Thursday, February 24, 2011

तो क्या पक्ष-विपक्ष में बैठने से बदलती सोच?

कुछ ऐसे भी मंजर हैं तारीख की नजरों में, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई है। आखिर मनमोहन की जुबां से दर्द फिर छलक ही पड़ा। तीन महीने के गतिरोध के बाद संसद में बहाल हुई शांति का सुकून भी दिखा। पर शायरी में लम्हा किसके लिए और सदियां किसके लिए? कहीं पीएम का मतलब यह तो नहीं- गठबंधन की मजबूरी का फायदा उठा राजा ने खता की। सजा कांग्रेस को भुगतनी पड़ रही? यों कांग्रेस गाहे-ब-गाहे यही साबित करने में जुटी। सो गुरुवार को लोकसभा में जेपीसी का औपचारिक प्रस्ताव आया। तो टर्म एंड रेफरेंस की आड़ में झुनझुना थमा दिया। लोकसभा से जेपीसी के 20 मेंबरों के नाम का एलान हो गया। अब राज्यसभा दस नामों का एलान करेगी। पर जेपीसी को सिर्फ टेलीकॉम लाइसेंस तक सिमटा दिया। यों स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ी की जांच अब 1998 से होगी। सो जेपीसी पर राजनीतिक तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। लोकसभा में प्रणव दा ने प्रस्ताव पेश किया। तो जेपीसी के गठन के पीछे ईमानदार सोच नदारद। अलबत्ता उन ने भी वही राग अलापा, जो पीएम ने कहा था। जेपीसी का गठन सिर्फ इसलिए, क्योंकि संसद की कार्यवाही चल सके। सो प्रणव दा ने विपक्ष को खूब खरी-खोटी सुनाईं। दलील दी- 543 के सदन में 20, 50 या 200 सांसदों की ओर से संसद को बंधक बनाने का क्या मतलब? संसद को ठप करना लोकतंत्र को मजबूत बनाना नहीं। हमें संविधान के प्रति अपनी शपथ को याद रखना होगा। उन ने पाकिस्तान के मिलिट्री रूल की भी याद दिलाई। कैसे दस अक्टूबर 1958 को पाकिस्तान मार्शल लॉ का शिकार हुआ। चार दिन में तीन पीएम बने, सदन का उपाध्यक्ष सदन में ही मार दिया गया। फिर संसदीय संस्थाओं के प्रति नफरत की भावना पैदा हुई और आखिरकार उसकी जगह एक संविधानेत्तर संस्था ने ली। यों प्रणव दा ने भारत में ऐसे हालात को बेमानी बताया। पर क्या यह एक अडिय़ल सरकार की विपक्ष और देश की जनता को धमकी नहीं? आखिर भ्रष्टाचार पर जेपीसी के गठन में मिलिट्री रूल जैसे उदाहरण की क्या जरूरत थी? यही प्रणव दा कुछ हफ्ते पहले विपक्ष की जेपीसी की मांग को माओवादी हरकत करार दे चुके। सो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भी सरकार को घेरने में कसर नहीं छोड़ी। पीएम को आत्मचिंतन की सलाह दी। कहा- अगर जेपीसी की मांग करना माओवाद, तो विपक्ष में रहते कांग्रेस भी ऐसा कर चुकी। सो सदन में जमकर नोंकझोंक हुई। सुषमा ने गुस्से में 2001 के हंगामे का रिकार्ड मार्शल के हाथ बंसल को भिजवा दिया। बोलीं- जिनके घर शीशे के हों, दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकते। सचमुच भ्रष्टाचार के इस हमाम में सब एक जैसे। भ्रष्टाचार पर किसी भी सरकार का रुख ईमानदार नहीं रहा। इंदिरा राज में भ्रष्टाचार का मुद्दा गूंजा। जेपी आंदोलन ने देश की राजनीति को नया मुकाम दिया। तब इंदिरा ने भ्रष्टाचार को वैश्विक मुद्दा करार दिया। यही हाल राजीव गांधी के शासन में भी। यही हाल वाजपेयी राज में भी। तहलका कांड और ताबूत घोटाले पर एनडीए ने विपक्षी कांग्रेस को कितनी तवज्जो दी? जार्ज फर्नांडिस का इस्तीफा लिया। पर रपट आने से पहले मंत्री बना दिया। तब एनडीए ने जेपीसी की मांग नहीं मानी। प्रणव मुखर्जी ने विपक्ष को याद दिलाया। कैसे तबके विधि मंत्री अरुण जेतली ने कहा था- जेपीसी जांच नहीं हो सकती। इस मुद्दे पर सदन में चर्चा कराना अधिक महत्वपूर्ण। बकौल प्रणव दा, कांग्रेस भी अबके पहले सदन में बहस चाहती थी, फिर कोई फैसला। यों प्रणव दा की यह दलील डैमेज कंट्रोल की कवायद। पर उन ने बीजेपी को सही याद दिलाई। पर सुषमा ने पेप्सी-कोला में पेस्टीसाइड के मुद्दे पर गठित जेपीसी की नजीर दी। कहा- मैंने दो घंटे में जेपीसी मान ली थी। विपक्ष के सदस्य शरद पवार को अध्यक्ष बनाया था। पर सुषमा भूल रहीं, पेप्सी-कोला विवाद राजनीतिक मुद्दा नहीं था। सो जब कपिल सिब्बल ने बहस में हिस्सा लिया। तो मुंह खोलते ही पहले मुंह की खा गए। सुषमा को झूठी साबित करने की कोशिश की। पर फौरन सॉरी बोल शब्द वापस लेने पड़े। फिर भी सिब्बल हमले से बाज नहीं आए। पहले तो स्पेक्ट्रम घोटाले में जीरो नुकसान का राग अलापा। हंगामा हुआ, तो बैठ गए। पर सदन में विपक्षी सांसदों ने पूछ ही लिया- जब कोई नुकसान नहीं हुआ। तो जेपीसी का क्या मतलब? यों सिब्बल ने बीजेपी को याद दिलाया, कैसे तहलका कांड के वक्त पीएम वाजपेयी ने देश के नाम संदेश दिया। तो कहा था- संसद ही सही फोरम, जहां चर्चा हो सकती। पर विपक्ष हंगामा कर सदन रोक रहा। सचमुच विपक्ष और सत्तापक्ष में रहते राजनीतिक दलों की सोच बदल जाती। सत्ताधारी तानाशाही तेवर दिखाते। तो विपक्ष भी हाईजैक करने की फिराक में रहता। सुषमा ने तो खुद कबूला- जब-जब भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा, तबकी विपक्ष ने जेपीसी की मांग की। अबके माहौल बना, कांग्रेस मजबूर हुई। तो कांग्रेसियों के चेहरों पर खिन्नता साफ झलक रही। प्रणव का सैन्य शासन का भय दिखाना। पक्ष-विपक्ष की वही लड़ाई- तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे। सो बीजेपी ने पीएम को मंथन की सलाह दी। पर जब खुद का इतिहास दिखाया गया। तो तिलमिला उठी।
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24/02/2011

