Monday, November 9, 2009
इंडिया गेट से
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'राज' द्रोह पर नपुंसक
क्यों अपनी राजनीति?
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संतोष कुमार
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'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा... हिंदी हैं हम, वतन है... हिंदोस्तां हमारा।' मोहम्मद इकबाल का लिखा तराना 1904 से अब तक अपने गौरव का गीत बना हुआ। पर कौन सोच सकता, ऐसा तराना लिखने वाला कभी बंटवारे की बात करेगा। फिर भी इतिहास का यही सच। इकबाल बाद में बंटवारे के कट्टïर पैरोकार बन गए थे। ऐसा ही तराना उन ने पाक की खातिर भी लिखा। अब इकबाल तो सारे जहां से अच्छा गीत आम भारतीय की जुबान से दूर नहीं कर सके। पर सोमवार को महाराष्टï्र की विधानसभा से वही बंटवारे की बू आई। एक तरफ मराठी प्रेम, तो दूसरी तरफ देश को बांटने का संदेश। राज ठाकरे के गुंडों ने फिर देश को शर्मसार करने वाला वाकया दिखाया। पहली बार एमएनएस के 13 एमएलए चुने गए। तो राज ठाकरे के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे। सो सड़कों की लड़ाई विधानसभा पहुंच गई। विवाद का मुद्दा बनी अपनी राष्टï्र भाषा। राज ठाकरे ने अपील कम, आदेश के अंदाज में सभी विधायकों को फरमान थमा दिया था। शपथ ग्रहण सिर्फ मराठी में ही करना होगा। पर समाजवादी पार्टी के अबू आजमी ने हिंदी में शपथ का खम ठोका। सोमवार को आजमी शपथ लेने को खड़े हुए। तो राज ठाकरे के पालतुओं ने माइक छीना। हाथापाई से लेकर लप्पड़-थप्पड़ और जूते-चप्पल भी चलाए। पर आजमी का कसूर क्या? सिर्फ यही ना, राष्टï्र भाषा में शपथ ली। इसमें मराठी का अपमान कहां से? क्या मराठी संस्कृति यह कहती, किसी से जबरन अपनी जुबान बुलवाओ। क्या इंसानियत कोई संस्कृति नहीं? अगर राज ठाकरे ने अपील की थी। अपील या अनुरोध तो किसी पर बंदिश नहीं। फिर राज के गुर्गों ने इतना हंगामा क्यों बरपाया? क्या मराठी प्रेम या महाराष्टï्र राज ठाकरे के बाप की जागीर हो गई? उत्तर भारतीयों की मुखालफत कर कभी सड़कों पर तांडव, तो कभी विधानसभा में। भले सोमवार को एमएनएस की गुंडागर्दी पर फौरी कार्रवाई हुई। मर्यादा तार-तार करने वाले एमएनएस के चार एमएलए चार साल के लिए सस्पेंड कर दिए। राम कदम, शिशिर शिंदे, वसंत गीते, रमेश वांजले अब विधानसभा परिसर में भी कदम नहीं रख पाएंगे। पर यह तो कार्रवाई का टोकन भर। राज के गुर्गे फिर सड़कों पर तांडव मचाएंगे। पर दूसरा पहलू, सस्पेंड हुए चार एमएलए के इलाके की जनता खामियाजा क्यों भुगते? बेहतर तो यही होता, एमएलए बर्खास्त कर दिए जाते। एमएनएस को बैन करने की सिफारिश चुनाव आयोग से होती। राज ठाकरे के चि_ïीनुमा फरमान और बयानों पर फौरी कार्रवाई होती। ताकि ऐसे राष्टï्र द्रोहियों को दुबारा सिर उठाने का मौका न मिले। पर अपनी राजनीति में ऐसा साहस कहां। सीएम अशोक चव्हाण ने सस्पेंशन का एलान किया। तो सजा की वजह सदन में हुआ व्यवहार बताया। हिंदी के अपमान पर सवाल टाल गए। यों राज ठाकरे के खिलाफ जांच का एलान जरूर किया। पर राज तो पहले भी गिरफ्तार और रिहा होते रहे। पुलिस हाथ जोड़े खड़ी रहती। राज हाथ में सिगरेट लिए बयान देते। अबके विधानसभा में एमएनएस के एमएलए ने हाथापाई की। तो बाहर उनके नेताओं की जुबान जहर उगल रही थी। वागीश सारस्वत से लेकर सरपोतदार तक अपनी हरकत को जायज ठहराते रहे। वागीश ने यहां तक कह दिया, आजमी जैसे लोग लातों के भूत हैं, बातों से नहीं मानते। लगे हाथ एमएनएस की धमकी भी, जिसको जिस भाषा में बात करनी हो, आकर कर ले। यानी न संविधान का लिहाज, न