संसद से सडक़ तक, फिर सडक़ से संसद तक जेपीसी की लड़ाई जारी रहेगी। विपक्ष ने बजट सत्र में भी मुहिम जारी रखने का एलान कर दिया। पर पहले एनडीए महारैली करेगा। सो भ्रष्टाचार पर विपक्ष के हमलों से चकरघिन्नी बनी कांग्रेस बेसिर-पैर की बयानबाजी को उतारू। संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने पुरानी फाइलें खंगाल कांग्रेस प्रवक्ताओं को कुछ कानूनी मंत्र थमाए। तो अब कांग्रेसी राशन-पानी लेकर एनडीए कार्यकाल को निशाना बना रहे। मनीष तिवारी ने गुरुवार को तेवर दिखाते हुए बीजेपी से तीन सवाल पूछे। पहला- क्या यह सच नहीं कि 1999 में खुद पीएम वाजपेयी ने जगमोहन को संचार मंत्रालय से हटाकर टेलीकॉम कंपनियों को फायदा पहुंचाया, जिससे 60 हजार करोड़ करा नुकसान हुआ? दूसरा- जब 2001 में प्रमोद महाजन मंत्री थे, तब क्या उन्होंने मुफ्त स्पेक्ट्रम नहीं बांटे? तीसरा- पहली अप्रैल 2004 को जब देश चुनाव में था, तब बीजेपी ने ऑपरेटरों की राजस्व हिस्सेदारी घटाकर फायदा नहीं पहुंचाया था? अब कांग्रेस के इन तीनों सवालों का जवाब तो बीजेपी देती रहे। पर अपना सवाल, क्या इन सवालों के जरिए कांग्रेस राजा का पाप धोना चाह रही? चलो मान लें, कांग्रेस प्रवक्ता के आरोप में दम। तो फिर जेपीसी बनाने में एतराज क्यों? बीजेपी तो पहले दिन से खम ठोक कर कह रही- सिर्फ 2001 से क्यों, 1998 में जबसे राजग की सरकार, तबसे जेपीसी की जांच करा लो। जब विपक्ष खुद अपनी जांच कराने को तैयार, तो भला कांग्रेस जेपीसी से क्यों भाग रही? वैसे भी जेपीसी में अमूमन सत्तापक्ष का ही बहुमत होता। फिर भी सरकार जेपीसी पर ऐसी रार ठाने, तो इसे दाल में काला कहेंगे या पूरी दाल काली। वैसे सच्चाई यही, कांग्रेस इस संकट से निकलने का कोई रास्ता नहीं ढूंढ पा रही। सो नेता दिहाड़ी मजदूर की तरह बयानबाजी कर रहे। तभी तो गुरुवार को सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज शिवराज वी. पाटिल से घोटाले की जांच का एलान किया। पर बीजेपी ने नकार दिया। तो सिब्बल ने एक नया सुर्रा छोड़ दिया। अब यह सुर्रा हताशा, बौखलाहट या एक वकील की वकालत, यह आप ही तय करिए। पर जरा पहले सुर्रा सुनते जाइए। सिब्बल बोले- विपक्ष टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर जेपीसी की मांग कर रहा। पर असल में 20 दिन से संसद की कार्यवाही ठप होने से देश पर 70 हजार करोड़ का बोझ पड़ा है। सो इसकी जेपीसी से जांच होनी चाहिए। पर सवाल सिब्बल से- अगर हंगामे पर जेपीसी की जरूरत, तो किससे मांग कर रहे। खुद मालिक-मुख्तार बने बैठे, क्यों नहीं बनवा लेते जेपीसी। कम से कम जनता यह तो देख ले, एक नील 76 खरब रुपए के घोटाले पर कांग्रेस जिद ठाने बैठी। और संसद सत्र पर खर्च हुए 70 हजार करोड़ को नैतिकता का हथियार बना रही। किसके काल में क्या हुआ, यह भले राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा हो। पर जनता यह जानना चाह रही, टू-जी स्पेक्ट्रम के महाघोटाले में किस-किस ने अपने हाथ धोए। जेपीसी जब सारी सच्चाइयों को उजागर करने में सक्षम, तो सरकार के पीछे हटने का क्या मतलब लगाएं? स्पेक्ट्रम घोटाले में नेता, नौकरशाह, कॉरपोरेट घराने और अपनी मीडिया की सांठगांठ उजागर हो चुकी। नेता, नौकरशाह, कॉरपोरेट का गठजोड़ तो बहुत पुराना। पर इस खेल में अपना मीडिया सही मायने में ‘नैतिकता का स्मगलर’ निकला। सो सचमुच ईमानदारी से जेपीसी जांच हो जाए। तो कम से कम समूचे सिस्टम की एक बार सफाई हो जाए। घोटाले के इस खेल में गुरुवार को नया मोड़ आ गया। जब रतन टाटा और उद्योगपति व राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर एक दूसरे के खिलाफ मैदान में कूद पड़े। चंद्रशेखर ने टाटा को चिट्ठी लिखकर फायदे का आरोप लगाया। तो जवाब में टाटा ने न सिर्फ चंद्रशेखर को लपेटा, अलबत्ता पूरी तरह से कांग्रेस के पाले में खड़े दिखे। सो बीजेपी के प्रकाश जावडेकर ने पहले तल्खी दिखाई। बोले- रतन टाटा कोई जज या जेपीसी नहीं। वह उद्योगपति हैं, जिनकी टेलीफोन कंपनी को यूपीए शासन में काफी फायदा पहुंचा है। पर सुषमा स्वराज और एस.एस. आहलूवालिया ने टाटा की टिप्पणी को दो कॉरपोरेट हस्तियों के बीच जंग बता चुप्पी साध ली। यानी बीजेपी टाटा को नाराज नहीं करना चाहती। राजनीतिक दलों को चंदा कॉरपोरेट घरानों से ही मिलता। सो टाटा की परेशानी को बीजेपी समझ रही। पूरे मामले में टाटा ही सबसे अधिक प्रभावित हो रहे। नीरा राडिया के सिर्फ दस घंटे के टेप ने नेता, नौकरशाह, उद्योग जगत और मीडिया की पोल खोल दी। अभी तो 1990 घंटे का टेप बाकी। सो टाटा का कोर्ट से लेकर खुले आम राजनीति के मैदान में उतरना कोई अचरज की बात नहीं। भ्रष्टाचार पर छिड़ी राजनीतिक जंग के बीच गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस भी मन गया। पर देखो, टाटा जैसे लोगों का पैसा राजनीतिक दल के लिए चंदा कहलाता और आम आदमी का रिश्वत। तभी तो सीवीसी पी.जे. थॉमस ने भ्रष्टाचार का नया अर्थशास्त्र बताया। बोले- आम आदमी रिश्वत देना बंद करे, तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। मांग-पूर्ति का फार्मूला बताया- लोग रिश्वत देते हैं, सो मांग बढ़ती है। पता नहीं थॉमस ने कौन सा अर्थशास्त्र पढ़ा। जब तक मांग न हो, पूर्ति कहां से होगी। वैसे भी आम आदमी की जेब में इतने पैसे नहीं होते, जो बिना मांगे रिश्वत देता फिरे। पर थॉमस तो थॉमस हैं। यानी कुल मिलाकर वही बात, भ्रष्टाचार की भैंस को डंडा क्यों मारा। वह तो व्यवस्था में रच-बस चुका। जिस भैंस का दूध पीकर सभी मस्त हो चुके। सो अब एंटी करप्शन डे का मंत्र यही- भ्रष्टाचार का विरोध कर व्यर्थ समय न गंवाएं।