Wednesday, February 23, 2011

अफजल की याचिका बता रही कसाब का भविष्य

तो तीस मेंबरी जेपीसी का खाका तय हो गया। अध्यक्ष समेत कांग्रेस के दर्जन तो बीजेपी के आधा दर्जन मेंबर होंगे। लेफ्ट, बीएसपी, जेडीयू, डीएमके के दो-दो। सपा, अन्ना द्रमुक, तृणमूल, बीजद, एनसीपी के एक-एक मेंबर होंगे। बीजेपी अपने आधा दर्जन में से ही एनडीए का भी पेट भरेगी। बीजेपी ने अपने कोटे के छह में से पांच नामों का एलान कर दिया। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, हरेन पाठक लोकसभा से। तो एस.एस. आहलूवालिया और रविशंकर प्रसाद राज्यसभा से जेपीसी में होंगे। छठी सीट बीजेपी ने शिवसेना को दे दी। अब गुरुवार को कपिल सिब्बल प्रस्ताव लाएंगे। तो बहस में नोंकझोंक भी जमकर होगी। पर गतिरोध का औपचारिक पटाक्षेप हो जाएगा। फिर जेपीसी की जांच सुर्खियों में रहेगी। सो बात संसद के बजट सत्र की। गतिरोध टूटा, तो संसद फिर अपनी रौ में लौट आया। गुरुवार को तेलंगाना ने तीन बार लोकसभा की कार्यवाही ठप कराई। तेलंगाना को लेकर हंगामे में टीआरएस ही नहीं, कांग्रेसी सांसद भी आगे। सो सुषमा स्वराज ने टीआरएस के प्रति खूब सहानुभूति जताई। लोकसभा में उन ने पीएम से अपील की- इसी सत्र में बिल लाने का भरोसा दे दें। पर दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता। सो कांग्रेस हड़बड़ी से बच रही। पर तेलंगाना से जुड़े कांग्रेसी सांसदों ने अब खम ठोक दिया- तेलंगाना की हमारी मांग पूरी नहीं हुई, तो हम संसद भवन परिसर में ही आत्महत्या कर लेंगे। सो कांग्रेस अपने सांसदों को मनाएगी या तेलंगाना की मांग मानेगी, यह अभी देखना होगा। पर गुरुवार को धन्यवाद प्रस्ताव की बहस में शरद यादव ने भ्रष्टाचार को अफीम बता सरकार की खूब बखिया उधेड़ी। तो कांग्रेसियों ने कर्नाटक का सुर्रा छोड़ दिया। पर असली नोंकझोंक राज्यसभा में हुई। पहला सवाल संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की दया याचिका से जुड़ा था। सो विपक्षी सूरमाओं ने होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम को घेरने की कोशिश की। पर चालाक चिदंबरम चतुराई दिखा गए। उन ने साफ कह दिया- बतौर गृहमंत्री उन ने दया याचिकाओं के निपटान में कोई देरी नहीं की। पर चिदंबरम पुरानी देरी और अफजल की याचिका के भविष्य का कोई समयबद्ध भरोसा नहीं दे सके। तो शिवसेना के मनोहर जोशी ने आरोप मढ़ दिया- अल्पसंख्यक समुदाय का होने की वजह से अफजल गुरु की दया याचिका पर फैसले में देरी की जा रही। जोशी के इस आरोप से सत्तापक्ष ही नहीं, वामपंथी भी भडक़ गए। पर चिदंबरम ने सफाई दी- दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजते समय धर्म-जाति या संप्रदाय के बारे में नहीं सोचता। मैं किसी भय, पक्षपात, पूर्वाग्रह और भेदभाव के बिना अपना काम करता हूं। उन ने विपक्ष को कोई ठोस जवाब देने के बजाए अपनी पीठ जमकर ठोकी। चिदंबरम ने याद दिलाया कि कैसे एनडीए काल में 14 याचिकाएं आईं और यूपीए-वन में उनके गृहमंत्री बनने से पहले 14 केस आए। यानी कुल 28 केस में सिर्फ दो का निपटान हुआ। जबकि उनके गृहमंत्री रहते 13 केस आए, जिनमें सात का निपटारा हो चुका। चिदंबरम ने बाकायदा स्ट्राइक रेट बताया। जिसके मुताबिक एनडीए ने 14 में एक भी केस नहीं सुलझाया। शिवराज पाटिल ने 28 में दो सुलझाए। और खुद उन ने 13 में सात केस। यानी चिदंबरम का दावा- उनका स्ट्राइक रेट पचास फीसदी के करीब। चिदंबरम ने इस बात से भी इनकार कर दिया कि दया याचिकाओं के निपटान को समय सीमा में बांधने के लिए कोई संविधान संशोधन होगा। सो अब सवाल- क्या आतंकवादियों की याचिका भी कतार से ही सुनी जाएगी? क्या स्ट्राइक रेट उम्दा होने से अफजल जैसे आतंकियों को और वक्त दिया जाए? गृहमंत्री ने बेहिचक कह दिया- अफजल का फैसला कतार से ही होगा। अभी मामला गृह मंत्रालय में लंबित। सो मंत्रालय से राष्ट्रपति के पास जाने और वहां कितना वक्त लगेगा, यह नहीं कह सकते। उन ने इशारा कर दिया- दया याचिका के निपटान में सबसे कम 18 दिन, तो सबसे अधिक 11 साल 11 महीने 18 दिन का रिकार्ड। अफजल की याचिका को तो अभी साढ़े पांच साल ही हुए। अगर अभी भी सरकार ऐसी दलील दे रही। तो मुंबई हमले के दोषी कसाब का क्या होगा? कसाब ने तो सुप्रीम कोर्ट जाने का इरादा जता दिया। सो अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी। तो कसाब राष्ट्रपति के सामने भी जाएगा। यानी दया याचिकाओं का ऐसे ही निपटान होता रहा। तो मुंबई में मौत का तांडव करने वाला कसाब अभी एक दशक और भारत का अनाज तोड़ेगा। वैसे भी ताजा 25 दया याचिकाओं की सूची में अफजल का नंबर अठारहवां। सो राम जेठमलानी ने सरकार को याद दिलाया- सुप्रीम कोर्ट तय कर चुका कि किसी दोषी की सजा के अमल में दो साल से अधिक की देरी हो। तो मानसिक यातना को आधार बना सजा में बदलाव किया जा सकता। यानी अफजल अपनी दया याचिका के निपटान से पहले भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा दे। तो राहत मिलने के पूरे आसार। तब सरकार क्या कहेगी? चिदंबरम ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया- देरी उनके या मंत्रालय के स्तर पर नहीं हुई। अफजल की याचिका पर दिल्ली सरकार ने देर की। पर सवाल- दिल्ली के उपराज्यपाल ने तो जून 2010 में ही गृह मंत्रालय को फाइल भेज दी। फिर सात महीने से गृह मंत्रालय क्या कर रहा? सरकार शायद भूल रही, जब मुंबई हमले के बाद जनता सडक़ों पर उतरी। तो राजनेताओं की सांसें अटक गई थीं।
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23/02/2011