कानून का डर। अलबत्ता राज ठाकरे तो हर कदम संविधान को श्रद्धांजलि दे रहे। आजमी की हिंदी पर हंगामा बरपाया। पर कांग्रेसी बाबा सिद्दीकी ने अंग्रेजी में शपथ ली। तो कुछ नहीं बोले। यानी अंग्रेजी मंजूर, हिंदी नहीं। अब राष्ट्रभाषा के खिलाफ लोगों को भड़काना राजद्रोह नहीं, तो और क्या? पर राज के खिलाफ ठोस कार्रवाई में किस बात का इंतजार? हिंदी भाषियों के खिलाफ मुंबई की सड़कों पर जो दुनिया ने देखा। सोमवार को विधानसभा का वाकया देखा। फिर किस बात की देरी? आखिर 'राजÓ द्रोह पर अपनी राजनीति नपुंसक क्यों बनी बैठी? कांग्रेसी सत्यव्रत हों, या सिंघवी। लालू हों या शाहनवाज। सिर्फ कड़ी भत्र्सना तक ही सीमित रहे। लालू ने इतना जरूर चेताया, देश टूटेगा, तो महाराष्टï्र की वजह से। पर जब लालू कांग्रेस के साथ पावरफुल थे, तब कार्रवाई का दबाव क्यों नहीं बनाया। महाराष्टï्र और केंद्र में तब भी कांग्रेस, आज भी कांग्रेस सत्ता में। विपक्षी बीजेपी की हालत तो न तीन में, न तेरह में। आपसी लड़ाई में ही इस कदर उलझी। राज कौन, शायद मालूम नहीं होगा। सो उससे आग या खून खौलने की उम्मीद ही बेमानी। पर कांग्रेस तो आजादी की आन, बान, शान वाली पार्टी। फिर भी खून क्यों नहीं खौल रहा? क्या खून इतना ठंडा पड़ चुका। जो संविधान की श्रद्धांजलि देने वाले और मानवता को कुचलने वाले राज को रोक नहीं पा रही। राज के सिर्फ तेरह पालतुओं ने हंगामा मचाया। तो मुंबई में हाई अलर्ट करना पड़ा। अब भी अगर राजनीति ऐसी ही नपुंसक बनी रही। तो इकबाल की मानसिकता वाले राज जैसे लोग बढ़ते जाएंगे। बाकियों को इकबाल का लिखा गीत भुलाना होगा।
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09।11।2009
Wednesday, November 4, 2009
इंडिया गेट से
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चोली-दामन जैसा रिश्ता
राजनीति और भ्रष्टाचार का
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तो शरद पवार ने फिर मुह खोला। सो न जाने महंगाई अब कहाँ जाकर थमेगी। ख़ुद पवार को भी मालूम नहीं। सो महंगाई का भूत दिखाकर कट लिए। कभी मंदी की दुहाई, तो कभी पैदावार में कमी की दलील। पर इन नेताओं से यह पूछकर देखो, कौन सा महकमा मलाईदार तो चट बता देंगे। मलाईदार महकमों का मामला न होता तो महाराष्ट्र में सरकार न बन गई होती। पर चुनावी खर्च सूद समेत निकालना जरूरी सो कांग्रेस-एनसीपी मलाई छोड़ने को राजी नहीं। अब गवर्नर ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया। तो कमोबेश शायद अब कुछ जुगाड़ फिट हो जाए। पर जनता की गाढ़ी कमाई की लूट कैसी मचेगी, यह मधु कोड़ा से पूछकर देख लो। अमीर बनने का सबसे शॉर्टकट तरीका बन चुकी राजनीति। मधु कोड़ा तो फर्श से अर्श तक पहुंचने का ताजा उदाहरण। पर पूछताछ हुई तो बीमार पड़ गए। पर छापे में अहम दस्तावेज जांच एजेंसी के हाथ लगे। सो बुधवार को इनकम टेक्स विभाग ने कोड़ा का घर सील कर दिया।जब झारखंड राज्य बना, तो बीजेपी कोटे से मंत्री थे। पर राज्यसभा चुनाव में पैसा लेकर क्रॉस वोटिंग की तो बीजेपी ने निकाल दिया। पर दूसरा चुनाव निर्दलीय जीते तो कांग्रेस-लालू-शिबू ने मिलकर सीएम बना दिया। सो कोड़ा ने जमकर कारगुजारी दिखाई। किसको कितना शेयर मिला, पता नहीं। पर अकेले कोड़ा ने चार हजार करोड़ जमा कर लिए। मंत्री-सीएम रहते कोड़ा दुबई-बैंकाक भी घूम आए। पर केंद्र सरकार को भनक भी न लगी। कहीं ऐसा तो नहीं, राजनीतिक शेयर मिल गया। तो सरकारी तंत्र ने आंख मूंद ली हो। कोड़ा इलाज के बहाने जिन देशों में गए। उन देशों से ही अकूत संपत्ति की पोल खुल रही। अब झारखंड चुनाव हो रहे। तो