चीन की चकल्लसबाजी असर दिखा गई। पिछले साल अक्टूबर में भारत-चीन रिश्तों में जबर्दस्त तल्खी आई। तीन अक्टूबर 2009 को पीएम मनमोहन अरुणाचल के चुनावी दौरे पर गए थे। तब दस दिन बाद यानी तेरह अक्टूबर को चीन ने मनमोहन के दौरे पर सवाल उठाया। अरुणाचल को विवादास्पद बता पीएम के दौरे पर एतराज जताया। तब भारत ने थोड़ी सख्ती दिखाई, चीनी राजदूत को तलब कर लिया था। फिर भी चीन ने अपना डरावना चेहरा दिखाना बंद नहीं किया। भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश में चीन ने पाक से खूब पींगें बढ़ाईं। पाक पीएम यूसुफ रजा गिलानी और चीनी राष्ट्रपति हू जिन्ताओ के बीच हुई मीटिंग में झेलम पनबिजली प्रोजैक्ट और काराकोरम मार्ग में सहयोग का वादा हो गया। तब जिन्ताओ ने बाकायदा बयान दिया था- भले वैश्विक परिस्थितियां बदल रहीं, पर पाक और चीन के लोग आपस में दिल से जुड़े हुए। यों चीन की ऐसी दिल्लगी कौन नहीं जानता। पंडित नेहरू के जमाने में चीन ने अपने साथ भी दिल्लगी की थी। सो चीन का पाक प्रेम सिर्फ भारत पर हौवा बनाने के लिए। चीनी फार्मूला, दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त। फिर वीजा डिप्लोमैसी का खेल किया। तो कभी अरुणाचल के लोगों को वीजा नहीं, तो कभी कश्मीर के बाशिंदों को स्टेपल्ड वीजा दिया। कश्मीर को भारत से अलग मान चीनी दूतावास लंबे समय से पासपोर्ट के बजाए कोरे कागज पर मुहर लगाता था। चीनी अतिक्रमण के किस्से तो पिछले साल इस कदर बढ़ गए थे कि कभी अरुणाचल तो कभी उत्तराखंड से खबरें आतीं। पर मनमोहन सरकार ने चुप्पी साध ली। यानी पिछले अक्टूबर से लेकर हाल तक चीन ने भारत पर दबाव बनाने के हर पेंतरे आजमाए। पर भारत ने आंखों पर गांधारी की तरह पट्टी बांध ली। सो चीनी प्रधानमंत्री का चार सौ के दल-बल के साथ भारत दौरा हुआ। तो अपनी तैयारी का नमूना देखिए। न स्टेपल्ड वीजा पर भरोसा मिला, न यूएन सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का। न मुंबई हमले के लिए पाक की निंदा, न सीमा पर चीनी अतिक्रमण की बात। पर चीन की चालाकी देखिए, वेन जियाबाओ जिस मकसद से आए, उसे पूरा कर लिया। भारत का मध्य वर्गीय बाजार अमेरिका-चीन समेत औद्योगिक देशों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र। सो पहले ओबामा ने अपना काम किया। पर अमेरिका से भी भारत को रणनीतिक साझेदारी मिली। अमेरिका ने चीन की तरह भारत को पूरी तरह दबाव में नहीं रखा। पर चीनी पीएम वेन जियाबाओ और मनमोहन की वार्ता के बाद छह अहम बिंदुओं पर समझौते हुए। चीन सौ बिलियन डालर के व्यापार का खाका बना गया। पर बदले में भारत ने क्या हासिल किया? भारत-चीन के बीच व्यापार में असंतुलन किसी से छुपा नहीं। स्टेपल्ड वीजा तक के मुद्दे पर जियाबाओ ने टका सा जवाब दिया। खुद भरोसा देने के बजाए अधिकारियों पर टाल दिया। सो कुल मिलाकर चीन की साल भर की कोशिश सफल रही। पर अपनी सरकार की तैयारी ऐसी रही, हर मोर्चे पर डिफेंसिव दिखे। या यों कहें, सरेंडर कर दिया, तो अतिशयोक्ति नहीं। सचमुच मनमोहन सरकार आंतरिक मोर्चे में ही उलझी रह गई। भ्रष्टाचार के भंवर से निकलने की कोशिश में वेन जियाबाओ को वॉकओवर दे दिया। मनमोहन सरकार जेपीसी और सुप्रीम कोर्ट को सफाई देने की तैयारी में ही लगी रही। यों गुरुवार को थोड़ी राहत मिली, जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच की मॉनीटरिंग कबूल ली। अब विपक्ष की मजबूरी, सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठा सकता। सीबीआई, सीवीसी, पीएसी, एक सदस्यीय कमेटी से जांच को ठुकरा चुका। पर सुप्रीम कोर्ट ने निगरानी का बीड़ा उठाया। तो बीजेपी को स्वागत करना ही पड़ा। पर भ्रष्टाचार के मुद्दे से सरकार को घेरने की देशव्यापी रणनीति का एलान हो चुका। सो बीजेपी के राजीव प्रताप रूड़ी बोले- कोर्ट की पहल का स्वागत। पर यह जेपीसी का विकल्प नहीं। यानी अगर जांच की यही रफ्तार रही, तो बजट सत्र आते-आते जेपीसी मांग की हवा निकल चुकी होगी। पर बात चीन की, जिसने साबित कर दिया। बॉर्डर तो बहाना, असली लड़ाई बाजारवाद की। पिछले साल जब दोनों देशों में वार ऑफ वर्ड चरम पर था, तब 15 अक्टूबर को यही बात आपको बताई थी। पर सवाल, हम खुद को चीन से कमजोर मान मनौवैज्ञानिक हार क्यों कबूल रहे? दुनिया अब 1962 जैसी नहीं। भारत को 1962 की भूल से सबक लेकर अपनी बढ़ती ताकत का भरोसा होना चाहिए। जब आर्थिक महामंदी ने दुनिया को झकझोर दिया। तो सिर्फ भारत और चीन ही ऐसे दो देश, जिन ने मंदी को मात दी। सो चीन की कोशिश हमेशा यही होगी, भारत मजबूत ताकत बनकर न उभरे। इतिहास साक्षी, कैसे माओत्सेतुंग ने भारत को सबक सिखाने का एलान किया था। कैसे लाल झंडा बीजिंग से होकर काठमांडू, कलकत्ता और लंदन तक पहुंचाने का दंभ भरा था। यह नहीं भूलना चाहिए। चीन ने आज भी पीओके में 43,180 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा जमा रखा। पर दबाव बनाने को भारत पर पूर्वोत्तर में 90,000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जाने का दावा ठोक रहा। सो चीन से रिश्तों में सावधानी जरूरी, समर्पण नहीं। यों इस डर की जिम्मेदार भी कांग्रेस। अपने नटवर सिंह ने एक बार कहा था- अगर 1962 की हार का विश्लेषण किया होता, तो डरने की बात नहीं होती। पर तबके पीएम को बचाने के लिए तबके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने जिम्मेदारी ओढ़ ली थी। अफसोस, अड़तालीस साल बाद भी चीन संग कूटनीति में दब्बू निकला भारत।