 

Tuesday, February 22, 2011

जेपीसी हो या गोधरा: रस्सी जल गई, बल नहीं गया

रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया। मनमोहन सरकार की अकड़ जेपीसी का एलान करने में भी दिख गई। पीएम ने संसद के दोनों सदनों में बयान पढ़ जेपीसी का इरादा जताया। पर जरा इरादे की नेकनीयती भी देख लीजिए। बकौल पीएम, संसद को पंगु बनाना देश बर्दाश्त नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार का जड़ से खात्मा सरकार की प्रतिबद्धता। सो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग में सीबीआई कर रही। संसद की पीएसी मामला देख रही। जस्टिस शिवराज पाटिल कमेटी की जांच रपट आ चुकी। सरकार ने सभी प्रभावशाली कदम उठाए। ताकि विपक्ष को जेपीसी पर जोर न देने के लिए मना लिया जाए। पर सफलता नहीं मिली। अब अगर बजट सत्र भी विपक्ष नहीं चलने देता। तो लोकतंत्र के हित में नहीं होता। सो हम विशेष परिस्थितियों में जेपीसी गठन को राजी हो रहे। यानी पीएम के बयान का एक पंक्ति में निचोड़- लोकतंत्र बचाने को झुकी सरकार। यों दिल बहलाने को मनमोहन-ए-खयाल अच्छा है। पर सवाल- हुजूर लोकतंत्र की याद आने में इतनी देर क्यों लगी? शीत सत्र में क्या लोकतंत्र टूर पर था? असलियत तो मनमोहन ही नहीं, पूरी कांग्रेस जानती। टू-जी घोटाले में जब राजा का बाजा बज गया। सीबीआई ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। नए टेलीकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल ने बचाव के तमाम पैंतरे आजमाए। पर खुद की सांस उखड़ गई। सुप्रीम कोर्ट से लेकर समूचे विपक्ष ने हमले की धार बरकरार रखी। तो लोकतंत्र याद आने लगा। पहले मनमोहन और कांग्रेस ने लोकतंत्र को बपौती समझ चलाना चाहा। पर बात नहीं जमी, तो लोकतंत्र की दुहाई दे रहे। अगर लोकतंत्र की दुहाई, तो साथ में विपक्ष की जिद के आगे मजबूर होने का राग क्यों? आखिर शीत सत्र में ऐसी क्या जिद, जो जेपीसी नहीं मानी? सचमुच शुरुआत में कांग्रेस और सरकार ने राजा को जमकर बचाया था। बचाने में हाल तक कपिल सिब्बल भी लगे रहे। जिन ने तो घोटाले को ही झुठला दिया। पर जब मिस्र की जनता ने सडक़ों पर उतर लोकतंत्र की अलख जगाई। अपने देश की जनभावना में मिस्र जैसा उबाल नहीं। पर जुबां और आंखें मिस्र के आंदोलन की दुहाई देते दिखे। सो मनमोहन को लोकतंत्र दिख गया। अब देर से ही सही, मनमोहन सरकार दुरुस्त आई। तो लोकसभा में सुषमा स्वराज ने स्वागत किया। बोलीं- जेपीसी का गठन सत्तापक्ष या विपक्ष की जय-पराजय नहीं, अलबत्ता लोकतंत्र की जीत। पर राज्यसभा में अरुण जेतली ने पीएम के बयान को खेदजनक करार दिया। यों गुरुदास दासगुप्त और मुलायम सिंह ने सही फरमाया। दासगुप्त बोले- जेपीसी गठन पर सरकार आभार या बधाई की पात्र नहीं। सरकार की बुद्धि जागी, सो अपना फर्ज निभाया। मुलायम ने तो पीएम से कह दिया- आपको न खुदा मिला, न बिसाल-ए-सनम। शीत सत्र में जेपीसी बना लेते, तो जनता में गलत संदेश न जाता। पर अब तो जनता भी जान गई, सरकार भ्रष्टाचार दबाना चाह रही। यों सत्ता के नशे में भला जनता की फिक्र कौन सी सरकार करती। वोट बैंक की राजनीति ही पार्टियों का एजंडा। तभी तो मंगलवार को ही यूपी विधानसभा के मुद्दे पर माया-मुलायमवादी लोकसभा में भिड़ गए। पर बात कांग्रेसी अकड़ की। तो मंगलवार को जेपीसी का एलान करना ही पड़ा। गुजरात की स्पेशल कोर्ट ने कांग्रेसी सेक्युलरिज्म की हवा निकाल दी। गोधरा कांड पर नौ साल बाद फैसला आया। तो साबित हो गया, साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में साजिश के तहत आग लगाई गई। यों अदालत ने 63 आरोपियों को बरी कर दिया। जबकि 31 को साजिश का दोषी पाया। सो तीस्ता सीतलवाड़ जैसे एक्टिविस्टों को सांप सूंघ गया। कांग्रेस, कानून मंत्री वीरप्पा मोइली, पी. चिदंबरम, सलमान खुर्शीद जैसों ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी। जबकि बीजेपी की तो बांछें खिल गईं। सचमुच गोधरा कांड और उसके बाद हुए गुजरात दंगों पर खूब राजनीति हुई। बतौर रेल मंत्री लालू यादव ने जस्टिस यू.सी. बनर्जी कमेटी बनाई। तो बनर्जी ने लालू के मनमाफिक रपट दी। साबरमती ट्रेन अग्निकांड दुर्घटना करार दे दिया। पूरी थ्योरी गढ़ दी- कैसे एस-6 कोच में बैठे कारसेवकों ने स्टोव जलाया और आग लग गई। जिसमें 59 कार सेवक मारे गए। यों गुजरात हाईकोर्ट ने पहले बनर्जी रपट पर रोक लगाई। फिर कमेटी के गठन को असंवैधानिक ठहरा दिया। अब जब विशेष अदालत ने भले 63 को बरी कर दिया। पर साजिश की बात साबित हो गई। अब इसमें कोई बदलाव की संभावना नहीं, भले कुछ और आरोपी छूट जाएं। पर मंगलवार को विशेष अदालत के फैसले के बाद भी खास संप्रदाय की बात को सेक्युलरिज्म मानने वाले यही साबित करने में जुटे रहे। कोर्ट ने 63 लोगों को बरी कर दिया। नरेंद्र मोदी सरकार ने लोगों को टार्गेट किया था। पर मुंबई हमले के केस में भी तो कई रिहा हुए। फिर भी साजिश की बात कबूलने में झोला छाप वाले हिचकिचाते दिखे। पुलिस जांच में कई बार निर्दोष पकड़े जाते। पर विशेष अदालत का फैसला उन लोगों के लिए सबक, जो सेक्युलरिज्म को एक विशेष समुदाय से जोडक़र जस्टिफाई करने में लगे रहते। कांग्रेसी दिग्विजय सिंह का बटला राग भी इसी कड़ी में। अब चाहे ऊपरी अदालत में दोषी छूटे या सजा पर मुहर लगे, यह अलग बात। पर गुजरात की स्पेशल कोर्ट का फैसला छद्म धर्मनिरपेक्षता के मुंह पर करारा तमाचा। यानी मंगलवार को जेपीसी हो या गोधरा का फैसला, बात वही- रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया।
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22/02/2011