कांग्रेस खुद को बेदाग दिखाने की कोशिश में कोड़ा पर शिकंजा कसवा रही। पर यह तो वही बात, चोरी में भी साथ दिया। अब चौकीदार बन जनता को बरगला रही। यों कोड़ा तो सिर्फ भ्रष्टाचार की कड़ी। राजनीति और भ्रष्टाचार का तो चोली-दामन जैसा रिश्ता बन चुका। वरना चार आने का नेता यों ही करोड़पति नहीं बन जाता। फिर भी अपना इरादा किसी पर उंगली उठाने का नहीं। पर राजनेताओं का इतिहास-भूगोल याद करा दें। ताकि आप खुद उनका क्वनागरिक शास्त्रं तैयार कर सकें। हाजी मस्तान पोर्टर से स्मगलर, और स्मगलर से नेता बन गए। भजनलाल 1950 के दशक में चुन्नियां बेचा करते थे। चार आने का टिकट नहीं खरीद पाने की वजह से धर लिए गए थे। फिर किस्मत ऐसी बदली, चार बार सीएम, दो बार केंद्र में मंत्री और अब हरियाणा में किंगमेकर बने हुए। ओमप्रकाश चौटाला साधारण किसान परिवार से थे पर सीबीआई की नजर में 2000 करोड़ के मालिक। बूटा सिंह अकाली पत्रिका अखबार के दफ्तर में पानी पिलाने का काम करते थे। पर देश के होम मिनिस्टर की कुर्सी तक पहुंच गए। बेटा हाल ही में एक करोड़ की रिश्वत लेते धरा जा चुका। नरसिंह का झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड। दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन साल की सजा दी। पर सुप्रीम कोर्ट ने संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला बताकर बरी कर दिया। पंडित सुखराम के घर संचार घोटाले में छापा पड़ा। तो मंत्री के सरकारी आवास से साढ़े चार करोड़ मिले। पर वही सुखराम कभी मंडी के स्कूल में क्लर्क थे। दिल्ली आए, तो सर्वेट क्वार्टर में रहे। उस जमाने में पंद्रह रुपए की साइकिल आती थी। पर सुखराम की हैसियत से बाहर थी। यों सुखराम पहले नेता हुए, जिन्हें भ्रष्टाचार में सजा मिली। अब लालू यादव को ही लो। बिहार में साढ़े नौ सौ करोड़ का चारा घोटाला सबको चौंकाने वाला। कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा के परिवार की आधिकारिक संपत्ति साढ़ सात सौ करोड़। चुनाव आयोग को हलफनामे में इतना बताया। तो बाकी भगवान ही जाने। पर कभी देवगौड़ा जूनियर इंजीनियर के नीचे ड्राफ्टमैन हुआ करते थे।बीजेपी के येदुरप्पा की मुसीबत बने रेड्डी बंधुओं की संपत्ति सात हजार करोड़। जो सिर्फ 2004 से 2009 के बीच बनी। आंध्र में वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन के अकेले की संपत्ति पांच सौ करोड़। कहां से आए इतने पैसे? कोई निचले स्तर से उठकर देश की बागडोर संभाले, तो गौरव की बात। पर संपत्ति भी देश जैसी विशाल हो जाए, तो क्या कहेंगे? तमिलनाडु में जयललिता हों या करुणानिधि। जयललिता ने अपनी आत्मकथा में खुद लिखा। जब उनकी मां की मौत हुई, तो अंतिम संस्कार को पैसे न थे। लाश घर में पड़ी थी, पर वह फिल्म की शूटिंग में गईं। ताकि 51 रुपए का बंदोबस्त हो सके। आज जयललिता क्या हैं, बताने की जरूरत नहीं। बीजेपी में प्रमोद महाजन के शुरुआती दिन मुफलिसी में गुजरे। पर राजनीति में आए, तो संपत्ति बेहिसाब हो गई। ये सारे उदाहरण तो सिर्फ एक झलक। कई सफेदपोश तो ऐसे, जिन पर जांच एजेंसी हाथ डालने की हिमाकत भी नहीं कर सकती। पर उनका इतिहास और वर्तमान खुद हकीकत बयां कर रहा। आम आदमी तो दो जून की रोटी जुटा ले, तो संतोष की सांस लेता। पर राजनेताओं का पेट भरता ही नहीं। सुरसा की तरह मुंह फैलाए बैठे। करोड़ों-करोड़ों निगल रहे, पर डकार का नाम नहीं। सो भ्रष्टाचार पर नकेल, सिर्फ कहने की बात।
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०४/११/2009
Monday, November 2, 2009
Saturday, October 31, 2009
...ये 'आग' लगती क्यों नहीं ?
