Tuesday, March 1, 2011

‘राज’ हो या ‘राजा’, सत्ता के लिए कुछ भी चलेगा

तो बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी के चुनाव की रणभेरी बज गई। जेपीसी का प्रस्ताव राज्यसभा से भी पास हो गया। कांग्रेस ने कानूनदां रविशंकर प्रसाद के मुकाबले अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतारा। पर सिंघवी पहले ही मैदान छोड़ गए। सिंघवी ने जेपीसी में शामिल होने से सोमवार की रात ही इनकार कर दिया। फिर भी प्रस्ताव में नाम शामिल। सो मंगलवार को संसद भवन परिसर में ही बोले- कई टेलीकॉम कंपनियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मुकदमे की जिरह कर चुका। सो मेरा जेपीसी में होना सही नहीं होगा। सिंघवी की दलील सोलह आने सही। पर कांग्रेस ने अभी सिंघवी को हटाने की कोई राय नहीं बनाई। सो अब देखना होगा, सिंघवी की नैतिकता जीतेगी या कांग्रेस का जोर चलेगा। पर राज्यसभा में कपिल सिब्बल और अरुण जेतली की वकीली जंग जमकर हुई। सिब्बल ने एनडीए सरकार को दोषी ठहराने की पुरानी कोशिश जारी रखी। तो जेतली ने पूछ ही लिया- 2001 की परिस्थितियां 2007 में कैसे दोहराई जा सकतीं? पहले आओ, पहले पाओ की नीति पर सिब्बल लगातार सवाल उठा रहे। ए. राजा को एनडीए की नीति का ही अनुसरण करने वाला बता रहे। सो जेतली ने सिब्बल को याद दिलाया- एनडीए राज के वक्त संचार क्षेत्र में घनत्व बहुत कम था। ओडिशा, पूर्वोत्तर, पूर्वी यूपी जैसे कुछ सर्किलों में तो दो बार टैंडर जारी हुए। पर कोई बोली लगाने वाला नहीं आया। सो पहले आओ, पहले पाओ की नीति अपनाई गई। सचमुच तब और राजा के घोटाले के वक्त के संचार जगत में बहुत फर्क आ चुका था। पर राजा ने तो जानबूझकर 2001 को आधार बना 2007 में कमाल किया। पसंदीदा कंपनियों को फायदा पहुंचाया। पर अपने मीडिया बंधुओं और वकीलों की यही बड़ी कमजोरी। एक बार जो बात कह दी, भले झूठ ही क्यों न हो, आखिरी सांस तक अड़े रहते। सो सिब्बल सब कुछ जानकर भी कुछ समझने को तैयार नहीं। वैसे सिब्बल की मुश्किल, कानूनदां होने के नाते सही साबित करने की चुनौती। आखिर कांग्रेस ने बड़े भरोसे के साथ दो-दो भारी-भरकम मंत्रालय दे रखे। यूपीए की पहली पारी में बड़े बेआबरू वाले हालात में सिब्बल ने राज्यमंत्री का दर्जा कबूला था। सो ओहदा बढ़ा, तो सुर्खियों में रह साबित कर रहे। पर अब वकीलों की दलीलबाजी छोडि़ए। जेपीसी से जनता की उम्मीदें बंधीं। जिसकी खातिर विपक्ष ने संसद का शीत सत्र नहीं चलने दिया। सरकार को घुटने टेकने पड़े। भले दिल बहलाने को कांग्रेस ने लोकतंत्र की थोथी दुहाई दी। संसद को चलाना जरूरी बताया। पर संसद में तो हंगामे का सफर जारी। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विपक्ष की जिद का देश ने समर्थन किया। पर आम बजट के बाद मंगलवार को दोनों सदनों की बैठक शुरू हुई। तो कुछ नए मुद्दों के साथ विपक्ष हंगामे पर उतर आया। जातीय जनगणना के फॉर्मेट, टेलीफोन टेपिंग और सिख विरोधी दंगे के मिले-जुले मुद्दे ने दोपहर तक दोनों सदनों की कार्यवाही ठप करा दी। सचमुच अब संसद में यह परंपरा बन गई। मुद्दा छोटा हो या बड़ा, वैल में कूदकर हंगामा करो। मानो, अपनी बात कहने का सांसदों के पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं। जाति की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दलों ने अपने हिसाब से जातीय गणना कराने को लेकर हंगामा किया। तो अकाली दल ने सिख विरोधी दंगे में नया मुद्दा उठाया। हरियाणा के रिवाड़ी में भी सिखों का नरसंहार हुआ था। पर अब थाने से उसकी एफआईआर गायब हो गई। सो हरियाणा सरकार पर मामले को दबाने का आरोप लगाया। सांसद वैल में आ गए। सो कार्यवाही ठप हो गई। अब जब सिख विरोधी दंगे के मामले में गाहे-ब-गाहे नए खुलासे हो रहे। तो अभी गोधरा-गुजरात दंगे की कई परतें उधडऩी बाकी। साबरमती एक्सप्रेस में गोधरा स्टेशन पर 59 कारसेवकों को जलाने के केस में विशेष अदालत ने मंगलवार को सजा सुना दी। दोषियों में से 11 को फांसी, 20 को उम्रकैद हुई। तो एक पक्ष गदगद हुआ, दूसरे पक्ष ने अपील का एलान कर दिया। यों गोधरा कांड पर अदालती फैसले ने साजिश की बात साबित कर दी। पर इसे आधार बना गुजरात दंगे को जायज नहीं ठहराया जा सकता। क्रिया की प्रतिक्रिया बताकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। सो गुजरात दंगे के मामले में भी अदालती फैसले और पक्षकारों की प्रतिक्रिया का इंतजार। पर सवाल- क्रिया की प्रतिक्रिया के नाम पर क्या दंगे को जायजा ठहराया जा सकता? माना, गोधरा कांड में कुछ कट्टरपंथियों ने साजिश की। पर गुजरात दंगे में साजिश को भी इनकार नहीं किया जा सकता। अगर क्रिया की प्रतिक्रिया आधार बनने लगी, तो लोकतंत्र का क्या होगा? जिस लोकतंत्र की सब दुहाई देते, वह तो अराजक हो जाएगा। पर अपने नेताओं को लोकतंत्र से अधिक कुर्सी की फिक्र। सो संसद का हश्र जनता बखूबी देख रही। लगे हाथ विपक्षी बीजेपी के  चाल, चरित्र, चेहरे का नया रंग भी देख लो। महाराष्ट्र की सत्ता से दूरी में बीजेपी पानी बिन मछली बन चुकी। शायद उद्योगपतियों का चंदा कम हो गया होगा। सो अब बीजेपी उस राज ठाकरे से गठजोड़ करना चाह रही। जिसने प्रांतवाद के नाम पर संविधान के साथ होली खेली। खुद आडवाणी ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे की मुहिम को असंवैधानिक कहा था। पर शिवसेना के एतराज के बाद भी बीजेपी का राज-प्रेम उफान मार रहा। शिवसेना से हामी भराने को हाथ-पैर मार रही। सो लोकतंत्र का पहरुआ किसे कहेंगे आप? भ्रष्टाचारियों को बचाने की हरसंभव कोशिश में जुटे सत्तापक्ष को या संविधान का मखौल उड़ाने वाले राज के साथ पींगें बढ़ाने वाले विपक्ष को?
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01/03/2011