Monday, February 21, 2011

जेपीसी मानी, पर सब कुछ लुटाने के बाद

आतंकी कसाब की फांसी हाईकोर्ट से कनफर्म हो गई। तो इधर संसद की उलझी डोर भी सुलझ गई। सो अब इसे जूते और प्याज खाना कहें या लौट कर बुद्धू घर को आया, यह आप ही तय करें। पर सरकार अब जेपीसी को राजी। मंगलवार को खुद पीएम मनमोहन जेपीसी का इरादा जताएंगे। फिर गुरुवार को दोपहर दो बजे टेलीकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल मोशन लाएंगे। जिसमें सभी मेंबरों के नाम और टर्म एंड रेफरेंस भी होंगे। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की मीटिंग में जेपीसी पर बहस के लिए चार घंटे का वक्त तय हो गया। सो सवाल- जब जेपीसी माननी ही थी, तो शीत सत्र हंगामे में व्यर्थ क्यों जाने दिया। कांग्रेस और सरकार के तमाम दांव धरे रह गए। अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की चौतरफा जांच हो रही। सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग में सीबीआई, तो पीएसी भी जांच कर रही। जस्टिस शिवराज पाटिल कमेटी अपनी जांच पूरी कर चुकी। यानी तमाम हथकंडों के बावजूद अब जेपीसी माननी ही पड़ी। सो अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की सारी जांच एक साथ चलेगी। पर कांग्रेस अब भी न तुम जीते, न हम हारे वाले अंदाज में इतरा रही। जेपीसी पर दोनों पक्षों में सहमति बन चुकी। पर कांग्रेस कह रही- अभी तक जेपीसी का एलान नहीं हुआ, सो टिप्पणी नहीं। यों दिल बहलाने को गालिब-ए-खयाल अच्छा। पर शीत सत्र से अब तक कांग्रेस अपनी फजीहत खूब करा चुकी। घोटालों पर बचाव के हर पेंतरा उलटा पड़ा। ए. राजा अपने राजदारों समेत गिरफ्तार हुए। नए-नवेले संचार मंत्री कपिल सिब्बल की काबिलियत भी धरी रह गई। पहले तो उन ने घोटाले को निल बता दिया। फिर ठीकरा ट्राई और एनडीए सरकार के सिर फोड़ा। सीएजी के गणित पर भी उंगली उठाई। पर सिब्बल की वकालत भी नहीं चली। उलटा सुप्रीम कोर्ट से फटकार मिली। पीएसी ने भी आंखें दिखा स्पीकर से शिकायत कर दी। फिर हाल ही में पीएम ने टीवी संपादकों के जरिए मोर्चा संभाला। पर गठबंधन की मजबूरी के राग ने पीएम को और कमजोर साबित कर दिया। सो अब कांग्रेस और सरकार जेपीसी को राजी। तो सवाल- सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। दिन में गर चिराग जलाया, तो क्या किया? अगर कांग्रेस शीत सत्र में ही जेपीसी को राजी हो जाती। तो सुप्रीम कोर्ट मॉनीटरिंग वाली सीबीआई जांच का झमेला न होता। पर अब जेपीसी का एलान होने जा रहा। तो काबीना मंत्री दलील दे रहे- अब बाकी जांच के कोई मायने नहीं। पर हकीकत इसके उलट। सो कहीं कई जांच के चक्कर में निचोड़ देश को घनचक्कर न बना दे। संसदीय इतिहास में अब तक चार जेपीसी बन चुकीं। कांग्रेस राज में बोफोर्स और हर्षद मेहता दलाली कांड पर जेपीसी बनी। तो एनडीए राज में मार्केट घोटाले और शीतल पेय