Tuesday, July 20, 2010

बिहार में दंगल, दिल्ली में वर्जिश

अपनी दिल्ली, राजस्थान में बदरा बरसे। तो बिहार में कुर्सियां बरसीं। नीतिश कुमार का पहला टर्म पूरा हो रहा। दूसरे टर्म से पहले सत्तापक्ष और विपक्ष ने विधानसभा को ही अखाड़ा बना लिया। नीतिश-बीजेपी सत्ता में वापसी की मुहिम में जुटे। तो पिछली बार जमीन सूंघ चुके लालू-पासवान वापसी की राह ढूंढ रहे। नीतिश सरकार ने भी आखिरी वक्त में विपक्ष को मुद्दा थमा दिया। जब सीएजी रपट में खुलासा हुआ, सरकार ने 11,412 करोड़ खर्च तो किए, पर कोई हिसाब नहीं। सो हाईकोर्ट ने ट्रेजरी घोटाले में सीबीआई जांच के आदेश दे दिए। अब नीतिश सरकार फटाफट खर्चे के बिल बनाने में जुटी। सो बिहार विधानसभा में मानसून सत्र के पहले दिन ही हंगामा मच गया। विपक्ष वैल में पहुंचा, तो सत्तापक्ष से मंत्री-विधायक भी धमके। सो जमकर हाथापाई हुई। जिसके हाथ में जो आया, एक-दूसरे को दे मारा। सो करीब दर्जन भर विधायक घायल हो गए। पर सीएम नीतिश मुस्करा कर चल दिए। सदन में सीएम, डिप्टी सीएम मौजूद हों और हंगामा इस कदर बढ़ जाए। तो नैतिकता की उम्मीद किससे करें। सो लालू-पासवान ने नीतिश पर हमला बोला। कहा- विपक्ष संवैधानिक हक के तहत सदन में विरोध कर रहा था। पर नीतिश की शह से सत्तापक्ष ने मारपीट की। यों सत्तापक्ष में बैठा नेता अपने चेले-चपाटों को कैसे शह देता, यह लालू से बेहतर कोई बता भी नहीं सकता। मनमोहन की पिछली पारी में लालू 24 सांसदों के साथ सबसे बड़े सहयोगी थे। सो रेल मंत्री रहते भी रुतबा पीएम-सीएम से कम नहीं था। घटना 24 अगस्त 2006 की, जब लोकसभा में तबके जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह और लालू की तू-तू, मैं-मैं हो गई। दोनों के बीच बहस गाली-गलौज तक पहुंच गई। तो लालू के इशारे पर उनसे साले साधु यादव सांसदों की बैठने वाली बैंच को लांघते हुए प्रभुनाथ को मारने पहुंच गए। पर बीच में सांसद बृजभूषण शरण सिंह खड़े हो गए। सो साधु अपनी हरकत को अंजाम नहीं दे पाए। पर लालू हाथ उठा-उठा कर उकसाते दिखे। मुंह से गालियों के फूल बरसाते रहे। सो बाद में माफी मांगनी पड़ी। अब राजनीतिक मतभेद मनभेद बन गए। सो संसद हो या विधानसभा, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की वर्जिश का अड्डा बन गए। जनता के बीच जाने से पहले नेतागण सदन में ही वार्म-अप करते, ताकि मैदान में फुर्ती रहे। सो यूपी, उड़ीसा, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसी कई विधानसभा यह ट्रेंड अपना चुकीं। हर बार राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी दलील होती। दोनों पक्ष एक-दूसरे को जमकर कोसते। पर अपने गिरेबां में झांकते तक नहीं। अब नीतिश सरकार खर्च का हिसाब क्यों नहीं दे पाई या सचमुच घोटाला हुआ, यह तो जांच में साफ होगा। पर इतना तो जरूर हुआ, नीतिश राज में बिहार का कायापलट हो रहा। अगर रुपए खर्च नहीं होंगे, तो कायापलट कैसे संभव। अब हिसाब-किताब किसने नहीं रखा, यह तो बाद की बात। पर लालू-राबड़ी राज में पैसे खर्च ही नहीं हुए थे। कुछ फंड वापस केंद्र को चला जाता था, तो कुछ लालूवादी डकार जाते थे। पर साढ़े चार साल तक नीतिश के खिलाफ विपक्ष को ढूंढे कोई मुद्दा नहीं मिला। सो चुनावी साल में लालू-पासवान को तो समझो सीएजी ने मुंह मांगी मुराद थमा दी। यों सीएजी बनी ही मीन-मेख निकालने को। अगर काम कुछ भी न हो और कागजी पेट भर दो, तो सीएजी को एतराज नहीं होगा। यही हुआ था, जब सीएजी ने दिल्ली की शीला सरकार पर सवाल उठाए। लो फ्लोर बसों की खरीद के मामले में सीएजी ने रपट में कहा था कि अधिक कीमत पर बस खरीदी गई। पर तब शीला ने सीएजी को खरी-खरी सुनाने में देर नहीं की। सीएजी की रपट को कूड़ेदान में डालने को कह दिया। सीएजी जैसी संस्था की जरूरत पर ही सवाल उठा दिए। यानी कुल मिलाकर सीएजी कभी सत्तापक्ष को नहीं भाया। अलबत्ता विपक्ष के लिए हर रपट वरदान बन जाती। पर सीएजी और नीतिश के विवाद में आम आदमी का मुद्दा तो छूट गया। लालू-पासवान ने महंगाई पर मोर्चा निकाला। तो केंद्र को कम, नीतिश को खूब कोसा। पर अब बाकी मुद्दे गौण हो गए। सो बिहार के बाद अब दिल्ली में भी तैयारी हो रही। विपक्ष ने भारत बंद कर महंगाई पर तेवर दिखाए थे। तो अब सरकार ने विपक्षी एकता में सेंध लगाने को वही पुराना फार्मूला तय कर लिया। संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होगा। तो विपक्ष के तेवर देख सरकार मुद्दों की प्राथमिकता तय करेगी। पर इतना तय हो गया, विपक्षी एकता तोडऩे को हिंदू आतंकवाद और महिला आरक्षण बिल का सुर्रा छोड़ेगी सरकार। लेफ्ट तो वैसे भी ममता की बढ़ती राजनीतिक बेल से परेशान। सो बीजेपी के साथ दिखकर अपना और बंटाधार नहीं करेगी। लालू-पासवान भी बिहार चुनाव को देख बीजेपी संग बांसुरी नहीं बजाएंगे। रही बात मुलायम की। तो हिंदू आतंकवाद और महिला आरक्षण ही तोडऩे को काफी। अगर कांग्रेस सचमुच अपनी रणनीति में कामयाब हुई। बीजेपी-लेफ्ट के सहयोग से जबरन महिला बिल पास कराने की ठानी। तो कहीं ऐसा न हो, सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बिहार में भी गठबंधन टूट जाए। याद है ना, इसी सदन में शरद यादव ने एलान किया था- अगर महिला आरक्षण बिल पास हुआ, तो सुकरात की तरह जहर पी लेंगे। अब बिल पास हो या नहीं हो, पर विपक्षी एकता टूटनी तय। बिहार विधानसभा जैसी तस्वीर दिल्ली में दोहराए। तो हैरानी नहीं। सांसदों के वेतन-भत्ते बढऩे भी तय। पर महंगाई का बाल बांका नहीं होगा। यों केबिनेट सैक्रेट्री केएम चंद्रशेखर ने भरोसा दिलाया, दिसंबर तक महंगाई दर पांच-छह फीसदी पर आ जाएगी।
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20/07/2010

