाते रहेंगे नक्सलवाद!
नक्सलवाद पर एक और मीटिंग निपट गई। अब नक्सल प्रभावित जिलों में चार सौ थाने बनेंगे। हर थाने को सालाना दो करोड़ की सहायता मिलेगी। राज्यों में स्पेशल पुलिस आफीसरों के पद बढ़ेंगे। पर सबसे अहम फैसला हुआ, चार राज्य मिलकर यूनीफाइड कमांड बनाएंगे। पूरे ऑपरेशन में केंद्र सरकार तंत्रीय सुविधा मुहैया कराएगी। हैलीकॉप्टर दिए जाएंगे। यूनीफाइड कमांड में सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल को कमान सौंपी जाएगी। सीआरपीएफ में भी डीजी (एक्शन) की तैनायी होगी। यानी यह तो हुई नक्सलियों पर कार्रवाई की तैयारी। दूसरी तरफ योजना आयोग एक हाई पॉवर कमेटी बनाएगा। जो नक्सली क्षेत्र में विकास योजनाओं की जरूरत और हालात पर सुझाव देगी। सडक़ संपर्क सुधारे जाएंगे। प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल पर विशेष फोकस करेगी सरकार। पर कार्रवाई और विकास एक साथ कैसे संभव होगा? नक्सलियों की सोच यही, अगर सरकार रोड बना रही, तो उसका इस्तेमाल कार्रवाई के लिए होगा। सो नक्सली लैंड माइंस बिछा सडक़ ही नेस्तनाबूद कर देते। पर नक्सल समस्या को लेकर मीटिंग पीएम मनमोहन ने बुलाई थी। सो केंद्र सरकार सोनिया और दिग्विजय की सोच के साथ कदमताल करती दिखी। कुल मिलाकर मनमोहन सरकार ऊहापोह में ही फंसी। मीटिंग तो बुला ली। पर केंद्र की ओर से कोई ठोस फार्मूला नहीं। सारा दारोमदार राज्यों पर ही छोड़ दिया। छह साल बाद यूनीफाइड कमांड की सुध ली। पर प्रस्ताव को अधकचरा बना दिया। वाजपेयी सरकार ने यूनीफाइड कमांड की पहल की थी। पर मनमोहन ने कमान संभालते ही ठंडे बस्ते में डाल दिया। पहली पारी में साढ़े चार साल होम मिनिस्टर रहे शिवराज पाटिल तो वैसे ही नक्सलियों को अपना भाई बताते रहे। जैसा बुधवार को बीजेपी के सहयोगी नीतिश कुमार ने बताया। यों अच्छा हो, इन्हीं दोनों को नक्सलवादियों से वार्ता के लिए भेज दिया जाए। हो न हो एक भाई दूसरे भाई की बात मान ले। अब जरा नक्सलियों को भाई बताने वाले नेता कुछ नक्सली हमले भी याद रखें। छत्तीसगढ़ की हाल की घटनाओं को लें, तो कैसे नक्सलियों ने सुरक्षा बलों को मारा। फिर सिर धड़ से अलग किया। अगर नेताओं को सुरक्षा बल या आम आदमी का खून, खून नहीं लगता। तो याद दिलाते जाएं, नेताओं की बिरादरी के ही थे सुनील महतो। झामुमो के लोकसभा सांसद थे। पांच मार्च 2007 को जमशेदपुर के निकट केसरपुर गांव में फुटबाल मैच का ईनाम बांटने गए थे। तभी नक्सलवादियों ने मंच पर पहुंच सांसद के सुरक्षा गार्ड से बंदूक छीनी। पहले सुरक्षा गार्डों को मारा। फिर सांसद सुनील महतो को गोली से भून दिया। पर नक्सली करतूत यहीं खत्म नहीं हुई। नक्सलियों ने उसके बाद जो किया, उसे देख भले नेताओं का खून न खौले। पर आम नागरिक का खून खौल उठेगा। नक्सलवादियों ने सांसद को गोली मारने के बाद लाश पर कूद-कूद कर नृत्य किया। खुशियां मनाईं, माओवादी जिंदाबाद के नारे लगाए। पर नीतिश हों या पाटिल, दिग्विजय हों या सोनिया, कौन समझाए। यों पी. चिदंबरम ने लकीर पीटने के बजाए ऑपरेशन ग्रीन हंट के जरिए नई लकीर खींची। पर दस जनपथ से आए फरमान ने चिदंबरम के हाथ जकड़ दिए। मजबूर चिदंबरम ने छह अप्रैल को दंतेवाड़ा हमले के बाद इस्तीफे की पेशकश भी कर दी थी। सो मजबूरी में ही सही, अब चिदंबरम भी अपनों के रंग में रंग गए। दंतेवाड़ा कांड के बाद नक्सलियों की हरकत को गृह युद्ध करार देने वाले चिदंबरम ने बुधवार को कांग्रेसी फार्मूला ही अपनाया। नक्सलवाद को राज्य की कानून व्यवस्था का मुद्दा मान यूनीफाइड कमांड का जिम्मा भी राज्य के सिर ही छोड़ दिया। केंद्र राज्यों को संसाधन मुहैया कराएगा। पर उपलब्धता के आधार से। यानी हैलीकॉप्टर होगा, तो नक्सली क्षेत्र में तैनाती होगी। नहीं तो भगवान भरोसे। पर जुबानी सख्ती भी खूब दिख रही। चिदंबरम बोले- नक्सलियों को जज नहीं बनने देंगे। पर कोई पूछे, आप क्या कर लोगे। जब सारा मामला राज्य पर ही छोड़ दिया। नक्सलवाद को राष्ट्रीय समस्या मानने के बजाए कुछ राज्यों की समस्या मान रहे। तो कैसे नक्सलवाद का खात्मा होगा? पीएम ने सीएम की मीटिंग बुलाकर महज खानापूर्ति की। हर बार की तरह अबके भी भाषणबाजी हुई। तो एकीकृत कमान के साथ-साथ फंड की कमी न होने देने का भरोसा। नक्सलियों ने कितने लोगों को मारा, यह भी बताया। चिदंबरम के मुताबिक 2004 से 2008 के बीच सालाना औसतन पांच सौ आम नागरिक मारे गए। अब जरा नक्सली हमले की घटना के आंकड़े देखिए। साल 2006 में 930 हमले हुए। 