में पेस्टीसाइड के मुद्दे पर। अब टू-जी स्पेक्ट्रम पर पांचवीं जेपीसी बनने जा रही। पर इतिहास यही इशारा कर रहा- जेपीसी अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब नहीं रही। यों पांचवीं जेपीसी कितनी सफल, रपट आने के बाद ही पता चलेगा। पर जेपीसी के गठन की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। विपक्ष ने स्पेक्ट्रम, आदर्श, कॉमनवेल्थ और इसरो-देवास डील समेत जेपीसी मांगी। पर सरकार ने सिर्फ राजा से जुड़े स्पेक्ट्रम घोटाले की जेपीसी मानी। तो सुषमा स्वराज दलील दे रहीं- विपक्षी एकता बरकरार रखने और गतिरोध तोडऩे के लिए हमने टू-जी स्पेक्ट्रम पर ही जेपीसी मान ली। यों राजनीतिक हलकों में चर्चाएं कई और। बीजेपी के एक बड़े नेता का रिश्तेदार कॉमनवेल्थ में जुड़ा। तो दूसरे का आदर्श से जुड़े लोगों से बेहतर संबंध। सो गतिरोध तोडऩे के बहाने दोनों ने आदर्श, कॉमनवेल्थ को जेपीसी से बाहर होने दिया। अब देर से ही सही, पक्ष-विपक्ष ने संसद में बना गतिरोध तोड़ा। तो मंगलवार से संसद की कार्यवाही चलेगी। सो सोमवार को परंपरा के मुताबिक नए साल के पहले सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का अभिभाषण हुआ। सरकार ने अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा। पर सरकार के एक साल के एजंडे में कुछ नया नहीं। अलबत्ता महंगाई पर काबू पाना सरकार की प्राथमिकता में। पर इसके लिए सरकार ने एक साल मांग लिया। यानी वित्तीय वर्ष 2011-12 में महंगाई पर काबू पाना सरकार की पहली प्राथमिकता। पर विकास से भी समझौता नहीं करेगी। सो राष्ट्रपति का अभिभाषण उत्साह पैदा करने वाला नहीं रहा। करीब 50 मिनट के अभिभाषण में महज दो बार ताली बजीं, वह भी मद्धिम। मिस्र में लोकतंत्र का स्वागत और महिला बिल की उम्मीद पर कुछ सांसदों ने ताली बजाई। बाकी अभिभाषण में कहीं ऐसा दमखम नहीं, जहां सांसद मेजें थपथपाने को मजबूर हुए हों। अलबत्ता कांग्रेस को पहले दिन अपने ही सांसदों से शर्मसार होना पड़ा। अभिभाषण में तेलंगाना का जिक्र नहीं था। सो कांग्रेसी सांसद राष्ट्रपति के सामने ही सोनिया के फोटू के साथ जय तेलंगाना के बैनर लहराने लगे। फिर भी बजट सत्र में पक्ष-विपक्ष की सहमति संसद ही नहीं, लोकतंत्र के लिए सुकून की बात। आखिरकार आवाम की जिद के आगे सरकार को झुकना पड़ा। मनमोहन ने तो पिछले हफ्ते की प्रेस कांफ्रेंस में भी यहां तक कह दिया था- शीत सत्र हंगामे में क्यों बरबाद हुआ, इसकी वजह मैं समझ नहीं पा रहा। पर अब सवाल- क्या पीएम को वजह समझ आ गई? सचमुच टू-जी घोटाला और इसके लिए जेपीसी का विवाद संसद का नया इतिहास रच गया। सो सरकार को जवाब देना होगा- शीत सत्र में ही जेपीसी क्यों नहीं मान गई?
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21/02/2011

Friday, February 18, 2011

तो क्या क्रिकेट के शोर में दबाएंगे भ्रष्टाचार?