Monday, July 19, 2010

... मातम के लिए अभी आंसू बचाए रखिए

'आज करे सो काल कर, काल करे सो परसों। इतनी जल्दी क्या है, जब जीना है बरसों।' रेलवे का मूल मंत्र अब यही हो गया। अपने नेता तो बरसों जीएंगे। आम आदमी यों ही हादसों का शिकार होता रहेगा। सो नीतिश कुमार के रेल मंत्री वक्त से ही टक्कर रोधी उपकरण (एंटी कोलीजन डिवाइस) हर रेल बजट भाषण में जगह पा जाता। भले अब तक पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे को छोड़ किसी ट्रेन में यह डिवाइस नहीं लगे। जब सीके जाफरशरीफ रेल मंत्री थे, तो कोंकण के एमडी बी राजामोहन को पूरी छूट मिली। उन ने डिवाइस तैयार तो किया। पर महंगी टेक्नोलॉजी की वजह से व्यापक अमल में नहीं लाया गया। भले हादसे-दर-हादसे मुसाफिर मरते जा रहे। मुआवजों से लेकर राहत तक धन पानी की तरह बह रहा। पर अपनी तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो रहा। अपने नेताओं को तो विदेशी माल लाने में ही फायदा नजर आता। कम से कम इसी बहाने विदेश टूर का मौका मिल जाता। कुछ मातहत भी कमीशन से मालामाल हो जाते। सो विदेशी माल के आगे देशी की क्या औकात। अब अगर महंगी टेक्नोलॉजी से रेलवे को परहेज, तो अपनी ही रिसर्च डिजाइन एंड स्टेंडर्ड ऑर्गनाइजेशन की सुध क्यों नहीं लेती। जी हां, रेलवे की अपनी रिसर्च विंग है। पर अब तक कोई आविष्कार नहीं कर पाई। हर बार सिर्फ जुबानी तीर चलते। हर रेल मंत्री अपनी डफली आप ही बजाता। तभी तो नीतिश के बाद पासवान, लालू और अब ममता रेल मंत्री। पर रेल मंत्रालय के बदलते चेहरों के साथ सुरक्षा के मुकम्मल उपाय तो नहीं हुए। पर हर रेल मंत्री का भाषण अपग्रेड होता चला गया। अगर पुराने भाषण छोड़ दें, तो ममता बनर्जी की ओर से 24 फरवरी 2010 को पेश रेल बजट ही देख लें। अब तक एंटी कोलीजन डिवाइस तो लगे नहीं। पर ममता ने अबके ट्रेन के डिब्बे और इंजन भी टक्कर रोधी बनाने का एलान कर दिया। लगे हाथ विजन-2020 का खाका भी परोसा। सालाना एक हजार किलोमीटर रेल लाइन बिछाने का लक्ष्य। अगले दस साल में नेटवर्क में 25 हजार किलोमीटर के इजाफे की तैयारी। पर क्या रेलवे का इतना बड़ा नेटवर्क कोलकाता के एक कमरे में बैठकर चलाया जा सकता? ममता ने बजट भाषण में खुद बताया था। कैसे जब देश आजाद हुआ, तो 1950 में रेलवे के पास 53,596 किलोमीटर की लाइन थी। पर 58 साल बाद भी यह नेटवर्क 64,015 किलोमीटर पर सिमटा हुआ। यानी सालाना औसत 180 किलोमीटर रहा। पर जब रेलवे का इतिहास इतना बिगड़ा हुआ। तो ममता बनर्जी कायापलट को मंत्रालय में बैठना गवारा क्यों नहीं समझतीं? सचमुच जब भारत आजाद हुआ था। तब चीन के पास भारत की तुलना में एक चौथाई रेल लाइनें भी नहीं थीं। पर अब दुनिया में चीन का नेटवर्क सबसे बड़ा। सो अपने रेल मंत्रियों ने नया ट्रेंड शुरू कर दिया। बजट भाषण में लच्छेदार जुमलों से दिल जीतने की खूब कोशिश होती। भले ट्रेन में मुसाफिरों का सफर अंग्रेजी का सफर क्यों न हो। सच्चाई यही, रेलवे को नेताओं ने राजनीति की ट्रेन बना लिया। जिस राज्य का मंत्री बना, ट्रेन की दिशा उधर ही मुड़ गई। सो दुधारू गाय होकर भी रेलवे मरणासन्न दिख रही। आखिर बिना चारा रेलवे कब तक दूध दे? अब तो खड़ी ट्रेन में भी पीछे से टक्कर आम बात हो गई। पिछले साल 21 अक्टूबर को मथुरा के पास रुकी मेवाड़ एक्सप्रेस को पीछे से गोवा एक्सप्रेस ने टक्कर मार दी थी। फिर दो जनवरी को इटावा में लिच्छवी-मगध और गोरखधाम-प्रयागराज की ऐसी ही टक्कर हुई थी। ममता के चौदह महीने के टर्म में अब तक करीब दर्जन भर दुर्घटनाएं हो चुकीं। कुछेक में नक्सलवादियों का भी हाथ। जिनमें 27 अक्टूबर 2009 को राजधानी एक्सप्रेस को बंधक बनाना और 28 मई 2010 को ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पटरी से उतारना शामिल। सो ममता को अबके भी साजिश नजर आ रही। रेलवे जिम्मेदारी ओढऩे को तैयार नहीं। केबिन मास्टर अपनी चूक से इनकार कर रहा। तो रेलवे बोर्ड के डायरेक्टर विवेक सहाय ड्राइवर की चूक से। जांच के नाम पर सब अपनी जिम्मेदारी से बच रहे। पर अब तक की दुर्घटनाओं की जांच का नतीजा क्या निकला? किसकी जिम्मेदारी तय हुई और रेलवे ने क्या सबक लिया? सो अब तो यही लग रहा, न रेलवे दोषी, न महकमा चलाने वाले नेता। अगर सचमुच कोई जिम्मेदार, तो वह है आम आदमी। अपना लोकतंत्र है ही ऐसा, जहां जनता खुद के लिए खुद जिम्मेदार। अगर नेता जिम्मेदारी ओढऩे लगें, तो फिर राजनीति कौन करेगा। हर हादसे के बाद वही होता, जो सोमवार को हुआ। बंगाल के बीरभूम के निकट सैंथिया स्टेशन पर खड़ी वनांचल एक्सप्रेस को पीछे से आ रही उत्तरबंग एक्सप्रेस ने जोरदार टक्कर मारी। साठ से ज्यादा मौतें हो चुकीं, सैकड़ों घायल। पर हादसों पर राजनीति शुरू हो गई। ममता पर लालू-पासवान के साथ लेफ्ट-बीजेपी ने भी हमला बोला। तो निचोड़ यही था, ममता का ध्यान रेल भवन से ज्यादा रायटर्स बिल्डिंग पर। सो ट्रेन बेलगाम दौड़ रही। सोमवार को हादसे की जगह राहत ट्रेन राहत काम पूरा होने के बाद पहुंची। तो उसमें पीने का पानी भी नहीं था। जब नेताओं की आंख का पानी मर चुका, तो पीने का पानी कहां से मिले? क्या लच्छेदार भाषणों से ही हो जाएगी रेलवे की सुरक्षा? इंटर लॉकिंग सिस्टम, एंटी कोलीजन डिवाइस क्या सिर्फ कागजों तक रहेंगे? आखिर कब तक रेलवे को रेलवे के भरोसे छोड़ा जाए? अब तो सरकार को विशेष पहल कर महकमा दुरुस्त करना होगा। वरना नेताओं का तो कुछ नहीं, पर हम-आप मातम के लिए आंसू बचाए रखें। क्योंकि आज का हादसा कोई आखिरी नहीं....।
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19/07/2010