2002 में 1465, 2003 में 1597, 2004 में 1533 और 2005 में 1608 जगहों पर नक्सली हमले हुए। हर बार वही भाषणबाजी, सघन कार्रवाई करेंगे। बख्शा नहीं जाएगा। पर सचमुच में अपनी व्यवस्था का नासूर नक्सलवाद कब खत्म होगा? यूनीफाइड कमांड की बात कोई नई नहीं। मुख्यमंत्रियों की मीटिंग हर साल दो-चार दफा हो ही जाती। पर बयानों में कोई फर्क नहीं होता। अब आप मार्च 2007 में सांसद सुनील महतो की नृशंस हत्या से पहले की सीएम मीटिंग में पीएम मनमोहन का एलान देख लो। तब कहा था- 'नक्सलियों के खिलाफ राज्य अब संयुक्त अभियान छेड़ेंगे। जिसके लिए केंद्रीय कोष की कमी नहीं होने दी जाएगी।' अब करीब साढ़े तीन साल बाद आज का बयान देखिए। आखिर साढ़े तीन साल बाद महज ढाई कोस भी क्यों नहीं चल पाई सरकार? यानी बुधवार की मीटिंग का मतलब साफ, आगे भी ऐसे ही जुबान से नक्सलवाद मिटाते रहेंगे।
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14/07/2010
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14/07/2010
Tuesday, July 13, 2010
भारत बनाम इंडिया, आधी हकीकत, आधा फसाना
साईं इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय। भक्ति काल में जब कबीर ने यह दोहा लिखा होगा, तो सोचा भी न होगा, दुनिया इतनी बदल जाएगी। अब जैसी अपने देश की तस्वीर, अगर कबीर वाणी की पैरोडी बने। तो यही होगा- साईं इतना दीजिए जामें आम आदमी मरता रहे,च् साधुज् मस्त होता जाय। सचमुच गरीब हर राजनीतिक जुमले में जुडक़र मर रहा। पर सरकार की नीतियां खास-उल-खास पर मेहरबान। यूएनडीपी की ताजा रपट ने अपने विकास के थोथे दावे की कलई खोल दी। रपट को मानिए, तो दुनिया के सबसे अधिक गरीब लोग भारत में रहते। यों अपने यहां तो गरीबी के पैमाने और आंकड़े को लेकर बहस ही छिड़ी हुई। पर यूएनडीपी के पैमाने से भारत में 42 करोड़ लोग गरीब। यानी 26 अफ्रीकी देशों से भी एक करोड़ अधिक गरीब भारत में। यूएनडीपी की नजर में गरीब वही, जो रोजाना एक डालर से कम की आमद पर जिंदगी बसर करे। यानी अपने यहां के हिसाब से देखें, तो 48-50 रुपए से कम कमाने वाला गरीब। पर सोचो, अर्जुन सेन गुप्त की 20 रुपए दिहाड़ी वाली रपट लागूं करें। तो गरीबी का आंकड़ा दुगुने से कहीं अधिक होगा। अर्जुन सेन कमेटी ने तो 84 करोड़ लोग गरीब बताए थे। पर यूएनडीपी ने जो गरीबी की खस्ता हालत बताई। उसके मुताबिक बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान में गरीबों की बाढ़। रपट में इन आठ राज्यों में रहने वाले गरीबों की हालत सबसे अधिक गरीब अफ्रीकी देश इथोपिया और तंजानिया के लोगों जैसी। जहां न स्वास्थ्य की सुविधा, न शिक्षा की। बुनियादी सुविधाएं तो दूर, पीने को साफ पानी भी नहीं। अब कोई पूछे, जब मनमोहन सरकार सामाजिक क्षेत्र पर फोकस कर रही। तो कहां गया नेशनल रूरल हैल्थ मिशन, कहां है सर्व शिक्षा अभियान, कहां है शिक्षा का मौलिक अधिकार? गरीबी की तस्वीर को अगर शहर और गांव में बांटें। तो अपनी 135 करोड़ की आबादी में करीब 37 फीसदी बीपीएल। जिनमें 22 फीसदी ग्रामीण, तो 15 फीसदी शहरी आबादी। अकेले बिहार, यूपी, उड़ीसा में आधे से अधिक गरीब। पर पंजाब, दिल्ली में गरीब की संख्या कम। यों नरेगा जैसी योजना ने कुछ बदलाव किया। पर गरीब को गरीबी रेखा से बाहर लाने में अभी सफल नहीं हुई। सो सवाल समूची राजनीतिक व्यवस्था से। आखिर 63 साल बाद भी देश की तस्वीर ऐसी क्यों? आखिर ऐसी कौन सी नीति बन रही, जहां करोड़पति-अरबपति धन कुबेर बनते जा रहे और आम आदमी पके हुए आम की तरह पिचकता जा रहा। सिर्फ राजनीति ही नहीं, अपनी मीडिया भी कोई दूध की धुली नहीं। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। जब अक्टूबर 2007 में अपने मुकेश अंबानी जगत अमीर बन गए। तो मीडिया की सुर्खियां बनीं। तब 31 अक्टूबर 2007 को यहीं पर लिखा था- सिर्फ अंबानी नहीं, 84 करोड़ की भी हो फिक्र। पर तबसे अब तक आम आदमी की फिक्र हुई, तो सिर्फ जुबां से। मनमोहन सरकार को तेल कंपनियों की सेहत की चिंता तो खूब, पर कभी आम आदमी के पीठ से चिपके पेट की फिक्र नहीं। एक तरफ देश की 42 करोड़ कहें या 84 करोड़, आबादी गरीब, तो दूसरी तरफ अकेले अंबानी जैसे सब पर भारी। अगर 1997 से अब तक के आंकड़े को देखें, तो करीबन सवा दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके। सन 1990 के दशक तक अपने देश की जीडीपी में कृषि का अनुपात पांच फीसदी होता था। अब महज एकाध फीसदी पर सिमटा हुआ। क्या यही है देश की मनमोहिनी अर्थव्यवस्था? हर चुनाव में वादे खूब होते। कभी परमाणु डील की बात, तो कभी पोकरण तिहराने की बात। पर कभी कोई नेता ताल ठोककर यह नहीं कहता- फलां वक्त तक देश से अमीरी-गरीबी की खाई मिटा देंगे। चारों तरफ खुशहाली ला देंगे। आखिर आम आदमी परमाणु डील या पोकरण-तीन से क्या करेगा? उसे तो दो जून की दाल-रोटी चाहिए। सिर ढकने को छत चाहिए। पर आजादी के 63 साल बाद आम आदमी रोजमर्रा की चीजों के लिए मोहताज। सरकार ने महंगाई से जिंदगी तबाह कर रखी। तो विपक्ष ने बंद से मुहाल कर रखी। फिर भी महंगाई कम नहीं होती। तो क्या ऐसी सूरत में भारत 2020 का सपना देख रहा? हम 2020 तक भारत को इंडिया बनाना चाह रहे। पर हकीकत क्या? क्या गरीबी-अमीरी की बढ़ती खाई से भारत विकसित देश बनेगा? क्या विकास दर आम आदमी की गरीबी दूर करेगी? हम मुकेश अंबानी के जगत अमीर बनने पर फक्र करते। सरपट दौड़ती विकास दर पर फक्र करते। सेसेंक्स और शेयर मार्केट की उछाल पर गदगद होते। पर देश की जो तस्वीर यूएनडीपी ने दिखाई, या अर्जुन सेन गुप्त कमेटी दिखा चुकी। कभी उधर ध्यान क्यों नहीं जाता? सरकार की नीतियां उन पांच फीसदी लोगों को ध्यान में रखकर बनतीं, जिनमें से चार फीसदी वोट डालना भी अपनी शान के खिलाफ समझते। पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल ने एक बार कहा था- अमीरी-गरीबी की खाई इसी तरह बढ़ी, तो वह दिन दूर नहीं जब गांव से लोग ट्रेक्टर में आएंगे और दिल्ली जैसे महानगर को लूट ले जाएंगे। अपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार वायसराय लार्ड इर्विन को यहां तक कह दिया था, आपको शर्म आनी चाहिए, एक आम भारतीय से पांच सौ गुना अधिक आपकी आमदनी। पर आज के जमाने में अमीरी-गरीबी की खाई 80 से 85 लाख गुना बढ़ चुकी। पर आम आदमी की ओर कौन ध्यान दे। आम आदमी किसी राजनीतिक दल को चुनावी चंदा जो नहीं देता। सो जो देवत है, वो पावत है।
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13/07/2010
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13/07/2010
Friday, July 9, 2010
बदनाम राजनीति में अब कोई वाजपेयी क्यों नहीं?
'बदनाम होंगे, तो क्या नाम न होगा।' वाजपेयी के बाद की बीजेपी कुछ साल से इसी फार्मूले पर चल रही। अब नितिन गडकरी भी उसी परंपरा के वाहक। सो अध्यक्षी संभाले छह महीने ही बीते। पर जुबान ऐसी चली, अब तक छह विवाद भी खाते में जोड़ लिए। पहला विवाद तो कुर्सी संभालने के 25वें दिन ही हो गया। जब अप्रवासियों को महानगरों की समस्या बता गए। तो बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी जेडीयू ने गडकरी का पुतला फूंक सलामी दी थी। फिर फरवरी के इंदौर अधिवेशन में राम मंदिर के बाजू में मस्जिद बनाने का बयान। अप्रैल में सिख विरोधी दंगे को गुजरात दंगे से जोड़ा। दंगों को आम लोगों की प्रतिक्रिया बताया। तो खालसा पंथ ने एतराज जताया। सो फौरन गडकरी को खंडन जारी करना पड़ा। फिर बारह मई को चंडीगढ़ की रैली में लालू-मुलायम को सोनिया गांधी के तलवे चाटने वाला कुत्ता बता बखेड़ा खड़ा किया। पर राजनीतिक भूचाल देख गडकरी ने चंडीगढ़ में जुबान से जो उगला, वही निगल लिया। पर लालूवादी रामकृपाल ने गडकरी को छछूंदर कह दिया। अब दिग्विजय सिंह का नाम नहीं लिया। पर इशारों में ही पूछ लिया, आजमगढ़ में आतंकी के घर जाने वाले महाराणा