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09/12/2010
Thursday, December 9, 2010
Wednesday, December 8, 2010
चिदंबरम और सिब्बल की दलील के तो क्या कहने
तो 26/11 का सबक यही, बैताल फिर पेड़ पर जा लटका। वही रोना-धोना- न अत्याधुनिक हथियार, न खुफिया जानकारी। केंद्र-राज्य के बीच ठीकरा फोड़ू बयानबाजी। पर सवाल, 26/11 की दूसरी बरसी के बाद भी वही राग क्यों बज रहा? मल्टी एजेंसी सेंटर (मैक), एनआईए, आधुनिक हथियारों का ताम-झाम किस काम का? वाराणसी के गंगा घाट पर धमाके के बाद भी बुधवार को श्रद्धालुओं ने वही जज्बा दिखाया। पर अपने नेताओं में आवाम की सुरक्षा का जज्बा क्यों नहीं दिखता? आतंकवाद पर फिर वही गीत क्यों गा रहे? मौका-मुआइना करने वाराणसी पहुंचे होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने सुरक्षा में चूक तो कबूली। पर जिम्मेदार यूपी सरकार को ठहरा दिया। बोले- 26/11 और छह दिसंबर की बरसी पर तो एडवाइजरी दी ही थी। इससे पहले 25 फरवरी को पुणे की जर्मन बेकरी विस्फोट के बाद वाराणसी के दशाश्वमेघ घाट पर हमले की जानकारी दी थी। यानी चिदंबरम ने बेहिचक मायावती सरकार पर सुरक्षा में कोताही का आरोप लगा दिया। पर माया की ओर से यूपी के केबिनेट सैक्रेट्री शशांक शेखर ने मोर्चा संभाला। ठोस खुफिया जानकारी न देने के लिए केंद्र को लपेटा। लगे हाथ केंद्र को नसीहत भी दे दी- दलगत राजनीति से ऊपर उठे केंद्र सरकार। सुरक्षा बलों को अत्याधुनिक हथियार दे। खुफिया सूचना का फायदा तभी, जब स्पष्ट और कार्रवाई योग्य हो। केंद्र सामान्य एडवाइजरी जारी कर अपने फर्ज की इतिश्री न माने। शशांक ने 25 फरवरी की खुफिया जानकारी को यह कहते हुए कमजोर बताने की कोशिश की कि वह सूचना दशहरा के परिप्रेक्ष्य में थी। यानी बम धमाके के 14-16 घंटे के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। बीजेपी ने भी कूदने में देर नहीं की। चिदंबरम को कनफ्यूज्ड होम मिनिस्टर बता आतंकवाद का राजनीतिकरण न करने की सलाह दी। पर सवाल, क्या ऐसी हरकतों से हम आतंकवादी मंसूबों पर पानी फेर सकेंगे? आतंकवादी अयोध्या फैसला, एसआईटी से मोदी को क्लीन चिट और कश्मीरी नेताओं के साथ बुरे बर्ताव को हमले का आधार बना रहे। सो राजनीतिक संयम की जरूरत। गुजरात दंगे हों या बाबरी विध्वंस, वह दौर बीत चुका। पर दो साल की मासूम स्वास्तिका का क्या कसूर? पापड़ बेचने वाला हरिया का एक पैर खराब हुआ। पर असल में उस परिवार की कमर टूट गई। फूल बेचने वाली दस साल की राधिका बूढ़ी नानी की देखभाल करती थी। अब नानी हास्पीटल में उस मासूम की देखभाल कर रही। सो अपने नेताओं को वोट बैंक से ऊपर उठ संयम और राजनीतिक एकता की मिसाल पेश करने की जरूरत। संसद में एक मिनट का मौन धारण कर श्रद्धांजलि देना ही सब कुछ नहीं। वैसे भी संसद को तो नेताओं ने मजाक बना रखा। भ्रष्टाचार की आग में उन्नीसवें दिन भी संसद झुलसी। पर दोनों पक्ष पानी के बजाए पेट्रोल डाल रहे। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुप्रीम कोर्ट से लगातार पड़ रहे डंडे और संसद ठप होने से हो रही फजीहत के बाद पूर्व संचार मंत्री राजा पर शिकंजा थोड़ा कसा। बुधवार को सीबीआई ने राजा के दिल्ली, चेन्नई आवास और उनके साथ रहे चार अधिकारियों के घर छापा डाला। वैसे छापे के मायने आप खुद निकालिए। सीबीआई ने स्पेक्ट्रम घोटाले में 21 अक्टूबर 2009 को ही केस दर्ज किया। राजा ने पिछले महीने 14 नवंबर को पद से इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट से सीबीआई से फटकार मिल चुकी। सो यह दिखावा नहीं, तो क्या? क्या कोई आरोपी घर में इतने वक्त तक सबूत छुपाकर रखेगा? पर विपक्ष ने छापे को संसद का दबाव बता अपनी पीठ ठोकी। गुरुदास दासगुप्त ने तो राजा को गिरफ्तार कर तिहाड़ भेजने की मांग कर दी। यानी जेपीसी पर अड़ा विपक्ष अब अडिग हो गया। पर लगातार लपेटे में आ रही सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को थोड़ी राहत दी। ए. राजा लंबे समय से दलील देते आ रहे। उन ने स्पेक्ट्रम आवंटन में अपने पूर्ववर्ती की नीति का ही अनुसरण किया। सो अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच का दायरा 2001 तक ले जाने की हिदायत दी। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा- हम इस जांच में पक्षपाती नहीं होना चाहते। बल्कि 2001 में जो हुआ, उस पर भी नजर डालने की जरूरत है। अब यह सीबीआई का काम है कि वह जांच करे और यह पता लगाए कि क्या हुआ था। सो बीजेपी ने फौरन स्वागत किया। वैसे भी इन आरोपों का बीजेपी कई बार जवाब दे चुकी। प्रमोद महाजन के वक्त पहले आओ, पहले पाओ की नीति के तहत स्पेक्ट्रम की कीमत तय की गई थी। सो बुधवार को नए-नवेले संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने विपक्ष को घेरा। तो बोले- नीति बनाई उन ने, आरोप हम पर लगा रहे। यानी सिब्बल की मानें, तो राजा ने वही किया, जो एनडीए ने तय किया था। सो सवाल सिब्बल से- अगर राजा गलत नहीं, तो इस्तीफा क्यों लिया? क्या सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई लकीर पीट रहीं? सिब्बल भूल रहे, राजा ने चालाकी दिखाई। साल 2001 के मार्केट रेट पर स्पेक्ट्रम की जो कीमत तय हुई थी, 2008 में उसी कीमत पर अपनी पसंदीदा कंपनियों को बांट दी। अब कोई पूछे, जब 2001 की नीति पर ही काम करना था, तो राजा क्या झक मारने के लिए मंत्री बने थे? अगर राजा गलत नहीं थे, तो पीएम मनमोहन ने चिट्ठी क्यों लिखी थी? अगर सिब्बल 2001 के आधार पर स्पेक्ट्रम घोटाले और राजा का बचाव कर रहे। तो सवाल, क्या सिर्फ पूंजीपति कंपनियों के लिए ही दरियादिल? अगर 2001 में तय कीमत पर स्पेक्ट्रम आवंटन जायज, तो सिब्बल यह बताएं, आज आम आदमी को 2001 की कीमत पर राशन, दूध, सब्जियां क्यों नहीं उपलब्ध करा रही सरकार?
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08/12/2010
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08/12/2010
Tuesday, December 7, 2010
भ्रष्टाचार थमे, तो ही हों सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त
स्पेक्ट्रम घोटाले ने हर्षद मेहता कांड का रिकार्ड तोड़ दिया। अठारहवें दिन भी संसद में गतिरोध बना रहा। सो अब कांग्रेस साल- 2010 में दोहरा इतिहास रचने जा रही। सोनिया गांधी का चौथी बार अध्यक्ष बनना स्वर्णिम इतिहास। तो देश के अब तक के सबसे बड़े घोटाले पर जेपीसी न बनाने की जिद ठानकर संसद का पूरा सत्र ठप रखने का एक और बदनुमा इतिहास। पर तमाम झंझावातों के बीच गुरुवार को सोनिया गांधी का हैप्पी बर्थडे। सो मजाक में ही सही, विपक्ष रिटर्न गिफ्ट में जेपीसी की उम्मीद कर रहा। पर स्पेक्ट्रम यानी प्रतिबिंब के इस भ्रष्टाचार में राजनीति के कई विशालकाय प्रतिबिंब दिख रहे। सो जेपीसी न बनाने की रार ठनी हुई। पर कांग्रेस की मुसीबत इस कदर बढ़ चुकी, अब जेपीसी को ठीक से इनकार भी नहीं कर पा रही। सोमवार को यूपीए की मीटिंग में प्रणव मुखर्जी ने अपनों की नब्ज टटोली। ममता बनर्जी ने बंगाल चुनाव के मद्देनजर जेपीसी का दबाव डाला। तो महाराष्ट्र के लवासा प्रौजैक्ट में पर्यावरण मंत्रालय की अड़चन से खफा शरद पवार ने भी जेपीसी की चाबी घुमा दी। सो मंगलवार को जब संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल से पूछा गया- क्या सरकार जेपीसी से इनकार कर रही? तो उनका जवाब कांग्रेस की परेशानी की गाथा बयां कर रहा था। बंसल बोले- अभी तक की स्थिति में जेपीसी नहीं। सो अब सवाल, क्या संसद सत्र का बंटाधार करने के बाद आखिरी दिन जेपीसी बनेगी? यों स्पेक्ट्रम घोटाले में बड़े नेताओं के घरों की इतनी परछाइयां शामिल, जेपीसी के आसार नजर नहीं आ रहे। पर कांग्रेस की हालत पस्त। सो कभी यूपीए की, तो कभी कोर ग्रुप की मीटिंग-मीटिंग खेल रही। पर संसद ठप होने का ठीकरा विपक्ष के सिर न फूटे, सो सत्र के बाद रैली की तैयारी। तो मंगलवार को विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सफाई दी- कभी-कभी संसद का न चलना भी संसद चलने से अधिक प्रभावी होता। यानी संसद में गतिरोध न बनता, तो भ्रष्टाचार का मुद्दा इतना व्यापक न होता। पर भ्रष्टाचार के इस हमाम में हम-आप किसे ईमानदार मानें? अब ए. राजा की एक और कलई खुल गई। जून-2009 में मद्रास हाईकोर्ट के जज रघुपति ने एक केंद्रीय मंत्री की ओर से धमकी मिलने का खुलासा किया था। तब उन ने 12 जून को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन को चिट्ठी लिखी थी। पर तब नाम का खुलासा नहीं हुआ था, फिर भी शक की सुई राजा की ओर ही घूम रही थी। अब मंगलवार को हाईकोर्ट के जज खलीफुल्लाह ने राजा की ओर से धमकी मिलने का खुलासा कर दिया। यानी राजा के किस्से अनेक। पर घोटाले के सीजन में यूपी ने भी कमाल कर दिया। करीब दो लाख करोड़ से अधिक के अनाज घोटाले का खुलासा हुआ। मुलायम सिंह के राज में कोटे के अनाज को एक प्रक्रिया के तहत खुले बाजार में और बांग्लादेश-नेपाल तक सप्लाई किया। करीब 200 अफसर इस घोटाले में संलिप्त बताए जा रहे। तो सचमुच यह घोटाला स्पेक्ट्रम के भी पार जाएगा। भ्रष्टाचारियों को न शर्म, न लिहाज। यूपी के ही एक पुराने जमीन घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव को चार साल की सजा मिल गई। अपने पी.