Friday, July 16, 2010

पीठ में खंजर घोंपना तो पाक की फितरत

लो, कर लो बात। भारत-पाक विदेश मंत्री स्तर की बात बनी कम, बिगड़ ज्यादा गई। जगजाहिर हो गया, दोनों देशों की बातचीत महज रस्म अदायगी। तभी तो गुरुवार को दोनों विदेश मंत्री वार्ता की मेज पर बैठे। पर शुक्रवार को रिश्तों पर दोनों तरफ से जुबान की कैंची चली। पाक के विदेश मंत्री एसएम कुरैशी और अपने एसएम कृष्णा पद ही नहीं, नाम में भी एक राशि के। पर शांति वार्ता ऐसी हुई, दोनों एक-दूसरे को फूटी आंख न सुहाए। सो शुक्रवार को कृष्णा दिल्ली रवाना हुए। तो कुरैशी ने पाक की नीयत जाहिर कर दी। बौखलाहट कुरैशी के चेहरे से साफ झलकी। जब भारत के साथ-साथ कृष्णा पर फब्ती कसी। भारत को बातचीत में चुनिंदा बताया। तो कृष्णा को अपरिपक्व बताने की कोशिश की। कहा- मैंने पूरी बातचीत में किसी से निर्देश नहीं लिया। पर भारत के विदेश मंत्री को बार-बार नई दिल्ली से निर्देश लेना पड़ रहा था। पर कृष्णा जैसे ही दिल्ली उतरे, कुरैशी की कलई खुल गई। कृष्णा ने एक बार भी फोन से बात नहीं की। पर कुरैशी ने झूठ क्यों बोला? अगर आपने कुरैशी की लाइव प्रेस कांफ्रेंस देखी हो, तो बौखलाहट साफ देखी होगी। कुरैशी ने भारत को चुनिंदा मुद्दे पर बात करने वाला बताया। पर यह नहीं बताया, किस मुद्दे को लेकर रार ठनी। सच तो यह, भारत ने आतंकवाद पर जोर दिया। पाकिस्तान हुक्मरानों से हिसाब-किताब मांगा। तो कुरैशी ने कश्मीर राग छेड़ दिया। पर भारत की रणनीति तय थी। पी. चिदंबरम ने 26 जून को जो डोजियर सौंपा, उस पर बीते तीन हफ्ते में पाक ने क्या कदम उठाया? पर कदम उठाया हो, तो कुरैशी जवाब देते। पर भारत की आतंकवाद पर जिद ने कुरैशी को कुलबुला दिया। कुरैशी की खीझ तो गुरुवार को ही दिख गई, जब उन ने भारत के गृह सचिव जीके पिल्लई के बयान की तुलना आतंकवादी हाफिज सईद से कर दी। पिल्लई ने आखिर वही कहा था, जो एनआईए को पूछताछ में डेविड हेडली ने बताया। अमेरिकी एजेंसी एफबीआई के साथ अपनी एनआईए ने शिकागो में हेडली से पूछताछ की। तो हेडली ने मुंबई हमलों की साजिश की शुरुआत से अंत तक आईएसआई की भूमिका का खुलासा किया था। यानी आतंकवाद पर पाक चौतरफा घिरा, तो मुद्दे से फोकस हटाने को फिर पुराना राग छेड़ दिया। अब आप कुरैशी की पूरी प्रेस कांफ्रेंस का लब्बोलुवाब देखें। तो कुरैशी ने कश्मीर, सियाचीन, सरक्रीक का मुद्दा उठाया। भारत के अधिकार वाले कश्मीर में हुए निष्पक्ष चुनावों पर सवाल उठाए। हुर्रियत जैसे संगठनों के बिना चुनाव को निष्पक्ष नहीं मानता पाक। पर सबसे अहम जो पाक ने अबके यह मान लिया, कश्मीर में उपद्रव के पीछे उसी का हाथ। कुरैशी ने बेझिझक कह दिया- कश्मीर एक विवादित क्षेत्र। अगर वहां हिंसा हो रही, तो पाक मूकदर्शक नहीं रह सकता। अगर