प्रताप की औलाद हैं या औरंगजेब की? तो गुरुवार को देहरादून में संसद हमले के दोषी अफजल को कांग्रेस का दामाद बता दिया। सो बवाल मचना ही था। पर गडकरी का तुर्रा देखिए, अबके माफी मांगने से इनकार कर दिया। खम ठोककर बोले- 'जो कहा, वह सही, मैं अपने बयान पर कायम हूं।' पर कांग्रेस राशन-पानी लेकर चढ़ गई। गडकरी को मानसिक रोगी बताया। पर गडकरी जैसा सुलझा इनसान इतना उलझा बयान क्यों दे रहा? बीजेपी में एक थ्योरी चल रही, जो कांग्रेसी बयानों से पुष्ट हो रही। पिछले कुछ समय से कांग्रेस नेता गडकरी को गंभीरता से नहीं ले रहे। कभी कद पर उंगली उठा रहे, तो कभी पद पर। सो गडकरी ने जान-बूझ कर कांग्रेस नेताओं को निशाना बनाना शुरू किया। ताकि सुर्खियों के सरताज बने रहें। यों सचमुच पिछले शुक्रवार जब गडकरी ने महंगाई पर सवाल पूछा, तो मनीष तिवारी ने महंगाई के भूत से भागने को गडकरी के कद पर सवाल उठा दिए। कहा- 'गडकरी इतने बड़े नेता नहीं, जो कांग्रेस के इस मंच से जवाब दें।' पर अब गडकरी ने भाषाई मर्यादा तोड़ी, तो मनीष तिवारी गडकरी को पद की मर्यादा याद दिला रहे। शुक्रवार को कांग्रेस मंच से शकील अहमद उतरे। तो उन ने गडकरी को आड़े हाथों लिया। सो सवाल हुआ, आज गडकरी पर क्यों बोल रही कांग्रेस? तो शकील ने मनीष की उस राय को निंदा की एक शब्दावली बताया। अब गडकरी के प्रवक्ता भी कुछ ऐसी ही दलील दे रहे। रविशंकर बोले- 'गडकरी ने देश की पीड़ा जाहिर की।' तो सवाल, क्या भावना व्यक्त करने को राजनीति की मर्यादाएं ऐसे ही टूटेंगी? अगर गडकरी ने मर्यादा तोड़ी, तो कांग्रेस भी दूध की धुली नहीं रही। दिल्ली में कांग्रेस ने गडकरी को मनोरोगी बताया। तो देहरादून से कांग्रेस ने पलटवार कर पूछा, अगर अफजल को दामाद बता रहे। तो गडकरी बताएं, मसूद अजहर कौन था? जिसे सम्मान सहित जसवंत सिंह कंधार छोडक़र आए थे। पर कब तक मर्यादाएं टूटती रहेंगी? कभी सोनिया गुजरात के सीएम मोदी को मौत का सौदागर कहतीं, कभी मोदी सोनिया को। मई में मध्य प्रदेश विधानसभा के बाहर कांग्रेसी एमएलए ने बीजेपी की महिला एमएलए ललिता के खिलाफ ऐसी अभद्र टिप्पणी की, जिसे लिखा नहीं जा सकता। क्या यही अपनी राजनीति का स्तर? एक वक्त था, जब अटल बिहारी वाजपेयी गुजरात दंगों से आहत हुए। तो सिर्फ एक शब्द- 'राजधर्म' का पालन करने की टिप्पणी से सारी बात कह दी। जब 2004 के चुनाव में प्रमोद महाजन ने सोनिया गांधी की तुलना मोनिका लेविंस्की से कर दी। नरेंद्र मोदी ने राहुल को जर्सी बछड़ा, तो सोनिया को इटली की.... कह दिया। तो कांग्रेसियों से पहले वाजपेयी ने एतराज किया। भाषा की लक्ष्मण रेखा न लांघने की नसीहत दी। पर आज कांग्रेस या बीजेपी में ऐसा कोई नेता क्यों नहीं, जो वाजपेयी जैसी दो-टूक नसीहत दे सके। अब तो कोई किसी को कुत्ता कह रहा, कोई छछूंदर। कोई मनोरोगी, तो कोई कुछ। राजनीतिक मुद्दे खत्म होते जा रहे। गाली-गलौज तो आम बात हो गई। संसद के पिछले सत्र को ही लें, तो मर्यादा तोड़ू सत्र कहना उम्दा रहेगा। कोई भी दल अछूता नहीं रहा था। आखिर में अनंत-लालू प्रकरण में सुषमा ने माफी मांगी। बाद में सुषमा ने कहा था- 'भले कहीं भी पार्टी नेता कुछ बोल जाएं, पर कम से कम संसद में वाणी पर संयम होना चाहिए।' पर गडकरी तो सांसद ही नहीं। सो बाहर ही सुर्खियां बटोर रहे। पर विरोधी ही नहीं, अब तो अपने भी गडकरी को संयम की नसीहत दे रहे। शुक्रवार को शरद यादव ने भी गडकरी की भावना को जायज माना, पर भाषा पर एतराज जता गए। बोले- 'सच मर्यादा में अधिक अच्छा लगता है।' पिछली बार लालू-मुलायम को कुत्ता कहा था। तो कलराज मिश्र ने नसीहत दी थी- 'नेता संयम में रहकर भाषा का प्रयोग करें। क्योंकि नेता जनता से जुड़ा होता है और जनता पर नेता की बात का फर्क पड़ता है।' सो कांग्रेस को फिलहाल छोडि़ए, गडकरी पर नसीहतों का असर कितना, यह तो भविष्य बताएगा। पर यह क्या, इधर गडकरी ने मर्यादा तोड़ू भाषा पर खम ठोक दिया। उधर हरियाणा के झिंझोली में बीजेपी के मंडल स्तरीय नेताओं के प्रशिक्षक वर्ग का उद्घाटन किया। अब सोचिए, जब बड़े मियां ऐसे, तो छोटे मियां क्या सीखेंगे?