Monday, February 28, 2011

तो चतुर सुजान निकले बाबू मोशाय!

काला जादू तो चला। पर न आंख बंद हुई, न डिब्बा गायब। पिछले साल सिर्फ बिहार में चुनाव था। सो बजट में ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा प्रणव दा ने दादागिरी दिखाई। तो बिहार में सूपड़ासाफ हो गया। पर अबके बंगाल में चुनाव। सो दादा ने आम आदमी से दिल्लगी की। उद्योग जगत को दिखाई दरियादिली। सो उद्योग जगत ने भी दरिया मेें डूब-डूब कर सराहना की। आखिर करे भी क्यों नहीं, प्रणव दा ने अबके सिर्फ जादूगरी दिखाई। बजट को लोक-लुभावन और खजाने के बीच तालमेल बिठाने वाला बनाया। टेक्स ढांचा हर बजट के लिए रीढ़ की हड्डी। सो एक तरफ आम करदाताओं की टेक्स छूट सीमा बढ़ाकर 1.80 लाख की। तो महिलाओं का अलग स्लैब ही खत्म कर दिया। बुजुर्गों को मिलने वाली राहत में भी चतुराई दिखाई। अस्सी पार के बुजुर्गों की नई कैटेगरी बना अति वरिष्ठ कहा। वरिष्ठ नागरिकों की उम्र सीमा घटा साठ साल कर दी। पर छूट के नाम पर दस हजार का ठेंगा थमा दिया। अति वरिष्ठों की छूट पांच लाख कर वाहवाही लूटी। पर आंकड़ों का गोल-मोल देखिए। टेक्स देने वाले अति वरिष्ठों की संख्या एक फीसदी भी नहीं होगी। यानी प्रणव दा ने इस हाथ से छूट दी, उस हाथ से खजाना भर लिया। सो महिलाओं में नाराजगी लाजिमी। सुषमा स्वराज से लेकर गिरिजा व्यास तक खफा दिखीं। दादा के बजट में महंगाई की फिक्र तो थी। पर नहीं था निपटने का उपाय। पिछले कुछ साल में हर मध्यम वर्गीय गृहिणी का किचिन कॉस्ट ढाई से तीन हजार रुपए महीना बढ़ गया। पर दादा ने मध्यम वर्गीय महिलाओं से विशेष टेक्स छूट छीन ली। सो महिलाओं की टेक्स छूट जस की तस रही। यानी महज सालाना दो हजार। अब कोई पूछे- टेक्स सीमा के मुताबिक मिडिल क्लास की मासिक आय हुई 15 हजार रुपए। तो क्या दिल्ली जैसे महानगर में इस वेतन से परिवार का सहज भरण-पोषण संभव? यों आंगनबाड़ी की महिलाओं को दादा ने निहाल कर दिया। सेविका-सहायिका दोनों के वेतन पहली अप्रैल से दुगुने हो जाएंगे। सेल्फ हैल्प ग्रुप बना 500 करोड़ का फंड भी तय कर दिया। सो दादा के बजट से गांव की महिलाओं में खुशी, तो शहरी महिलाओं में गम। अब जरा गरीबों की फिक्र में बजट का हाल देखिए। सरकार की मजबूरी आवंटन में साफ हो गई। पिछली दफा जोर-जोर से मनरेगा का आवंटन बता रहे थे कांग्रेसी। पर अबके सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी सारी परियोजनाओं का एकमुश्त आवंटन हुआ, जो पिछले बजट से 17 फीसदी अधिक। भारत निर्माण में भी एकमुश्त आवंटन कर 48 से 58 हजार करोड़ कर दिया। सामाजिक क्षेत्र के आवंटन में सोनिया गांधी की महत्वाकांक्षी योजना राइट टू फूड भी शामिल। इसी साल राइट टू फूड को संसद से पारित करा लागू करने का एलान। सो बजट में 17 फीसदी बढ़ोतरी और सरकारी खजाने की मजबूरी का अंदाजा लगा लीजिए। यों महंगाई की मदद से बढ़ी विकास दर की खुशी भी छलकी। राजकोषीय घाटा 5.5 से घटकर 5.1 फीसदी होने पर दादा गदगद दिखे। एफआरबीएम एक्ट में संशोधन कर इसे और कम करने का दावा किया। पर महंगाई की मार झेल रही आम जनता का घाटा कैसे कम हो, बजट में कुछ नहीं। अलबत्ता प्रणव दा ने पिछले साल भी बजट भाषण में इंद्र देवता के सामने हाथ फैलाए थे। अबके भी उन ने पिछले साल की तरह इंद्र की कृपा मांगी। यानी महंगाई फिर इंद्र के भरोसे। पर जब पिछले साल इंद्र मेहरबान हुए, तो महंगाई कम क्यों नहीं हुई? प्रणव दा ने इंद्र से मानसूनी वर्षा का वरदान मांगा। तो धन की देवी लक्ष्मी से भी अरज लगाई। यानी मानसून के सहारे महंगाई रोकने की उम्मीद। तो विकास के लिए लक्ष्मी से प्रार्थना। पर महज मानसूनी बारिश से क्या होगा, गर किसानों को सहूलियत न मिले। सो दादा ने किसानों के साथ भी आंकड़ों के खूब करतब दिखाए। किसानों के लिए कर्ज लक्ष्य की सीमा 3,75,000 करोड़ से बढ़ाकर 4,75,000 करोड़ कर दी। पर जब राधा ही न नाचे, तो नौ मन तेल का क्या होगा? किसानों को दस्तावेज की आड़ में कभी आसानी से कर्ज मिलते ही नहीं। सो लिमिट बढ़ाकर पूरा बजट ही रख दो, क्या हो जाएगा? बैंकों के पास किसानों के लिए हुआ आवंटन यों ही पड़ा रहेगा। अब किसान कर्ज की ब्याज दर को सात फीसदी बरकरार रखा गया। पर समय पर कर्ज अदा करने वाले किसान को सात की बजाए चार फीसदी ही ब्याज देना होगा। अब कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति के लिए ऊंट के मुंह में जीरा के समान 400 करोड़ दिए। कृषि क्षेत्र में समुचित विकास का बजट 37,500 से बढ़ाकर 47,500 करोड़ कर दिया। पर आप आंकड़ों का पुराना खाक देख लो। कृषि मद के करीबन 90 फीसदी पैसे कृषि आधारित उद्योग में खप जाते। सो कैसे होगी कृषि आत्मनिर्भरता? अब प्रणव के बजट में इस साल किसानों को कितना मिला, यह देखना होगा। यों पेंशन में भी नई कैटेगरी बना दादा ने राहत दी। पर कुल मिलाकर काला धन हो या महंगाई, भ्रष्टाचार हो या सब्सिडी, तस्वीर साफ नहीं। कैरोसिन, एलपीजी, खाद पर सब्सिडी के बदले मार्च 2012 से कैश मिलेगा। तो क्या बाकी देश में एलपीजी की सब्सिडी खत्म होगी? यानी पूरे बजट में आम आदमी, गरीब और गांव से जुड़े मुद्दों पर खूब चिंता जताई। उद्योग जगत को वाहवाह कर दिया। मंदी से उबरने के बावजूद 2008 से मिल रही उद्योग जगत की छूट को दादा ने कंटीन्यू कर दिया। अरबपति देश में बढ़ गए। पर बजट की चपेट में कोई उद्योगपति नहीं, ना ही कोई नया कर। सो सोचिए, अब अगर पेट्रोल की कीमतें बढ़ी, तो महंगाई पर भविष्यवाणी का क्या होगा?
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28/02/2011