जे. थॉमस को भी यही डर सता रहा। अगर कुर्सी छोड़ी, तो शिकंजा कसेगा। सो सौदेबाजी पर उतरे हुए। पहले मुकदमा न चलाने का फैसला चाह रहे, फिर इस्तीफा देंगे। सो देश में जब अफसरशाही और नेताओं की ऐसी सांठगांठ होगी, तो देश का क्या होगा। वही, जो मंगलवार को वाराणसी के शीतला घाट पर हुआ। आखिर अमेरिका ने ऐसा क्या बंदोबस्त किया, जो 9/11 के बाद कोई आतंकी वारदात न हुई। अमेरिका की तैयारी देखिए, कुछ महीने पहले ही फैजल शहजाद नामक आतंकी ने टाइम्स स्क्वायर में कार बम विस्फोट करने की हिमाकत की। पर अमेरिकी खुफिया और पुलिस तंत्र ने न सिर्फ विस्फोट को होने से रोक लिया, अलबत्ता 24 घंटे के भीतर आतंकी को गिरफ्तार कर उसके लाहौर तक के घर खंगाल डाले। पर हमने 26/11 के मुंबई हमले से क्या सबक सीखा? मुंबई हमले के करीब सवा साल बाद पुणे की जर्मन बेकरी में धमाके हुए। उसके बाद अब मंगलवार को वाराणसी में गंगा तट स्थित शीतला घाट पर धमाका। वह भी तब, जब राम जन्मभूमि विवाद पर हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद बाबरी विध्वंस की पहली बरसी थी और सरकार के शब्दों में समूचे देश में हाई अलर्ट था। पर अलर्ट के अगले दिन ही हुआ धमाका क्या अपनी खुफिया और सुरक्षा तंत्र की पोल नहीं खोल रहा। आखिर 26/11 के बाद हमने क्या तैयारी की? वाराणसी के गंगा तट पर 2006 में भी धमाके हो चुके। पर शाम को होने वाली गंगा आरती के वक्त आतंकी दूध के कंटेनर में बम रख बेरोक-टोक घुस जाए। तो सचमुच गृहमंत्री पी. चिदंबरम का वह बयान सटीक। जिनमें उन ने कहा था- देश की सुरक्षा 90 फीसदी भगवान भरोसे, दस फीसदी सुरक्षा तंत्र के। आखिर देश और अवाम की सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त हों भी कैसे, जब अपने नेता-अफसरान आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हों। सुरक्षा का मामला हो या अवाम का पेट भरने का, व्यवस्था चलाने वाले पहले अपनी जेब और पेट की फिक्र करते। हर काम में पहले कमीशन फिक्स होता, फिर बाकी बची मुट्ठी भर रकम में देश की फिक्र होती। आप खुद देखो, अपने देश में कहां घोटाला नहीं। बंदूक खरीदो या तोप, अनाज खरीदो या परछाईं, चारा हो या चीनी, सडक़ हो या पानी, पहले जेब भरी जाती, फिर काम होता। पर बम धमाके के बाद भी वही राजनीतिक रोना-धोना। सख्त कार्रवाई होगी, आतंकियों के मंसूबे कामयाब नहीं होने देंगे और संयम की अपील।
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07/12/2010
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07/12/2010
Monday, December 6, 2010
तो अब ‘त्रिदोष’ की मारी कांग्रेस बेचारी
मौसम ने करवट ली, ठंड ने कंपकपाना शुरू किया। तो सरकार भी अब ठिठुरने लगी। सीवीसी पीजे थॉमस ने आखिर इस्तीफा नहीं दिया। शायद कांग्रेस और थॉमस ने अब ठान लिया, जब तक सुप्रीम कोर्ट प्याज नहीं खिलाए। तब तक सीवीसी का इस्तीफा नहीं होगा। कोर्ट ने आखिरी सुनवाई के लिए 27 जनवरी की तारीख मुकर्रर करते हुए थॉमस और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया। चीफ जस्टिस एसएच कपाडिय़ा की खंडपीठ ने कहा- हमने फाइल देख ली है और अब आखिरी सुनवाई करेंगे। कोर्ट ने बाकायदा थॉमस को सफाई पेश करने के निर्देश दिए। तो अब थॉमस ने भी कोर्ट के सामने सारे दस्तावेज रखने की दलील दी। पर सुप्रीम कोर्ट की मंशा पिछली दो टिप्पणियों में साफ हो चुकी। फिर भी थॉमस हैं कि कुर्सी से चिपके हुए। सरकार की ओर से इशारे के बाद भी थॉमस अब इस्तीफे को राजी नहीं। यानी सरकार अपने ही जाल में उलझ गई। अब या तो कोर्ट थॉमस की नियुक्ति को रद्द करे, या फिर सरकार महाभियोग लाए। थॉमस भी तकनीकी दांवपेच से वाकिफ। सो भ्रष्टाचार के इस खेल में अकेले शहादत क्यों दें? वैसे भी लानत-मलानत यूपीए सरकार की फितरत बन चुकी। सो अब इंतजार बासठवें गणतंत्र दिवस की अगली सुबह का। पर जरा कांग्रेस की दलील सुनिए। थॉमस की नियुक्ति पर अभी भी कोई पछतावा नहीं। अलबत्ता संवैधानिक पद पर नियुक्ति के सभी मानदंडों को पूरा करने वाला बता रही। अभिषेक मनु सिंघवी ने बहुमत के फैसले से थॉमस की नियुक्ति का पुराना राग दोहराया। पर सवाल, जब पैनल में पीएम-गृहमंत्री और नेता विपक्ष हो। तो क्या फैसला होगा, कोई भी अनुमान लगा सकता। तभी तो सुषमा ने थॉमस का विरोध किया। पर पीएम-गृहमंत्री ने सत्ता की धौंस जमा दी। क्या इसे बहुमत का फैसला कहेंगे? क्या पीएम या गृहमंत्री कभी सपने में भी विपक्ष के सुर में सुर मिला सकते? सो थॉमस की नियुक्ति बहुमत का फैसला नहीं। अलबत्ता सत्तापक्ष की दादागिरी कहिए। पर अब कांग्रेस और सरकार बेचारगी की मुद्रा में। थॉमस कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं। सो सारी फजीहत कांग्रेस की झोली में गिर रहीं। पर फिलहाल कांग्रेस की हालत नंगा नहाए क्या, और निचोड़े क्या जैसी। कहते हैं ना, मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जेपीसी जांच को लेकर संसद ने गतिरोध के पुराने रिकार्ड की बराबरी कर ली। हर्षद मेहता कांड के वक्त 17 दिन के गतिरोध के बाद जेपीसी बनी थी। सोमवार को स्पेक्ट्रम मामले में गतिरोध का सत्रहवां दिन था। सो अठारहवें दिन इतिहास दोहराएगा, ऐसी उम्मीद तो नहीं दिख रही। पर कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम जरूर हो चुकी। बंगाल चुनाव के मद्देनजर ममता बनर्जी ने भी जेपीसी मानने का दबाव बढ़ा दिया। शरद पवार और करुणानिधि भी पक्ष में। करुणानिधि को लग रहा, अगर गतिरोध जारी रहा, तो तमिलनाडु में अहम चुनावी मुद्दा बनेगा। और अगर जेपीसी बन जाए, तो फिलहाल राजा पर बना फोकस शिफ्ट होकर मनमोहन की ओर जाएगा। यानी भ्रष्टाचार के भंवर में डूबने की आशंका। सो करुणानिधि की दलील सुनिए। उनने कहा- बेहद अफसोस की बात है कि पढ़े-लिख भी यह मानने को तैयार हैं कि एक व्यक्ति एक नील 76 खरब रुपए की बड़ी राशि का घोटाला कर सकता। करुणानिधि ने बकासुर का जिक्र करते हुए कहा- लोग सोचते थे बकासुर का मुंह 30 हजार मील लंबा हो सकता था, जिसकी भूख कभी शांत नहीं होती। यों करुणा के कहने के निहितार्थ अलग। पर उन ने यह तो साफ कर दिया, घोटाले में एकला राजा ही नहीं, समूची टीम शामिल। सचमुच अगर राजा ही दोषी होते, तो कांग्रेस जेपीसी बनाने में इतनी हील-हवाली न करती। पर कांग्रेस की मुश्किल सोमवार को तब और बढ़ गई, जब गैर यूपीए-गैर एनडीए के 11 दलों ने न सिर्फ जेपीसी मांगी, अलबत्ता पीएम को भी तलब करने का इरादा जता दिया। सीताराम येचुरी और गुरुदास दासगुप्त ने सवाल उठाया- जब बिल क्लिंटन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री संसदीय समिति के सामने पेश हो सकते। तो हमारे शासन प्रमुख को बुलाने में क्या गलत। वैसे भी मनमोहन को जेपीसी का सामना करने का पुराना अनुभव। येचुरी ने तो साफ कहा- देशहित में पीएम जेपीसी से भयभीत नहीं, पर कांग्रेस जरूर डरी हुई। सचमुच कांग्रेस का डर सोमवार को उजागर हो गया। जब यूपीए की इमरजेंसी मीटिंग बुला ली। विपक्षी दलों ने खम ठोक दिया- शीत सत्र में जेपीसी नहीं बनी, तो बजट सत्र में भी मांग जारी रहेगी। यानी कांग्रेस का संकट अभी खत्म नहीं। जेपीसी और थॉमस का मामला तो गले में हड्डी की तरह अटक चुका। अगर शीत सत्र पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, तो संसदीय इतिहास में एक और काला अध्याय जुड़ेगा। पर बात मुसीबत की, तो लुटी-पिटी कांग्रेस को जम्मू-कश्मीर के स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पताल पहुंचाने का बंदोबस्त कर दिया। कांग्रेस कोटे से मंत्री श्यामलाल शर्मा ने कश्मीर समस्या का फार्मूला रैली में सुझा दिया- कश्मीर को आजादी दे दो, जम्मू को राज्य और लेह-लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दो। यानी संसद के प्रस्ताव और संविधान की भावना के खिलाफ राष्ट्रद्रोह जैसा बयान। सो अब कांग्रेस जेपीसी और थॉमस के बाद श्यामलाल शर्मा के बयान में फंसी। पुराने जमाने में कहते थे- त्रिदोष यानी एक साथ तीन बीमारी- कफ, पित्त और वात का कोई इलाज नहीं। अब कांग्रेस एक साथ तीन बीमारी का सामना कैसे करेगी, यह वक्त ही बताएगा।
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06/12/2010
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06/12/2010
Wednesday, December 1, 2010
निर्लज्जता की पराकाष्ठा या पराकाष्ठा के पार निर्लज्जता
निर्लज्जता की पराकाष्ठा कहें या पराकाष्ठा के पार निर्लज्जता। पी.जे. थॉमस ने सीवीसी की कुर्सी छोडऩे से इनकार कर दिया। तो सरकार ने घोटाले की फाइल से दूर रखने की दलील। विपक्ष ने भी संसद में सरकारी काम निपटाने में हंगामे के बीच ही सहयोग देना शुरू कर दिया। सो लोकतंत्र के मंदिर से पक्ष-विपक्ष की नौटंकी कब तक चलेगी, देखना होगा। यों पंद्रहवीं लोकसभा के फोटो सैशन की तैयारी पूरी हो गई। गुरुवार को सांसदों के फोटो खिंचेंगे, ताकि आने वाली पीढिय़ां इतिहास के तौर पर निहार सकें। पर संसद से पहले बात थॉमस की, जो लोक-लिहाज की परवाह किए बिना कह गए- मैं अभी भी सीवीसी का बिग बॉस। पर सवाल, जब सरकार टू-जी घोटाले की फाइल से थॉमस को दूर रख रही, तो पद पर रखने का क्या मतलब? जब सुप्रीम कोर्ट थॉमस की नीयत पर संदेह जाहिर कर चुका। तो घोटाले की फाइल से थॉमस को दूर रखने की सरकारी दलील और थॉमस का इस्तीफे से इनकार का क्या मतलब? सुप्रीम कोर्ट की पहली टिप्पणी के बाद ही गृह मंत्रालय से थॉमस की विदाई की खबर निकलने लगी थी। पर चिदंबरम से मुलाकात के बाद थॉमस का ऐसा तुर्रा क्यों? क्या यह कांग्रेस की कोई रणनीति या पोल-खोल की धमकी? चाहे जो भी हो, थॉमस की विदाई तय। अब कांग्रेस को यह तय करना कि सुप्रीम कोर्ट की चपत से ही थॉमस को चलता करती या चांटा खाकर। यों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज के.टी. थॉमस का मानना, पी.