संसद में घोटाला कप की गूंज होगी। तो बाहर क्रिकेट वल्र्ड कप की। सो कांग्रेसी अब बड़ी आस लगाए बैठे, भ्रष्टाचार का घेरा कुछ कमजोर होगा। शुक्रवार को कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद से लेकर राजीव शुक्ल तक यही दुआएं करते दिखे। शकील बोले- मीडिया अब क्रिकेट की अधिक खबरें दिखाएगा। सो लोगों का ध्यान भ्रष्टाचार के मुद्दे से हट जाएगा। राजीव शुक्ल भी करीब-करीब यही बोले। संसद का बजट सत्र और वल्र्ड कप साथ-साथ, देखते हैं लोग किसको देखेंगे। पर दोनों के चेहरों पर अजीब सी मुर्दनी हंसी दिखी। अब वल्र्ड कप के उत्साह से कोई भ्रष्टाचार को ढांपना चाहे, तो ऐसे नेताओं को क्या कहेंगे। यों कई बार अति उत्साह के चक्कर में गड़बड़झाले हो जाते। कांग्रेस तो इस दौर से गुजर अब जेपीसी को झुक गई। मंगलवार को लोकसभा में शायद खुद पीएम जेपीसी का प्रस्ताव रखेंगे। बहस की औपचारिकता निभा एलान हो जाएगा। सो शुक्रवार को संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कह दिया- बुधवार से पहले जेपीसी पर फैसला हो जाएगा। यानी मंगलवार को संसद में मंगल की उम्मीद करिए। पर बात अति उत्साह के मारों की। तो भला लालकृष्ण आडवाणी को कैसे भूल सकते। आडवाणी पीएम नहीं बन सके, पीएम इन वेटिंग ही रह गए। पर कामकाज का ढर्रा पीएम जैसा ही अपना रखा। याद होगा, चुनावी समर के बीच कैसे आडवाणी हर क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ मीटिंग कर एजंडा पेश करते थे। अभी भी वही ढर्रा जारी। सो ब्लैक मनी के मामले पर विशेषज्ञों की टास्क फोर्स बना दी। टास्क फोर्स ने पता नहीं कहां से टास्क लिया। सोनिया-राजीव के भी स्विस बैंक में अकाउंट बता दिए। आडवाणी ने डेढ़ घंटे की प्रेस कांफ्रेंस में टास्क फोर्स की पूरी रपट को खूब बांचा। पर सोनिया गांधी ने चिट्ठी लिख एतराज जताया। तो आडवाणी ने फौरन चिट्ठी लिख सोनिया से माफी मांग ली। दलील दी- अगर आपने पहले खंडन कर दिया होता, तो टास्क फोर्स इस खंडन को ध्यान में रखती। अब इसका क्या मतलब? मान लो, हम-आप खंडन न करें, तो आडवाणी की टास्क फोर्स हमारा-आपका भी नाम ले देगी? सवाल- टास्क फोर्स ने किस आधार पर सोनिया-राजीव का नाम लिया? महज सोनिया के खंडन से ही आडवाणी ने कैसे मान लिया? यों ऐसी गलतियां आडवाणी कई दफा कर चुके। जब आडवाणी ने लोकसभा चुनाव से पहले अपनी आत्मकथा- माई कंट्री, माई लाइफ लिखी। तो ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार और एक-दो मुद्दे ऐसे, जिन पर बाद में माफी मांगनी पड़ी। पर कांग्रेस को आडवाणी की माफी राजनीतिक चाल नजर आ रही। जब आडवाणी ने अपनी किताब लिखी थी, तब होली के दिन पत्नी कमला के साथ सोनिया के घर गए थे। किताब के बहाने मेल-जोल बढ़ाने की कोशिश की थी। पर कांग्रेस ने किताब को आधार बना आडवाणी को कई दफा घेरा। अबके होली करीब, तो आडवाणी ने सिर्फ सोनिया के खंडन से ही माफी मांग ली। सो सवाल- जब सोनिया का खंडन मान रहे, तो आडवाणी कभी मनमोहन सिंह की बात को सच क्यों नहीं मानते? सो एक कांग्रेसी ने चुटकी ली- सीबीआई के पचड़े से बचने की कोशिश हो रही। सीबीआई ने बाबरी ढांचा केस में आडवाणी समेत आठ लोगों पर मुकदमा वापस लेने के हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। सो मामला फिर खुला, तो कांग्रेस के खिलाफ तनी बीजेपी की तोपें फुस्स हो जाएंगी। पर दबी जुबान में ही सही, कांग्रेस ने सीबीआई के बेजा इस्तेमाल की बात मान ली। सो बजट सत्र में सरकार और विपक्ष की बांसुरी खूब बजेगी। बैंड तो बेचारे आम आदमी का बज रहा। सरकार की चालाकी कहें या बेशर्मी, शुक्रवार को महंगाई दर पीएम के अनुमान से भी नीचे आ गई। हुआ यों कि सरकार ने अब महंगाई दर मापने का नया सूचकांक जारी कर दिया। सो नए सूचकांक के मुताबिक अब महंगाई दर महज छह फीसदी। तो महंगाई नीचे लाने का मनमोहिनी-प्रणवी फार्मूला आप खुद देख लो। यों विशेषज्ञों ने तो पहले ही बता दिया- नई पैदावार का मौसम आ गया, सो महंगाई तो खुद-ब-खुद नीचे आएगी। सरकार भी बजट में कुछ लोक-लुभावन एलान करने की सोच रही। पिछले बजट में प्रणव दा ने पेट्रोल के दाम बढ़ा इतिहास रचा। तो अबके घटाकर रचेंगे। सचमुच संसद का बजट सत्र सरकार के लिए इम्तिहान जैसा। महंगाई-भ्रष्टाचार-ब्लैकमनी और माननीय सीवीसी पी.जे. थॉमस का मामला फोकस में रहेगा। सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण में पूरे साल का एजंडा झलकेगा। तो भ्रष्टाचार से लडऩे के सोनिया मंत्र का जाप होगा। पर ए. राजा ने तो थम ठोककर कह दिया- मैं जल्द बेदाग होकर लौटूंगा। सचमुच नेताओं के मामले में जनता को अभी भी ठोस कार्रवाई का भरोसा नहीं। पर बजट सत्र अबके सचमुच इतिहास रचने जा रहा। जेपीसी जांच का एलान होगा। जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर वोटिंग होगी। सभापति हामिद अंसारी ने महाभियोग को मंजूरी दे दी। पर बजट सत्र में जहां सरकार को खुद को साबित करने की चुनौती। तो विपक्ष पर भी कर्नाटक-गुजरात जैसे मामलों में दिखाने का दबाव। पर नीयत किसी की साफ नहीं। तभी तो कांग्रेसी क्रिकेट के शोर में भ्रष्टाचार दबाने की कोशिश कर रहे।
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18/02/2011

Thursday, February 17, 2011

‘घोटाला कप’ हो, तो कौन मारेगा बाजी?