 

Friday, February 25, 2011

तो बदहाल रेलवे का बेहाल बजट

रेत की इमारत आखिर कब तक बुलंदी को छुएगी। लालू यादव ने चिकनी-चुपड़ी चकल्लसबाजी खूब की। तो शीशे की चमक में सब चौंधिया गए। लालू इतने मशहूर हुए, हार्वर्ड तक मैनेजमेंट का पाठ पढ़ा आए। पर राज छिना, तो लालू के काज की पोल भी खुल गई। ममता बनर्जी ने व्हाइट पेपर लाकर रेलवे का बदरंग चेहरा देश को दिखा दिया। पर 90 के दशक से भला कौन रेल मंत्री देश की सोच बजट पेश करता? हर रेल मंत्री ने रेलवे को चुनावी हथकंडा ही बनाया। सो शुक्रवार को ममता बनर्जी यूपीए राज का तीसरा रेल बजट पेश करने पहुंचीं। तो बजट से पहले बंगाल चुनाव का प्रोमो प्रणव दा ने ही दिखा दिया। लोकसभा में अपने किरोड़ीलाल मीणा ने ब्लैकमनी पर पूरक सवाल पूछा। तो कुछ टीका-टिप्पणी के बाद प्रणव दा आग-बबूला हो उठे। वामपंथियों को निशाने पर ले लिया। बोले- ब्लैकमनी वालों की लिस्ट में एक वामपंथी नेता का भी नाम। पर बताऊंगा नहीं। सो हंगामा मचा। फिर प्रणव दा ने माफी मांग ली। पर बंगाल चुनाव में वामपंथी किला उखाडऩे का बीड़ा प्रणव-ममता ने उठा रखा। सो प्रणव के प्रोमो के बाद ममता ने बजट पेश किया। तो देश को दुलार मिला, सारी ममता बंगाल पर उड़ेल दी। यों बजट में 88 एक्सप्रेस ट्रेनों का एलान। न यात्री किराया बढ़ाया, न माल-भाड़ा। पर रियायतों का पिटारा भी खूब खोला। विकलांगों और कीर्ति-शौर्य चक्र विजेताओं को अब राजधानी-शताब्दी में छूट। अपने पत्रकारों को अब साल में दो बार बीवी संग बाहर जाने में छूट। पुरुष सीनियर सिटीजन की छूट भी 30 से 40 फीसदी हो गई। महिला सीनियर सिटीजन की उम्र अब 58 होगी। पर बात ममता के बंगाल प्रेम की। तो इसमें कुछ नया नहीं दिखा। ममता ने भी वही किया, जो हर रेल मंत्री करता आ रहा। इस बार से अधिक तो ममता पिछले बजट में बंगाल को दे चुकीं। पिछले साल 54 नई ट्रेनों में से 28 बंगाल के खाते में गई थीं। मल्टी फंक्शनल कांप्लेक्स 93 में से आधा दर्जन बंगाल को दिए थे। विश्व स्तरीय दस स्टेशन में दो बंगाल से थे। टेगोर जयंती के नाम पर हावड़ा-बोलपुर में म्यूजियम, संगीत अकादमी, सांस्कृतिक परिसर आदि-आदि कई योजनाओं के जरिए ममता ने बंगाल चुनाव की बिसात बिछा दी थी। अबके तो उन ने थोड़ा कम किया। पर जितना किया, उसमें भी बंगाल ही अव्वल। वैसे रेलवे की हालत खस्ता। सो बजट में कुछ नया या उत्साहवर्धक नहीं दिखा। बंगाल के दार्जिलिंग में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, सिंगूर में कोच फैक्ट्री, सियालदाह में सुखी गृह योजना, नए यात्री टर्मिनल, हावड़ा राजधानी एक्सप्रेस में इंटरनेट सुविधा, खडग़पुर में प्रशिक्षण केंद्र, कोलकाता मैट्रो में 34 नई सेवाएं, कोलकाता रेल विकास निगम की स्थापना, कोलकाता क्षेत्र में 50 नई लोकल सेवा, गुरु रवींद्रनाथ टेगोर