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16/12/2010
Thursday, December 16, 2010
Wednesday, December 15, 2010
जनता की जेब पर डाका, डीएमके पर छापा
अब हलाल नहीं, झटके में आम आदमी की गर्दन उतरने लगी। सो रातों-रात पेट्रोल की कीमत बढ़ा ऐसा झटका दिया, लोग उफ भी न कर पाए। महंगाई को बढ़ा जनता का गला दबाना कोई अपने नेताओं से सीखे। रात में कीमतें बढ़ाईं, तडक़े देश भर में सीबीआई के छापे डलवा दिए। सो दिन भर अपनी मीडिया का जो भोंपू महंगाई पर बजता, सीबीआई के छापों में ही उलझा रहा। तभी तो न जनता का आक्रोश बाहर आ सका, न राजनीतिक दलों के पहले जैसे तेवर दिखे। यों युवा मोर्चा के बैनर तले जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर कीमत वापस लेने की मांग की। पर कांग्रेस की दबंगई का इतिहास कौन नहीं जानता। जब कांग्रेस ने एक बार कमिटमेंट कर दी, तो खुद की भी नहीं सुनती। अगर जेपीसी की ना कर दी, तो कोई माई का लाल हां नहीं करवा सका। भले संसद के समूचे सत्र की ऐसी-तैसी हो गई। ऐसे ही एटमी डील पर मनमोहन ने कमिटमेंट कर दी, तो लेफ्ट की समर्थन वापसी भी बेअसर रही। पर यह काहे का लोकतंत्र, जहां जनता की आवाज झटके से काटे जाने वाले बकरे की तरह दबा दी जाती। क्या यह लोकतांत्रिक तानाशाही नहीं? अगर सरकार को ऐसी ही तानाशाही दिखानी, तो कभी महंगाई पर क्यों नहीं दिखाती? पर जनता की फिक्र तो सिर्फ चुनावी मौसम में ही। तभी तो पिछली बार मनमोहन अमेरिका की खातिर सरकार कुर्बान करने पर अड़ गए थे। अबके भ्रष्टाचार पर जेपीसी से बचने के लिए। बुधवार को देश भर में 34 जगहों पर सीबीआई ने छापे मारे। ए. राजा के करीबियों के साथ-साथ करुणानिधि की बेटी कनीमोझी तक आंच पहुंच गई। सो कीमत में बढ़ोतरी से ध्यान बंटाने को नया सुर्रा छोड़ दिया। अब कांग्रेस-डीएमके के रिश्तों में दरार की खबरें उडऩे लगीं। अपना मीडिया तो बहुमत के गुणा-भाग में भी जुट गया। करुणा निकाला, जया जोड़ी। कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा और मनमोहन का कुनबा खड़ा कर दिया। पर अपने मीडिया का करेक्टर फिर कभी तफ्सील से बताएंगे। फिलहाल बात चेन्नई में बुधवार को 27 जगह पड़े छापों से डीएमके-कांग्रेस में मची खलबली की। छापों से खफा डीएमके ने शनिवार को चेन्नई में फैसलाकुन बैठक का एलान कर दिया। पर आंकड़ों का समीकरण ऐसा, रिश्ता टूटा, तो केंद्र और राज्य दोनों की सरकार खतरे में। तमिलनाडु में अप्रैल में चुनाव होने। पर राजनीतिक हालात डीएमके के खिलाफ। सो कांग्रेस भी अब जयललिता की अन्नाद्रमुक से पींगें बढ़ाने की फिराक में। पर कांग्रेस की रणनीति, डीएमके खुद छोडक़र जाए। सो कांग्रेस जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां बना रही कि डीएमके गठबंधन छोडऩे को मजबूर हो जाए। कांग्रेस की इस रणनीति की वजह भी साफ। भ्रष्टाचार के दलदल में अब कांग्रेस भी फंसने लगी। सो डीएमके को अलग कर ए. राजा की बलि लेने की तैयारी। ताकि विपक्ष को चित कर जनता को संदेश दे सके। यानी पूरे खेल में कांग्रेस का संदेश होगा, भ्रष्टाचारी मंत्री तक को भी नहीं बख्शा। डीएमके से रिश्ता तोड़ सरकार दांव पर लगा दी। पर यही काम तो कांग्रेस ने झारखंड में मधु कोड़ा के साथ किया। कोड़ा फिलहाल तिहाड़ में, राजा को कांग्रेस कहां भेजेगी, यह भविष्य के गर्भ में। पर कछुआ से खरगोश बनी सीबीआई का काम कांग्रेस का कार्यक्रम बता रहा। सो कांग्रेस और डीएमके के बीच तलाक होना तय मानिए। अब सिर्फ वक्त, वक्ता और स्थान का इंतजार। रही बात मनमोहन सरकार पर खतरे की, तो अब अपने मनमोहन सरकार बचाने में माहिर हो चुके। पिछली बार सांसदों की बोली शुरू तो 25 करोड़ से हुई, पर कहां तक गई, मालूम नहीं। तब अमेरिका से एटमी करार वजह थी। अबके तो एक नील 76 खरब के भ्रष्टाचार पर बलि का मुद्दा। सो सांसदों के रेट क्या होंगे, भगवान ही जाने। पर अब भ्रष्टाचार हो या महंगाई, भुगतना तो आम आदमी को ही। पेट्रोल में आग लगा अब डीजल, रसोई गैस की तैयारी। पर सवाल, पेट्रोल-डीजल की कीमतें कहां जाकर थमेंगी? जब एनडीए से कांग्रेस ने सत्ता छीनी, तो दिल्ली में पेट्रोल 30 और डीजल 20 रुपए लीटर थी। पर आज पेट्रोल करीब 60, तो डीजल 40 रुपए के पार। आज भी पेट्रोल