इंडिया गेट से
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...ये 'आग' लगती
क्यों नहीं ?
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संतोष कुमार
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ये आग दो दिन तक नहीं बुझी। गुलाबी शहर आग के धुंए से बदरंग हो गया पर 24 घंटे बाद भी वही लाचारी। आईओसी को न आग की वजह मालूम, न बुझाने के उपाय। समूची व्यवस्था आग बुझने की बाट जोह रही। पर जब सब खाक में मिल जाएगा। तो व्यवस्था का रहनुमा राख हाथ में उठा क्या कसमें उठाएंगे? फिर वही राग अलापेंगे। मामले की जांच होगी। सुरक्षा के नए उपाय ढूंढे जाएंगे। पर यह सब तो सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह जाएगा। और फिर इंतजार होगा एक नए हादसे का। राजनीति और नौकरशाही की सांठगांठ ने जनमानस को हादसों का आदी बना दिया। वरना किसी राज्य की राजधानी में तेल का इतना बड़ा डिपो हो। और सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं। आपदा प्रबंधन की भी पोल खुल गई। याद है ना, 26 दिसंबर 2004 की सुनामी के बाद आपदा प्रबंधन की कितनी बातें हुईं। बाकायदा आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी बना। पर पांच साल बीत गए, क्या आपने कभी चुस्त आपदा प्रबंधन देखा? जब जयपुर जैसी राजधानी का ऐसा हाल। तो सोचिए, कहीं सुदूर गांव में ऐसा हादसा हो। तो क्या होगा। आखिर आग भयावह होने से पहले नियंत्रण क्यों नहीं हो सका। मंत्री से लेकर आईओसी तक लाचारी जता रहे। जैसे भारत में सरकार कुछ भी नहीं, सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा। आज डिपो की आग पर ऐसी लाचारी। कल एटमी ठिकाने पर खुदा न खास्ता कुछ हो जाए। तो क्या यही लाचारी दिखाएंगे हम? अगर हम एटम बम रखने की क्षमता रखते हैं तो हमें सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त भी करने होंगे। अगर ऐसी ही लाचारी होगी। तो कल को लश्कर या जैश आकर एटम बम ले जाएं तो क्या होगा? राजनीति-नौकरशाही की सांठगांठ टालू नीति अपना रही। तभी तो व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही। गुरुवार की रात सीतापुरा स्थित आईओसी डिपो में आग लगी। पर पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा महाराष्ट्र की सियासी गोटी फिट करने में व्यस्त थे। सो जब डिपो की आग भयावह हो गई। तो क्वनवज्योतिं संवाददाता ने देवड़ा से अगला कदम जानना चाहा। मंत्री से पूछा, जयपुर के तेल डिपो में आग लगी। अब बचाव के क्या उपाय होंगे? तो काबिना मंत्री की काबिलियत भरी टिप्पणी सुनते जाओ। पता नहीं देवड़ा का मिजाज कैसा था। पर मौके की नजाकत को नजरअंदाज कर मंत्री बोल गए- "आग लगी है, तो मैं क्या करूं।" पर मंत्री को शायद गलती का अहसास हो गया। सो फौरन कहा- क्वतेल बिखर जाने के बाद काबू पाना संभव नहीं।ं शुक्रवार को मुरली देवड़ा जयपुर पहुंचे। देवड़ा ने जयपुर में संयत शब्दों में लाचारी जता दी। पर देवड़ा से ज्यादा उम्मीद भी बेमानी। कभी जमीनी राजनीति नहीं की। सो किसी भी बयान में जमीनी टच नहीं दिखेगा। अलबत्ता देवड़ा ऐसी टिप्पणी करते। मानो मंत्री नहीं, किसी कंपनी के सीईओ हों। पर कहते हैं ना, गुस्से या हड़बड़ी में इंसान की असलियत बाहर आ जाती। सो मुरली देवड़ा की जुबानी व्यवस्था की पोल फिर खुल गई। अब आईओसी की मानें, तो सीतापुरा डिपो की आग से 300 करोड़ के नुकसान