की याद में चार कवि गुरु ट्रेन, कोलकाता में परियोजना क्रियान्वयन के लिए एक केंद्रीय संगठन की सौगात ममता ने दी। कुल 36 ट्रेनें, 32 परियोजनाएं और 14 मल्टी फंक्शनल कांप्लेक्स बंगाल गए। सो लोकसभा में जमकर हंगामा मचा। हालात ऐसे बन गए, मानो, बिहार और बंगाल के ममतावादी सांसद अब भिड़े-तब भिड़े। संसदीय कार्यमंत्री को दखल देना पड़ा। सो ममता भी सदन में तमतमा उठीं। गुस्से में यहां तक कह दिया- बिहार को हिंदुस्तान बना दो। सदन में ही पूछ लिया- जब मैंने बजट में मणिपुर-केरल का नाम लिया, तो क्यों नहीं चिल्लाए? बंगाल के नाम पर क्यों चिल्लाते हो। मैं अपने राज्य के लिए करूंगी और पूरे देश के लिए करूंगी। यानी ममता ने इशारों में ही कबूल लिया- जो ट्रैंड चला, वह भी दोहरा रहीं। सो सचमुच ममता चुनावी दूरंतो पर सवार होकर रायटर्स बिल्डिंग के सफर को निकल पड़ीं। रायटर्स बिल्डिंग में रेल का यार्ड तो ममता ने पिछले बजट में ही तैयार कर दिया था। सो अब ममता भले रायटर्स बिल्डिंग जाने की तैयारी करें। पर रेलवे का चुनावी दोहन कब तक चलेगा? खुद ममता ने बजट में माना- ऑपरेटिंग रेश्यो 84 फीसदी। टेक्स फ्री बॉंड के जरिए पैसा जुटाने की कोशिश होगी। पर जब 1924 में अंग्रेजों ने अलग से रेल बजट की व्यवस्था शुरू की। तो मकसद था- रेलवे इतना बड़ा उद्योग, जो अपने आप में सक्षम। पर आज हालात ऐसे हो चुके, हर साल बजटीय सहायता की जरूरत हो रही। बाजार से ब्याज पर कर्ज लिए जा रहे। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की मुहिम सिरे नहीं चढ़ रही। रेलवे का प्रोजैक्ट टाइम बाउंड नहीं। सो प्राइवेट लोग जोखिम नहीं ले रहे। खुद ममता के पिछले और ताजा बजट का फर्क देखिए। विश्व स्तरीय स्टेशन का बनना तो दूर, कागजी ढांचा भी नहीं बन सका। आदर्श स्टेशन अभी भी पूरे नहीं हुए। टक्कर रोधी उपकरण लगाने की बात कोंकण रेलवे के समय से हर बजट में होती आ रही। पर उपकरण इतना महंगा, कोई मंत्री अमल का साहस नहीं दिखाता। यों ममता इस उपकरण को लगाने का दावा कर रहीं। पर फिर वही कमजोरी, रेलवे में कोई टाइम बाउंड प्रोग्राम नहीं। रेलवे का विकास नहीं हो रहा। पर बजट के जरिए लोक-लुभावन घोषणाएं खूब होतीं। अबके भी ममता ने कुल सौ से भी अधिक ट्रेन का एलान किया। पर रेलवे का लदान घट रहा। नई पटरियां नहीं। सो जब यात्री ट्रेनें चलेंगी, तो माल ढुलाई का अनुपात और घटेगा। अब कोई पूछे- क्या इसी ढर्रे पर रेलवे का कायाकल्प होगा? ममता ने पिछली बार भी लता मंगेशकर के गाए गीत- जरा याद करो कुर्बानी, को बजट भाषण में जोड़ा। अबके भी वही दोहराया। पर सवाल- खस्ता हाल रेलवे कब तक चुनावी पटरी पर दौड़ेगी। सो शुक्रवार को जब ममता ने बजट पेश किया। तो बदहाल रेलवे का बेहाल बजट ही दिखा।
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25/02/2011