की कीमतें पाकिस्तान में 26, बांग्लादेश में 22, नेपाल में 34, बर्मा में 30, अफगानिस्तान में 36 रुपए लीटर। पेट्रोल की उत्पादन कीमत महज 20 रुपए, पर भारत में यह तेल नहीं, राजस्व का कुआं बन चुका। सो बाकी टेक्स के रूप में आम आदमी से वसूल रही सरकार। मनमोहन दूसरी बार पीएम बने, पर संयोग कहें या या कुछ और। पर पेट्रोल-डीजल, दाल, चावल, आटा, सब्जी, दूध, चीनी सभी चीजों के दाम दुगुने हो चुके। भ्रष्टाचार की रफ्तार तो ऐसी, आम आदमी गिनती भूल जाए। स्विस बैंक के एक डायरेक्टर ने कहा था- भारतीय गरीब हैं, भारत नहीं। भारतीयों के 280 लाख करोड़ रुपए स्विस बैंक में जमा, जिससे तीस साल तक भारत का टेक्सलेस बजट बन सकता। साठ करोड़ रोजगार पैदा हो सके। देश के दूरदराज गांव से दिल्ली तक चार लेन की सडक़ें बन सकतीं। पांच सौ सामाजिक परियोजनाओं को मुफ्त बिजली मिल सकती। देश के हर नागरिक को साठ साल तक दो हजार रुपए मंथली मिल सकते। पर इस धन को लाने के लिए कोई पहल नहीं। अलबत्ता पिछले छह महीने में छठी बार जनता पर बोझ डाल दिया।
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15/12/2010
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15/12/2010
Tuesday, December 14, 2010
'नर्वस न हो कॉरपोरेट, देश भले नर्वस हो जाए'
न कभी ऐसी सरकार देखी, न कभी ऐसा विपक्ष। अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर कुछ इसी अंदाज में आरोप लगा रहे। संसद ठप होने के लिए आडवाणी ने सरकार को कोसा। बोले- ऐसा कांग्रेस की वजह से हुआ। तो जवाब में कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी बोले- बीता सत्र अलग तरह से याद किया जाएगा। ऐसा विपक्षी आचरण हमने कभी नहीं देखा। अब कांग्रेस-बीजेपी ने एक-दूसरे में क्या देखा या नहीं, यह वही जानें। पर देश की जनता दोनों का आचरण बखूबी देख रही। सो भ्रष्टाचार में घिरी कांग्रेस पर आडवाणी ने फिर चोट की। सडक़ों पर संघर्ष का औपचारिक एलान हो गया। दिल्ली, मुंबई, जयपुर समेत देश के तमाम शहरों में तीन महीने तक भ्रष्टाचार विरोधी रैलियां होंगी। आडवाणी ने टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को बहुआयामी बता फिर जेपीसी की मांग दोहराई। बोले- सत्र में कोई कामकाज न होना भी नतीजा देने वाला रहा। आडवाणी बोले- संसद में विपक्ष इस कदर सरकार को नहीं घेरता, तो राजा की छुट्टी नहीं होती। पर आडवाणी को मलाल, भले राजा गए, पर सरकार की जिद के चलते प्रजा को सच्चाई मालूम नहीं पड़ी। राजा के घटाले में किसने-किसने मलाई काटी, यह बात दबी हुई। सो विपक्ष जेपीसी की मांग से फिलहाल पीछे नहीं हटेगा। आडवाणी ने बजट सत्र की रणनीति पर चुप्पी साध ली। मध्यावधि चुनाव के सुर्रे को भी उन ने नकार दिया। यानी कुल मिलाकर आडवाणी ने भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द ही कांग्रेस को घेरने की कोशिश की। सरकार और कॉरपोरेट लॉबी के गठजोड़ का जिक्र कर आडवाणी ने सोनिया पर भी चुटकी ली। बोले- पीएम को तो बहुत सी बातें पता भी नहीं होतीं। सो अब तक लगता था- केबिनेट दस जनपथ से तय होता। पर नीरा राडिया के टेप से हमारा भ्रम टूट गया। अब पता लगा, सोनिया भी नहीं, कॉरपोरेट लॉबी केबिनेट तय करती। सचमुच देश और पीएम पद के लिए इससे बड़ी विडंबना नहीं हो सकती। जब पीएम का विशेषाधिकार भी कॉरपोरेट जगत के लिए दलाली करने वाले हथिया लें। तो व्यवस्था से आम आदमी क्या उम्मीद करेगा? टाटा और अंबानी के लिए लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया के टेप खुलासे से सारा देश सकते में। पर देश के हर बड़े ताजा मसलों में मौन साधने वाले बाबा मनमोहन को कोई हैरत नहीं। सो मंगलवार को पीएम मनमोहन ने ऐसी बात पर चिंता जताई, जिसका कोई राष्ट्रीय सरोकार नहीं। उन ने फोन टेपिंग से हुए बड़े खुलासे पर कोई चिंता जाहिर नहीं की। अलबत्ता चिंता इस बात पर जताई कि टेप लीक कैसे हो रहे। पीएम ने बाकायदा केबिनेट सैक्रेट्री के.एम. चंद्रशेखर को हिदायत दे महीने भर में रपट मांग ली। क्या कभी पीएम ने बढ़ती महंगाई पर महीने भर में कोई रपट मंगाई? विज्ञान भवन में इंडियन कॉरपोरेट वीक का उद्घाटन करते हुए पीएम बोले- उद्योग जगत की नर्वसनेस से हम वाकिफ । अब अपने पीएम के बारे में क्या कहें, जिन्हें कॉरपोरेट जगत के नर्वसनेस की चिंता। भले भ्रष्टाचार के भंवर को देख अपना देश नर्वस क्यों न हो जाए। पर पीएम के बयान का कॉरपोरेट जगत ने दिल से स्वागत किया। उद्योगपति और सांसद राहुल बजाज ने खुशी तो जताई। पर कॉरपोरेट और राजनीति की सांठगांठ का बखान कर गए। बोले- गैर कानूनी ढंग से राजनीतिक दल कारोबारियों से फंड लेते। सो दोनों अपनी-अपनी जगह गलत हैं। सचमुच सरकार की नीतियां कैसे खास लोगों के लिए बनतीं, यह किसी आम आदमी से पूछकर देखिए। पर कोई उद्योगपति अगर दस रुपए का चंदा देता है, तो बदले में