भारत वहां सेना भेजेगा, तो असर पाक पर भी होगा। यानी विदेश मंत्री स्तर की बातचीत का इतना फायदा तो हुआ, पाक ने कश्मीर में उपद्रव को शह देना कबूला। अब विदेश मंत्री स्तर की पहली बातचीत में पाक का यह रवैया क्या जतला रहा? पर कृष्णा ने भले आतंकवाद को मुख्य मुद्दा बना पाक को घेरा। मुंबई हमले के दोषियों पर कार्रवाई की मांग दोहरा दुखती रग छेड़ दी। पर कृष्णा ने कूटनीतिक चूक भी कर दी। जब गुरुवार को साझा प्रेस कांफ्रेंस में कुरैशी ने भारत के गृह सचिव की तुलना आतंकी हाफिज सईद से कर दी। तो अपने कृष्णा चुपचाप रहे। अगर तभी अपना एतराज जताया होता। तो अपनी विदेश नीति की धमक दिखती। पर कृष्णा तो ऐसे निकल लिए, जैसे कुछ सुना ही न हो। अगर तभी कृष्णा ने एतराज किया होता, तो शायद कुरैशी शुक्रवार को बड़ी हिमाकत न करते। यही नहीं, कृष्णा न तो पाक में बोले, न शुक्रवार को स्वदेश लौटने पर। कुरैशी के बयान से राजनीतिक पारा चढ़ गया। तो एयरपोर्ट पर ही कृष्णा ने जवाब दिया। कुरैशी के आरोपों पर पलटवार करने के बजाए महज सफाई देते दिखे। उन ने पिल्लई के बयान की तुलना पर एतराज जताया। पर कह गए- कुरैशी की तरह बयानबाजी कर प्वाइंट स्कोर नहीं करना चाहते। यों कृष्णा की बात सही। पर यह कैसी कूटनीति, जो पाक चोरी भी करे और फिर हमीं से सीनाजोरी करे। सो बीजेपी ने तो पाक से वार्ता बंद करने की मांग की। पर कांग्रेस ने खारिज कर दिया। सचमुच मुंबई हमले के बाद भारत ने पाक के खिलाफ जो कूटनीतिक सफलता हासिल की, अबके गंवा दी। पाक से वार्ता की पेशकश पहले भारत ने ही की। तो इन्हीं कुरैशी ने मजाक उड़ाया था। भारत को घुटनाटेकू बताया था। फिर भी 11 मई को अपने कृष्णा ने कुरैशी से फोन पर बात की। वार्ता के लिए 15 जुलाई मुकर्रर की थी। पर पहले 26 जून को चिदंबरम गए। जिन ने भी आतंकवाद पर फोकस किया। अब कृष्णा ने भी। पर मुंबई हमले के बाद से अब तक कार्रवाई के नाम पर पाक कितने पेंतरे बदल चुका, क्या मनमोहन सरकार को इल्म नहीं। फिर भी बातचीत का स्तर अपग्रेड होता गया। पर शुक्रवार को बदले में क्या मिला। अब दिसंबर में कुरैशी को दिल्ली आने का न्योता दिया गया। यों सरकार का एक खेमा भी बातचीत रोकने की पैरवी कर रहा। पर अंकल सैम को दिखाने के लिए बातचीत होगी। दोनों के दिल में क्या, यह तो रिस-रिस कर बाहर आ रहा। तो क्या सचमुच दोनों देशों की बातचीत से विश्वास का माहौल बन रहा? विदेश सचिव स्तर की वार्ता हो या विदेश मंत्री स्तर की, सिर्फ कड़वाहट पैदा कर रही। पाक अपनी हरकत से बाज नहीं आ सकता। जब वाजपेयी लाहौर बस लेकर गए, तो बदले में कारगिल मिला। अबके कृष्णा दिल मिलाने गए, तो कुरैशी ने जुबानी छुरा घोंप दिया।
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16/07/2010