Thursday, February 24, 2011

तो क्या पक्ष-विपक्ष में बैठने से बदलती सोच?

कुछ ऐसे भी मंजर हैं तारीख की नजरों में, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई है। आखिर मनमोहन की जुबां से दर्द फिर छलक ही पड़ा। तीन महीने के गतिरोध के बाद संसद में बहाल हुई शांति का सुकून भी दिखा। पर शायरी में लम्हा किसके लिए और सदियां किसके लिए? कहीं पीएम का मतलब यह तो नहीं- गठबंधन की मजबूरी का फायदा उठा राजा ने खता की। सजा कांग्रेस को भुगतनी पड़ रही? यों कांग्रेस गाहे-ब-गाहे यही साबित करने में जुटी। सो गुरुवार को लोकसभा में जेपीसी का औपचारिक प्रस्ताव आया। तो टर्म एंड रेफरेंस की आड़ में झुनझुना थमा दिया। लोकसभा से जेपीसी के 20 मेंबरों के नाम का एलान हो गया। अब राज्यसभा दस नामों का एलान करेगी। पर जेपीसी को सिर्फ टेलीकॉम लाइसेंस तक सिमटा दिया। यों स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ी की जांच अब 1998 से होगी। सो जेपीसी पर राजनीतिक तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। लोकसभा में प्रणव दा ने प्रस्ताव पेश किया। तो जेपीसी के गठन के पीछे ईमानदार सोच नदारद। अलबत्ता उन ने भी वही राग अलापा, जो पीएम ने कहा था। जेपीसी का गठन सिर्फ इसलिए, क्योंकि संसद की कार्यवाही चल सके। सो प्रणव दा ने विपक्ष को खूब खरी-खोटी सुनाईं। दलील दी- 543 के सदन में 20, 50 या 200 सांसदों की ओर से संसद को बंधक बनाने का क्या मतलब? संसद को ठप करना लोकतंत्र को मजबूत बनाना नहीं। हमें संविधान के प्रति अपनी शपथ को याद रखना होगा। उन ने पाकिस्तान के मिलिट्री रूल की भी याद दिलाई। कैसे दस अक्टूबर 1958 को पाकिस्तान मार्शल लॉ का शिकार हुआ। चार दिन में तीन पीएम बने, सदन का उपाध्यक्ष सदन में ही मार दिया गया। फिर संसदीय संस्थाओं के प्रति नफरत की भावना पैदा हुई और आखिरकार उसकी जगह एक संविधानेत्तर संस्था ने ली। यों प्रणव दा ने भारत में ऐसे हालात को बेमानी बताया। पर क्या यह एक अडिय़ल सरकार की विपक्ष और देश की जनता को धमकी नहीं? आखिर भ्रष्टाचार पर जेपीसी के गठन में मिलिट्री रूल जैसे उदाहरण की क्या जरूरत थी? यही प्रणव दा कुछ हफ्ते पहले विपक्ष की जेपीसी की मांग को माओवादी हरकत करार दे चुके। सो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भी सरकार को घेरने में कसर नहीं छोड़ी। पीएम को आत्मचिंतन की सलाह दी। कहा- अगर जेपीसी की मांग करना माओवाद, तो विपक्ष में रहते कांग्रेस भी ऐसा कर चुकी। सो सदन में जमकर नोंकझोंक हुई। सुषमा ने गुस्से में 2001 के हंगामे का रिकार्ड मार्शल के हाथ बंसल को भिजवा दिया। बोलीं- जिनके घर शीशे के हों, दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकते। सचमुच भ्रष्टाचार के इस हमाम में सब एक जैसे। भ्रष्टाचार पर किसी भी सरकार का रुख ईमानदार नहीं रहा। इंदिरा राज में भ्रष्टाचार का मुद्दा गूंजा। जेपी आंदोलन ने देश की राजनीति को नया मुकाम दिया। तब इंदिरा ने भ्रष्टाचार को वैश्विक मुद्दा करार दिया। यही हाल राजीव गांधी के शासन में भी। यही हाल वाजपेयी राज में भी। तहलका कांड और ताबूत घोटाले पर एनडीए ने विपक्षी कांग्रेस को कितनी तवज्जो दी? जार्ज फर्नांडिस का इस्तीफा लिया। पर रपट आने से पहले मंत्री बना दिया। तब एनडीए ने जेपीसी की मांग नहीं मानी। प्रणव मुखर्जी ने विपक्ष को याद दिलाया। कैसे तबके विधि मंत्री अरुण जेतली ने कहा था- जेपीसी जांच नहीं हो सकती। इस मुद्दे पर सदन में चर्चा कराना अधिक महत्वपूर्ण। बकौल प्रणव दा, कांग्रेस भी अबके पहले सदन में बहस चाहती थी, फिर कोई फैसला। यों प्रणव दा की यह दलील डैमेज कंट्रोल की कवायद। पर उन ने बीजेपी को सही याद दिलाई। पर सुषमा ने पेप्सी-कोला में पेस्टीसाइड के मुद्दे पर गठित जेपीसी की नजीर दी। कहा- मैंने दो घंटे में जेपीसी मान ली थी। विपक्ष के सदस्य शरद पवार को अध्यक्ष बनाया था। पर सुषमा भूल रहीं, पेप्सी-कोला विवाद राजनीतिक मुद्दा नहीं था। सो जब कपिल सिब्बल ने बहस में हिस्सा लिया। तो मुंह खोलते ही पहले मुंह की खा गए। सुषमा को झूठी साबित करने की कोशिश की। पर फौरन सॉरी बोल शब्द वापस लेने पड़े। फिर भी सिब्बल हमले से बाज नहीं आए। पहले तो स्पेक्ट्रम घोटाले में जीरो नुकसान का राग अलापा। हंगामा हुआ, तो बैठ गए। पर सदन में विपक्षी सांसदों ने पूछ ही लिया- जब कोई नुकसान नहीं हुआ। तो जेपीसी का क्या मतलब? यों सिब्बल ने बीजेपी को याद दिलाया, कैसे तहलका कांड के वक्त पीएम वाजपेयी ने देश के नाम संदेश दिया। तो कहा था- संसद ही सही फोरम, जहां चर्चा हो सकती। पर विपक्ष हंगामा कर सदन रोक रहा। सचमुच विपक्ष और सत्तापक्ष में रहते राजनीतिक दलों की सोच बदल जाती। सत्ताधारी तानाशाही तेवर दिखाते। तो विपक्ष भी हाईजैक करने की फिराक में रहता। सुषमा ने तो खुद कबूला- जब-जब भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा, तबकी विपक्ष ने जेपीसी की मांग की। अबके माहौल बना, कांग्रेस मजबूर हुई। तो कांग्रेसियों के चेहरों पर खिन्नता साफ झलक रही। प्रणव का सैन्य शासन का भय दिखाना। पक्ष-विपक्ष की वही लड़ाई- तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे। सो बीजेपी ने पीएम को मंथन की सलाह दी। पर जब खुद का इतिहास दिखाया गया। तो तिलमिला उठी।
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24/02/2011