सरकार से दस करोड़ का काम भी करवाता। पर सवाल, आखिर अपने मनमोहन कभी आम आदमी की खातिर चिंता क्यों नहीं दिखाते? संसद में अमेरिका से जुड़े मुद्दों पर बहस हो, तो पीएम एक नहीं, चार-चार बार दखल देते। पर महंगाई की बात हो, तो पीएम की जुबां नहीं खुलती। किसानों की आत्महत्या पर आत्मा नहीं कचोटती। कॉरपोरेट जगत का दर्द मनमोहन को अपना सा लगता। नमूना आप खुद देख लो। संसद सत्र निपटा, तो पीएम की जुबां टाटाओं, अंबानियों को राहत देने के लिए खुली। पर मंगलवार की रात से ही एक बार फिर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ गए। यानी मालदार कंपनियों की चिंता में आम आदमी की चिता सजाई जा रही। सो भ्रष्टाचार पर कोई नजीर पेश करने वाली कार्रवाई होगी, उम्मीद नहीं। अगर भ्रष्टाचार के प्रति चिंता होती, तो बिहार के सीएम नीतिश कुमार की तरह केंद्र में भी नेता जज्बा दिखाते। बिहार में घपले की विधायक निधि खत्म हो गई। भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जप्त कर उसके घर में स्कूल खोलने का प्रावधान बन गया। पर बिहार सरकार के इस फैसले को लागू करने में केंद्र ने साढ़े तीन साल लगा दिए। बिहार का बिल साढ़े तीन साल तक मंजूरी की बाट जोह रहा था। पर कार्यपालिका ही जब ऐसी, तो न्यायपालिका से क्या उम्मीद। अब तो छींटे न्यायपालिका पर भी पडऩे लगे। मद्रास हाईकोर्ट के जज रघुपति ने जुलाई 2009 में केंद्रीय मंत्री की ओर से धमकी की शिकायत की थी। तब हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एच.एल. गोखले ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन को नाम वाली चिट्ठी भेज दी। पर के.जी. बालाकृष्णन इनकार कर रहे। तो वही गोखले अब सुप्रीम कोर्ट में जज। सो उन ने पूरी कलई खोल दी। फिर भी बालाकृष्णन मानने को राजी नहीं। अब बालाकृष्णन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुखिया। सो आम आदमी भला किससे उम्मीद करे।
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14/12/2010
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14/12/2010
Monday, December 13, 2010
शहीदों को श्रद्धांजलि के बीच चिरायु हो भ्रष्टाचार!
संसद सत्र की बलि चढ़ गई, पर किसी भ्रष्टाचारी को बलि चढ़ाने वाली जेपीसी नहीं बनी। एक पूरे सत्र का हंगामे में गुजर जाना संसद का नया इतिहास रच गया। पर इस काले इतिहास में किसका परिहास बना? न विपक्ष, न सत्तापक्ष अपना परिहास मान रहा। यानी सचमुच अपनी संसद मजाक बनकर रह गई। तभी तो समूचा विपक्ष चीखता-चिल्लाता रह गया। सत्ता के बहरे कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब सत्र निपटने के बाद भी कांग्रेस और सरकार वही दलीलें दोहरा रहीं। जेपीसी को नकार पीएसी, सीबीआई, रिटायर्ड जज से जांच की बात। पर सवाल वही, जब कोई खुद को ईमानदार मान रहा। तो किसी भी जांच से डर कैसा? जेपीसी कोई भूत तो नहीं, वह संसद की नियमावली का ही हिस्सा। फिर कोई भी सरकार जेपीसी की मांग को कानून या संविधान की अवमानना कैसे करार दे सकती। पर अब संसद का शीत सत्र निपट गया। तो संकट के बादल बजट सत्र पर घुमडऩे लगे। एनडीए ने सोमवार को बापू की मूर्ति के सामने धरना दिया। अब सडक़ों पर विपक्ष का शंखनाद होगा। जिसकी गूंज बजट सत्र तक बरकरार रखने की तैयारी। सो संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल बोले- अगर बजट सत्र ठप हुआ, तो संवैधानिक संकट के लिए विपक्ष जिम्मेदार होगा। उन ने शीत सत्र में हंगामे की वजह से डेढ़ अरब रुपए के नुकसान का ठीकरा भी विपक्ष के सिर फोड़ा। तो बीजेपी से वेंकैया नायडू ने कमान संभाल ली। बोले- नुकसान की जिम्मेदार खुद कांग्रेस। अगर हंगामे से हुआ नुकसान अपराध, तो टू-जी स्पेक्ट्रम-कामॅनवेल्थ और आदर्श घोटाले के तीन लाख करोड़ डकारने वाले क्या अपराधी नहीं? सो बजट सत्र में किसका बाजा बजेगा, यह तभी दिखेगा। पर शीत सत्र के आखिर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने सांसदों से रू-ब-रू हुईं। तो गीता सार (क्यों व्यर्थ चिंता.. किससे व्यर्थ डरते.. कौन तुम्हारा क्या बिगाड़.... जो हुआ वह अच्छा.. जो हो रहा या जो होगा वह भी अच्छा..) का अनुसरण करते हुए जेपीसी से इनकार कर दिया। भ्रष्टाचार पर हंगामे के बीच पीएम के लंबे मौन की भी खूब तारीफ की। फिर उन ने बीजेपी को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू किया। सोनिया ने बीजेपी को कर्नाटक और तहलका की याद दिलाई। भ्रष्टाचार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया। पर सवाल, अगर बीजेपी ने भ्रष्टाचार किया, तो क्या कांग्रेस को भी भ्रष्टाचार का लाइसेंस? आखिर बचाव का यह कौनसा हथियार? भ्रष्टाचार पर अगर बीजेपी की कमीज सफेद नहीं, तो क्या कांग्रेस भी वैसी ही कमीज पहनेगी? राजनीति की यह कौन सी नैतिकता, जब छह साल एनडीए सत्ता में थी। तो