क्रिकेट के महाकुंभ का रंगारंग आगाज हो गया। सो वल्र्ड कप की खुमारी अब सिर चढऩे लगी। पर अफसोस, ए. राजा अब तिहाड़ जेल से ही मैच का लुत्फ उठाएंगे। कुछ परेशानी हुई, तो अस्पताल में भरती होकर मैच देखेंगे। पर फूटी किस्मत कांग्रेस की, घोटालों ने सारा मजा किरकिरा कर दिया। जब दुनिया मैच का मजा ले रही होगी। कांग्रेस और सरकार घोटालों का हिसाब-किताब करने में मशगूल होगी। सचमुच घोटालों ने ऐसा बैंड बजाया, गुरुवार को एस-बैंड स्पेक्ट्रम की इसरो-देवास डील रद्द करनी पड़ी। सीसीएस यानी सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी की मीटिंग के बाद विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने एलान कर दिया। डील सामरिक हित में नहीं, सो इसे तत्काल रद्द किया जाता है। पर देवास मल्टीमीडिया सरकार को लगातार आंखें दिखा रहा। सो मोइली ने दो-टूक कह दिया- जब सामरिक जरूरत का सवाल हो। तो निजी कंपनी को छोडि़ए, सरकार व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए एंट्रिक्स को भी स्पेक्ट्रम नहीं दे सकती। मोइली ने कंपनी की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए साफ कर दिया- डील रद्द करने के खिलाफ कंंपनी अदालत गई, तो भी सफल नहीं होगी। हमने मामले की पूरी पड़ताल की और डील के प्रावधानों व कानून के मुताबिक इसे रद्द किया जा सकता। माना, सरकार को सामरिक हित में डील रद्द करने का हक। पर क्या डील रद्द करने से घोटाला छुप जाएगा? सरकार की हताशा का अंदाजा इसी बात से लगाइए, पीएमओ ने पिछले गुरुवार ही इसरो-देवास डील की जांच के लिए बी.के. चतुर्वेदी कमीशन बनाया था। एक महीने में रपट देने को कहा गया। पर रपट का इंतजार किए बिना, महज हफ्ते भर बाद ही डील क्यों रद्द कर दी? यानी सामरिक हित को आधार बना भले डील रद्द कर दी। पर घोटाले की पूरी तैयारी थी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सो बीजेपी ने तो सवाल उठाए ही, पीएसी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने देर से की गई छोटी कार्रवाई करार दिया। बोले- डील रद्द करना ही पर्याप्त नहीं। मामले की गंभीरता से जांच हो और जिसने डील की, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए। बीजेपी ने तो जेपीसी के दायरे में इसरो डील को भी लाने की शर्त रख दी। सो मुश्किल में मनमोहन अब क्या करेंगे? यों बुधवार को उन ने जो सफाई दी, कांग्रेसी खेमे में ही दोहरे अर्थ निकाले जा रहे। सो क्रिकेट वल्र्ड कप की ओपिनिंग सेरेमनी देखने के बजाए कांग्रेसी संसद की रणनीति और पीएम उवाच के मंथन में ही जुटे दिखे। यों औपचारिक तौर पर कांग्रेस ने गुरुवार को दोहराया- पीएम अपने मकसद में सफल हुए। वह मध्यम वर्ग को संदेश देना चाह रहे थे। सो टीवी के जरिए जनता को बताया- उतने बड़े दोषी नहीं, जितना प्रचार हो रहा। पर जरा अंदरखाने कांग्रेस की चुटीली चर्चाएं भी सुनिए। मनमोहन उवाच को कांग्रेसी रणनीतिक हिस्सा बता रहे। जिसमें पीएम ने अपनी मजबूरी बता यह जतलाने की कोशिश की, उन ने निजी तौर पर कुछ ऐसा नहीं किया, जो उन पर उंगली उठाई जा रही। यानी कांग्रेसी खेमे में मनमोहन के खिलाफ सुर उठ रहे। पीएम की पूरी प्रेस कांफ्रेंस का निचोड़ यही माना जा रहा। भले मनमोहन सरकार के मुखिया, पर राजनीतिक फैसलों में उनकी भूमिका नहीं। जितने भी गलत फैसले हुए, वह सब गठबंधन के नेताओं और मुखिया स्तर पर लिए गए। यानी मनमोहन विरोधियों की नजर में सीधे सोनिया गांधी पर उंगली उठाई गई। सचमुच मनमोहन ने बड़ी बेबाकी से मजबूरी का इकरार किया। मिजाज के मुताबिक काम न होने का अफसोस भी जताया। यानी मतलब साफ- मनमोहन अगर पीएम की कुर्सी पर बैठ अपना काम कर रहे। तो सिर्फ सोनिया गांधी की वजह से। सो पीएम ने प्रेस कांफ्रेंस में खुद को ऐसे ही पेश किया, मानो, सीईओ की भूमिका निभा रहे। यों सरकार हो या संगठन, सचमुच मनमोहन की भूमिका यही। हर जगह सोनिया की पसंद के लोग तैनात। सो मनमोहन कार्यकारी की ही भूमिका निभा रहे। यूपीए की दूसरी पारी में उन ने ए. राजा और टीआर बालू को केबिनेट में न लेने का खम ठोका। पर मजबूरी में राजा को लेना पड़ा। टू-जी घोटाले में वित्त मंत्रालय की भी सहमति रही। सो मनमोहन ने अधिक दखल नहीं दिया। यानी राजा की वजह से जो छींटे मनमोहन पर पड़ रहे, असल में उसकी जवाबदेही सोनिया गांधी की। राजनीतिक फैसले सोनिया ही करतीं। पर बतौर पीएम कांग्रेसी पाप का ठीकरा मनमोहन के सिर फूट रहा। आज भी देश की जनता निजी तौर पर मनमोहन को क्लीन मान रही। पर दस जनपथ को खुश रखने के चक्कर में मनमोहन अपनी छवि दागदार कर रहे। मनमोहन का मजबूरी गान मजाक का विषय बन चुका। पर मनमोहन कब तक मजबूरी गान गाएंगे और देश में घोटाले दर घोटाले होते रहेंगे? सो वल्र्ड कप के इस मौसम में घोटालों की बारिश देख ख्याल आ रहा- गर देश में घोटाला कप का आयोजन हो, तो कौन जीतेगा? देश में इतने घोटाले और घोटालेबाज हो चुके, घोटाला कप के लिए कई प्रायोजक मिल जाएंगे। अपने टमाटर-प्याज के किसान भाई भी राहत महसूस करेंगे। शायद खपत बढ़ेगी, तो प्याज-टमाटर की पैदावार भी बढ़े। मुर्गियां भी अधिक अंडे देने लगें।
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17/02/2011