Wednesday, February 23, 2011

अफजल की याचिका बता रही कसाब का भविष्य

तो तीस मेंबरी जेपीसी का खाका तय हो गया। अध्यक्ष समेत कांग्रेस के दर्जन तो बीजेपी के आधा दर्जन मेंबर होंगे। लेफ्ट, बीएसपी, जेडीयू, डीएमके के दो-दो। सपा, अन्ना द्रमुक, तृणमूल, बीजद, एनसीपी के एक-एक मेंबर होंगे। बीजेपी अपने आधा दर्जन में से ही एनडीए का भी पेट भरेगी। बीजेपी ने अपने कोटे के छह में से पांच नामों का एलान कर दिया। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, हरेन पाठक लोकसभा से। तो एस.एस. आहलूवालिया और रविशंकर प्रसाद राज्यसभा से जेपीसी में होंगे। छठी सीट बीजेपी ने शिवसेना को दे दी। अब गुरुवार को कपिल सिब्बल प्रस्ताव लाएंगे। तो बहस में नोंकझोंक भी जमकर होगी। पर गतिरोध का औपचारिक पटाक्षेप हो जाएगा। फिर जेपीसी की जांच सुर्खियों में रहेगी। सो बात संसद के बजट सत्र की। गतिरोध टूटा, तो संसद फिर अपनी रौ में लौट आया। गुरुवार को तेलंगाना ने तीन बार लोकसभा की कार्यवाही ठप कराई। तेलंगाना को लेकर हंगामे में टीआरएस ही नहीं, कांग्रेसी सांसद भी आगे। सो सुषमा स्वराज ने टीआरएस के प्रति खूब सहानुभूति जताई। लोकसभा में उन ने पीएम से अपील की- इसी सत्र में बिल लाने का भरोसा दे दें। पर दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता। सो कांग्रेस हड़बड़ी से बच रही। पर तेलंगाना से जुड़े कांग्रेसी सांसदों ने अब खम ठोक दिया- तेलंगाना की हमारी मांग पूरी नहीं हुई, तो हम संसद भवन परिसर में ही आत्महत्या कर लेंगे। सो कांग्रेस अपने सांसदों को मनाएगी या तेलंगाना की मांग मानेगी, यह अभी देखना होगा। पर गुरुवार को धन्यवाद प्रस्ताव की बहस में शरद यादव ने भ्रष्टाचार को अफीम बता सरकार की खूब बखिया उधेड़ी। तो कांग्रेसियों ने कर्नाटक का सुर्रा छोड़ दिया। पर असली नोंकझोंक राज्यसभा में हुई। पहला सवाल संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की दया याचिका से जुड़ा था। सो विपक्षी सूरमाओं ने होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम को घेरने की कोशिश की। पर चालाक चिदंबरम चतुराई दिखा गए। उन ने साफ कह दिया- बतौर गृहमंत्री उन ने दया याचिकाओं के निपटान में कोई देरी नहीं की। पर चिदंबरम पुरानी देरी और अफजल की याचिका के भविष्य का कोई समयबद्ध भरोसा नहीं दे सके। तो शिवसेना के मनोहर जोशी ने आरोप मढ़ दिया- अल्पसंख्यक समुदाय का होने की वजह से अफजल गुरु की दया याचिका पर फैसले में देरी की जा रही। जोशी के इस आरोप से सत्तापक्ष ही नहीं, वामपंथी भी भडक़ गए। पर चिदंबरम ने सफाई दी- दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजते समय धर्म-जाति या संप्रदाय के बारे में नहीं सोचता। मैं किसी भय, पक्षपात, पूर्वाग्रह और भेदभाव के बिना अपना काम करता हूं। उन ने विपक्ष को कोई ठोस जवाब देने के बजाए अपनी पीठ जमकर ठोकी। चिदंबरम ने याद दिलाया कि कैसे एनडीए काल में 14 याचिकाएं आईं और यूपीए-वन में उनके गृहमंत्री बनने से पहले 14 केस आए। यानी कुल 28 केस में सिर्फ दो का निपटान हुआ। जबकि उनके गृहमंत्री रहते 13 केस आए, जिनमें सात का निपटारा हो चुका। चिदंबरम ने बाकायदा स्ट्राइक रेट बताया। जिसके मुताबिक एनडीए ने 14 में एक भी केस नहीं सुलझाया। शिवराज पाटिल ने 28 में दो सुलझाए। और खुद उन ने 13 में सात केस। यानी चिदंबरम का दावा- उनका स्ट्राइक रेट पचास फीसदी के करीब। चिदंबरम ने इस बात से भी इनकार कर दिया कि दया याचिकाओं के निपटान को समय सीमा में बांधने के लिए कोई संविधान संशोधन होगा। सो अब सवाल- क्या आतंकवादियों की याचिका भी कतार से ही सुनी जाएगी? क्या स्ट्राइक रेट उम्दा होने से अफजल जैसे आतंकियों को और वक्त दिया जाए? गृहमंत्री ने बेहिचक कह दिया- अफजल का फैसला कतार से ही होगा। अभी मामला गृह मंत्रालय में लंबित। सो मंत्रालय से राष्ट्रपति के पास जाने और वहां कितना वक्त लगेगा, यह नहीं कह सकते। उन ने इशारा कर दिया- दया याचिका के निपटान में सबसे कम 18 दिन, तो सबसे अधिक 11 साल 11 महीने 18 दिन का रिकार्ड। अफजल की याचिका को तो अभी साढ़े पांच साल ही हुए। अगर अभी भी सरकार ऐसी दलील दे रही। तो मुंबई हमले के दोषी कसाब का क्या होगा? कसाब ने तो सुप्रीम कोर्ट जाने का इरादा जता दिया। सो अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी। तो कसाब राष्ट्रपति के सामने भी जाएगा। यानी दया याचिकाओं का ऐसे ही निपटान होता रहा। तो मुंबई में मौत का तांडव करने वाला कसाब अभी एक दशक और भारत का अनाज तोड़ेगा। वैसे भी ताजा 25 दया याचिकाओं की सूची में अफजल का नंबर अठारहवां। सो राम जेठमलानी ने सरकार को याद दिलाया- सुप्रीम कोर्ट तय कर चुका कि किसी दोषी की सजा के अमल में दो साल से अधिक की देरी हो। तो मानसिक यातना को आधार बना सजा में बदलाव किया जा सकता। यानी अफजल अपनी दया याचिका के निपटान से पहले भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा दे। तो राहत मिलने के पूरे आसार। तब सरकार क्या कहेगी? चिदंबरम ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया- देरी उनके या मंत्रालय के स्तर पर नहीं हुई। अफजल की याचिका पर दिल्ली सरकार ने देर की। पर सवाल- दिल्ली के उपराज्यपाल ने तो जून 2010 में ही गृह मंत्रालय को फाइल भेज दी। फिर सात महीने से गृह मंत्रालय क्या कर रहा? सरकार शायद भूल रही, जब मुंबई हमले के बाद जनता सडक़ों पर उतरी। तो राजनेताओं की सांसें अटक गई थीं।
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23/02/2011

 