कांग्रेस के 45 साल को अपनी ढाल बनाए चली। अब आठ साल बनवास के बाद कांग्रेस ने दुबारा सत्ता हासिल की। तो एनडीए के छह साल को ढाल बना लिया। आखिर जनता से यह आंख-मिचौली का खेल कब तक चलता रहेगा? यों सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की ओर से की गई कार्रवाई का भी ढोल पीटा। आदर्श घोटाले में अशोक चव्हाण का इस्तीफा, संचार घोटाले में राजा का इस्तीफा और जांच की दलील दी। पर कोई पूछे, क्या ये कार्रवाई कांग्रेस ने अंतरात्मा के धिक्कार पर की? चव्हाण हों या राजा का इस्तीफा। सीबीआई की जांच हो या सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से। कांग्रेस ने सारे कदम मीडिया, सुप्रीम कोर्ट और संसद में बने राजनीतिक माहौल के बाद उठाए। अब जब सोनिया गांधी खुद कह रहीं, कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार के मामले में छुपाने को कुछ नहीं। सो डरने की कोई बात नहीं। तो सवाल, जब छुपाने और डरने जैसी कोई बात नहीं। तो जेपीसी से डर कैसा? लोकतंत्र का तो यही तकाजा, अगर सत्तापक्ष के मन में कोई चोर नहीं। तो विपक्ष की हर शंका का समाधान करने में आगे बढक़र कदम उठाए। पर दोनों की जिद ने एक ऐसा इतिहास बना दिया, जो हर भ्रष्टाचार के वक्त याद आएगा। अगर संसद का कोई मतलब न होता, तो संविधान में एक्जीक्यूटिव आर्डर से ही सरकार चलाने का प्रावधान होता। पर संसद को सर्वोपरि इसलिए बनाया गया, ताकि सत्तापक्ष अपनी मनमानी न कर सके। फिर भी व्यवहार में संसद अब सत्तापक्ष की बपौती दिखने लगी। सो सोमवार को जब संसद हमले की नौवीं बरसी पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। तो भ्रष्टाचार पर बेनतीजा रही जंग देख यही लगा, इस बार शीत सत्र में शहीदों को श्रद्धांजलि तो दी गई। पर भ्रष्टाचार को चिरायु होने का आशीर्वाद मिल गया। अगर अपने नेता संसद का मान नहीं रख सकते। तो क्यों न संसद का विसर्जन कर श्रद्धांजलि दे देते। अपने नेताओं का कोई ठिकाना नहीं। कोई ऐसा प्रस्ताव लेकर भी आ जाए। जुबान पर कंट्रोल होता, तो दिग्विजय सिंह के बाद होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ऐसा न बोलते। दिग्विजय तो अपनी हठबयानी से पीछे हटने को राजी नहीं। पर सोमवार को चिदंबरम ने क्राइम कैपीटल बनी दिल्ली का गुनहगार प्रवासियों को बना दिया। सो संसद भवन में बिहार-यूपी के नेताओं ने चिदंबरम को जमकर कोसा। कोसने वालों में विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेसी भी शामिल। सो शाम होते-होते चिदंबरम ने बयान वापस ले लिया। पर बात तो मुंह से निकल चुकी। सो कांग्रेस की मंशा भी जगजाहिर हो गई। अगर चिदंबरम की नजर में प्रवासी दिल्ली के अपराध के लिए जिम्मेदार। तो क्या समूचे भारत में अपराध के लिए विदेशियों को जिम्मेदार कहेंगे?
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13/12/2010
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13/12/2010
Saturday, December 11, 2010
तो क्या अब कसाब बचाओ मुहिम भी?
आखिर किस हद तक गिरेगी अपनी राजनीति? कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने फिर कमाल कर दिया, धोती को फाड़ के रूमाल कर दिया। ऊपर वाले की कृपा से भले वाराणसी बम धमाके में जान-माल की अधिक क्षति नहीं हुई। पर दिग्गी राजा ने जो राजनीतिक धमाका किया, खुद कांग्रेस-बीजेपी और अपनी कूटनीति भी लहुलुहान होती दिख रही। अभी 26/11 हमले की दूसरी बरसी को बीते महज पखवाड़ा भर हुए। पर दिग्गी राजा ने नई कहानी गढ़ दी। खुलासा किया- ‘मालेगांव बम धमाके की जांच में हिंदुवादी संगठनों की भूमिका उजागर करने की वजह से एटीएस चीफ हेमंत करकरे को कट्टर हिंदू संगठनों से जान का खतरा था।’ दिग्गी की मानें, तो मुंबई पर हुए आतंकी हमले से ठीक दो घंटे पहले फोन पर बातचीत में खुद करकरे ने यह बात उन्हें बताई थी। पर सवाल, दिग्गी राजा को 26 नवंबर 2008 को करकरे से हुई बात हमले की दूसरी बरसी के बाद अचानक कैसे याद आ गई? अगर करकरे को सचमुच धमकियां मिल रही थी, तो उन ने दिग्विजय सिंह को ही क्यों बताया? करकरे अपने वरिष्ठ अधिकारी या महाराष्ट्र के गृह मंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री या फिर पीएम-सीएम से बात कर सकते थे। पर उन ने सिर्फ दिग्गी राजा को ही क्यों बताई? इससे भी अलग सवाल, जब किसी को कोई धमकी मिलती है, तो वह सबसे पहले अपने परिवार से शेयर करता है। पर शहीद हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने फौरन इनकार किया। अलबत्ता जांच में जुड़े अधिकारी के नाते ऐसी बातों को सामान्य बताया। पर दिग्गी राजा की टिप्पणी को कविता करकरे ने वोट बैंक की ओछी राजनीति से प्रेरित बताने में देर नहीं की। सचमुच दिग्गी राजा की दलील आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को कमजोर करेगा। जब सारी दुनिया और अदालत मुंबई हमले और करकरे जैसे बहादुर ऑफीसरों की शहादत के पीछे पाकिस्तानी आतंकियों की करतूत मान चुका। यों विशेष अदालत से फांसी की सजा पा चुका आतंकी कसाब अब हाई कोर्ट में पैतरेबाजी कर रहा। हाल ही में कसाब ने हेमंत करकरे को मारने में अपनी भूमिका से इनकार किया था। अब करीब-करीब वही बात कांग्रेस महासचिव दिग्गी राजा कह रहे। उन ने दो-टूक कह दिया- ‘जब रात में करकरे की मौत की खबर मिली, तो मैं सन्न रह गया था और मेरे मुंह से निकला, ओह गॉड, मालेगांव जांच के विरोधियों ने उन्हें मार डाला।’ अब आप क्या कहेंगे? क्या शहादत पर बखेड़ा खड़ा करना सचमुच कांग्रेस की फितरत बन गई? या फिर वोट बैंक के लिए कसाब को भी अफजल बनाएगी कांग्रेस? सोमवार को संसद पर हमले की नौंवीं बरसी। पर लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर पर हमले का मास्टरमाइंड अफजल गुरु वोट बैंक के राजनीतिक तवे में सेंकी रोटियां तोड़ रहा। फिर भी संसद में श्रद्धांजलि का ढक़ोसला करते दिखेंगे अपने माननीय नेतागण। जो अफजल की फांसी से जुड़ी फाइल पर कुंडली मारकर बैठे हुए। सिर्फ अफजल ही नहीं, बटला हाउस मुठभेड़ में शहीद इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा पर भी उंगली उठा चुकी कांग्रेस। खुद दिग्गी राजा ने मोर्चा खोला था। आतंकियों के परिजनों से सहानुभूति जताने आजमगढ़ जाने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई थी। पर दिग्गी राजा के हर विवादास्पद स्टैंड में कांग्रेस की बड़ी राजनीति निहित होती। सो कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने तो बेबाक कह दिया। बोले- ‘दिग्विजय सिंह उपन्यास के पार्ट जरुर हैं, पर उपन्यासकार नहीं।’ अब कोई पूछे, उपन्यासकार कौन है? अब मुंबई जैसे आतंकी हमले को भी वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बनाने का क्या मकसद? क्या अब कांग्रेस ‘कसाब बचाओ मुहिम’ में जुट गई? अगर करकरे आतंकी हमले में शहीद नहीं हुए, तो क्या विरोधियों ने हत्या कर दी? अगर यही दिग्विजय सिंह का स्टैंड, तो पाक को बेमतलब डोजियर क्यों सौंपे? कसाब ने करकरे को नहीं मारा, तो कोर्ट में जाकर दिग्विजय उसके पक्ष में गवाही दे दें? फिर भी मन नहीं भरता, तो कसाब को सम्मान सहित पाक के फरीदकोट उसके गांव पहुंचा आएं। क्या दिग्विजय का बयान अब पाक के लिए ढ़ाल नहीं बनेगा। जब सत्ताधारी दल का एक वरिष्ठ महासचिव ही ऐसा कहेगा। तो पाक की मुराद तो खुद-ब-खुद पूरी हो जाएगी। पर कांग्रेस हो या बीजेपी, सबकी कहानी एक। दिग्विजय से पहले बीजेपी की वरिष्ठ नेत्री सुषमा स्वराज भी ऐसा कर चुकीं। जब 22 जुलाई 2008 को मनमोहन सरकार ने जोड़-तोड़ से बहुमत हासिल किया। फिर 25-26 जुलाई को अहमदाबाद-बेंगलुरू में लगातार सीरीयल ब्लास्ट हुए। तो 28 जुलाई को सुषमा ने इसे मनमोहन सरकार की साजिश बता दिया। बोलीं- ‘विश्वास मत के चार दिन बाद ही इस तरह का हमला हुआ। परिस्थितिजन्य साक्ष्य नाम की कोई चीज दुनिया में है या नहीं। ऐसा कभी नहीं हुआ, 24 घंटे में दो बीजेपी स्टेट में एक जैसे ब्लास्ट हुए। कैश फॉर वोट से ध्यान बंटाने, अमेरिकापरस्ती से छिटके मुस्लिम वोट को बीजेपी का कृत्रिम भय दिखाने के लिए हुए हमले।’ पर बवाल मचा, तो दो दिन बाद बीजेपी ने भी वैसे ही सुषमा से दूरी बना ली। जैसे कांग्रेस ने दिग्विजय के बयान से। पर तब भी न सुषमा ने खेद जता बयान वापस लिया, न दिग्विजय अब ऐसा कर रहे। सो राजनीति की यह कैसी विडंबना। कभी अफजल का बचाव, तो कभी बटला कांड में शहीद इंस्पेक्टर की शहादत पर सवाल, तो कभी भ्रष्टाचार के आरोपी ए. राजा और पी.जे. थॉमस जैसे लोगों का बचाव...। और अब दिग्विजय का रुख कहीं कांग्रेस की कसाब बचाओ मुहिम तो नहीं? विकिलीक्स के जरिए भी खुलासा हो गया, कांग्रेस ने 26/11 के बाद मजहब यानी वोट बैंक की राजनीति की कोशिश की थी।
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11/12/2010
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11/12/2010
Friday, December 10, 2010
संसद से कानकुन तक नहीं बदली आबोहवा
अब सोमवार को संसद हमले की नौंवी बरसी पर न सिर्फ शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। अलबत्ता यह पहला मौका होगा, जब उसी दिन संसद के एक समूचे सत्र की भी श्रद्धांजलि हो जाएगी। सो अब तो दिनों की गिनती बेकार, क्योंकि यह शीत सत्र संसद के इतिहास में काला अध्याय बन चुका। पर लड़ाई अभी थमी नहीं। विपक्ष ने 22 दिसंबर से बजट सत्र तक देश भर में रैलियों से अलख जगाए रखने की रणनीति बना ली। दिल्ली में विपक्ष पहली रैली से अपनी ताकत दिखाएगा। सो अब कांग्रेस के साथ-साथ यूपीए के घटक दल 2014 से पहले ही मध्यावधि चुनाव की आशंका जताने लगे। यूपीए के धुरंधर दो-टूक कह रहे- यही हालात रहे, तो जेपीसी के बजाए हम चुनाव में जाना पसंद करेंगे। विपक्ष भी मौजूदा