Wednesday, February 16, 2011

मजबूरी गिना, माटी की मूरत ही दिखे मनमोहन

पीएम मनमोहन ने आवाम का कितना मन मोहा, बुधवार के ऑन लाइन कमेंट्स में ही उजागर हो गया। किसी ने मनमोहन को धृतराष्ट्र कहा, किसी ने कार्टून। किसी ने कहा- बहुत हो चुका मनमोहन जी, बोलिए नहीं, अब तो गद्दी छोडि़ए। पर मनमोहन ने पहले ही गद्दी छोडऩे से इनकार कर दिया। बतौर पीएम नैतिक जिम्मेदारी कबूली, पर पद छोडऩे का सवाल हुआ। तो बोले- न ऐसा कोई ख्याल दिमाग में आया, न टर्म पूरा होने से पहले ऐसा सोचूंगा। अगर ऐसे पीएम इस्तीफा देने लगे, तो देश में हर छह महीने में चुनाव कराने पड़ेंगे। यानी मनमोहन ने एक तरफ कुर्सी के लिए खूंटा गाड़ा। तो दूसरी तरफ सरकार की गिरती साख का ठीकरा गठबंधन के सिर फोड़ दिया। गठबंधन सरकार की मजबूरियां गिनाईं। अब ए. राजा को दुबारा संचार मंत्री बनाना भले गठबंधन की मजबूरी। पर भ्रष्टाचार को न रोक पाना भी क्या गठबंधन की मजबूरी? मनमोहन ने बड़ी चतुराई से अपना दामन पाक-साफ बताया। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा को लिखी चिट्ठी और फिर राजा के जवाब को अपनी ढाल बनाया। बोले- राजा ने पारदर्शिता का भरोसा दिलाया था। ट्राई और टेलीकॉम कमीशन की ओर से नीलामी का सुझाव न देने की दलील दी थी। संचार मंत्रालय के साथ वित्त मंत्रालय भी सहमत था। सो विशेषज्ञों की वजह से मैंने बार-बार सलाह देना उचित नहीं समझा। यानी पीएम ने एक और खुलासा किया- स्पेक्ट्रम घोटाले की कड़ी में तबके वित्त मंत्री की भी भूमिका। तो क्या अब जांच एजेंसी तबके वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से भी पूछताछ करेगी? पर मनमोहन ने भ्रष्टाचारियों को सख्त सजा देने की बात कही। सच सामने लाने का दावा किया। पर सवाल हुआ- कॉमनवेल्थ घोटाले पर 90 दिन में जांच पूरी कर दोषियों को सामने लाने के दावे का क्या हुआ? तो मनमोहन बोले- देश में कानून का शासन। सो कानून अपना काम करेगा। पीएम ने सोलह आने सही कहा। पर गठबंधन की आड़ में भ्रष्टाचार की अनुमति क्या कानून का राज कहलाएगा? गठबंधन धर्म सत्ता में बने रहने के लिए भले मजबूरी हो। पर कानून के शासन में गठबंधन कोई मजबूरी नहीं होती। सो लोकतंत्र में कोई भी नेता गठबंधन को अपनी ढाल नहीं बना सकता। सो पीएम की 69 मिनट चली प्रेस कांफ्रेंस देश की आवाम को कोई खास संदेश नहीं दे सकी। पीएम कभी लाचार तो कभी बेबस दिखे। फिर भी हम होंगे कामयाब का संकल्प दोहराया। अब जरा पीएम की बेबाकी भी देखिए। उन ने अपना इरादा साफ कर दिया। विकास दर की कीमत पर महंगाई काबू नहीं करेंगे। यानी विकास दर को साढ़े आठ फीसदी से ऊपर रखने के लिए आवाम को महंगाई झेलनी होगी। यों मनमोहन ने मार्च तक सात फीसदी महंगाई दर लाने का दावा किया। पर भला देश की जनता पीएम के इस भरोसे को भी कैसे माने? पीएम ने 24 मई 2010 को भरोसा दिलाया था- दिसंबर तक महंगाई काबू कर लेंगे। फिर दो महीने पहले ही कांग्रेस महाधिवेशन के मंच से मनमोहन ने 20 दिसंबर को कहा- महंगाई दर मार्च तक साढ़े पांच फीसदी पर ले आएंगे। अब मार्च आने में महज बारह दिन बचे। तो मनमोहन सात फीसदी की बात कर रहे। सो हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। पर बात भ्रष्टाचार की। तो मनमोहन ने जेपीसी के साफ संकेत दे दिए। बोले- जेपीसी समेत किसी भी एजेंसी के समक्ष पेश होने को तैयार। वैसे भी पीएम के तौर पर मेरा आचरण सीजर की पत्नी के संदेह से परे जैसा होना चाहिए। पीएम ने बीजेपी पर सरकार को बंधक बनाने का आरोप लगाया। गुजरात के पूर्व मंत्री अमित शाह और जीएसटी के मसले पर ब्लैकमेलिंग का खुलासा किया। देवास-इसरो डील में कुछ भी न छिपाने का दावा किया। भ्रष्टाचार पर नैतिक जिम्मेदारी कबूल की। बोले- मुझे मेरी जिम्मेदारी का अहसास है, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए। पर गठबंधन की मजबूरियां हैं। सो गर पीएम ऐसे इस्तीफा देने लगे, तो हर छह महीने में चुनाव कराने पड़ेंगे। जो संभव नहीं। यानी पीएम ने माना, देश के हालात बदतर हो रहे। पर सत्ता में बने रहने के लिए गठबंधन जरूरी। सो भ्रष्टाचार को उसकी मजबूरी बता रहे। पीएम ने पहली बार बेबाकी के साथ माना, उनसे गलतियां हुई हैं। पर उतने बड़े दोषी नहीं, जितना प्रचारित किया जा रहा। यों पीएम ने मौजूदा यूपीए गठबंधन को मजबूत और प्रतिबद्ध करार दिया। पर सवाल- जब गठबंधन में कोई तनाव नहीं, तो मजबूरी गान क्यों गा रहे मनमोहन? सो बीजेपी के नितिन गडकरी ने पलटवार किया। पूछा- राजा के मामले में गठबंधन की मजबूरी। पर कॉमनवेल्थ, आदर्श और इसरो डील में क्या? उन ने आरोप लगाया- यूपीए सरकार लक्ष्मी की भक्त। जहां लक्ष्मी दर्शन के बिना कोई काम नहीं होता। सचमुच मनमोहन मैदान में उतर कर आवाम का मन तो नहीं मोह पाए। अलबत्ता जख्म को और गहरा कर दिया। सो आवाम की ओर से ऐसी-ऐसी टिप्पणियां आ रहीं, लिखना भी मुनासिब नहीं। फिर भी मनमोहन का दावा देखिए। मिस्र के हालात पर सवाल हुए। तो बोले- भारत में मिस्र नहीं दोहराएगा। पर जब देश का पीएम गठबंधन को मजबूरी बता देश के खजाने को लूटने दे। विकास के नाम पर महंगाई को बढऩे दे। गलती कबूल कर भी इस्तीफे से इनकार करे। तो शायद वह दिन दूर नहीं, जब अपना विजय चौक तहरीर स्क्वायर बन जाए।
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16/02/2011