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09/07/2010
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09/07/2010
Thursday, July 8, 2010
बुराई नहीं, राजनीति को सिर्फ वोट बैंक की फिक्र
घाटी में घमासान तेज हो गया। तो आखिर सेना बुलानी पड़ी। अलगाववादियों ने षडय़ंत्र रच घाटी को फिर सुलगा दिया। पहली बार सीएम बने युवा नेता उमर अब्दुल्ला षडय़ंत्र नहीं भांप पाए। सो अलगाववादी अपने मंसूबे में सफल होते दिख रहे। सिर्फ उमर नहीं, मनमोहन सरकार भी सोती रही। सो अब घाटी में हालात सामान्य बनाने का जिम्मा सेना को सौंपा गया। पर अभी भी कोई स्पष्ट नीति नहीं। पी. चिदंबरम ने सेना की मौजूदगी को महज प्रतिरोधात्मक बताया। अब गृह मंत्रालय से ही खुलासा हुआ। कैसे अलगाववादियों ने घाटी को सुलगाने की साजिश रची। फोन टेपिंग में कई भावी योजनाओं का भी खुलासा हुआ। पर केंद्र ने अपना हाथ झुलसाने के बजाए उमर अब्दुल्ला को आगे कर दिया। अब सारा दारोमदार उमर पर, जो जुलाई-अगस्त 2008 में हुए अमरनाथ श्राइन बोर्ड विवाद के वक्त खूब तेवर दिखा चुके। लोकसभा में उमर का उत्तेजनापूर्ण भाषण सुर्खियों में रहा था। घाटी में अमन-चैन और अपनी जमीन के लिए कुर्बानी का एलान किया था। पर अब वही घाटी आग में क्यों झुलस रही? क्यों नहीं युवाओं के दिल पर राज कर पाए उमर? उमर हों या मनमोहन सरकार, अलगाववादियों के आगे नतमस्तक क्यों दिख रहे? पर जैसे अलगाववाद के आगे सरकार कमजोर दिख रही, वैसे ही गुरुवार को खाप के खौफ की शिकार दिखी। सो केबिनेट में ऑनर किलिंग पर संशोधन का फैसला टल गया। केबिनेट में ही आम सहमति नहीं बनी। सो बीच का लटकाऊ रास्ता अपनाया। अब संशोधन के मामले पर जीओएम बनेगी। सभी राज्यों से सलाह-मशविरा होगा। फिर संसद में संशोधन बिल पेश। पर जीओएम का मतलब तो अब बीच के शब्द ओ जैसा हो गया। यानी जो भी मैटर जीओएम के पास, उसका तो गोल-मोल होना तय। बीजेपी की मानें, तो यह 54 वां जीओएम होगा। अब सचमुच सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति होती, तो सीधे बिल लाने का खम ठोकती। पर अंबिका ने महज संभावना जताई। तो चिदंबरम ने मानसून सत्र खत्म होने से पहले सलाह-मशविरे की प्रक्रिया पूरी करने का एलान। पर जरा याद करिए, जब 30 मार्च को मनोज-बबली केस में करनाल कोर्ट ने खाप की खाल खींची। ऑनर किलिंग पर बहस शुरू हो गई। तो अपने विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने संतवाणी सुनाई। हमेशा की तरह कानून की खामी कबूली, कानून में बदलाव को जरूरी बताया। बिल लाने का दावा भी किया। पर अपनों का दबाव बढ़ गया। याद है ना, कैसे कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने खाप की पैरवी की। तो कांग्रेस ने फटकार लगाई। पर जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी समर्थन कर दिया। तो वोट बैंक की मजबूरी कांग्रेस की जुबान पर ताला लगा गई। कांग्रेस को यही दिख रहा, एकाध प्रेमी जोड़ा वोट बैंक नहीं हो सकता, जबकि खाप से पंगा लेकर चुनाव में जीत संभव नहीं। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने हमेशा की तरह नीति साफ कर दी। बोले- कानून में बदलाव की कोई जरूरत नहीं। मौजूदा कानून ही पर्याप्त। अब जीओएम का मतलब आप दिग्गी राजा के बयान से लगा लो। नक्सलवाद हो या आतंक या फिर बटला कांड, दिग्गी की सिर्फ जुबान होती, सोच दस जनपथ की। यानी सामाजिक बुराई से लडऩे का जज्बा किसी में नहीं। भैरोंसिंह शेखावत और बंसीलाल जैसी मिसाल अब नहीं मिलती। देवराला सती कांड में शेखावत पूरे समाज से लड़ गए थे। समाज उसे उचित ठहरा रहा था। पर शेखावत ने खुला विरोध जताया। दलील दी, बचपन में ही मेरे पिता गुजर गए थे और अगर तब मेरी मां सती हो जातीं, तो मैं कहां जाता। क्या आज मैं यहां होता? बीजेपी भी तब समाज का विरोध देख डर गई थी। कार्यकारिणी की बैठक के आखिर में होने वाली अटल-आडवाणी की रैली टालने का फैसला हुआ। पर शेखावत ने रार ठान ली। बंसीलाल का मामला थोड़ा अलग। चुनाव में किसानों को मुफ्त बिजली देने का शिगूफा चल रहा था। पर बंसीलाल ने जींद की जनसभा में खम ठोककर कहा- मुफ्त बिजली नहीं देंगे। सो बंसीलाल चुनाव हार गए। पर जब मुफ्तखोरी का हश्र जनता ने देखा। बिजली महज झरोखा-दर्शन कराने लगी। तो अगले चुनाव में उसी जनता ने बंसीलाल को ताज पहनाया। मानसिकता बदलने की यह अद्भुत मिसाल। पर अब सिर्फ वोट बैंक की फिक्र होती, बीजेपी हो या कांग्रेस या फिर कोई और। बीजेपी भी अबके खाप जैसी ही सोच दिखा रही। पर राजनीतिक नफा-नुकसान से जुबां पर ताला। बीजेपी तो अंतरधार्मिक विवाह पर भी अपना रंग दिखा चुकी। भले जमाना बदल गया, पर समाज का भौंडा चेहरा नहीं बदला। अप्रैल 2007 में भोपाल के उमर ने सिंधी समाज की प्रियंका वाधवानी से लव मैरिज की। तो दोनों धर्मों के ठेकेदार मैदान में कूद पड़े। दोनों तरफ से तालिबानी फरमान जारी हो गए। तब सीएम शिवराज सिंह चौहान ने भले संविधान का मान रख उमर-प्रियंका की शादी पर सीधी टिप्पणी नहीं की। अलबत्ता मन की भड़ास निकालते हुए बोले- मध्य प्रदेश को दिल्ली या मुंबई न समझें। यहां का सामाजिक परिवेश भिन्न है। अब कोई पूछे, सामाजिक परिवेश बनाने वाला कौन? क्या व्यक्ति के बिना समाज का अस्तित्व है? व्यक्ति से परिवार, परिवार से मोहल्ला, मोहल्लों से गांव और समाज का निर्माण होता है। अगर बदलते जमाने के साथ व्यक्ति की सोच बदल रही, तो समाज के ठेकेदार रूढि़वाद में ही क्यों जकड़े हुए?