Thursday, July 15, 2010

कांग्रेस सही, तो संघ पर क्यों नहीं लगा देती बैन?

तो जैसे को तैसा के चक्कर में राजनीति की ऐसी-तैसी हो रही। अब दिग्विजय सिंह ने नितिन गडकरी से पूछ लिया, बताओ तुम्हारा बाप कौन? यानी सीधे-सपाट शब्दों में कहें, तो संयत भाषा में नेता मां-बहन की गाली पर उतर आए। गडकरी ने दिग्विजय को औरंगजेब की औलाद कहा था। अफजल को कांग्रेस का दामाद बताया। तो दिग्गी के भाजपाई भाई लक्ष्मण को अखर गया। सो लक्ष्मण ने शर्त रखी, गडकरी माफी मांगें, वरना बीजेपी छोड़ देंगे। पर अब बीजेपी के लिए लक्ष्मण सिंह काम के नहीं रहे। सो गुरुवार को बीजेपी ने ही निकाल दिया। गडकरी की जुबान पूर्व सांसद पर भारी पड़ी। सिर्फ दिग्विजय नहीं, कांग्रेस महासचिव बी.के. हरिप्रसाद ने कर्नाटक विवाद पर बीजेपी से पूछ लिया- बताओ रेड्डी बंधु रिश्ते में तुम्हारे क्या? उत्तराखंड कांग्रेस ने तो उसी दिन पूछ लिया था- अगर अफजल को कांग्रेस का दामाद बता रहे, तो बताओ मसूद अजहर कौन थे? भले भाषाई अभद्रता दोनों तरफ से हो रही। पर अगर आप किसी को मां-बहन की गाली देंगे। तो बदले में लड्डू की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। सबको अपने-अपने वोट बैंक की फिक्र। सो गाली-गलौज में भी सब अपना फायदा देख रहे। कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने में जुटी। तो बीजेपी हिंदू वोट बैंक दुरुस्त करने में। उधर यूपी में मुलायम सिंह ने भी पासा फेंक दिया। कल्याण सिंह से बढ़ाई पींगों पर मुसलमानों से माफी मांग ली। पर वोट को मजहब में उलझाकर कब तक उल्लू सीधा करते रहेंगे राजनेता? दिग्विजय सिंह ने तो मानो ठान ली हो, संघ को बदनाम करके छोड़ेंगे। ताकि जनभावना सीधे संघ के खिलाफ बन जाए। पर दिग्विजय का भांडा तो सीबीआई ने ही फोड़ दिया। कांग्रेस मालेगांव, अजमेर जैसे कुछ ब्लास्ट के लिए सीधे संघ को जिम्मेदार ठहरा रही थी। मीडिया में लगातार खबरें आने लगीं। पर तेरह जुलाई को सीबीआई के डायरेक्टर अश्विनी कुमार ने खंडन कर दिया। कहा- अब तक की जांच में ना संघ की कोई भूमिका, ना ही संघ के किसी व्यक्ति से पूछताछ हुई। सो ना-ना करते गुरुवार को बीजेपी खुलकर संघ के बचाव में उतर आई। कांग्रेस को चेतावनी दी- संघ की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाए, तो खामियाजा भुगतना होगा। पर हफ्ते भर से बीजेपी की हवाइयां उड़ी हुई थीं। संघ का मसला संघ के सिर ही छोड़ दिया था। पर जब मीडिया में खुलासा होने लगा, संघ के बड़े नेताओं पर उंगली उठने लगी। तो मामला राजनीतिक हो गया। कांग्रेसी दिग्विजय के बयानों ने बीजेपी को मजबूर कर दिया। अब तक बीजेपी-संघ यही दलील दे रही थीं, कानून अपना काम करेगा। दोषी कोई भी हो, बख्शा नहीं जाना चाहिए। पर अब संघ परिवार आक्रामक मूड में आ गया। सीबीआई डायरेक्टर के बयान के बाद दिल्ली में जुटे संघ के नेता मंथन कर रहे। माना जा रहा, अब संघ मीडिया में छपी खबरों के खिलाफ मानहानि का नोटिस देगा। यों संघ की बात सही, जब जांच एजेंसी ही सबूत से इनकार कर रही। तो दिग्विजय किस आधार पर आरोप लगा रहे। अगर दिग्विजय के पास अपने सबूत, तो क्यों नहीं सरकार को देते। केंद्र में आखिर कांग्रेस की ही सरकार। अगर सचमुच संघ परिवार हिंदू आतंकवाद का केंद्र। तो बैन क्यों नहीं लगवाते? आखिर मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर राजनीति क्यों? पर कांग्रेस और संघ का बैर कोई नया नहीं। संघ पर अब तक तीन बार बैन लग चुका। पहली बार महात्मा गांधी की हत्या के बाद चार फरवरी 1948 को। यों गांधीजी की हत्या सिर्फ बहाना थी। असल में तबके गृहमंत्री सरदार पटेल को कांग्रेस संगठन और देश की जनता का भरोसा हासिल था। पंडित नेहरू को डर था, कहीं संघ का सहयोग लेकर पटेल उन्हें सत्ता से न हटा दें। सो गांधीजी की हत्या के बहाने अपनी हसरत पूरी की। पर जांच में साफ हो गया, गांधीजी की हत्या में संघ की कोई भूमिका नहीं। फिर नेहरू ने संघ के पास संविधान न होने को आधार बनाया। पर संघ ने कुछ समय के बाद संविधान उपलब्ध करा दिया। सो जुलाई 1949 में बैन हटाना पड़ा। फिर इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के बाद चार जुलाई 1975 को संघ पर बैन लगाया। पर संघ में बढ़ती लोगों की आस्था की वजह से 1977 के चुनाव में इंदिरा की हार हुई और इस्तीफा देने से पहले 22 मार्च 1977 को उन ने बैन हटा दिया। फिर बाबरी विध्वंस के बाद दस दिसंबर 1992 को नरसिंह राव ने बैन लगाया। पर कोर्ट ने चार जून 1993 को बैन हटा दिया। यानी कांग्रेस ने जब-जब संघ पर बैन लगाया, आखिर मुंह की ही खानी पड़ी। सन 1948 हो या 1975 या फिर 1992, संघ पर सत्ता का कुठाराघात उसे और मजबूत कर गया। बीजेपी का सत्ता तक पहुंचना उसी का नतीजा। सो कांग्रेस अब येन-केन-प्रकारेण संघ को बदनाम करने में जुटी। हिंदू आतंकवाद का जुमला दिग्विजय सिंह के दिमाग की उपज। जिसे उन ने गुजरात विधानसभा चुनाव के वक्त इस्तेमाल किया। तो चुनाव आयोग की फटकार भी खानी पड़ी थी। पर साध्वी प्रज्ञा केस के बाद अजमेर ब्लास्ट मामले में देवेंद्र गुप्त की गिरफ्तारी ने दिग्विजय को फिर मौका दे दिया। गुरुवार को इंदौर में संघ व बीजेपी को हिंदू आतंकवाद की मदद करने वाला संगठन बताया। समझौता ब्लास्ट पर भी संघ को कटघरे में उतारा। अब सीबीआई को सच मानें या दिग्विजय को? दिग्विजय का एजंडा तो बटला से लेकर दंतेवाड़ा और भोपाल त्रासदी तक साफ हो चुका। पर अब दिग्विजय लाख चिल-पों करें, संघ को तो सीबीआई का सहारा मिल गया।
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15/07/2010

Wednesday, July 14, 2010

तो आगे भी जुबां से ही मिटाते रहेंगे नक्सलवाद!