जे. थॉमस का हट जाना ही पद की गरिमा के हित में। पर जब सत्ता का नशा हो, तो कांग्रेस और थॉमस भला क्यों न इतराएं। तभी तो चौदहवें दिन भी संसद ठप हुई। पर सरकार और विपक्ष अपनी जिद से पीछे हटने को राजी नहीं। अब गतिरोध टूटने की सारी उम्मीदें दम तोड़ चुकीं। सो जरूरी संवैधानिक कामकाज निपटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई। पर तेरह दिन यानी तेरहवीं के बाद चौदहवें दिन सरकार के साथ-साथ विपक्ष की भी पोल खुल गई। विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ा। पर इस कदर भी नहीं कि सरकार को मजबूर कर सके। तभी तो प्रणव मुखर्जी ने बुधवार को तडक़े विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को फोन लगाया। अनुपूरक अनुदान मांग पारित कराने पर सहयोग मांगा। तो सुषमा ने इनकार के बजाए आडवाणी से गुफ्तगू कर एनडीए की मीटिंग बुलवा ली। मीटिंग में आडवाणी सरीखे नेताओं ने दलील दी- संवैधानिक कामकाज में रुकावट नहीं होना चाहिए। क्योंकि हमारी लड़ाई सरकार से है, संविधान से नहीं। सो विपक्ष ने हंगामे में ही अनुदान मांगें पारित कराने की हरी झंडी दे दी। प्रणव दा को संदेशा भेजा गया, तो प्रणव ने आशंका जताई। कहीं कोई विपक्षी सांसद बिल फाडऩे या स्पीकर टेबल तक पहुंचने की कोशिश तो नहीं करेगा। विपक्ष ने प्रणव दा को इस बात का भी पूरा भरोसा दे दिया। सो बुधवार को लोकसभा में अनुपूरक अनुदान मांगें पारित हो गईं। अब गुरुवार को राज्यसभा में पारित होंगी। इसी तरह रेलवे की अनुदान मांगें भी पारित कराई जाएंगी। यानी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की जुगलबंदी देखिए, एक तरफ जेपीसी की जिद। तो दूसरी तरफ बिल पास कराने में सरकार को सहयोग। अगर विपक्ष सचमुच भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गंभीर, तो इसी दांव से सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर देता। अब अगर विपक्ष की यह दलील मान लें कि वह सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहता। तो क्या जिस तरह बिल पास हुआ, क्या वह संवैधानिक? अगर सब कुछ हंगामे में ही निपट जाएगा, तो फिर संसद का क्या औचित्य? अगर सरकार और विपक्ष को संविधान की इतनी ही फिक्र। तो गतिरोध खत्म कर ऐसा फार्मूला निकालते कि संसद की गरिमा बरकरार रहती। पर दोनों को देश या संविधान की फिक्र कम, वोट बैंक की राजनीति अधिक। अगर सरकार के जरूरी कामकाज संसद में ऐसे ही निपट जाएं। तो भला कौन सी सरकार संसद चलाना चाहेगी। सरकार तो हमेशा इसी फिराक में रहती कि कम समय में अधिक काम निपट जाए। ताकि विपक्ष की घेरेबंदी से बचा जा सके। वैसे भी संसद की शक्तियों में आई गिरावट पर डा. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी मौजूं टिप्पणी कर चुके। उनके मुताबिक- यह सत्य है कि कानून बनाने एवं टेक्स लगाने की सर्वोपरि सत्ता संसद में निहित है। पर वास्तविकता यह है कि विधि अधिनियमों का गर्भाधान और जन्म मंत्रालयों में होता है। संसद में सिर्फ मंत्रोच्चारण के साथ उनका उपनयन संस्कार कर उन्हें औपचारिक यज्ञोपवीत दे दिया जाता है। सचमुच सैद्धांतिक तौर पर संसद की मर्जी से ही सरकार रह सकती। पर व्यवहार में केबिनेट ने संसद के काम और अधिकार हथिया लिए। तभी तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां भी सरकार को झकझोर नहीं पा रहीं। बुधवार को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने फिर कहा- आंखों को जो दिख रहा है, उससे अधिक भी कुछ है। पर सरकार ने अब बेशर्मी का चश्मा पहन लिया। विपक्ष ने भी संसद के काम निपटाने में सहयोग दे दिया। सो जेपीसी नहीं, अब सत्रावसान की तैयारी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने गुस्से में जो कहा और किया, सुनिए। बोले- क्या जेपीसी के सदस्य बनने वाले नेता पुलिस अधिकारी बनेंगे? यह कहकर मनीष तिवारी बीजेपी नेता राजीव प्रताप रूड़ी की कार में बैठकर निकल लिए। सो सवाल करनी नहीं, कथनी पर। जब कांग्रेस प्रवक्ता की जेपीसी के बारे में ऐसी सोच। तो फिर संसद चलाने पर इतना खर्च क्यों? क्यों न संसद का विसर्जन कर कांग्रेस को हमेशा के लिए सत्ता सौंप दें।
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01/12/2010
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01/12/2010
Tuesday, November 30, 2010
संसद ठप हो या सडक़ें जाम, भुगतेगी जनता ही
‘मुझसे कहा गया कि संसद देश की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है। जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है। लेकिन क्या यह सच है?’ संसद का ताजा हाल देख प्रख्यात कवि सुदामा पांडे धूमिल की ये पंक्तियां बिलकुल सटीक। शीत सत्र की शुरुआत नौ नवंबर को हुई। पर भ्रष्टाचार का जिन्न न सिर्फ सरकारी खजाने को, अलबत्ता संसद सत्र का पूरा महीना निगल गया। अब दिसंबर में छुट्टियों समेत तेरह दिन बचे। पर वक्त से पहले सत्र की तेरहवीं मानकर चलिए। गतिरोध तोडऩे को तीसरी मीटिंग भी नाकाम रही। या यों कहें, मीटिंग जहां से शुरू हुई, वहीं आकर खत्म हो गई। सरकार की ओर से प्रणव मुखर्जी तीन दफा प्रयास कर चुके। पहली मीटिंग रस्म अदायगी। दूसरी मेंं पीएसी के साथ बहुआयामी जांच एजेंसी का प्रस्ताव। तो तीसरी बार फोन पर सुषमा-आडवाणी को सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग में सीबीआई जांच का प्रस्ताव रखा। पर विपक्ष ने सरकार के कामचलाऊ प्रस्तावों