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08/07/2010
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08/07/2010
Tuesday, July 6, 2010
सिर्फ पवार नहीं, अब तो पूरी सरकार थक चुकी!
तो बंद के बाद अब आंकड़ों की जंग शुरू हो गई। बीजेपी ने सरकार से जवाब मांगा, बताए बंद से हुए नुकसान के आकलन का क्या पैमाना? भारत बंद की सफलता ने सचमुच विपक्ष में जोश भर दिया। सो मंगलवार को सरकारी रपट से ही सरकार पर हमला बोला। रविशंकर प्रसाद बोले- पेट्रोलियम मंत्रालय की रपट के मुताबिक वर्ष 2009-10 में तेल कंपनियों ने 4663.78 करोड़ का मुनाफा कमाया। फिर हर कंपनी का अलग-अलग मुनाफा भी बताया। यानी तेल कंपनियों के घाटे में होने की दलील महज शिगूफा। सचमुच सरकार ने पेट्रोल-डीजल को राजस्व का कुआं बना लिया। सरकारी इश्तिहारों में कैरोसिन की बढ़ोतरी पर पाकिस्तान जैसे देश के नाम तो गिना दिए। पर यह छुपा गई, कैसे पाक में 26 रुपए लीटर पेट्रोल मिल रहा। अपने से गरीब देश बांग्लादेश में भी 22 रुपए कीमत। पर भारत में 50 रुपए के पार हो चुका। औसतन पेट्रोल की बेसिक कीमत साढ़े सोलह रुपए प्रति लीटर। पर केंद्र सरकार का टेक्स करीबन 12 रुपए, उत्पाद शुल्क करीब दस रुपए। राज्यों का टेक्स करीबन आठ और वैट चार रुपए। अब कोई चीज तिगुने दाम पर बिके, फिर भी घाटे की बात हो। तो कौन भरोसा करेगा। पर महंगाई बेलगाम हो चुकी, तो शरद पवार अपना बोझ कम करना चाह रहे। पीएम से मिलकर गुहार लगा चुके। सो मानसून सत्र से पहले मनमोहन केबिनेट में फेरबदल की तैयारी। पर महंगाई की माथापच्ची छोड़ पावर की जोर-आजमाइश में जुटी कांग्रेस-एनसीपी। कांग्रेस पवार से खाद्य-आपूर्ति मंत्रालय लेकर अपने पास रखना चाह रही। ताकि खाद्य सुरक्षा बिल का श्रेय सिर्फ कांग्रेस को मिले। पर पवार चाह रहे, एनसीपी कोटे से एक और मंत्री बने। अब सोचो, पवार का बोझ भले कम होगा। पर देश का खर्चा तो बढ़ेगा ही। पवार विभाग छोडऩे को राजी। तो क्या नए मंत्री को सैलरी भी अपने हिस्से में से देंगे? नया मंत्री होगा, तो नया नौकर-चाकर-स्टाफ-गाड़ी-बंगला सब चाहिए। यानी आम आदमी तो पहले ही पवार को झेल रहा था। तो क्या अब पवार जैसे दो झेलने पड़ेंगे? आखिर पवार करते ही क्या, जो काम का बोझ हो? जब-जब मुंह खोला, सिर्फ महंगाई बढ़ाई। इससे बेहतर तो पवार का बोझ कम हो जाए। यों काम के बोझ से सिर्फ पवार ही नहीं थके, ऐसा लग रहा, पूरी सरकार थक चुकी। सचमुच सरकार के पास कोई नीति नहीं। सिर्फ राजनीतिक मैनेजमेंट से सरकार घिसट रही। अब अजित सिंह की रालोद को यूपीए में शामिल करने की भी तैयारी चल रही। ताकि मानसून सत्र में विपक्ष महंगाई पर तेवर दिखाए। तो सरकार का अस्तित्व खतरे में न दिखे। यों विपक्ष को महंगाई का मुद्दा पहली बार फैसलाकुन दिख रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में भी महंगाई मुद्दा थी। पर बीजेपी के एजंडे में तीसरे-चौथे नंबर का मुद्दा रही। मनमोहन का कमजोर नेतृत्व, आतंकवाद जैसे मुद्दे प्राथमिक रहे। पर अब भारत बंद में जनता के गुस्से का असर दिखा। तो संसद में फिर आर-पार की तैयारी। पर संसद का रिकार्ड यही बतला रहा, विपक्ष ने रार ठानी, तो बहस की रस्म अदायगी हो जाएगी। यही तो हुआ था बजट सत्र की शुरुआत में। विपक्ष ने जिद ठानी, तो सरकार ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस से पहले महंगाई की बहस पूरी करा दी। पर हुआ क्या, महंगाई तो अपना मुंह फैलाती ही चली गई। अब मंगलवार को बंद पर आडवाणी की टिप्पणी आई। तो यही लगा, संसद में सिर्फ रस्म अदायगी होगी। भारत बंद से हुए नुकसान की खबर से आहत दिखे। बोले- अबके बंद से यह टीका-टिप्पणी बंद होगी कि विपक्ष महंगाई के मुद्दे पर पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा। अब आडवाणी की इस टिप्पणी का क्या