का अनुमान। यह सिर्फ आईओसी का आंकड़ा। राज्य सरकार का जो नुकसान हुआ, वह अलग। पर करोड़ों के नुकसान के साथ कई लोगों की जानें भी गईं, तो कई जूझ रहे। तो क्या अब नेता और नौकरशाह जागेंगे? या फिर वही कागजी बंदोबस्त और करोड़ों का बजट। जो उपाय पर खर्चने के बजाए सीधे रहनुमाओं के पेट में जाएगा। जहां से डकार भी बामुश्किल आती। अपनी व्यवस्था का यही ढर्रा। तभी तो 21 साल बीत चुके। भोपाल गैस त्रासदी के दंश से हम उबर नहीं पाए। आज भी उस इलाके की मिट्टी जहरीली। पर उसे हटाने का कोई बंदोबस्त नहीं हो सका। अपने जयपुर के इस भीषण अग्निकांड का असली असर तो बाद में ही दिखेगा। पर व्यवस्था को भगवान भरोसे कब तक छोड़ते रहेंगे हम-आप? सड़क चलते राहगीर की हादसे में मौत हो जाए। तो हम भगवान को दोष देते। मुंबई में लोकल ट्रेन पर पानी की पाइप लाइन गिर जाए। तो मरने वाले के नसीब की दुहाई देते। दिल्ली में ही भूकंप का एक बड़ा झटका आ जाए तो शायद 80 फीसदी दिल्ली तबाह हो जाएगी। पर दिखावे को सरकार नई इमारतें खड़ी कर रही है। पुराने का कोई रख-रखाव भी नहीं। मेट्रो के पिलर गिर रहे। फिर भी सुरक्षा मानक की तैयारी नहीं। कोई भी इमारत या रोड बनती, तो बाकायदा उसकी उम्र तय होती है। पर समय रहते कोई इंतजाम नहीं होता। बिहार में कोसी की बाढ़ भी व्यवस्था की भूल का ही नतीजा।पर लोकतंत्र की आड़ में नेताओं ने राजनीति को ऐसा लबादा ओढ़ा दिया कि सड़क हादसे हो या इमारत गिर जाए, मेट्रो का पिलर ढहे या तेल डिपो में आग लग जाए। व्यवस्था ने ऐसी संस्कृति बना दी, आम लोगों में ऐसी चीजें "आग" नहीं बनतीं। जबकि ऐसे हादसों में सोलह आने व्यवस्था दोषी होता है। तेल डिपो के आग मामले में भी इंडियन आयल की गलती साफ हो रही। पहले से रिसाव हो रहा था। पर वक्त रहते बंदोबस्त नहीं किया। सो अब सवाल, आम लोग के दिलों में आग कब लगेगी? ताकि सोई व्यवस्था को जगा सकें। पर यह 'आग' लगती क्यों नहीं? कब तक हम-आप भगवान या किस्मत पर दोष मढ़ेंगे? सरकार जनता के पैसे से चलती है फिर जिम्मेदारी से बच कैसे सकती है?
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३०/१०/२००९
Thursday, October 29, 2009
इंडिया गेट से
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पड़ोस थर्रा रहा, हम
तू-तू, मैं-मैं में उलझे
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• संतोष कुमार
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राजधानी एक्सप्रेस दिल्ली पहुंच गई। ट्रेन पर नक्सलियों ने जो लिखा, जस का तस दिल्ली पहुंचा। पर खौफजदा मुसाफिरों ने व्यवस्था की कलई खोल दी। ट्रेन भुवनेश्वर से चली। तो खोजी कुत्तो के साथ सुरक्षा बल भी मौजूद थे। पर नक्सली बेल्ट शुरू होने से पहले जवान खड़गपुर में ही उतर गए। एक मुसाफिर ने खम ठोककर बार-बार यह बात दोहराई। ताकि शक की गुंजाइश न रहे। नक्सलियों ने ट्रेन बंधक तो बनाई। पर सुरक्षा बलों के पहुंचने से पहले ही ट्रेन छोड़ चले गए। अगर यह सच, तो सरकार पर कोई कैसे भरोसा करेगा। घने जंगलों के बीच मुसाफिर भगवान भरोसे रहे। पर सुध लेने वाला कोई नहीं। बुद्धदेव भट्टाचार्य रायटर्स में मीटिंग करते रहे। तो चिदंबरम शाम को दुबारा दफ्तर लौटे। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन जम्मू-कश्मीर में उद्घाटन की तैयारी में मशगूल रहे। तो ममता बनर्जी ने बुद्धदेव से बात करना भी गवारा न समझा। राजनीति की यह कैसी मिसाल। ममता ठहरीं रेल मंत्री। पर बंगाल की राजनीति सिर चढ़ गई। सो माओवादियों के खिलाफ तो कुछ न बोलीं। पर सीपीएम और बंगाल सरकार को देश के लिए खतरनाक बता दिया। लेफ्ट पर रेलवे की छवि बिगाड़ने का आरोप लगाया। राष्ट्रपति से बंगाल में अनुच्छेद 356 लगाने की मांग कर दी। सो बुधवार को राजधानी पर दिल्ली में खूब चिकचिक हुई। लेफ्ट और ममता के बीच माओवाद पर तू-तू, मैं-मैं हुई। तो प्रकाश कारत और सीताराम येचुरी ने ट्रेन हाईजैक को ममता की साजिश बता दिया। सवाल उठाया, माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बल की मुहिम की मुखालफत क्यों कर रही हैं ममता? पर ममता फिलहाल कांग्रेस की सहयोगी। सो कांग्रेस ने ममता पर आरोप को बेमानी बताया। पर लगे हाथ नसीहत भी दे दी। नक्सलवाद के खिलाफ मुहिम में आरोप-प्रत्यारोप से कुछ न होगा। अलबत्ता एक सुर में आवाज उठाने की जरूरत। पर कांग्रेस को गले में हड्डी फंसी। तो एक सुर की बात हो रही। जो भी सत्ता में होता, यही दलील। यों राजनीति में जिस दिन एकजुटता हो जाए, शायद देश की आधी समस्याएं निपट जाएं। पर अपने नेताओं की राजनीति का निचोड़ यही। सुर एक हो गया, तो फिर राजनीति काहे की। पर अहम सवाल, जब नक्सलवाद से निपटने में हम इतने लचर। तो सीमापार आतंकवाद से कैसे निपटेंगे? मामला पाकस्तान का हो, या चीन का। अपनी राजनीति में विचारधारा का मतभेद मनभेद में तब्दील हो चुका। फलां की विचारधारा हमसे नहीं मिलती। तो हम उसकी अच्छी सलाह भी क्यों मानें। पर इस मानसिकता से नुकसान तो देश का हो रहा। बुधवार को संघ प्रमुख मोहन भागवत दिल्ली में थे। मौका था तरुण विजय की किताब क्वइंडिया बैटल टू विनं के विमोचन का। पर पहले उन ने बीजेपी की कीमोथेरेपी पर सफाई दी। वाकई मीडिया ने बात का बतंगड़ बना दिया। भागवत से जयपुर में सवाल हुआ था। कुछ लोग बीजेपी को सर्जरी, तो कुछ मेडिसिन और कीमोथेरेपी की जरूरत बता रहे। तो भागवत ने सवाल दोहराते हुए यही कहा- बीजेपी को मेडिसिन की जरूरत, या कीमोथेरेपी की , या सर्जरी की , यह जांच कर बीजेपी खुद तय करे। फिर दिल्ली में राजनाथ ने भी चलते-चलते बात कर ली। भागवत के बयान का पता न था। पर कीमोथेरेपी की बात आई। तो हंसते हुए उन ने कहा- किसका दिमाग खराब हो गया है। पर बीजेपी बेचारगी के दौर से गुजर रही। सो मीडिया ने भी हाथ सेक लिया। पर बुधवार को भागवत ने सिर्फ इतना ही कहा- कभी-कभी मीडिया में ऐसा होता है। भागवत ने आडवाणी से भी भेंट की । राजनीति पर चर्चा हुई। पर भागवत की मानें, तो संघ नेतृत्व परिवर्तन की बात वन टू वन मीटिंग में नहीं करता। अलबत्ता सामूहिक चर्चा में अपना सुझाव देता। पर बीजेपी की बात तो होती रहेगी। भागवत ने वैचारिक शत्रुता पर जो कहा, वाकई काबिल-ए-गौर। चीन ने 1962 के बाद कोई युद्ध नहीं लड़ा। पर जीत की मुद्रा में हुंकार रहा। सो भारत को पुराने घाव भूलने होंगे। अब परिस्थितियां 1962 जैसी नहीं। सो बिना युद्ध युद्ध जीतने की नीति अपनानी होगी। तब हम क्यों हारे, जड़ों में जाकर कठोरता से मंथन की जरूरत। ताकी देश का भविष्य संवार सकें। भागवत ने सवाल उठाया। दूर के देशों का हमारे पड़ोसियों से बेहतर संबंध। पर हमारे क्यों नहीं? देश में बहस होनी चाहिए। भले विचारधारा अलग-अलग क्यों न हो। पर देशहित में आम सहमति बनाने की जरूरत। अब भागवत की बात सोलह आने सही। राजनीति