को सुनते ही नकार दिया। सो अब मंगलवार को स्पीकर मीरा कुमार ने पहल की। पर मीटिंग में कोई नया प्रस्ताव नहीं। अलबत्ता सरकार ने एक बार फिर अपने पुराने नुस्खे ही परोस दिए। तो विपक्ष ने भी अपनी वही धुन सुना दी। जिस पर सरकार थिरकने को राजी नहीं। यानी बैताल वापस पेड़ पर लटक गया। अब इतना बड़ा घोटाला, जिसमें न सिर्फ करने वाला, अलबत्ता गिनती भी हांफने लगे। और सरकार जेपीसी न बनाने की जिद ठान ले। तो क्या संसद को देश की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण मानेंगे? क्या जनता को जनता के नैतिक विचारों का समर्पण कहेंगे? जब समूचा विपक्ष विचारधारा की राजनीति से परे हट एक सुर में जेपीसी की मांग कर रहा। तो सत्तापक्ष को इतना गुरेज क्यों? क्या भ्रष्टाचार कांग्रेस या सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं? ग्लोबल करप्शन इंडैक्स में भारत 84वें से 87वें स्थान पर पहुंच गया। तो सवाल, क्या जब तक नेता देश को न बेच दें, तब तक भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं? आखिर कांग्रेस और सरकार को कब बात समझ आएगी? सुप्रीम कोर्ट लगातार टिप्पणियां कर रहा। पर सरकार को शर्म है कि आती नहीं। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को महाघोटाला, सीबीआई को फटकार, पीएमओ से सवाल जैसी बातें हो चुकीं। अब तो मंगलवार को सीवीसी पी.जे. थॉमस की नियुक्ति पर भी आईना दिखा दिया। थॉमस पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के साथ सैक्रेट्री रह चुके। केरल के पॉम ऑयल घोटाले में चार्जशीट। सो नियुक्ति संबंधी पैनल में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने थॉमस का विरोध किया था। पर पैनल के दो अन्य मेंबर पीएम और होम मिनिस्टर ने सत्ता की धौंस दिखाई। बहुमत से थॉमस को सीवीसी की कमान थमा दी। पर अब सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ा, तो खुद की सांस थमी हुई। थॉमस को थेंक यू कहने का इशारा भी हो गया। थॉमस ने होम मिनिस्टर चिदंबरम से मुलाकात की। तो अब थॉमस का इस्तीफा महज औपचारिकता। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो-टूक कहा- सीबीआई कुल मिलाकर सीवीसी की निगरानी में काम करती। ऐसे में थॉमस के लिए स्पेक्ट्रम घोटाले की निष्पक्ष तरीके से जांच की निगरानी करना मुश्किल होगा। क्योंकि जब थॉमस टेलीकॉम सैक्रेट्री थे, तब उन ने स्पेक्ट्रम आवंटन के उस फैसले को सही ठहराया था। जिसकी आज कोर्ट और सीबीआई समीक्षा कर रही। अब ऐसी कठोर टिप्पणी के बाद फौरन थॉमस का इस्तीफा नहीं हुआ। तो यह कांग्रेस राज में ही संभव। बूटा सिंह के बिहार विधानसभा भंग करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया था। फिर भी कांग्रेस ने फौरन बूटा को रवाना नहीं किया। तभी तो मंगलवार को वनवास से लौटे कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कानूनी तुर्रा दिखाया। बोले- थॉमस इस्तीफा देंगे या नहीं, यह पता नहीं। लेकिन वह पद की सभी योग्यताएं पूरी करते हैं और सीवीसी की जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर सकते हैं। अब कांग्रेस की इस दलील को सच मानेंगे या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को? पर सवाल, जेपीसी से कन्नी क्यों काट रही कांग्रेस? सर्वदलीय मीटिंग में सरकार की ओर से फारुख अब्दुल्ला ने दलील दी- पिछली चार जेपीसी का कोई नतीजा नहीं निकला। सो इस मांग का कोई औचित्य नहीं। पर विपक्ष की नेता सुषमा ने दलील दी- अगर सरकार की यही सोच, तो क्यों न रूल बुक से जेपीसी निकाल दे। ताकि न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। मीटिंग में स्पीकर ने सिर्फ प्रश्नकाल चलने देने की भी अपील की। पर विपक्ष ने दो-टूक कह दिया- प्रश्नकाल ही नहीं, सारा काम होगा, पर पहले जेपीसी। फिर भी सरकार ने मीटिंग में जेपीसी से इनकार कर दिया। अब सरकार के पास दो ही विकल्प- या तो जेपीसी माने, वरना हंगामे में ही जरूरी विधायी कामकाज निपटा सत्रावसान करे। सत्ताधारी खेमे से विपक्ष पर संसद न चलने देने का ठीकरा फोडऩे की मुहिम पहले ही शुरू हो चुकी। सो अब एनडीए ने संसद से सडक़ तक की रणनीति बना ली। दिल्ली या मुंबई में भ्रष्टाचार पर विराट रैली कर सरकार को बेनकाब करने का फैसला किया। पर एनडीए के साथ समूचा विपक्ष एक मंच पर आए, इसका बीड़ा शरद यादव को सौंप दिया। यों इसी बीजेपी ने महंगाई पर संसद की विपक्षी एकता को सडक़ पर दिखाने से इनकार कर दिया था। पर अब बोफोर्स दोहराने और तख्ता पलट का मंसूबा पाल समूचे विपक्ष को मंच पर लाना चाह रही। पर इस राजनीति में कहीं स्पेक्ट्रम का भ्रष्टाचार भी बोफोर्स जैसी जांच बनकर न रह जाए। वैसे भी जेपीसी से संसद ठप हो या रैली से सडक़ें जाम, नुकसान तो आम जनता ही झेलेगी।
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30/11/2010
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30/11/2010
Monday, November 29, 2010
तो क्या जेपीसी की जिद पर अब सौदेबाजी होगी?