मतलब? यही ना, एक भारत बंद, और जिम्मेदारी की इतिश्री। सो जब विपक्ष रस्म निभा चुप हो जाएगा। तो सरकार से राहत की क्या उम्मीद। महंगाई हो या आंतरिक सुरक्षा का मसला या फिर विदेश नीति। मनमोहन सरकार ढुलमुल ही दिखती। अब पाकिस्तान ने 17 आतंकी संगठनों पर बैन लगाया। टास्क फोर्स बनाकर आगे बढऩे की तैयारी की। इसी में मुंबई हमले से जुड़ी जमात-उद-दावा भी शामिल। पर पाकिस्तान ने यह कदम भारत के दबाव में नहीं उठाया। अलबत्ता जब पाक खुद आतंक का शिकार हुआ, अमेरिका को खतरा दिखा। तो यह कदम उठाया गया। सचमुच जब अपने देश में आतंक जैसे मुद्दे पर भी राजनीतिक आम सहमति नहीं होगी। तो कूटनीतिक सफलता की उम्मीद ही कैसे। अब इशरत जहां का ही केस देख लो। जब शिवराज पाटिल होम मिनिस्टर थे। तो कोर्ट में हलफनामा दिया, तो इशरत को लश्कर का आतंकी कबूला। पर चिदंबरम के टर्म में हलफनामा पलट गया। अब मुंबई हमले का मुख्य साजिशकर्ता अमेरिका में बंद डेविड कोलमैन हेडली का खुलासा हुआ। तो इशरत जहां तक बात पहुंच गई। हेडली ने खुलासा किया, इशरत लश्कर की आत्मघाती थी। अब हेडली से पूछताछ करने कोई नरेंद्र मोदी की टीम नहीं, अलबत्ता चिदंबरम की एनआईए गई थी। सो कब तक आतंकवाद और मजहब का घालमेल चलेगा? सिर्फ आतंक ही नहीं, नक्सलवाद पर भी ढोंग हो रहा। मंगलवार को होम सैक्रेट्री जीके पिल्लई ने नक्सलवाद के खिलाफ सेना की तैनाती से इनकार कर दिया। पर यह भी कहा, नक्सलवाद के खात्मे में सात साल लगेंगे। तो क्या तब तक खूनी तांडव चलता रहेगा? सरकार इतनी कन्फ्यूज्ड, अब चौदह जुलाई को नक्सल प्रभावित राज्यों की बैठक बुलाई। उधर कश्मीर अलगाववाद की आग में झुलस रहा। मंगलवार को श्रीनगर में बेमियादी कफ्र्यू लग गया। अपने सुरक्षा बलों पर दबाव बनाया जा रहा।
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06/07/2010
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06/07/2010
Monday, July 5, 2010
जनता सडक़ों पर उतरी, सरकार बेहयाई पर
बहरी सरकार तो आम आदमी का दर्द नहीं ही सुन रही थी। अब अगर सरकार अंधी नहीं, तो शायद भारत बंद की झलक देख ली होगी। विपक्ष के बिखराव का फायदा उठा कीमतें तो बढ़ा दीं। पर विपक्ष के बिखराव के बाद भी बंद का ऐसा असर, सरकार के लिए एक इशारा। लालू-माया तो साथ नहीं आए। रामविलास पासवान हैप्पी बर्थ-डे का केक बनवाने में मशगूल रहे। लेफ्ट ने अलग डफली बजाई। फिर भी बंद सफल रहा, तो यह जनता की ओर से बहरी, गंूगी, अंधी सरकार को संदेश। धरती से आकाश तक महंगाई के खिलाफ जनता ने आक्रोश का इजहार किया। पर महंगाई पर मंथन के बजाए सरकार ने रणनीतिक अभियान छेड़ दिया। शुरुआत तो दो दिन पहले ही हो गई, जब देश भर के अखबारों में सरकारी इश्तिहार छपे। मुरली देवड़ा के मंत्रालय से छपे इश्तिहार में कहा गया- 'भारत बंद, समस्या का समाधान नहीं।' यानी महंगाई से कांग्रेस और सरकार का भी तेल निकल रहा। पर दूरदृष्टा नेतृत्व का अभाव संकट बढ़ा रहा। अगर बंद बेमानी होता, तो सरकार इश्तिहारबाजी नहीं करती। सचमुच ऐसा पहली दफा हुआ होगा, जब विपक्ष के बंद के खिलाफ सरकार ने ऐसे इश्तिहार छपवाए। पर सवाल, अगर भारत बंद समाधान नहीं, तो सरकार ने महंगाई के लिए क्या किया? माना, बंद समाधान नहीं। पर सरकार कभी इश्तिहार देकर यह क्यों नहीं बताती, जबसे अर्थशास्त्री मनमोहन पीएम बने, महंगाई सिर्फ बढ़ती ही क्यों जा रही? पिछले छह साल में कभी भी ऐसा क्यों नहीं हुआ, जब महंगाई कुछ महीनों के लिए भी कम हुई हो और जनता ने राहत की सांस ली हो। आखिर ऐसा क्यों, जो सिर्फ महंगाई बढ़ती ही जा रही? अब भले महंगाई को रोकने को सरकार ने कुछ नहीं किया। पर विपक्ष के बंद के आयोजन ने कम से कम इशितहारबाजी में कुछ नौकरशाहों-नेताओं के वारे-न्यारे तो कर ही दिए। कोई भी इश्तिहार बिना कमीशनखोरी के नहीं छपते। अगर सरकार