में विचारधारा के नाम पर छुआछूत क्यों। जब जनता छुआछूत नहीं कर रही। लोकतंत्र में सत्ता ही सबकुछ नहीं। विपक्ष की मजबूती भी सत्ता से कम नहीं। तो फिर राजनीति का एक सुर क्यों नहीं बन रहा? नक्सली देश के भीतर चुनौती दे रहे। तो पड़ोसी देश पाक अपने ही जाल में उलझता जा रहा। शायद ही कोई ऐसा दिन बीत रहा। जब पाक में धमाके न होते हों। बुधवार को पेशावर थर्रा उठा। एक सौ के करीब लोग मारे गए। तड़क काबुल में तालिबानियों ने यूएन गेस्ट हाउस पर कब्जा कर लिया। ढाई घंटे ऑपरेशन चला। सो पड़ोसी देश की अस्थिरता अपनी फिक्र का विषय। अगर मौजूदा हुकमरान के रहते शांति नहीं। तो फर्ज करो, पाकी की सत्ता तालिबानियों ने हथिया ली। तो क्या होगा। सो वोट की राजनीति छोड़ समस्याओं का मुकाबला एकजुटता से करना होगा।
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२८.१०.२००९
Thursday, October 8, 2009
तो क्यों ना दिल्ली वालों को बाड़ में डाल दें!
इंडिया गेट से
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तो क्यों ना दिल्ली वालों को बाड़ में डाल दें!
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• संतोष कुमार
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अब बीजेपी में वेंकैया वाणी निकली। तो आडवाणी के बिना कोई वाणी कैसे पूरी हो। सो वेंकैया ने 2014 में बिन आडवाणी चुनाव लड़ने की राय जता दी। उन ने 2014 से पहले नया नेतृत्व ढूंढने की बात कही। यों वेंकैया वाणी में कोई नयापन नहीं। पर बयानबाजी का मकसद आडवाणी भी बखूबी समझ रहे होंगे। सो आडवाणी कुपित न हों, वेंकैया ने खुद को सगा बताने में भी कसर नहीं छोड़ी। बोले- आडवाणी को पंद्रहवीं लोकसभा के लिए विपक्ष क नेता चुना गया। अब उन पर ही निर्भर करता है, वह कब पद से हटते हैं। यों सुषमा स्वराज ने तो पांच साल का टर्म पूरा करने का खुल्लमखुल्ला एलान किया था। तो संघ वाले कुपित हो गए। सो वेंकैया ने नया फार्मूला निकाला- सबका भला हो, पर शुरुआत मेरे से हो। सो बात भी कह दी, आडवाणी को नाराज भी न किया। संघ की भृकुटि भी न तनी। वेंकैया यही तो चाह रहे। जैसे भी हों, फिलहाल गुटबाजी से बचें। वेंकैया की नजरें फिर अध्यक्ष की कुर्सी पर जमीं। वैसे भी ठीक पांच साल पहले इन्हीं दिनों वेंकैया कुर्सी से विदा हुए थे। जब 2004 में बीजेपी लोक सभा हारी। तत्काल बाद अक्टूबर में महाराष्ट्र की जनता ने भी भरोसा नहीं किया। तो वेंकैया नायडू पत्नी की बीमारी का हवाला दे अध्यक्षी आडवाणी को सौंप गए। पर सही मायने में तब भी बीजेपी की दूसरी पांत में जबर्दस्त उठापटक थी। वेंकैया को जेतली सरीखे नेता भाव नहीं दे रहे थे। सो वेंकैया ने कुर्सी छोड़ आडवाणी से बैठने की मनुहार की थी। अब पांच साल बाद वेंकैया उसी कुर्सी के लिए जोर-आजमाइश कर रहे। यानी महाराष्ट्र के चुनाव नतीजे बीजेपी में फेरबदल का अध्याय शुरू करेंगे। सो महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने को पूरी ताकत झोंक दी। बाकायदा वोट के दिन छुट्टी का भी एलान हुआ। पर लगे हाथ शर्त जोड़ दी गई। यानी जो सरकारी मुलाजिम वोट डालने नहीं जाएगा, उसकी छुट्टी रद्द मानी जाएगी। सैलरी में से पैसा कटेगा। यानी जबरन वोट डलवाने की तैयारी। कहीं ऐसा न हो, नेता अपने निकम्मेपन का ठीकरा आम वोटर के सिर फोड़ दे। और भविष्य में वोट न डालने वालों पर जुर्माने लग जाएं। राजनेता