नक्सलवाद पर एक और मीटिंग निपट गई। अब नक्सल प्रभावित जिलों में चार सौ थाने बनेंगे। हर थाने को सालाना दो करोड़ की सहायता मिलेगी। राज्यों में स्पेशल पुलिस आफीसरों के पद बढ़ेंगे। पर सबसे अहम फैसला हुआ, चार राज्य मिलकर यूनीफाइड कमांड बनाएंगे। पूरे ऑपरेशन में केंद्र सरकार तंत्रीय सुविधा मुहैया कराएगी। हैलीकॉप्टर दिए जाएंगे। यूनीफाइड कमांड में सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल को कमान सौंपी जाएगी। सीआरपीएफ में भी डीजी (एक्शन) की तैनायी होगी। यानी यह तो हुई नक्सलियों पर कार्रवाई की तैयारी। दूसरी तरफ योजना आयोग एक हाई पॉवर कमेटी बनाएगा। जो नक्सली क्षेत्र में विकास योजनाओं की जरूरत और हालात पर सुझाव देगी। सडक़ संपर्क सुधारे जाएंगे। प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल पर विशेष फोकस करेगी सरकार। पर कार्रवाई और विकास एक साथ कैसे संभव होगा? नक्सलियों की सोच यही, अगर सरकार रोड बना रही, तो उसका इस्तेमाल कार्रवाई के लिए होगा। सो नक्सली लैंड माइंस बिछा सडक़ ही नेस्तनाबूद कर देते। पर नक्सल समस्या को लेकर मीटिंग पीएम मनमोहन ने बुलाई थी। सो केंद्र सरकार सोनिया और दिग्विजय की सोच के साथ कदमताल करती दिखी। कुल मिलाकर मनमोहन सरकार ऊहापोह में ही फंसी। मीटिंग तो बुला ली। पर केंद्र की ओर से कोई ठोस फार्मूला नहीं। सारा दारोमदार राज्यों पर ही छोड़ दिया। छह साल बाद यूनीफाइड कमांड की सुध ली। पर प्रस्ताव को अधकचरा बना दिया। वाजपेयी सरकार ने यूनीफाइड कमांड की पहल की थी। पर मनमोहन ने कमान संभालते ही ठंडे बस्ते में डाल दिया। पहली पारी में साढ़े चार साल होम मिनिस्टर रहे शिवराज पाटिल तो वैसे ही नक्सलियों को अपना भाई बताते रहे। जैसा बुधवार को बीजेपी के सहयोगी नीतिश कुमार ने बताया। यों अच्छा हो, इन्हीं दोनों को नक्सलवादियों से वार्ता के लिए भेज दिया जाए। हो न हो एक भाई दूसरे भाई की बात मान ले। अब जरा नक्सलियों को भाई बताने वाले नेता कुछ नक्सली हमले भी याद रखें। छत्तीसगढ़ की हाल की घटनाओं को लें, तो कैसे नक्सलियों ने सुरक्षा बलों को मारा। फिर सिर धड़ से अलग किया। अगर नेताओं को सुरक्षा बल या आम आदमी का खून, खून नहीं लगता। तो याद दिलाते जाएं, नेताओं की बिरादरी के ही थे सुनील महतो। झामुमो के लोकसभा सांसद थे। पांच मार्च 2007 को जमशेदपुर के निकट केसरपुर गांव में फुटबाल मैच का ईनाम बांटने गए थे। तभी नक्सलवादियों ने मंच पर पहुंच सांसद के सुरक्षा गार्ड से बंदूक छीनी। पहले सुरक्षा गार्डों को मारा। फिर सांसद सुनील महतो को गोली से भून दिया। पर नक्सली करतूत यहीं खत्म नहीं हुई। नक्सलियों ने उसके बाद जो किया, उसे देख भले नेताओं का खून न खौले। पर आम नागरिक का खून खौल उठेगा। नक्सलवादियों ने सांसद को गोली मारने के बाद लाश पर कूद-कूद कर नृत्य किया। खुशियां मनाईं, माओवादी जिंदाबाद के नारे लगाए। पर नीतिश हों या पाटिल, दिग्विजय हों या सोनिया, कौन समझाए। यों पी. चिदंबरम ने लकीर पीटने के बजाए ऑपरेशन ग्रीन हंट के जरिए नई लकीर खींची। पर दस जनपथ से आए फरमान ने चिदंबरम के हाथ जकड़ दिए। मजबूर चिदंबरम ने छह अप्रैल को दंतेवाड़ा हमले के बाद इस्तीफे की पेशकश भी कर दी थी। सो मजबूरी में ही सही, अब चिदंबरम भी अपनों के रंग में रंग गए। दंतेवाड़ा कांड के बाद नक्सलियों की हरकत को गृह युद्ध करार देने वाले चिदंबरम ने बुधवार को कांग्रेसी फार्मूला ही अपनाया। नक्सलवाद को राज्य की कानून व्यवस्था का मुद्दा मान यूनीफाइड कमांड का जिम्मा भी राज्य के सिर ही छोड़ दिया। केंद्र राज्यों को संसाधन मुहैया कराएगा। पर उपलब्धता के आधार से। यानी हैलीकॉप्टर होगा, तो नक्सली क्षेत्र में तैनाती होगी। नहीं तो भगवान भरोसे। पर जुबानी सख्ती भी खूब दिख रही। चिदंबरम बोले- नक्सलियों को जज नहीं बनने देंगे। पर कोई पूछे, आप क्या कर लोगे। जब सारा मामला राज्य पर ही छोड़ दिया। नक्सलवाद को राष्ट्रीय समस्या मानने के बजाए कुछ राज्यों की समस्या मान रहे। तो कैसे नक्सलवाद का खात्मा होगा? पीएम ने सीएम की मीटिंग बुलाकर महज खानापूर्ति की। हर बार की तरह अबके भी भाषणबाजी हुई। तो एकीकृत कमान के साथ-साथ फंड की कमी न होने देने का भरोसा। नक्सलियों ने कितने लोगों को मारा, यह भी बताया। चिदंबरम के मुताबिक 2004 से 2008 के बीच सालाना औसतन पांच सौ आम नागरिक मारे गए। अब जरा नक्सली हमले की घटना के आंकड़े देखिए। साल 2006 में 930 हमले हुए। 2002 में 1465, 2003 में 1597, 2004 में 1533 और 2005 में 1608 जगहों पर नक्सली हमले हुए। हर बार वही भाषणबाजी, सघन कार्रवाई करेंगे। बख्शा नहीं जाएगा। पर सचमुच में अपनी व्यवस्था का नासूर नक्सलवाद कब खत्म होगा? यूनीफाइड कमांड की बात कोई नई नहीं। मुख्यमंत्रियों की मीटिंग हर साल दो-चार दफा हो ही जाती। पर बयानों में कोई फर्क नहीं होता। अब आप मार्च 2007 में सांसद सुनील महतो की नृशंस हत्या से पहले की सीएम मीटिंग में पीएम मनमोहन का एलान देख लो। तब कहा था- 'नक्सलियों के खिलाफ राज्य अब संयुक्त अभियान छेड़ेंगे। जिसके लिए केंद्रीय कोष की कमी नहीं होने दी जाएगी।' अब करीब साढ़े तीन साल बाद आज का बयान देखिए। आखिर साढ़े तीन साल बाद महज ढाई कोस भी क्यों नहीं चल पाई सरकार? यानी बुधवार की मीटिंग का मतलब साफ, आगे भी ऐसे ही जुबान से नक्सलवाद मिटाते रहेंगे।
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14/07/2010