विकीलिक्स के खुलासों ने अमेरिका के प्रति दुनिया की सोच को पुख्ता कर दिया। अमेरिका ने विकीलिक्स को रोकने की तमाम कोशिशें कीं, पर नहीं रोक पाया। सो गुप्त दस्तावेज जारी हुए। तो अमेरिका की कथनी और करनी का भेद खुल गया। सामने तो हर देश की तारीफ, पर पीठ पीछे ब्लादीमिर पुतिन से लेकर हामिद करजई, निकोलस सरकोजी, गॉर्डन ब्राउन, कर्नल गद्दाफी आदि नेताओं के लिए गाली की भाषा का इस्तेमाल। किसी को कुत्ता, किसी को सनकी, चरित्रहीन, किसी को मंदबुद्धि और कई अभद्र शब्दों से उद्बोधन। यहां तक कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मुखिया तक की जासूसी कराने में कोताही नहीं बरती। यानी अमेरिका को अपने सिवा किसी पर भरोसा नहीं। सो खुलासों ने अमेरिका की बोलती बंद कर दी। खुद हिलेरी क्लिंटन दुनिया के देशों को फोन घुमा खुलासे पर भरोसा न करने की अपील करती रहीं। हिलेरी ने भारत से भी अपील की। यों अभी भारत के बारे में खुलासा आना बाकी। जॉर्ज बुश हों या बराक ओबामा, अपने मनमोहन की तारीफ में खुब कसीदे पढ़ चुके। पर अंदरूनी सोच क्या, यह तो आने वाले खुलासों में ही मालूम पड़ेगा। वैसे भी अमेरिका की फितरत कौन नहीं जानता। सो दुनिया में विकीलिक्स के खुलासों से खलबली, तो अपने देश में भ्रष्टाचार की रोज नई परतें उधड़ रहीं। संसद के शीत सत्र को तो पाला मार चुका। अब शायद मंगलवार को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार सर्वदलीय मीटिंग कर आखिरी पहल करेंगी। पर कोई नतीजा निकलेगा, आसार नजर नहीं आ रहे। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों में से कोई अपना पतनाला हटाने को राजी नहीं। सो अब बहती गंगा में सुरेश कलमाड़ी भी हाथ धोने आ गए। सोमवार को स्पीकर मीरा कुमार से मिल सीधे मीडिया स्टैंड पहुंच गए। बोले- कॉमनवेल्थ घोटाले में मैंने कुछ गलत नहीं किया। किसी भी जांच को तैयार। सो मैंने स्पीकर से मिलकर संसद में बयान देने की अनुमति मांगी। पर कोई पूछे, जब संसद न चल रही और ना ही चलने के कोई आसार। तो बयान क्या खाक देंगे। अगर कलमाड़ी सचमुच इतने ईमानदार, तो मानसून सत्र में बहस के दौरान चुप क्यों रहे? तब शरद यादव जैसे नेता ने शेरू, मोटी चमड़ी जैसे तमगे दिए। पर सचमुच कलमाड़ी पर कोई असर नहीं दिखा। सचमुच घोटालेबाज किस हद तक गिर सकते, इसकी मिसाल मुंबई में दिख रही। आदर्श सोसायटी घोटाले में अशोक चव्हाण की कुर्सी गई। तो अब अहम दस्तावेज गायब हो रहे। पहले महाराष्ट्र के शहरी विकास विभाग में रखी आदर्श सोसायटी की फाइल से चार अहम पन्ने गायब हुए। जिनमें नेताओं-अफसरों की सिफारिश से लेकर सोसायटी की खातिर सडक़ की चौड़ाई कम करने के आदेश। यों कंप्यूटर में रखी सॉफ्ट कॉपी सीबीआई को मिल गई। पर सोचिए, ऐसी ‘आदर्श’ चोरी किसने की होगी? अब सोमवार को खुलासा हुआ, डिफेंस इस्टेट से एनओसी देने वाले दस्तावेज गायब हो गए। आखिर घोटाला करने वाले अपने देश के महानुभाव क्या दिखाना चाहते? क्या सचमुच सत्य, अहिंसा और बापू के दिखाए आदर्श की भी तीस जनवरी 1948 को हत्या हो गई? आखिर अपने सरकारी तंत्र में ऐसा कौन सा दीमक। जो कभी भोपाल त्रासदी के मुख्य गुनहगार वारेन एंडरसन को भगाने के रिकार्ड गृह मंत्रालय में नहीं मिलते। तो कभी बोफोर्स दलाली के आरोपी ओतावियो क्वात्रोची के भगाने वालों का पता नहीं चलता। कभी सिख विरोधी नरसंहार के दोषियों का पता नहीं चलता। आखिर अपनी व्यवस्था को चलाने वाले देश में कौन सा ‘आदर्श’ स्थापित करना चाहते? क्या लूट-खसोट, इधर का माल उधर, दूसरों की जेब साफ कर अपनी भरना यही अपनी व्यवस्था का आदर्श? फिर भी कोई भ्रष्टाचार पर हेकड़ी दिखाए। तो उसे क्या कहेंगे आप? कांग्रेस ने एक बार फिर एलान कर दिया- न जेपीसी मानेंगे, न सत्रावसान करेंगे। पर अंदरखाने कांग्रेस कैसे लकीर पीट रही, सबको मालूम। मुसीबतों का सिलसिला थम नहीं रहा। आंध्र में नेतृत्व परिवर्तन भी काम नहीं कर पाया। आखिर जगन मोहन रेड्डी और पूर्व सीएम वाएसआर की पत्नी लक्ष्मी ने इस्तीफा दे दिया। मां-बेटे ने कुर्सी और कांग्रेस दोनों छोड़ दीं। सो कांग्रेस की बोलती बंद हो गई। जगन ने सोनिया गांधी को भेजी चिट्ठी में खूब आरोप लगाए। पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया से परहेज किया। अब कांग्रेस को जगन के अगले कदम का इंतजार। सो फिलहाल संसद में विपक्ष का तोड़ ढूंढ रही। बीजेपी नेता अरुण शौरी के बयान ने सहारा दिया। शौरी ने खुलासा किया- मुकेश अंबानी के खिलाफ संसद में न बोल सकूं, सो आखिरी वक्त में पार्टी ने मेरा नाम हटा वेंकैया को मौका दिया। सो कांग्रेस को मौका मिल गया। अब कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने पूछ लिया- अब तक तो सिर्फ मैच फिक्स हुआ करते थे। बीजेपी की नैतिकता देखिए, संसद की बहस भी फिक्स होने लगी। पर शौरी का खुलासा तो कांग्रेस के लिए महज सीढ़ी। असली तोड़ तो छत्तीसगढ़ में जाकर मिला। दिल्ली के वरिष्ठ नेता की सिफारिश पर रमन सरकार ने पुष्प स्टील को माइनिंग का लाइसेंस दे दिया। जिसे बाद में हाईकोर्ट ने अवैध ठहरा दिया। पर अब कांग्रेस का दावा, सिफारिश करने वाले बीजेपी के बड़े नेता का नाम उसे मालूम। सो मनीष तिवारी बोले- रमन सिंह उस बड़े नेता का नाम बताएं, वरना हम बताएंगे। सचमुच सिफारिश करने वाले में जिस बीजेपी नेता का नाम, गर खुलासा हो जाए, तो बीजेपी की जड़ें हिल जाएंगी। सो कांग्रेस ने इशारा कर दिया, ताकि जेपीसी की जिद छोड़ विपक्ष किसी और समझौते पर राजी हो जाए। यानी ‘आदर्श’ बनाने में बीजेपी-कांग्रेस चोर-चोर सगे भाई।
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29/11/2010
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29/11/2010
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