अब लोकतंत्र को मुट्ठी में करने की जुगत भिड़ा रहे। पर जब तक नेता अपने सुधरने का मापदंड तैयार नहीं करते। तब तक जबरन वोट की कोश्शिश कहां तक जायज। पर यह मुद्दा व्यापक बहस का। सो बात चुनावी समर की । चुनाव अभियान के आखिरी दौर में जुबानी जंग भी उफान पर। गुरुवार को राहुल ने पनवेल में चुनावी सभा की । तो नरेगा का राग खूब अलापा। भारत को दो हिस्सों में बांटा। पहला- बैकवर्ड इंडिया, दूसरा- शाइनिंग इंडिया। पहले का प्रहरी कांग्रेस को बताया। तो दूसरे को विपक्ष का साथी। राहुल बोले- हम संसद में गरीबों के लिए नरेगा लाए। तो विपक्ष ने पैसा जाया करने का आरोप लगाया। विपक्ष की यही आदत हो चुकी, गरीबों को पैसा देना इन्हें नहीं सुहाता। उन ने एक और पते की बात कही। बोले- सत्तर साल पहले देश में सभी गरीब थे। आज आधा देश तरककी कर रहा। तो क्या राहुल का मतलब यह, देश की बाकी गरीबी दूर करने के लिए कांग्रेस को और सत्तर साल चाहिए। पर राहुल बाबा किस विकास की बात कर रहे। इसका नमूना तो गुरुवार को देश की राजधानी दिल्ली में मिल गया। कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी पर लंबे अरसे से सवाल उठ रहे। पर सरकारी अमला सोया पड़ा था। अब कॉमनवेल्थ गेम्स फैडरेशन के अध्यक्ष माइक फेनेल ने मेजबानी छीनने की चेतावनी दी। तो समूचा तंत्र नींद से जागा। पर गुरुवार को कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर जो हुआ। लोकतंत्र के हित में तो कतई नहीं। तैयारियों से रू-ब-रू कराने के लिए 71 देशों के डेलीगेट्स का दौरा शुरू हुआ। तो सुबह के आठ बजे से शाम के सात बजे तक सभी अहम रोड मानो सील हो गए। पुलिस ने दो दिन पहले ही इश्तहार दे एडवाइजरी जारी कर दी। वाकई पुलिस-प्रशासन और अपनी सरकार ने निकम्मापन छिपाने को बढ़िया तरीका ईजाद किया। ट्रेफिक की बदहाली विदेशी मेहमान न देख सके । सो दिल्ली वालों को बाड़ में बंद करने की कोशिश। पर अभी तो शुरुआत हुई। खेल शुरू होने में सालभर बाकी। ऐसे कई ड्रामे होंगे, जब निकम्मी व्यवस्था के संचालक धौंस दिखा दिल्ली वालों को बाड़ में बंद करेंगे। तभी तो तैयारी का मौका-मुआइना विदेशी मेहमानों को कराया। पर मीडिया को भी पास नहीं फटकने दिया। अभी ऐसा हाल, तो 2010 में क्या होगा। क्यों न सरकार अभी से उम्दा बाड़ तैयार करे। जब तक दिल्ली में गेम्स हों, सभी दिल्ली वालों को बाड़ में ठूंस दें। यही होता है, जब किसी सरकारी अस्पताल में मंत्री का दौरा हो। तो मरीजों के बिस्तर पर झक सफेद चादर बिछ जाती। जैसे ही मंत्री गए, प्रशासन भेड़चाल शुरू कर देता। अब 70 साल में देश की राजधानी का यह विकास। तो राहुल बाबा ही बताएं। बाकी 70 साल में कैसा होगा विकास ? या फिर हर बार यही होगा, अपनी बदहाली छिपाने को आम आदमी को बाड़ में बंद कर दो। सो गुरुवार का वाकया देख होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम की वह चेतावनी याद आ गई। याद है ना, उन ने यही कहा था- दिल्ली वालो खुद से सुधर जाओ, वरना हम सुधार देंगे। सो लोक तंत्र में दिखावे की खातिर अपनी ही जनता पर चाबुक बरसाने की तैयारी। पर रंगा सियार कब तक शेर बना रहेगा। तैयारी की पोल तो एक प्रतिनिधि ने खोल ही दी। जब कहा- कुछ काम तो हुआ है। पर अभी बहुत बाकी।
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08।10।2009
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