Tuesday, July 13, 2010

भारत बनाम इंडिया, आधी हकीकत, आधा फसाना

साईं इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय। भक्ति काल में जब कबीर ने यह दोहा लिखा होगा, तो सोचा भी न होगा, दुनिया इतनी बदल जाएगी। अब जैसी अपने देश की तस्वीर, अगर कबीर वाणी की पैरोडी बने। तो यही होगा- साईं इतना दीजिए जामें आम आदमी मरता रहे,च् साधुज् मस्त होता जाय। सचमुच गरीब हर राजनीतिक जुमले में जुडक़र मर रहा। पर सरकार की नीतियां खास-उल-खास पर मेहरबान। यूएनडीपी की ताजा रपट ने अपने विकास के थोथे दावे की कलई खोल दी। रपट को मानिए, तो दुनिया के सबसे अधिक गरीब लोग भारत में रहते। यों अपने यहां तो गरीबी के पैमाने और आंकड़े को लेकर बहस ही छिड़ी हुई। पर यूएनडीपी के पैमाने से भारत में 42 करोड़ लोग गरीब। यानी 26 अफ्रीकी देशों से भी एक करोड़ अधिक गरीब भारत में। यूएनडीपी की नजर में गरीब वही, जो रोजाना एक डालर से कम की आमद पर जिंदगी बसर करे। यानी अपने यहां के हिसाब से देखें, तो 48-50 रुपए से कम कमाने वाला गरीब। पर सोचो, अर्जुन सेन गुप्त की 20 रुपए दिहाड़ी वाली रपट लागूं करें। तो गरीबी का आंकड़ा दुगुने से कहीं अधिक होगा। अर्जुन सेन कमेटी ने तो 84 करोड़ लोग गरीब बताए थे। पर यूएनडीपी ने जो गरीबी की खस्ता हालत बताई। उसके मुताबिक बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान में गरीबों की बाढ़। रपट में इन आठ राज्यों में रहने वाले गरीबों की हालत सबसे अधिक गरीब अफ्रीकी देश इथोपिया और तंजानिया के लोगों जैसी। जहां न स्वास्थ्य की सुविधा, न शिक्षा की। बुनियादी सुविधाएं तो दूर, पीने को साफ पानी भी नहीं। अब कोई पूछे, जब मनमोहन सरकार सामाजिक क्षेत्र पर फोकस कर रही। तो कहां गया नेशनल रूरल हैल्थ मिशन, कहां है सर्व शिक्षा अभियान, कहां है शिक्षा का मौलिक अधिकार? गरीबी की तस्वीर को अगर शहर और गांव में बांटें। तो अपनी 135 करोड़ की आबादी में करीब 37 फीसदी बीपीएल। जिनमें 22 फीसदी ग्रामीण, तो 15 फीसदी शहरी आबादी। अकेले बिहार, यूपी, उड़ीसा में आधे से अधिक गरीब। पर पंजाब, दिल्ली में गरीब की संख्या कम। यों नरेगा जैसी योजना ने कुछ बदलाव किया। पर गरीब को गरीबी रेखा से बाहर लाने में अभी सफल नहीं हुई। सो सवाल समूची राजनीतिक व्यवस्था से। आखिर 63 साल बाद भी देश की तस्वीर ऐसी क्यों? आखिर ऐसी कौन सी नीति बन रही, जहां करोड़पति-अरबपति धन कुबेर बनते जा रहे और आम आदमी पके हुए आम की तरह पिचकता जा रहा। सिर्फ राजनीति ही नहीं, अपनी मीडिया भी कोई दूध की धुली नहीं। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। जब अक्टूबर 2007 में अपने मुकेश अंबानी जगत अमीर बन गए। तो मीडिया की सुर्खियां बनीं। तब 31 अक्टूबर 2007 को यहीं पर लिखा था- सिर्फ अंबानी नहीं, 84 करोड़ की भी हो फिक्र। पर तबसे अब तक आम आदमी की फिक्र हुई, तो सिर्फ जुबां से। मनमोहन सरकार को तेल कंपनियों की सेहत की चिंता तो खूब, पर कभी आम आदमी के पीठ से चिपके पेट की फिक्र नहीं। एक तरफ देश की 42 करोड़ कहें या 84 करोड़, आबादी गरीब, तो दूसरी तरफ अकेले अंबानी जैसे सब पर भारी। अगर 1997 से अब तक के आंकड़े को देखें, तो करीबन सवा दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके। सन 1990 के दशक तक अपने देश की जीडीपी में कृषि का अनुपात पांच फीसदी होता था। अब महज एकाध फीसदी पर सिमटा हुआ। क्या यही है देश की मनमोहिनी अर्थव्यवस्था? हर चुनाव में वादे खूब होते। कभी परमाणु डील की बात, तो कभी पोकरण तिहराने की बात। पर कभी कोई नेता ताल ठोककर यह नहीं कहता- फलां वक्त तक देश से अमीरी-गरीबी की खाई मिटा देंगे। चारों तरफ खुशहाली ला देंगे। आखिर आम आदमी परमाणु डील या पोकरण-तीन से क्या करेगा? उसे तो दो जून की दाल-रोटी चाहिए। सिर ढकने को छत चाहिए। पर आजादी के 63 साल बाद आम आदमी रोजमर्रा की चीजों के लिए मोहताज। सरकार ने महंगाई से जिंदगी तबाह कर रखी। तो विपक्ष ने बंद से मुहाल कर रखी। फिर भी महंगाई कम नहीं होती। तो क्या ऐसी सूरत में भारत 2020 का सपना देख रहा? हम 2020 तक भारत को इंडिया बनाना चाह रहे। पर हकीकत क्या? क्या गरीबी-अमीरी की बढ़ती खाई से भारत विकसित देश बनेगा? क्या विकास दर आम आदमी की गरीबी दूर करेगी? हम मुकेश अंबानी के जगत अमीर बनने पर फक्र करते। सरपट दौड़ती विकास दर पर फक्र करते। सेसेंक्स और शेयर मार्केट की उछाल पर गदगद होते। पर देश की जो तस्वीर यूएनडीपी ने दिखाई, या अर्जुन सेन गुप्त कमेटी दिखा चुकी। कभी उधर ध्यान क्यों नहीं जाता? सरकार की नीतियां उन पांच फीसदी लोगों को ध्यान में रखकर बनतीं, जिनमें से चार फीसदी वोट डालना भी अपनी शान के खिलाफ समझते। पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल ने एक बार कहा था- अमीरी-गरीबी की खाई इसी तरह बढ़ी, तो वह दिन दूर नहीं जब गांव से लोग ट्रेक्टर में आएंगे और दिल्ली जैसे महानगर को लूट ले जाएंगे। अपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार वायसराय लार्ड इर्विन को यहां तक कह दिया था, आपको शर्म आनी चाहिए, एक आम भारतीय से पांच सौ गुना अधिक आपकी आमदनी। पर आज के जमाने में अमीरी-गरीबी की खाई 80 से 85 लाख गुना बढ़ चुकी। पर आम आदमी की ओर कौन ध्यान दे। आम आदमी किसी राजनीतिक दल को चुनावी चंदा जो नहीं देता। सो जो देवत है, वो पावत है।
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13/07/2010

Friday, July 9, 2010

बदनाम राजनीति में अब कोई वाजपेयी क्यों नहीं?