हालात में 2012 में मध्यावधि चुनाव मानकर चल रहा। भ्रष्टाचार पर पीएम की चुप्पी और कांग्रेस की जिद से विपक्ष को लग रहा, बोफोर्स दोहराएगा। सचमुच अब यह सवाल आम हो गया- जब कांग्रेस ईमानदार, तो जेपीसी जांच से परहेज क्यों? जब सीबीआई या सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज या विपक्ष की रहनुमाई वाली पीएसी से जांच को राजी। तो साधारण सा सवाल, जेपीसी न मानने की जिद क्यों? समूचे विपक्ष की आवाज दबाने को संसद सत्र की बलि क्यों? क्या संसद सिर्फ कठपुतली? जहां सिर्फ सत्ता पक्ष की ही चलेगी? लिखत-पढ़त में भले ऐसा न हो। पर सच्चाई यही, संसद को सत्ता पक्ष ने बपौती बना लिया। तभी तो अपने पीएम संसद में महीने भर से चल रहे गतिरोध के बावजूद विदेश यात्रा पर निकल चुके। सो संसद सत्र के वक्त पीएम के नदारद रहने पर एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी के ऊपर मौजूं टिप्पणी की थी। उनने कहा था- पंडित नेहरू संसद से सिर्फ तब बाहर रहते थे, जब उनके पास कोई चारा नहीं होता था। पर इंदिरा गांधी सिर्फ तब संसद आया करती थीं, जब उसे टालना संभव नहीं होता था। यों ऐसे आरोप मनमोहन के राजनीतिक गुरु नरसिंह राव पर भी लग चुके। पर तब तात्कालीन संसदीय कार्यमंत्री विद्याचरण शुक्ल ने दलील दी थी- नेहरू के बाद हर पीएम ने सिर्फ आवश्यकता महसूस होने पर ही संसद में आना उचित समझा। इसलिए आप नरसिंह राव पर संसद को अधिक समय न देने का आरोप नहीं लगा सकते। सो जब गुरु नरसिंह राव मौनी बाबा बन अल्पमत की सरकार चला चुके। तो चेले मनमोहन को क्या फिक्र। संसद की फिक्र होती, तो जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कानकुन में चल रही बैठक में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश देश का रुख नहीं बदलते। सात दिसंबर 2009 को राज्यसभा में जयराम ने भरोसा दिया था। किसी भी सूरत में कार्बन उत्सर्जन को लेकर कानूनी बाध्यता मंजूर नहीं करेंगे। पर कानकुन में जाकर रुख बदल दिया। पहले से तैयार सरकारी भाषण में संसद को दिए भरोसे वाला ही स्टैंड था। पर जयराम की चालाकी देखिए, बीच में अमेरिका को पसंद आने वाली बात कह दी। सभी देशों को कानूनी रुप में बाध्यता स्वीकार करने का सुर्रा छोड़ दिया। जयराम का अमेरिका प्रेम बताएंगे, पर सनद रहे, सो पहले इस बहस का इतिहास बता दें। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने विकास की अंधाधुंध होड़ में पर्यावरण को पलीता लगाया। औद्योगिक क्रांति कर दुनिया के दादा बन गए। पर कार्बन युक्त आबोहवा ने जिंदगी नरक बना दी। तो अब अमेरिका अपना कूृड़ा-करकट ढ़ोने का दबाव विकासशील देशों पर बना रहा। ग्रीन हाउस गैस बढ़ाने का अनुपात देखो। तो अमेरिका के मुकाबले भारत 18 गुना कम कार्बन छोड़ रहा। जहां अमेरिका में प्रति व्यक्ति 20 टन, वहां भारत में महज 1.5 टन का आंकड़ा। दो दशकों से भारत यही लड़ाई लड़ रहा- प्रदूषण पैदा करने वाला ही उसकी कीमत अदा करे। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च क्लाइमेट इनिसिएटिव की रपट देखो, तो साफ हो जाएगा। भारत में 76 फीसदी आबादी ऐसी जो महज दो डॉलर पर जीवन यापन कर रही। तो यूएस में रोजाना 13 डॉलर कमाने वाले बीपीएल में। यानी अमेरिका के हिसाब से देखें। तो अपनी 99 फीसदी आबादी गरीबी का शिकार। अगर ग्लोबल वार्मिंग पर दुनिया की दादागिरी के आगे नतमस्तक हो गए। तो देश की गरीबी कभी नहीं मिटेगी। ग्रीन हाउस गैस का स्टॉक ही देखो। तो दुनिया में कुल 75 फीसदी का स्टॉक। जिसमें एकला यूएस का 29 फीसदी और भारत का महज 2.3 फीसदी। अब अगर भारत जैसे देश अपना जीवन-स्तर बढ़ाएगा। तो ग्रीन हाउस गैस बढ़ेगा। साथ ही, मजबूत अर्थव्यवस्था पश्चिमी देशों को चुनौती। सो इस आड़ में यूएस की साजिश भी कम नहीं। तभी तो कोपेनहेगेन से कानकुन आते-आते ब्रिक्स यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के गुट में सेंध लगा दी। भारत-चीन कानकुन में अलग-थलग पड़ते दिखे। दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील विकसित देशों की गोद में जा बैठा। सो दबाव में जयराम ने बेड़ा गर्क कर दिया। पर बवाल मचा, तो सफाई देते फिर रहे। कह रहे, भारत अभी बाध्यकारी समझौते के लिए राजी नहीं। पर सभी देशों को कानूनी बाध्यकारी समझौता मानना चाहिए। भले जयराम जुबां से मजबूर, पर शायद दिल अमेरिका से लगा हुआ। तभी तो कोपेनहेगेन से पहले अक्टूबर 2009 में पीएम को चिट्ठी लिख स्टैंड बदलने की सलाह दी थी। सो आप खुद देख लो, देश हित की फिक्र किसे। संसद और देश का मान नहीं, अलबत्ता अपना-अपना जुगाड़ करने में जुटे नेता।
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10/12/2010
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10/12/2010
Thursday, December 9, 2010
एंटी करप्शन डे, यानी न करें भ्रष्टाचार का विरोध!