सचमुच ईमानदार होती, तो करोड़ों रुपए इश्तिहार पर लुटाने की बजाए गरीबी पर चोट करने के लिए खर्च करती। पर सोमवार को बंद के असर ने सरकारी इश्तिहार को धता बता दिया। तो मीडिया के एक तबके में बंद के खिलाफ मुहिम शुरू हो गई। शरद यादव ने तो इसे सरकार मैनेजमेंट का ही हिस्सा बताया। नितिन गडकरी ने भी सवाल उठाए, जब विपक्ष सडक़ पर नहीं उतरता है, तो भी मीडिया सवाल उठाता है। अब सडक़ों पर उतरा, तो भी सवाल उठा रहा। उन ने मीडिया को दोनों हाथों से डफली बजाने वाला करार दिया। सचमुच विजुअल मीडिया ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका को धूमिल किया। अगर सरकार की मनमानी पर एतराज जताना विपक्ष की जिम्मेदारी, तो उससे भी बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की। पर जिस दिन पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं, उसी शाम से लगातार विजुअल मीडिया मॉडल विवेका बाबाजी की आत्महत्या में घुसा हुआ। पल-पल की खबर दी जा रही। कहीं चैनल पर ऐसा नहीं दिखा, जो महंगाई के खिलाफ जनता को अपना मीडिया लामबंद कर रहा हो। लगातार विवेका बाबाजी को दिखाते रहे। तो ऐसा लगा, एक विवेका ने अपनी टीवी चैनलों को सचमुच बाबाजी बना दिया। सो बंद को बेमानी बताने वाले मीडिया के सवाल से शरद यादव भडक़े। उन ने पूछा- 'अगर बंद से महंगाई कम नहीं होगी, तो क्या टीवी चैनल पर राखी सावंत के ठुमके और महेंद्र सिंह धोनी की शादी की खबरों से महंगाई कम होगी?' सचमुच अपने मीडिया को शरद यादव ने आईना दिखाया। पर सरकारी हथकंडे का असर यहीं खत्म नहीं हुआ। शाम होते-होते एसोचैम जैसी संस्था ने बंद का आकलन कर दिया। बताया, भारत बंद से दस हजार करोड़ का नुकसान हुआ। पर कांग्रेस की अपनी ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने सिर्फ ट्रकों का नुकसान 20 अरब बताया। तो किसी ने बीस हजार करोड़ का नुकसान बताया। यानी बहस का मुद्दा घुमाने की कांग्रेसी कोशिश जमकर हुई। यों बंद सचमुच सही नहीं। पर जब सरकार तानाशाही तेवर दिखाए, तो और क्या उपाय? कैसे इतवार को प्रणव बाबू ने ठसक से कहा- कीमतें वापस नहीं लेंगे। पीएम-देवड़ा तो पहले ही तेवर दिखा चुके। पर आजादी के छह दशक बाद भी देश सिर्फ पेट्रोल-डीजल पर ही निर्भर क्यों? क्यों नहीं गैस या बिजली आधारित या कोई और विकल्प ढूंढे गए? दीर्घकालिक नीति नहीं, सिर्फ पेट्रोलियम पर टेक्स का बोझ। फिर भी सरकार कीमत बढ़ोतरी को न्यायसंगत ठहरा रही। यह बेहयाई नहीं, तो और क्या? दूध के दाम फौरन बढ़ गए। पर कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी बंद का संदेश भांपने के बजाए संवैधानिक पाठ पढ़ा रहे। कहा- 'बंद करना जनविरोधी कदम। विरोध के और भी तरीके हो सकते। विपक्ष संसद में और मीडिया के जरिए आवाज उठा सकता। पर कांग्रेस भूल रही, मनमोहन राज में महंगाई पर संसद में बारह बार बहस हो चुकी। फिर भी महंगाई सचिन की तरह रिकार्ड बनाती गई। सिंघवी ने एक और दलील दी, जब कोई बीमार हो, तो कड़वी दवा जरूरी। अभी न्यूनतम दरें बढ़ाई हैं। पर सिर्फ आम आदमी ही कड़वी दवा क्यों पीये? सरकार या तेल कंपनियां क्यों नहीं? थोथे विकास का राग कब तक? आम आदमी के पेट में अन्न दाना नहीं और सरकार कह रही, आओ कॉमन वैल्थ गेम दिखाएं। कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर ने हाल ही में सवाल उठाया था- 'यह कौन सा गेम हो रहा, जिसके लिए एक लाख कंडोम खेल गांव में स्टोर किए गए?' अब आप ही सोचो, जब सरकार ऐसी हो, तो बंद हो या आम आदमी की बंदगी, क्या उम्मीद रखेंगे। बंद हो या महंगाई, परेशान तो सिर्फ आम आदमी हो रहा।
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05/07/2010
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05/07/2010
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