Tuesday, February 22, 2011

जेपीसी हो या गोधरा: रस्सी जल गई, बल नहीं गया

रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया। मनमोहन सरकार की अकड़ जेपीसी का एलान करने में भी दिख गई। पीएम ने संसद के दोनों सदनों में बयान पढ़ जेपीसी का इरादा जताया। पर जरा इरादे की नेकनीयती भी देख लीजिए। बकौल पीएम, संसद को पंगु बनाना देश बर्दाश्त नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार का जड़ से खात्मा सरकार की प्रतिबद्धता। सो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग में सीबीआई कर रही। संसद की पीएसी मामला देख रही। जस्टिस शिवराज पाटिल कमेटी की जांच रपट आ चुकी। सरकार ने सभी प्रभावशाली कदम उठाए। ताकि विपक्ष को जेपीसी पर जोर न देने के लिए मना लिया जाए। पर सफलता नहीं मिली। अब अगर बजट सत्र भी विपक्ष नहीं चलने देता। तो लोकतंत्र के हित में नहीं होता। सो हम विशेष परिस्थितियों में जेपीसी गठन को राजी हो रहे। यानी पीएम के बयान का एक पंक्ति में निचोड़- लोकतंत्र बचाने को झुकी सरकार। यों दिल बहलाने को मनमोहन-ए-खयाल अच्छा है। पर सवाल- हुजूर लोकतंत्र की याद आने में इतनी देर क्यों लगी? शीत सत्र में क्या लोकतंत्र टूर पर था? असलियत तो मनमोहन ही नहीं, पूरी कांग्रेस जानती। टू-जी घोटाले में जब राजा का बाजा बज गया। सीबीआई ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। नए टेलीकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल ने बचाव के तमाम पैंतरे आजमाए। पर खुद की सांस उखड़ गई। सुप्रीम कोर्ट से लेकर समूचे विपक्ष ने हमले की धार बरकरार रखी। तो लोकतंत्र याद आने लगा। पहले मनमोहन और कांग्रेस ने लोकतंत्र को बपौती समझ चलाना चाहा। पर बात नहीं जमी, तो लोकतंत्र की दुहाई दे रहे। अगर लोकतंत्र की दुहाई, तो साथ में विपक्ष की जिद के आगे मजबूर होने का राग क्यों? आखिर शीत सत्र में ऐसी क्या जिद, जो जेपीसी नहीं मानी? सचमुच शुरुआत में कांग्रेस और सरकार ने राजा को जमकर बचाया था। बचाने में हाल तक कपिल सिब्बल भी लगे रहे। जिन ने तो घोटाले को ही झुठला दिया। पर जब मिस्र की जनता ने सडक़ों पर उतर लोकतंत्र की अलख जगाई। अपने देश की जनभावना में मिस्र जैसा उबाल नहीं। पर जुबां और आंखें मिस्र के आंदोलन की दुहाई देते दिखे। सो मनमोहन को लोकतंत्र दिख गया। अब देर से ही सही, मनमोहन सरकार दुरुस्त आई। तो लोकसभा में सुषमा स्वराज ने स्वागत किया। बोलीं- जेपीसी का गठन सत्तापक्ष या विपक्ष की जय-पराजय नहीं, अलबत्ता लोकतंत्र की जीत। पर राज्यसभा में अरुण जेतली ने पीएम के बयान को खेदजनक करार दिया। यों गुरुदास दासगुप्त और मुलायम सिंह ने सही फरमाया। दासगुप्त बोले- जेपीसी गठन पर सरकार आभार या बधाई की पात्र नहीं। सरकार की बुद्धि जागी, सो अपना फर्ज निभाया। मुलायम ने तो पीएम से कह दिया- आपको न खुदा मिला, न बिसाल-ए-सनम। शीत सत्र में जेपीसी बना लेते, तो जनता में गलत संदेश न जाता। पर अब तो जनता भी जान गई, सरकार भ्रष्टाचार दबाना चाह रही। यों सत्ता के नशे में भला जनता की फिक्र कौन सी सरकार करती। वोट बैंक की राजनीति ही पार्टियों का एजंडा। तभी तो मंगलवार को ही यूपी विधानसभा के मुद्दे पर माया-मुलायमवादी लोकसभा में भिड़ गए। पर बात कांग्रेसी अकड़ की। तो मंगलवार को जेपीसी का एलान करना ही पड़ा। गुजरात की स्पेशल कोर्ट ने कांग्रेसी सेक्युलरिज्म की हवा निकाल दी। गोधरा कांड पर नौ साल बाद फैसला आया। तो साबित हो गया, साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में साजिश के तहत आग लगाई गई। यों अदालत ने 63 आरोपियों को बरी कर दिया। जबकि 31 को साजिश का दोषी पाया। सो तीस्ता सीतलवाड़ जैसे एक्टिविस्टों को सांप सूंघ गया। कांग्रेस, कानून मंत्री वीरप्पा मोइली, पी. चिदंबरम, सलमान खुर्शीद जैसों ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी। जबकि बीजेपी की तो बांछें खिल गईं। सचमुच गोधरा कांड और उसके बाद हुए गुजरात दंगों पर खूब राजनीति हुई। बतौर रेल मंत्री लालू यादव ने जस्टिस यू.सी. बनर्जी कमेटी बनाई। तो बनर्जी ने लालू के मनमाफिक रपट दी। साबरमती ट्रेन अग्निकांड दुर्घटना करार दे दिया। पूरी थ्योरी गढ़ दी- कैसे एस-6 कोच में बैठे कारसेवकों ने स्टोव जलाया और आग लग गई। जिसमें 59 कार सेवक मारे गए। यों गुजरात हाईकोर्ट ने पहले बनर्जी रपट पर रोक लगाई। फिर कमेटी के गठन को असंवैधानिक ठहरा दिया। अब जब विशेष अदालत ने भले 63 को बरी कर दिया। पर साजिश की बात साबित हो गई। अब इसमें कोई बदलाव की संभावना नहीं, भले कुछ और आरोपी छूट जाएं। पर मंगलवार को विशेष अदालत के फैसले के बाद भी खास संप्रदाय की बात को सेक्युलरिज्म मानने वाले यही साबित करने में जुटे रहे। कोर्ट ने 63 लोगों को बरी कर दिया। नरेंद्र मोदी सरकार ने लोगों को टार्गेट किया था। पर मुंबई हमले के केस में भी तो कई रिहा हुए। फिर भी साजिश की बात कबूलने में झोला छाप वाले हिचकिचाते दिखे। पुलिस जांच में कई बार निर्दोष पकड़े जाते। पर विशेष अदालत का फैसला उन लोगों के लिए सबक, जो सेक्युलरिज्म को एक विशेष समुदाय से जोडक़र जस्टिफाई करने में लगे रहते। कांग्रेसी दिग्विजय सिंह का बटला राग भी इसी कड़ी में। अब चाहे ऊपरी अदालत में दोषी छूटे या सजा पर मुहर लगे, यह अलग बात। पर गुजरात की स्पेशल कोर्ट का फैसला छद्म धर्मनिरपेक्षता के मुंह पर करारा तमाचा। यानी मंगलवार को जेपीसी हो या गोधरा का फैसला, बात वही- रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया।
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22/02/2011