'बदनाम होंगे, तो क्या नाम न होगा।' वाजपेयी के बाद की बीजेपी कुछ साल से इसी फार्मूले पर चल रही। अब नितिन गडकरी भी उसी परंपरा के वाहक। सो अध्यक्षी संभाले छह महीने ही बीते। पर जुबान ऐसी चली, अब तक छह विवाद भी खाते में जोड़ लिए। पहला विवाद तो कुर्सी संभालने के 25वें दिन ही हो गया। जब अप्रवासियों को महानगरों की समस्या बता गए। तो बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी जेडीयू ने गडकरी का पुतला फूंक सलामी दी थी। फिर फरवरी के इंदौर अधिवेशन में राम मंदिर के बाजू में मस्जिद बनाने का बयान। अप्रैल में सिख विरोधी दंगे को गुजरात दंगे से जोड़ा। दंगों को आम लोगों की प्रतिक्रिया बताया। तो खालसा पंथ ने एतराज जताया। सो फौरन गडकरी को खंडन जारी करना पड़ा। फिर बारह मई को चंडीगढ़ की रैली में लालू-मुलायम को सोनिया गांधी के तलवे चाटने वाला कुत्ता बता बखेड़ा खड़ा किया। पर राजनीतिक भूचाल देख गडकरी ने चंडीगढ़ में जुबान से जो उगला, वही निगल लिया। पर लालूवादी रामकृपाल ने गडकरी को छछूंदर कह दिया। अब दिग्विजय सिंह का नाम नहीं लिया। पर इशारों में ही पूछ लिया, आजमगढ़ में आतंकी के घर जाने वाले महाराणा प्रताप की औलाद हैं या औरंगजेब की? तो गुरुवार को देहरादून में संसद हमले के दोषी अफजल को कांग्रेस का दामाद बता दिया। सो बवाल मचना ही था। पर गडकरी का तुर्रा देखिए, अबके माफी मांगने से इनकार कर दिया। खम ठोककर बोले- 'जो कहा, वह सही, मैं अपने बयान पर कायम हूं।' पर कांग्रेस राशन-पानी लेकर चढ़ गई। गडकरी को मानसिक रोगी बताया। पर गडकरी जैसा सुलझा इनसान इतना उलझा बयान क्यों दे रहा? बीजेपी में एक थ्योरी चल रही, जो कांग्रेसी बयानों से पुष्ट हो रही। पिछले कुछ समय से कांग्रेस नेता गडकरी को गंभीरता से नहीं ले रहे। कभी कद पर उंगली उठा रहे, तो कभी पद पर। सो गडकरी ने जान-बूझ कर कांग्रेस नेताओं को निशाना बनाना शुरू किया। ताकि सुर्खियों के सरताज बने रहें। यों सचमुच पिछले शुक्रवार जब गडकरी ने महंगाई पर सवाल पूछा, तो मनीष तिवारी ने महंगाई के भूत से भागने को गडकरी के कद पर सवाल उठा दिए। कहा- 'गडकरी इतने बड़े नेता नहीं, जो कांग्रेस के इस मंच से जवाब दें।' पर अब गडकरी ने भाषाई मर्यादा तोड़ी, तो मनीष तिवारी गडकरी को पद की मर्यादा याद दिला रहे। शुक्रवार को कांग्रेस मंच से शकील अहमद उतरे। तो उन ने गडकरी को आड़े हाथों लिया। सो सवाल हुआ, आज गडकरी पर क्यों बोल रही कांग्रेस? तो शकील ने मनीष की उस राय को निंदा की एक शब्दावली बताया। अब गडकरी के प्रवक्ता भी कुछ ऐसी ही दलील दे रहे। रविशंकर बोले- 'गडकरी ने देश की पीड़ा जाहिर की।' तो सवाल, क्या भावना व्यक्त करने को राजनीति की मर्यादाएं ऐसे ही टूटेंगी? अगर गडकरी ने मर्यादा तोड़ी, तो कांग्रेस भी दूध की धुली नहीं रही। दिल्ली में कांग्रेस ने गडकरी को मनोरोगी बताया। तो देहरादून से कांग्रेस ने पलटवार कर पूछा, अगर अफजल को दामाद बता रहे। तो गडकरी बताएं, मसूद अजहर कौन था? जिसे सम्मान सहित जसवंत सिंह कंधार छोडक़र आए थे। पर कब तक मर्यादाएं टूटती रहेंगी? कभी सोनिया गुजरात के सीएम मोदी को मौत का सौदागर कहतीं, कभी मोदी सोनिया को। मई में मध्य प्रदेश विधानसभा के बाहर कांग्रेसी एमएलए ने बीजेपी की महिला एमएलए ललिता के खिलाफ ऐसी अभद्र टिप्पणी की, जिसे लिखा नहीं जा सकता। क्या यही अपनी राजनीति का स्तर? एक वक्त था, जब अटल बिहारी वाजपेयी गुजरात दंगों से आहत हुए। तो सिर्फ एक शब्द- 'राजधर्म' का पालन करने की टिप्पणी से सारी बात कह दी। जब 2004 के चुनाव में प्रमोद महाजन ने सोनिया गांधी की तुलना मोनिका लेविंस्की से कर दी। नरेंद्र मोदी ने राहुल को जर्सी बछड़ा, तो सोनिया को इटली की.... कह दिया। तो कांग्रेसियों से पहले वाजपेयी ने एतराज किया। भाषा की लक्ष्मण रेखा न लांघने की नसीहत दी। पर आज कांग्रेस या बीजेपी में ऐसा कोई नेता क्यों नहीं, जो वाजपेयी जैसी दो-टूक नसीहत दे सके। अब तो कोई किसी को कुत्ता कह रहा, कोई छछूंदर। कोई मनोरोगी, तो कोई कुछ। राजनीतिक मुद्दे खत्म होते जा रहे। गाली-गलौज तो आम बात हो गई। संसद के पिछले सत्र को ही लें, तो मर्यादा तोड़ू सत्र कहना उम्दा रहेगा। कोई भी दल अछूता नहीं रहा था। आखिर में अनंत-लालू प्रकरण में सुषमा ने माफी मांगी। बाद में सुषमा ने कहा था- 'भले कहीं भी पार्टी नेता कुछ बोल जाएं, पर कम से कम संसद में वाणी पर संयम होना चाहिए।' पर गडकरी तो सांसद ही नहीं। सो बाहर ही सुर्खियां बटोर रहे। पर विरोधी ही नहीं, अब तो अपने भी गडकरी को संयम की नसीहत दे रहे। शुक्रवार को शरद यादव ने भी गडकरी की भावना को जायज माना, पर भाषा पर एतराज जता गए। बोले- 'सच मर्यादा में अधिक अच्छा लगता है।' पिछली बार लालू-मुलायम को कुत्ता कहा था। तो कलराज मिश्र ने नसीहत दी थी- 'नेता संयम में रहकर भाषा का प्रयोग करें। क्योंकि नेता जनता से जुड़ा होता है और जनता पर नेता की बात का फर्क पड़ता है।' सो कांग्रेस को फिलहाल छोडि़ए, गडकरी पर नसीहतों का असर कितना, यह तो भविष्य बताएगा। पर यह क्या, इधर गडकरी ने मर्यादा तोड़ू भाषा पर खम ठोक दिया। उधर हरियाणा के झिंझोली में बीजेपी के मंडल स्तरीय नेताओं के प्रशिक्षक वर्ग का उद्घाटन किया। अब सोचिए, जब बड़े मियां ऐसे, तो छोटे मियां क्या सीखेंगे?
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09/07/2010