संसद से सडक़ तक, फिर सडक़ से संसद तक जेपीसी की लड़ाई जारी रहेगी। विपक्ष ने बजट सत्र में भी मुहिम जारी रखने का एलान कर दिया। पर पहले एनडीए महारैली करेगा। सो भ्रष्टाचार पर विपक्ष के हमलों से चकरघिन्नी बनी कांग्रेस बेसिर-पैर की बयानबाजी को उतारू। संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने पुरानी फाइलें खंगाल कांग्रेस प्रवक्ताओं को कुछ कानूनी मंत्र थमाए। तो अब कांग्रेसी राशन-पानी लेकर एनडीए कार्यकाल को निशाना बना रहे। मनीष तिवारी ने गुरुवार को तेवर दिखाते हुए बीजेपी से तीन सवाल पूछे। पहला- क्या यह सच नहीं कि 1999 में खुद पीएम वाजपेयी ने जगमोहन को संचार मंत्रालय से हटाकर टेलीकॉम कंपनियों को फायदा पहुंचाया, जिससे 60 हजार करोड़ करा नुकसान हुआ? दूसरा- जब 2001 में प्रमोद महाजन मंत्री थे, तब क्या उन्होंने मुफ्त स्पेक्ट्रम नहीं बांटे? तीसरा- पहली अप्रैल 2004 को जब देश चुनाव में था, तब बीजेपी ने ऑपरेटरों की राजस्व हिस्सेदारी घटाकर फायदा नहीं पहुंचाया था? अब कांग्रेस के इन तीनों सवालों का जवाब तो बीजेपी देती रहे। पर अपना सवाल, क्या इन सवालों के जरिए कांग्रेस राजा का पाप धोना चाह रही? चलो मान लें, कांग्रेस प्रवक्ता के आरोप में दम। तो फिर जेपीसी बनाने में एतराज क्यों? बीजेपी तो पहले दिन से खम ठोक कर कह रही- सिर्फ 2001 से क्यों, 1998 में जबसे राजग की सरकार, तबसे जेपीसी की जांच करा लो। जब विपक्ष खुद अपनी जांच कराने को तैयार, तो भला कांग्रेस जेपीसी से क्यों भाग रही? वैसे भी जेपीसी में अमूमन सत्तापक्ष का ही बहुमत होता। फिर भी सरकार जेपीसी पर ऐसी रार ठाने, तो इसे दाल में काला कहेंगे या पूरी दाल काली। वैसे सच्चाई यही, कांग्रेस इस संकट से निकलने का कोई रास्ता नहीं ढूंढ पा रही। सो नेता दिहाड़ी मजदूर की तरह बयानबाजी कर रहे। तभी तो गुरुवार को सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज शिवराज वी. पाटिल से घोटाले की जांच का एलान किया। पर बीजेपी ने नकार दिया। तो सिब्बल ने एक नया सुर्रा छोड़ दिया। अब यह सुर्रा हताशा, बौखलाहट या एक वकील की वकालत, यह आप ही तय करिए। पर जरा पहले सुर्रा सुनते जाइए। सिब्बल बोले- विपक्ष टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर जेपीसी की मांग कर रहा। पर असल में 20 दिन से संसद की कार्यवाही ठप होने से देश पर 70 हजार करोड़ का बोझ पड़ा है। सो इसकी जेपीसी से जांच होनी चाहिए। पर सवाल सिब्बल से- अगर हंगामे पर जेपीसी की जरूरत, तो किससे मांग कर रहे। खुद मालिक-मुख्तार बने बैठे, क्यों नहीं बनवा लेते जेपीसी। कम से कम जनता यह तो देख ले, एक नील 76 खरब रुपए के घोटाले पर कांग्रेस जिद ठाने बैठी। और संसद सत्र पर खर्च हुए 70 हजार करोड़ को नैतिकता का हथियार बना रही। किसके काल में क्या हुआ, यह भले राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा हो। पर जनता यह जानना चाह रही, टू-जी स्पेक्ट्रम के महाघोटाले में किस-किस ने अपने हाथ धोए। जेपीसी जब सारी सच्चाइयों को उजागर करने में सक्षम, तो सरकार के पीछे हटने का क्या मतलब लगाएं? स्पेक्ट्रम घोटाले में नेता, नौकरशाह, कॉरपोरेट घराने और अपनी मीडिया की सांठगांठ उजागर हो चुकी। नेता, नौकरशाह, कॉरपोरेट का गठजोड़ तो बहुत पुराना। पर इस खेल में अपना मीडिया सही मायने में ‘नैतिकता का स्मगलर’ निकला। सो सचमुच ईमानदारी से जेपीसी जांच हो जाए। तो कम से कम समूचे सिस्टम की एक बार सफाई हो जाए। घोटाले के इस खेल में गुरुवार को नया मोड़ आ गया। जब रतन टाटा और उद्योगपति व राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर एक दूसरे के खिलाफ मैदान में कूद पड़े। चंद्रशेखर ने टाटा को चिट्ठी लिखकर फायदे का आरोप लगाया। तो जवाब में टाटा ने न सिर्फ चंद्रशेखर को लपेटा, अलबत्ता पूरी तरह से कांग्रेस के पाले में खड़े दिखे। सो बीजेपी के प्रकाश जावडेकर ने पहले तल्खी दिखाई। बोले- रतन टाटा कोई जज या जेपीसी नहीं। वह उद्योगपति हैं, जिनकी टेलीफोन कंपनी को यूपीए शासन में काफी फायदा पहुंचा है। पर सुषमा स्वराज और एस.एस. आहलूवालिया ने टाटा की टिप्पणी को दो कॉरपोरेट हस्तियों के बीच जंग बता चुप्पी साध ली। यानी बीजेपी टाटा को नाराज नहीं करना चाहती। राजनीतिक दलों को चंदा कॉरपोरेट घरानों से ही मिलता। सो टाटा की परेशानी को बीजेपी समझ रही। पूरे मामले में टाटा ही सबसे अधिक प्रभावित हो रहे। नीरा राडिया के सिर्फ दस घंटे के टेप ने नेता, नौकरशाह, उद्योग जगत और मीडिया की पोल खोल दी। अभी तो 1990 घंटे का टेप बाकी। सो टाटा का कोर्ट से लेकर खुले आम राजनीति के मैदान में उतरना कोई अचरज की बात नहीं। भ्रष्टाचार पर छिड़ी राजनीतिक जंग के बीच गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस भी मन गया। पर देखो, टाटा जैसे लोगों का पैसा राजनीतिक दल के लिए चंदा कहलाता और आम आदमी का रिश्वत। तभी तो सीवीसी पी.जे. थॉमस ने भ्रष्टाचार का नया अर्थशास्त्र बताया। बोले- आम आदमी रिश्वत देना बंद करे, तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। मांग-पूर्ति का फार्मूला बताया- लोग रिश्वत देते हैं, सो मांग बढ़ती है। पता नहीं थॉमस ने कौन सा अर्थशास्त्र पढ़ा। जब तक मांग न हो, पूर्ति कहां से होगी। वैसे भी आम आदमी की जेब में इतने पैसे नहीं होते, जो बिना मांगे रिश्वत देता फिरे। पर थॉमस तो थॉमस हैं। यानी कुल मिलाकर वही बात, भ्रष्टाचार की भैंस को डंडा क्यों मारा। वह तो व्यवस्था में रच-बस चुका। जिस भैंस का दूध पीकर सभी मस्त हो चुके। सो अब एंटी करप्शन डे का मंत्र यही- भ्रष्टाचार का विरोध कर व्यर्थ समय न गंवाएं।
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09/12/2010
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09/12/2010
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