Monday, February 21, 2011

जेपीसी मानी, पर सब कुछ लुटाने के बाद

आतंकी कसाब की फांसी हाईकोर्ट से कनफर्म हो गई। तो इधर संसद की उलझी डोर भी सुलझ गई। सो अब इसे जूते और प्याज खाना कहें या लौट कर बुद्धू घर को आया, यह आप ही तय करें। पर सरकार अब जेपीसी को राजी। मंगलवार को खुद पीएम मनमोहन जेपीसी का इरादा जताएंगे। फिर गुरुवार को दोपहर दो बजे टेलीकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल मोशन लाएंगे। जिसमें सभी मेंबरों के नाम और टर्म एंड रेफरेंस भी होंगे। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की मीटिंग में जेपीसी पर बहस के लिए चार घंटे का वक्त तय हो गया। सो सवाल- जब जेपीसी माननी ही थी, तो शीत सत्र हंगामे में व्यर्थ क्यों जाने दिया। कांग्रेस और सरकार के तमाम दांव धरे रह गए। अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की चौतरफा जांच हो रही। सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग में सीबीआई, तो पीएसी भी जांच कर रही। जस्टिस शिवराज पाटिल कमेटी अपनी जांच पूरी कर चुकी। यानी तमाम हथकंडों के बावजूद अब जेपीसी माननी ही पड़ी। सो अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की सारी जांच एक साथ चलेगी। पर कांग्रेस अब भी न तुम जीते, न हम हारे वाले अंदाज में इतरा रही। जेपीसी पर दोनों पक्षों में सहमति बन चुकी। पर कांग्रेस कह रही- अभी तक जेपीसी का एलान नहीं हुआ, सो टिप्पणी नहीं। यों दिल बहलाने को गालिब-ए-खयाल अच्छा। पर शीत सत्र से अब तक कांग्रेस अपनी फजीहत खूब करा चुकी। घोटालों पर बचाव के हर पेंतरा उलटा पड़ा। ए. राजा अपने राजदारों समेत गिरफ्तार हुए। नए-नवेले संचार मंत्री कपिल सिब्बल की काबिलियत भी धरी रह गई। पहले तो उन ने घोटाले को निल बता दिया। फिर ठीकरा ट्राई और एनडीए सरकार के सिर फोड़ा। सीएजी के गणित पर भी उंगली उठाई। पर सिब्बल की वकालत भी नहीं चली। उलटा सुप्रीम कोर्ट से फटकार मिली। पीएसी ने भी आंखें दिखा स्पीकर से शिकायत कर दी। फिर हाल ही में पीएम ने टीवी संपादकों के जरिए मोर्चा संभाला। पर गठबंधन की मजबूरी के राग ने पीएम को और कमजोर साबित कर दिया। सो अब कांग्रेस और सरकार जेपीसी को राजी। तो सवाल- सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। दिन में गर चिराग जलाया, तो क्या किया? अगर कांग्रेस शीत सत्र में ही जेपीसी को राजी हो जाती। तो सुप्रीम कोर्ट मॉनीटरिंग वाली सीबीआई जांच का झमेला न होता। पर अब जेपीसी का एलान होने जा रहा। तो काबीना मंत्री दलील दे रहे- अब बाकी जांच के कोई मायने नहीं। पर हकीकत इसके उलट। सो कहीं कई जांच के चक्कर में निचोड़ देश को घनचक्कर न बना दे। संसदीय इतिहास में अब तक चार जेपीसी बन चुकीं। कांग्रेस राज में बोफोर्स और हर्षद मेहता दलाली कांड पर जेपीसी बनी। तो एनडीए राज में मार्केट घोटाले और शीतल पेय में पेस्टीसाइड के मुद्दे पर। अब टू-जी स्पेक्ट्रम पर पांचवीं जेपीसी बनने जा रही। पर इतिहास यही इशारा कर रहा- जेपीसी अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब नहीं रही। यों पांचवीं जेपीसी कितनी सफल, रपट आने के बाद ही पता चलेगा। पर जेपीसी के गठन की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। विपक्ष ने स्पेक्ट्रम, आदर्श, कॉमनवेल्थ और इसरो-देवास डील समेत जेपीसी मांगी। पर सरकार ने सिर्फ राजा से जुड़े स्पेक्ट्रम घोटाले की जेपीसी मानी। तो सुषमा स्वराज दलील दे रहीं- विपक्षी एकता बरकरार रखने और गतिरोध तोडऩे के लिए हमने टू-जी स्पेक्ट्रम पर ही जेपीसी मान ली। यों राजनीतिक हलकों में चर्चाएं कई और। बीजेपी के एक बड़े नेता का रिश्तेदार कॉमनवेल्थ में जुड़ा। तो दूसरे का आदर्श से जुड़े लोगों से बेहतर संबंध। सो गतिरोध तोडऩे के बहाने दोनों ने आदर्श, कॉमनवेल्थ को जेपीसी से बाहर होने दिया। अब देर से ही सही, पक्ष-विपक्ष ने संसद में बना गतिरोध तोड़ा। तो मंगलवार से संसद की कार्यवाही चलेगी। सो सोमवार को परंपरा के मुताबिक नए साल के पहले सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का अभिभाषण हुआ। सरकार ने अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा। पर सरकार के एक साल के एजंडे में कुछ नया नहीं। अलबत्ता महंगाई पर काबू पाना सरकार की प्राथमिकता में। पर इसके लिए सरकार ने एक साल मांग लिया। यानी वित्तीय वर्ष 2011-12 में महंगाई पर काबू पाना सरकार की पहली प्राथमिकता। पर विकास से भी समझौता नहीं करेगी। सो राष्ट्रपति का अभिभाषण उत्साह पैदा करने वाला नहीं रहा। करीब 50 मिनट के अभिभाषण में महज दो बार ताली बजीं, वह भी मद्धिम। मिस्र में लोकतंत्र का स्वागत और महिला बिल की उम्मीद पर कुछ सांसदों ने ताली बजाई। बाकी अभिभाषण में कहीं ऐसा दमखम नहीं, जहां सांसद मेजें थपथपाने को मजबूर हुए हों। अलबत्ता कांग्रेस को पहले दिन अपने ही सांसदों से शर्मसार होना पड़ा। अभिभाषण में तेलंगाना का जिक्र नहीं था। सो कांग्रेसी सांसद राष्ट्रपति के सामने ही सोनिया के फोटू के साथ जय तेलंगाना के बैनर लहराने लगे। फिर भी बजट सत्र में पक्ष-विपक्ष की सहमति संसद ही नहीं, लोकतंत्र के लिए सुकून की बात। आखिरकार आवाम की जिद के आगे सरकार को झुकना पड़ा। मनमोहन ने तो पिछले हफ्ते की प्रेस कांफ्रेंस में भी यहां तक कह दिया था- शीत सत्र हंगामे में क्यों बरबाद हुआ, इसकी वजह मैं समझ नहीं पा रहा। पर अब सवाल- क्या पीएम को वजह समझ आ गई? सचमुच टू-जी घोटाला और इसके लिए जेपीसी का विवाद संसद का नया इतिहास रच गया। सो सरकार को जवाब देना होगा- शीत सत्र में ही जेपीसी क्यों नहीं मान गई?
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21/02/2011